Wednesday, 14 August 2013

कहानी - भड़-भड़ बाजा - गिरिजेश


प्रिय मित्र, आज आइए एक कहानी सुनिए। एक होता है भड़-भड़ बाजा। गली-मुहल्ले के कोमल-किशोर बच्चे किसी सड़क के आवारा कुत्ते को या किसी धोबी के छुट्टा टहलते हुए गधे को बड़े प्यार से पकड़ लेते हैं और उसकी पूँछ में एक खाली कनस्तर एक रस्सी से बाँध कर ज़ोर से हिला देते हैं। वह कनस्तर हिलाते ही ज़ोर-ज़ोर से भड़भडाता है। उसकी आवाज़ सुन कर और उससे परेशान होकर वह कुत्ता या गधा ज़ोर से भागता है। जैसे-जैसे वह भागता जाता है, वैसे-वैसे उसके पीछे बँधा कनस्तर और भी भड़भडाता जाता है। इस बेहूदी आवाज़ के पीछा करते रहने से बेतहाशा तंग होकर बेचारा मासूम गधा पूरी ताकत लगा कर लगातार भागता चला जाता है। भागते-भागते वह बेदम होकर फेंचकुर फेंकता हुआ आख़िरकार रुक जाता है। और उसके रुकते ही कनस्तर की आवाज़ भी, जो उसे लगातार परेशान करती रही थी, थम जाती है। 

हममें से अधिकतर की यही कहानी है। हमारे परिजन और 'शुभचिंतक' भी अपने अधूरे सपनों और अपनी नाकाम कामनाओं को हमारे तरुणाई तक पहुँचते ही हमारे पीछे उसी खाली कनस्तर की तरह बाँध कर अबोध बच्चों की तरह ही लगातार बजाते रहते हैं। उनको हमारे अपने खुद के सपनों और महत्वाकांक्षाओं की रंचमात्र भी परवाह नहीं होती। वे हमसे केवल अपनी माँगों को साम-दाम-दण्ड-भेद के सहारे किसी भी कीमत पर पूरा करवाना चाहते हैं। इसके लिये वे किसी भी हद त़क उतर कर हमको तब तक हर मुमकिन तरीके से मनोवैज्ञानिक ब्लैकमेल करते रहते हैं, जब तक हम फेंचकुर फेंकने वाले गधे की तरह आखिरकार आख़िरी हद तक परेशान होकर ठहर नहीं जाते। 

उनके द्वारा इस तरह बेहूदे और शातिर तरीके से लगातार पीछा किये जाने से परेशान रहने के चक्कर में हमारी तरुणाई के शानदार और सुनहरे वर्ष एक के बाद एक लगातार बर्बाद होते चले जाते हैं। अनवरत तनावग्रस्त मनोदशा में अपने हिस्से के काम को और भी बदतर तरीके से करते हुए हम सफलता के सुख से और भी वंचित होते चले जाते हैं। ऐसी हालत में तनाव और नाकामी से परेशान होकर हम तरह-तरह की दवाओं और नशों का सहारा लेने की ओर भागते हैं। मगर डूबते को तिनके का सहारा भी राहत नहीं दे पाता। तब कुछ लोग खूब-खूब परेशान होकर आख़िरकार पागल हो जाते हैं और कुछ थक-हार कर आत्महत्या करने तक जा पहुँचते हैं। 

मगर कुछ मुट्ठी भर तरुण/तरुणी थोड़ी सूझ-बूझ और बहादुरी से काम लेते हैं और दो-टूक शब्दों में अपने चालाक 'शुभचिन्तक' परिजनों से विनम्रता किन्तु दृढ़तापूर्वक प्रतिवाद करते हैं। वे उनको स्पष्ट तौर पर बता देते हैं कि वे उनको पूरा सम्मान और स्नेह देते तो हैं। मगर वे अब बच्चे नहीं हैं और उनको उनके अपने तरीके से जीने का और अपनी ज़िन्दगी का हर फैसला ख़ुद से लेने का अधिकार है और इस अधिकार को वे किसी भी कीमत पर किसी और के हाथों में गिरवी नहीं रखेंगे। अपनी आज़ादी को वे अपने सभी स्नेह-सिक्त सम्बन्धों से बढ़ कर प्यार करते हैं। और उसके लिये कोई भी कीमत चुकाने के लिये हर-हमेशा तैयार रहते हैं। अन्जाम चाहे जो भी हो, वे किसी भी कीमत पर किसी से भी इस मामले में समझौता नहीं करते, तो नहीं करते। 

