Thursday, 11 December 2014

"जाके प्रिय न राम वैदेही तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।"

तुलसीदास के जीवन की ऐतिहासिक घटनाएं
तुलसीदास के जीवन की कुछ घटनाएं एवं तिथियां भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कवि के जीवन-वृत्त और महिमामय व्यक्तित्व पर उनसे प्रकाश पड़ता है।

यज्ञोपवीत
मूल गोसाईं चरित के अनुसार तुलसीदास का यज्ञोपवीत माघ शुक्ला पंचमी सं० १५६१ में हुआ -

पन्द्रह सै इकसठ माघसुदी। तिथि पंचमि औ भृगुवार उदी ।
सरजू तट विप्रन जग्य किए। द्विज बालक कहं उपबीत किए ।।

कवि के माता - पिता की मृत्यु कवि के बाल्यकाल में ही हो गई थी।

विवाह
जनश्रुतियों एवं रामायणियों के विश्वास के अनुसार तुलसीदास विरक्त होने के पूर्व भी कथा-वाचन करते थे। युवक कथावाचक की विलक्षण प्रतिभा और दिव्य भगवद्भक्ति से प्रभावित होकर रत्नावली के पिता पं० दीन बंधु पाठक ने एक दिन, कथा के अन्त में, श्रोताओं के विदा हो जाने पर, अपनी बारह वर्षीया कन्या उसके चरणों में सौंप दी। मूल गोसाईं चरित के अनुसार रत्नावली के साथ युवक तुलसी का यह वैवाहिक सूत्र सं० १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी, दिन गुरुवार को जुड़ा था -

पंद्रह सै पार तिरासी विषै ।
सुभ जेठ सुदी गुरु तेरसि पै ।
अधिराति लगै जु फिरै भंवरी ।
दुलहा दुलही की परी पंवरी ।।

आराध्य-दर्शन
भक्त शिरोमणि तुलसीदास को अपने आराध्य के दर्शन भी हुए थे। उनके जीवन के वे सर्वोत्तम और महत्तम क्षण रहे होंगे। लोक-श्रुतियों के अनुसार तुलसीदास को आराध्य के दर्शन चित्रकूट में हुए थे। आराध्य युगल राम - लक्ष्मण को उन्होंने तिलक भी लगाया था -

चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर ।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।।

मूल गोसाईं चरित के अनुसार कवि के जीवन की वह पवित्रतम तिथि माघ अमावस्या (बुधवार), सं० १६०७ को बताया गया है।

सुखद अमावस मौनिया, बुध सोरह सै सात ।
जा बैठे तिसु घाट पै, विरही होतहि प्रात ।।

गोस्वामी तुलसीदास के महिमान्वित व्यक्तित्व और गरिमान्वित साधना को ज्योतित करने वाली एक और घटना का उल्लेख मूल गोसाईं चरित में किया गया है। तुलसीदास नंददास से मिलने बृंदावन पहुंचे। नंददास उन्हें कृष्ण मंदिर में ले गए। तुलसीदास अपने आराध्य के अनन्य भक्त थे। तुलसीदास राम और कृष्ण की तात्त्विक एकता स्वीकार करते हुए भी राम-रुप श्यामघन पर मोहित होने वाले चातक थे। अतः घनश्याम कृष्ण के समक्ष नतमस्तक कैसे होते। उनका भाव-विभोर कवि का कण्ठ मुखर हो उठा -

कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ ।।

इतिहास साक्षी दे या नहीं द, किन्तु लोक-श्रुति साक्षी देती है कि कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में बदल गई थी।

रत्नावली का महाप्रस्थान
रत्नावली का बैकुंठगमन 'मूल गोसाईं चरित' के अनुसार सं० १५८९ में हुआ। किंतु राजापुर की सामग्रियों से उसके दीर्घ जीवन का समर्थन होता है।

मीराबाई का पत्र
महात्मा बेनी माधव दास ने मूल गोसाईं चरित में मीराबाई और तुलसीदास के पत्राचार का उल्लेख किया किया है। अपने परिवार वालों से तंग आकर मीराबाई ने तुलसीदास को पत्र लिखा। मीराबाई पत्र के द्वारा तुलसीदास से दीक्षा ग्रहण करनी चाही थी। मीरा के पत्र के उत्तर में विनयपत्रिका का निम्नांकित पद की रचना की गई।

जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी ।
बलिगुरु तज्यो कंत ब्रजबनितन्हि, भये मुद मंगलकारी ।
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहां लौं ।
अंजन कहां आंखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहां लौं ।
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों हाय सनेह राम-पद, एतोमतो हमारो ।।