और फिर धैर्य के साथ प्रतीक्षा करते रहने के बाद एक दिन वह दिन भी आता है, जब पिछली पीढ़ी के पिछड़े हुए परिजन नयी पीढी के फैसलों के सामने अपना घुटना टेक देते हैं, हार मान लेते हैं, पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं और ठहरे हुए सम्बन्ध नयी ज़मीन पर और भी अधिक सम्मान और समानता के आधार पर और भी मज़बूत होकर निखर उठते हैं।

मेरा विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस कहानी को पढ़ कर सोचिये कि कहीं आपके साथ भी तो ऐसा ही नहीं हो रहा है! और अगर हाँ, तो फिर आप क्या करना चाहते हैं? घुट-घुट कर जीना और हरदम परेशान रहना या फिर अपनी आज़ादी के हक़ में थोड़ा कठोर फैसला लेना और हर तरह के तनाव से मुक्त हो जाना और पूरी सहजता से पूरे सुकून से ज़िन्दगी की जंग में एक के बाद एक सफलता हासिल करते जाना ! 
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

Wednesday, 7 August 2013

पड़ोसी ! - गिरिजेश


हिन्दुस्तान का दुश्मन पाकिस्तान,
पाकिस्तान का दुश्मन हिन्दुस्तान,
दोनों का दोस्त अतिमहाबली अमेरिका !
अमेरिका - दुनिया का दुश्मन !
कितना शातिर है अमेरिका !
कितने मासूम हैं लोग !
लोग जो ग़रीब हैं, मजदूर हैं, मजबूर हैं.
इसकी, उसकी, सब की सुनते हैं.
मगर फिर भी कुछ नहीं गुनते हैं.
केवल महँगाई डाइन के खाते जाने पर
मज़बूरी में अपना सर धुनते हैं.
उनको जगाना है, उनको बताना है,
उनको समझाना है, उनको सिखाना है;
हिन्दुस्तान का दुश्मन पाकिस्तान नहीं है,
पाकिस्तान का दुश्मन हिन्दुस्तान नहीं है,
दोनों पड़ोसी हैं, दोनों के बीच में झगड़ा नहीं रगड़ा है.
और इस रगड़े की वजह सीमा नहीं,
अमीरी है दोनों के धनपशुओं की,
जो अवाम का खून चूसने से बढ़ती जा रही है !
सुपर प्रॉफिट कमाने वाले अतिमहाबली के ही इशारे पर होते हैं -
दंगे, सीमा-युद्ध, आतंकी हमले !
वही बेचता है हथियार लड़ाई के
हिन्दुस्तान को भी और पाकिस्तान को भी,
और देता है रिश्वत नेताओं-अधिकारियों-दलालों को
ख़रीदने के लिये मौत के औज़ार !
उसी के चलते बढ़ती है महँगाई डाइन की लपलपाती ज़ुबान !
उसी के चलते बिक रहा है देश का सारा संसाधन !
वही ख़रीद रहा है हमारा ईमान !
अगर वाकई इनको ख़त्म करना है,
अगर वाकई दोनों पड़ोसियों के बीच शान्ति और भाई-चारा बनाना है,
अगर वाकई खुशहाली के माहौल में सुकून से साँस लेनी है,
अगर वाकई बनानी है एक बेहतर दुनिया अपने बच्चों के लिये,
तो ख़त्म करना होगा
मुट्ठी भर धन-कुबेरों की भीषण और वीभत्स अमीरी को,
तोड़ना होगा दोस्ती का रिश्ता
दुनिया के दुश्मन अतिमहाबली अमेरिका से !
पकड़ना होगा कस कर पड़ोसी का हाथ
और देना होगा मुसीबत में एक दूसरे का साथ !

(8.8.13. 8.45 a.m.)

सवाल सम्बन्ध का :- गिरिजेश


सवाल सम्बन्ध का :-
प्रिय मित्र, अपने कविहृदय मित्र अशोक कुमार पाण्डेय जी के वक्तव्य में "....जहाँ वैचारिक एकता नहीं है, वहां दोस्ती का कोई सम्बन्ध सिर्फ छलावा है." इसे पढ़ कर मुझे भी हार्दिक दुःख ही हो रहा है. मार्क्स के शब्दों "आने-पाई" के सम्बन्धों पर टिकी यह अमानुषिक व्यवस्था मनुष्य और मनुष्य के बीच के सभी तरह के गरिमामय सम्बन्धों को लगातार तोड़ती जा रही है. यह हर कदम पर हमारा अमानवीयकरण करती जा रही है. 

दशकों तक हर तरह से बचाने की कोशिश करने के बावज़ूद मेरे तो सभी के सभी भावनात्मक सम्बन्ध बहुत जल्दी-जल्दी टूट चुके, रक्त-सम्बन्ध बहुत पहले ही पीछे रह गये, बचे-खुचे स्नेह-सम्बन्ध भी एक के बाद एक करके लगातार बिखरते ही जा रहे हैं, मेरे प्रति मैत्री और अविश्वास - दोनों ही तरह के विचार अनेक लोगों के मन में एक साथ पनपते रहे हैं. और तो और मैंने ही नहीं, हममें से अनेक साथियों ने वैचारिक एकता के नाम पर भी जितना ढोंग झेला है, उसके चलते मन बुरी तरह खट्टा हो चुका है. 

इस विडम्बना के चलते मेरे भीतर से जहाँ एक ओर एक स्वर उठता है - "TRUST NONE !", वहीं दूसरी ओर समझ में आता है कि ऐसा करके कहीं हम व्यवस्था के दुष्चक्र के शिकार तो नहीं हो रहे हैं, जिसकी मंशा ही हमें एक दूसरे से दूर कर के हर एक को हर तरह से अलगाव में डाल कर सतत तनावग्रस्त और अवसादग्रस्त कर देने की है. ताकि उसके भष्टाचार, अत्याचार और शोषण के विरोध का स्वर और भी कमज़ोर होता चला जाये. 

ऐसे में कम से कम मुझे तो लगता है कि व्यवस्था विरोधी संघर्ष के लिये नये-नये साथियों को जोड़ते समय हमें थोड़ी सतर्कता और थोड़े सन्देह के साथ अपने नये सम्बन्धों की शुरुवात करते हुए अपने सभी भावनात्मक सम्बन्धों को वैचारिक धरातल तक उठाने की कोशिश करनी होगी. परन्तु कम से कम एकजुटता के धरातल पर ही सही सम्बन्धों का निर्वाह करने के प्रयास में हमसे अनेक मुद्दों पर मतभेद रखने वाले मित्रों की वैचारिक प्रतिबद्धता का सम्मान भी करते रहना होगा. इस कोशिश में अपने निकट आने वाले हर 'दो-पाये' पर हमें न्यूनतम विश्वास तो करना ही होगा, कम से कम तब तक, जब तक वह अपनी कुटिल करतूत को जग-जाहिर करके पूरी तरह जनविरोधी साबित न हो जाये. 

और ऐसा होने पर पूरी तरह से निर्मम होकर उससे सम्बन्ध-विच्छेद भी करना ही पड़ेगा, उसका पर्दाफाश भी करना ही पड़ेगा और किसी दूसरे नये मानवीय सम्बन्ध के लिये उसकी जगह खाली ही करनी पड़ेगी, चाहे हमें उससे कितना ही मोह क्यों न हो. क्योंकि उसका साथ तो हमें हरदम ही और भी नकारात्मक भावनाओं की हताशा में डुबाता ही रहेगा. कम से कम उसके दूर हो जाने पर पीड़ा चाहे जितनी हो, कुछ न कुछ नये लोगों से आगे और सम्पर्क और सम्बन्ध के लिये और भी रचनात्मक और सकारात्मक प्रयास करने की सम्भावना प्रबल होती जानी है.

तभी हम सभी एकजुट हो कर इस जनविरोधी व्यवस्था के विरुद्ध और भी सशक्त प्रतिवाद और प्रतिरोध का स्वर मुखरित कर सकेंगे. और "दुनिया के मेहनतकशों" को एक करने के सपने को साकार करने की दिशा में अपने स्तर पर छोटा-सा ही सही मगर सही दिशा में एक और कदम बढ़ाने का हार्दिक आनन्द हम सब को मयस्सर हो सकेगा. 
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

मैं सोऊँगा ! - गिरिजेश




मेरे 'बेटे'
सारे के सारे ही
मुझसे बड़े हो गये,
मुझसे आगे सभी बढ़ गये;
मेरा सपना अब ये आँखें देख रही हैं !
इससे अधिक मुझे क्या लेना ?
किसको यह सुख लेना-देना !