तुलसीदास ने मीराबाई को भक्ति-पथ के बाधकों के परित्याग का परामर्श दिया था।

केशवदास से संबद्ध घटना
मूल गोसाईं चरित के अनुसार केशवदास गोस्वामी तुलसीदास से मिलने काशी आए थे। उचित सम्मान न पा सकने के कारण वे लौट गए।

अकबर के दरबार में बंदी बनाया जाना
तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और कोई चमत्कार प्रदर्शित करने को कहा। यह प्रदर्शन-प्रियता तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी, अतः ऐसा करने से उन्होंने इनकार कर दिया। इस पर अकबर ने उन्हें बंदी बना लिया। तदुपरांत राजधानी और राजमहल में बंदरों का अभूतपूर्व एवं अद्भुत उपद्रव शुरु हो गया। अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है। अकबर को विवश होकर तुलसीदास को मुक्त कर देना पड़ा।

जहांगीर को तुलसी-दर्शन
जिस समय वे अनेक विरोधों का सामना कर सफलताओं और उपलब्धियों के सर्वोच्च शिखर का स्पर्श कर रहे थे, उसी समय दर्शनार्थ जहांगीर के आने का उल्लेख किया गया मिलता है।

दांपत्य जीवन
सुखद दांपत्य जीवन का आधार अर्थ प्राचुर्य नहीं, पति -पत्नि का पारस्परिक प्रेम, विश्वास और सहयोग होता है। तुलसीदास का दांपत्य जीवन आर्थिक विपन्नता के बावजूद संतुष्ट और सुखी था। भक्तमाल के प्रियादास की टीका से पता चलता है कि जीवन के वसंत काल में तुलसी पत्नी के प्रेम में सराबोर थे। पत्नी का वियोग उनके लिए असह्य था। उनकी पत्नी-निष्ठा दिव्यता को उल्लंघित कर वासना और आसक्ति की ओर उन्मुख हो गई थी।

रत्नावली के मायके चले जाने पर शव के सहारे नदी को पार करना और सपं के सहारे दीवाल को लांघकर अपने पत्नी के निकट पहुंचना। पत्नी की फटकार ने भोगी को जोगी, आसक्त को अनासक्त, गृहस्थ को सन्यासी और भांग को भी तुलसीदल बना दिया। वासना और आसक्ति के चरम सीमा पर आते ही उन्हें दूसरा लोक दिखाई पड़ने लगा। इसी लोक में उन्हें मानस और विनयपत्रिका जैसी उत्कृष्टतम रचनाओं की प्रेरणा और सिसृक्षा मिली।

वैराग्य की प्रेरणा
तुलसीदास के वैराग्य ग्रहण करने के दो कारण हो सकते हैं। प्रथम, अतिशय आसक्ति और वासना की प्रतिक्रिया ओर दूसरा, आर्थिक विपन्नता। पत्नी की फटकार ने उनके मन के समस्त विकारों को दूर कर दिया। दूसरे कारण विनयपत्रिका के निम्नांकित पदांशों से प्रतीत होता है कि आर्थिक संकटों से परेशान तुलसीदास को देखकर सन्तों ने भगवान राम की शरण में जाने का परामर्श दिया -

दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन मोहूं
तो से पसु पातकी परिहरे न सरन गए रघुबर ओर निबाहूं ।।

तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति विनाहू ।
नाम की महिमा, सीलनाथ को, मेरो भलो बिलोकि, अबतें ।।

रत्नावली ने भी कहा था कि इस अस्थि - चर्ममय देह में जैसी प्रीति है, ऐसी ही प्रीति अगर भगवान राम में होती तो भव-भीति मिट जाती। इसीलिए वैराग्य की मूल प्रेरणा भगवदाराधन ही है।

तुलसी का निवास - स्थान
विरक्त हो जाने के उपरांत तुलसीदास ने काशी को अपना मूल निवास-स्थान बनाया। वाराणसी के तुलसीघाट, घाट पर स्थित तुलसीदास द्वारा स्थापित अखाड़ा, मानस और विनयपत्रिका के प्रणयन-कक्ष, तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त होने वाली नाव के शेषांग, मानस की १७०४ ई० की पांडुलिपि, तुलसीदास की चरण-पादुकाएं आदि से पता चलता है कि तुलसीदास के जीवन का सर्वाधिक समय यहीं बीता। काशी के बाद कदाचित् सबसे अधिक दिनों तक अपने आराध्य की जन्मभूमि अयोध्या में रहे। मानस के कुछ अंश का अयोध्या में रचा जाना इस तथ्य का पुष्कल प्रमाण है।