मुझे ख़ुशी है;
बहुत जगा हूँ,
रात-रात भर
कलप-कलप कर
बिलख-बिलख कर
मैं रोया हूँ.
अब सोऊँगा !

दशकों बीते जाग रहा हूँ,
हरदम सरपट भाग रहा हूँ;
अब थक कर मैं चूर हो चुका,
अब सोऊँगा !

मेरे हिस्से में जो आया,
समर अभी तक मैंने झेला;
अब आगे कुछ और लड़ाई बढ़ जायेगी,
हुआ भरोसा मेरे मन को.
आज और भी हँसी-ख़ुशी से,
मस्ती से मन झूम रहा है;
पस्ती का माहौल नहीं अब पीछा करता,
अब सोऊँगा !

आज नाक का बाजा अपने,
बजा-बजा कर ज़ोर-ज़ोर से
‘ख़ुर्र-पीं, ख़ुर्र-पी’ की लय पूरे सुर में गूंजेगी ज़रूर ही.
मैं सोऊँगा !

अब तुम जगना, अब तुम लगना;
अब तुम लड़ना, आगे बढ़ना;
मैं हरदम ही साथ रहूँगा,
कदम-कदम पर
आगे-आगे मेरे चलना;
मुझको भी दिखलाना रस्ता,
इस अन्धेरे में भी तुमको सूझ रहा है;
मुझे ख़ुशी है !

हम जीतेंगे कठिन लड़ाई,
आज भले ही उनका है,
पर कल निश्चय ही अपना होगा;
पूरा जन का सपना होगा !
तुम सपने साकार करोगे,
मैं संतुष्ट हो चुका तुमसे;
अब सोऊँगा !

पूरी हुई तपस्या मेरी,
मैंने जग से जितना माँगा,
उससे भी है बढ़ कर पाया;
अब तुम सोचो,
अब तुम जानो;
कैसे होगा !
काम तुम्हारा
तुमको ही है पूरा करना.
मैं सोऊँगा !

- गिरिजेश
(1.8.13. 11p.m.)

Sunday, 4 August 2013

सच कहा, हे मित्र, तुमने...- गिरिजेश


प्रिय मित्र, आज मैत्री-दिवस है.
यह धरती का एकमात्र निःस्वार्थ सम्बन्ध है.
इस अवसर पर एक मित्र को सम्बोधित मेरी यह कविता देखिए -

-:सच कहा, हे मित्र, तुमने... :-
"क्या कहा?
हे मित्र, सच ही कहा तुमने आज फिर से;
हाँ, मुझे हँसना नहीं आया।
किन्तु पत्थर-बँधे पैरों दौड़ने की कोशिशों ने
जो मेरा छक्का छुड़ाया,
डगमगाया, लड़खड़ा कर गिरा, तो जग हँसा!
तभी जा कर मैं ठठा कर हँसा, हँसता गया...
फिर तो
शान्ति को झंझोड़ता, स्तब्धकारी, लोमहर्षक, उच्च स्वर का अट्टहास -
हर ओर मैंने गुँजा डाला, तब कहीं जग दहल पाया।

हाँ, मुझे चलना नहीं आया!
किन्तु पथ की विकटता ने जब मेरे उद्दाम साहस को बताया धता,
फिर तो,
चुनौती का हाथ थामे
लक्ष्य तक मैं भागता सरपट चला आया;
और चलना जगत को मैंने सिखाया।

सच कहा तुमने, मुझे रोना नहीं आया!
किन्तु जग की क्रूरता ने
जब मेरे भीतर भरे स्नेहिल स्वरों को काट खाया,
तो व्यथा बोझिल बना बैठी विवशता ने
तुम्हें भी बिलबिलाया और मुझको भी रुलाया;
रुदन बन अभिशाप आया।

मानता हूँ मुझे सच कहना नहीं आया।
किन्तु अत्याचार, शोषण, विषमता, अन्याय का वीभत्स ताण्डव
तो कचोटे जा रहा है सतत इस मासूम दिल को,
क्या करूँ?
कुछ अटपटे, कुछ-कुछ कड़े स्वर
कल्पना के पंख पहने
बुदबुदा कर उभर उठते हैं अँधेरी रात में,
नींद से बोझिल मनो-मस्तिष्क कड़ुआती पलक को खोल देते हैं,
थमा देते हैं कलम के साथ बूँदें हृदय की संवेदना को रिसा कर के;
तभी तो, कुछ कभी, कुछ का कुछ कभी, कहता चला आया।
लिखा, काटा, मिटाया; फिर लिखा, काटा, मिटाया;
धैर्य रक्खा, और मैं यह अन्ततः स्पष्ट लिख पाया ।"

आज मुझे मार्क्स-एंगेल्स, लेनिन-स्टालिन, माओ त्से तुंग-चू तेह, फिदेल-चे, राणा प्रताप-भामाशाह, हैदर अली-पुन्नैया पण्डित, आज़ाद-भगत सिंह, अकबर-बीरबल जैसे अनेक लोगों की मैत्री की याद आ रही है.
मुझे अपने अतीत और वर्तमान के सभी मित्रों के साथ और उनसे दूर हो जाने के बाद गुज़ारे गये वक्त के मीठे और कडुए संस्मरणों की याद आ रही है.
आज मैं अपने सभी मित्रों के प्रति अन्तर्मन से आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने मेरे व्यक्तित्व की ढेरों सीमाओं को नज़रअंदाज़ कर के भी मेरे साथ इस पवित्रतम सम्बन्ध का निर्वाह किया है.
आज तक मैं जो कुछ भी मानवता की सेवा करने के प्रयास में जो भी सफलता या विफलता हासिल कर सका हूँ, उस सब का श्रेय जीवन के अलग-अलग मोड़ों पर केवल और केवल मेरे सभी मित्रों द्वारा निर्वाह की जाने वाली भूमिका को है.
इस अवसर पर मैं अपने सभी मित्रों के लिये और भी सुखद और सार्थक जीवन की कामना करता हूँ.
आज मुझे अचानक यह गीत याद आ रहा है. आप भी सुनिए और सोचिए कि क्या इस गीत का कथ्य मेरे जीवन का मूल स्वर नहीं है.
अगर हाँ, तो क्यों !
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश
https://www.youtube.com/watch?v=aPX8_b_NqmM

Friday, 2 August 2013

धनतन्त्र की समाज-व्यवस्था - गिरिजेश


विद्रोही अमन - हम जब भी मीडिया कि बात करते हैं या गरियाते हैं तो उसको लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का तमगा भी लगा देते हैं, लेकिन लोकतंत्र के पहले, दूसरे और तीसरे स्तम्भ का नाम आज तक नही सुन पाया किसी भी लेख में, जिज्ञासा है जानने की ये तीन स्तम्भ कौन से हैं?? कृपया पथ प्रदर्शित करें??
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Akshat BaLodi - Karenge.. jald hi

Mohan Shrotriya - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। इन तीनों के बारे में खूब लिखा जाता है यहां भी।

विद्रोही अमन - धन्यवाद् सर.

Naresh Semwal - or panchwa istmbh ap h Aman g

Piyush Kumar - Ye chauthe shtambh ka tamga aap jaise vidhroi log lagte hain.....dhyan se dekho....ye teen shtambh humara loktantra hai...jise duniya ka sabse majboot loktantra bnata hai.....Agar aapko ye teen loktantra pta karna hai to plz...dil se ek baar Hindustan ko jaan lo........kyunki vidhroh karne wale to bahut hai...but sawrane wale kum........i will be waiting for ur reply...mr Hindustan vidhroi.... 

Aapka path pardrisht karne ke liye education ke saath development bhi padna padega.....m sry...but its reality for u Mr. Vidhrohi....

Rahul Singh - 9th or 10th me civics......nahi padhe the kya bHai.....agar padhe hote..... Ye question nahi puch rahe hote aaj.....
https://www.facebook.com/aman.badoni
https://www.facebook.com/aman.badoni/posts/960577777320862?ref=notif&notif_t=tagged_with_story
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व्यवस्था - गिरिजेश
प्रिय मित्र, व्यवस्था के बारे में समझ साफ़ न होने से हम अक्सर भ्रम के शिकार बना दिये जाते हैं और इस लुटेरी व्यवस्था को थोडा-बहुत सुधारने की कोशिश को व्यवस्था बदलने की क्रान्तिकारी लड़ाई की कार्यवाही मान बैठते हैं। देश के उच्चतम न्यायलय के गत दिनों नेताओं के चुनाव लड़ने के बारे में आये निर्णयों ने एक बार फिर इस भ्रम को फैलाने में सफलता पायी है।

व्यवस्था क्या है - यह समझने की ज़रूरत है। सत्ता क्या है - इसे जानने की ज़रुरत भी है।
व्यवस्था है किसी भी समाज में चल रहे सम्बन्धों को चलते रहने देना। सत्ता है उन सम्बन्धों के चलते रहने में आने वाली रुकावटों को दूर करने वाला वह डंडा, जिसके दम पर शासक वर्ग आम जन को शोषण, उत्पीड़न और दमन की चक्की के दो पाटों के बीच पीसते समय ज़बरदस्ती कुचलता रहता है।

समाज में दो तरह के लोग एक साथ रहते हैं - अधिकतम कंगाल और मुट्ठी भर मालामाल। उनके रोजी-रोटी, आय-व्यय, रहन-सहन, जनम-मरण, सोच-समझ, आचार-विचार, शिक्षण-प्रशिक्षण - सब के सब एक जैसे स्तर के ही होने के चलते उनको एक वर्ग कहते हैं। एक वर्ग कमेरों का है, तो दूसरा वर्ग लुटेरों का है। लुटेरों के वर्ग का इन्सान के ज़िन्दा रहने के लिए ज़रूरी सारे सामानों का उत्पादन करने वाले सभी साधनों पर आज कब्ज़ा है।

उत्पादन उस प्रक्रिया का नाम है, जिसके ज़रिये इन्सान प्रकृति प्रदत्त सभी उपहारों को अपने उपभोग योग्य स्वरूप में रूपांतरित करने के लिए श्रम करता है। श्रम करने वाले को ज़िन्दा रहने भर को 'मज़दूरी' दे कर समूचे उत्पादन पर अपना कब्ज़ा करके शोषक वर्ग अपना 'मुनाफा' का पहाड़ खडा करता रहता है। इस तरह ये दो तरह के इन्सान बन जाते हैं। एक तरफ मुट्ठी भर मालामाल हैं, तो दूसरी तरफ़ करोड़ों करोड़ कंगाल हैं।

अब आती है सत्ता - इसके तीन मुख्य स्तम्भ हैं - न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका। चौथा स्तम्भ मीडिया को कहते हैं और सत्ता के लिये देश और विदेशों में जासूसी करने वाले विभाग के कर्मियों को 'पंचमांगी' के नाम से जानते हैं। विधायिका परदे के सामने कठपुतली की तरह शासक वर्ग द्वारा चुनाव और सरकार के नाटक में पक्ष-विपक्ष के नाम दे कर लगातार नचाई जाती रहती है, ताकि आम जन के बीच वोट-तन्त्र के सहारे धन-तन्त्र ख़ुद के 'जनतन्त्र' होने का भ्रम बनाये रखे।

असल में तो सारी नीतियों को लागू करने का ही नहीं, उनको बनाने का भी काम कार्यपालिका की आइ.ए.एस. लॉबी करती है।

सत्ता किसी नेता या किसी पार्टी की होती ही नहीं। किसी भी नेता या उसकी पार्टी की तो केवल सरकार ही हो सकती है। सत्ता तो शासक वर्ग की होती है। और आज इस देश ही नहीं समूची दुनिया का शासक वर्ग देशी-विदेशी पूँजी का नापाक गठबन्धन है। केवल हमारे ही देश में ही नहीं, बल्कि आज के इस अति विकसित पूंजीवादी जगत तथाकथित 'वैश्विक गाँव' के किसी भी देश में जिस किसी भी पार्टी की सरकार हो, वह हमेशा ही हर नीति और हर निर्णय धनिक वर्ग के देशी-विदेशी उद्योगों के मालिकों के हित में ही बनाती रहती है।

आइए अब न्यायपालिका की भूमिका को समझने की कोशिश करें। न्यायपालिका मौका पाते ही विधायिका के अलोकप्रिय कुकर्मों के विरुद्ध बार-बार फैसला देती रहती है। परन्तु अगर न्यायपालिका विधायिका के ऊपर अंकुश लगाने का प्रयास करती है, तो विधायिका भी न्यायपालिका को अपनी सीमा में रहने के लिये बार-बार धमकाती रहती है।

न्यायपालिका द्वारा ऐसा फैसला केवल आम जन के दिमाग में इस भ्रम को बनाये रखने और व्यवस्था के चौथे स्तम्भ मीडिया द्वारा प्रचारित कराते रहने के लिये किया जाता है कि न्यायपालिका सत्ता से ऊपर और समाज से भी ऊपर संविधान की तरह एक परम पवित्र, सर्वशक्तिमान और सर्वमान्य शक्ति है। और वह तो निष्पक्ष ही होती है।

इनमें से केवल विधायिका के लोगों का चुनाव होता है. केवल वे ही इलेक्ट किये जाते हैं. ताकि शोषित शासित जन सामान्य को समझाया जा सके कि यह धनतन्त्र वास्तव में जनतन्त्र है क्योंकि उनके पास मतदान करने का अधिकार है. मगर शेष सभी स्तम्भों के लोगों का सिलेक्शन होता है. उनका काम शोषित शासित वर्गों के ऊपर शासक पूँजीपति वर्ग के द्वारा सतत जारी शोषण को बिना किसी व्यवधान के चलाते रहने की व्यवस्था देना और उसे लागू करवाना होता है. किसी भी तरह का व्यवधान आते ही शासक वर्गों की सत्ता की नौकरी करने वाली उनकी पुलिस और सेना विद्रोहियों से सख्ती से निपटती है.

मगर सोचने का मामला तो यह है कि इस लूट-तन्त्र में लूटे जा रहे कंगाल और उसे लूटने वाले मालामाल वर्ग के बीच के परस्पर विरोधी हितों के बीच शासक वर्ग की सत्ता के तरह-तरह के औजारों में से केवल एक औजार के तौर पर बनाया गया और चलाया जा रहा न्याय की अंधी देवी के मन्दिर का यह औजार क्या निष्पक्ष हो सकता है !!!

सोचने में हमारी मदद बर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता कर सकती है - 
"सभी अफसर उनके… "
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यह टिप्पड़ी इस कविता पर है -

"अन्ना ने एक अँधेरे कमरे में दिया जलाया था ,
इस सड़े गले सिस्टम को बदलने के लिए ,
उम्मीद की एक किरण को पैदा किया था ,

आज कमरे में थोड़ी सी रौशनी नज़र आने लगी है ,
उम्मीद थोड़ी जागने लगी है ,

पिछले दिनों कुछ अच्छे फैंसले हुए ,
ये फैंसले संसद ने नहीं किये ,
जिनका ये काम है ,

ये फैंसले देश की अदालतों ने किये ,
जिन पर आम आदमी का विश्वास अभी जिन्दा है ,

पहला फैंसला सरकार सीबीआई को आजाद करे ,
वरना मजबूरन हमे आजाद करना पड़ेगा ,

दूसरा फैंसला लुभाने वाले चुनावी वादों पर अंकुश लगाया जाये ,

तीसरा फैंसला किसी भी अदालत से,
2 साल की सजा पाने वाले नेता की संसद और विधानसभा से छुटी ,

चोथा फैंसला जाती के आधार पर रैलिये करने पर रोक ,

पांचवा फैंसला राजनितिक पार्टी को RTI में लाने की कोशिश ,

धीरे धीरे ही सही ,
परिवर्तन का सूरज निकल रहा है ,

हर उम्मीद टूटने के बाद ,
नयी उम्मीदे जन्म ले रही हैं ,

कुछ लोग कोशिश कर रहे हैं ,
अगर कुछ और लोग कोशिश करे ,
विव्स्था परिवर्तन हो ही जायेगा , जय हिन्द " - Sandeep Garg

http://www.facebook.com/AamAadmiPartyLehragaga
http://www.facebook.com/WeWantArvindKejriwalAsIndianPm
_________

Satya Narayan
बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की ये कविता इस व्‍यवस्‍था की "निष्‍पक्षता" को हमारे सामने खोलकर रख देती है।

वो सब कुछ करने को तैयार
वो सब कुछ करने को तैयार
सभी अफ़सर उनके
जेल और सुधार-घर उनके
सभी दफ़्तर उनके

क़ानूनी किताबें उनकी
कारख़ाने हथियारों के
पादरी प्रोफ़ेसर उनके
जज और जेलर तक उनके
सभी अफ़सर उनके

अख़बार, छापेख़ाने
हमें अपना बनाने के
बहाने चुप कराने के
नेता और गुण्डे तक उनके
सभी अफसर उनके

एक दिन ऐसा आयेगा
पैसा फिर काम न आयेगा
धरा हथियार रह जायेगा
और ये जल्दी ही होगा
ये ढाँचा बदल जायेगा

ये ढाँचा बदल जायेगा
ये ढाँचा बदल जायेगा
बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (‘मदर’ नाटक से)


http://www.youtube.com/watch?v=Dt5GJfqCMSI

http://young-azamgarh.blogspot.in/2013/08/blog-post_2.html

— with Girijesh Tiwari.

ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है ! - गिरिजेश




ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है !
हर एक इन्सान दर्द में डूबा, हर एक दिल यहाँ इतना अधिक उदास क्यों है !
ज़िन्दगी के हर एक मोड़ पर
मेरी भलाई चाहने वाले मेरे सभी के सभी ‘शुभ-चिन्तकों’ ने
मेरी ख़ातिर ख़ूब-ख़ूब कोशिश की.
मुझे हज़ार बार, हर कदम प’, हर तरह सिखाया गया –
“बेवकूफ़, थोड़ा और समझदार बनो !”

मेरी समझ से अभी भी मेरा गुनाह महज़ इतना है –
“मैं इनको, उनको, सबको बेतहाशा प्यार करता हूँ.”
अभी भी मेरी ग़लतियाँ कोई भी मुझे बताता ही नहीं.
मेरा अपराध बताने की जगह सभी महज़ इतना ही कहते रहते हैं –
“तुम बेवकूफ़ हो, कुछ भी समझ ही नहीं सकते.”
उनकी सज़ा मेरे लिये अब तो यही मुक़र्रर है –
“जुबान बन्द रखो, कुछ भी किसी से न कहो.”

अगर मुझे पता ही न चल पाये –
“क्या है चूक मेरी या है क्या मेरी ग़लती !”
और यह मुझको बताने के लिये भी कोई भी तैयार न हो.
हर एक मुझसे महज़ बार-बार यही कहे, कहता रहे –
“तुम समझ नहीं सकते, तुम तो अव्यावहारिक हो.”
क्या महज़ इतनी बात सुन-सुन कर खुद ही सब समझ लूँगा ?
और समझदार भी बन जाऊँगा?

मुझे अभी भी नहीं लग रहा है –
मैंने आज तक किसी से भी, किसी तरह से, कभी भी, कोई भी ग़द्दारी की.
हाँ, ज़िन्दगी में जब कभी चालाक दिमागों ने मेरा पीछा किया.
मुझे किसी भी तरह से फँसाने-जकड़ने की कोशिश की.
मैं चुपचाप “दो कदम पीछे” हटा.
वे मुझको कभी भी किसी भी तरह से जकड़ नहीं पाये.
मुझे किसी का भी कैसा भी रहा हो, मगर पट्टा नहीं बर्दाश्त हुआ.
और मैं भाग चला देख कर दोहरेपन को.

“दो क़दम पीछे” हटा.
और फिर से उसी सड़क पर पहुँचा.
जिसने मुझे बार-बार गिरने पर उठाया है.
जिसने मुझे बार-बार प्यार दिया, मौका दिया, काम दिया.
फिर भी चाहे कितना भी दर्द झेलना पड़ा मुझको.
कभी पलट कर अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे न हटा.

मगर अब भी मुझे समझ में नहीं आता है –
ऐसी हालात है मेरे दिल की !
और मैं क्या कर दूँ, कैसे करूँ ?
किससे कहूँ, कैसे कहूँ, कितना कहूँ ?
सामने इतना बड़ा काम है ललकार रहा,
मेरा ईमान भी मुझको ही है धिक्कार रहा;
मगर य’ दिल है कि कुछ सुनने को तैयार नहीं,
और कुछ सोच सकूँ इसके भी आसार नहीं.
3.8.13. (8 a.m.)