तीर्थाटन के क्रम में वे प्रयाग, चित्रकूट, हरिद्वार आदि भी गए। बालकांड के ""दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवर चले कहारा'' तथा ''सूखत धान परा जनु पानी'' से उनका मिथिला-प्रवास भी सिद्ध होता है। धान की खेती के लिए भी मिथिला ही प्राचीन काल से प्रसिद्ध रही है। धान और पानी का संबंध-ज्ञान बिना मिथिला में रहे तुलसीदास कदाचित् व्यक्त नहीं करते। इससे भी साबित होता है कि वे मिथिला में रहे।

विरोध और सम्मान
जनश्रुतियों और अनेक ग्रंथों से पता चलता है कि तुलसीदास को काशी के कुछ अनुदार पंडितों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था। उन पंडितों ने रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने और हमारे कवि के जीवन पर संकट ढालने के भी प्रयास किए थे। जनश्रुतियों से यह भी पता चलता है कि रामचरितमानस की विमलता और उदात्तता के लिए विश्वनाथ जी के मन्दिर में उसकी पांडुलिपि रखी गई थी और भगवान विश्वनाथ का समर्थन मानस को मिला था। अन्ततः, विरोधियों को तुलसी के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। विरोधों का शमन होते ही कवि का सम्मान दिव्य-गंध की तरह बढ़ने और फैलने लगा। कवि के बढ़ते हुए सम्मान का साक्ष्य कवितावली की निम्नांकित पंक्तियां भी देती हैं -

जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागिबस
खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो ।
मानस वचनकाय किए पाप सति भाय
राम को कहाय दास दगाबाज पुनी सो ।

राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप
तुलसी से जग मानियत महामुनी सो ।
अति ही अभागो अनुरागत न राम पद
मूढ़ एतो बढ़ो अचरज देखि सुनी सो ।।
(कवितावली, उत्तर, ७२)

तुलसी अपने जीवन-काल में ही वाल्मीकि के अवतार माने जाने लगे थे -

त्रेता काव्य निबंध करिव सत कोटि रमायन ।
इक अच्छर उच्चरे ब्रह्महत्यादि परायन ।।

पुनि भक्तन सुख देन बहुरि लीला विस्तारी ।
राम चरण रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी ।
संसार अपार के पार को सगुन रुप नौका लिए ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भए ।।
(भक्तमाल, छप्पय १२९)

पं० रामनरेश त्रिपाठी ने काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक श्री मधुसूदन सरस्वती को तुलसीदास का समसामयिक बताया है। उनके साथ उनके वादविवाद का उल्लेख किया है और मानस तथा तुलसी की प्रशंसा में लिखा उनका श्लोक भी उद्घृत किया है। उस श्लोक से भी तुलसीदास की प्रशस्ति का पता मालूम होता है।

आनन्दकाननेह्यस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु:
कविता मंजरी यस्य, राम-भ्रमर भूषिता ।

जीवन की सांध्य वेला
तुलसीदास को जीवन की सांध्य वेला में अतिशय शारीरिक कष्ट हुआ था। तुलसीदास बाहु की पीड़ा से व्यथित हो उठे तो असहाय बालक की भांति आराध्य को पुकारने लगे थे।

घेरि लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यौं,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पोर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष, धूम-मूलमलिनाई है ।।

करुनानिधान हनुमान महा बलबान,
हेरि हैसि हांकि फूंकि फौजें तै उड़ाई है ।
खाए हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।
(हनुमान बाहुक, ३५)

निम्नांकित पद से तीव्र पीड़ारुभूति और उसके कारण शरीर की दुर्दशा का पता चलता हैं -

पायेंपीर पेटपीर बांहपीर मुंहपीर
जर्जर सकल सरी पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।

हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारे हीं तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के निकट बिकल बूड़े गोखुरनि,
हाय राम रा ऐरती हाल कहुं भई है ।।

दोहावली के तीन दोहों में बाहु-पीड़ा की अनुभूति -

तुलसी तनु सर सुखजलज, भुजरुज गज बर जोर ।
दलत दयानिधि देखिए, कपिकेसरी किसोर ।।
भुज तरु कोटर रोग अहि, बरबस कियो प्रबेस ।
बिहगराज बाहन तुरत, काढिअ मिटे कलेस ।।
बाहु विटप सुख विहंग थलु, लगी कुपीर कुआगि ।
राम कृपा जल सींचिए, बेगि दीन हित लागि ।।

आजीवन काशी में भगवान विश्वनाथ का राम कथा का सुधापान कराते-कराते असी गंग के तीर पर सं० १६८० की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन तुलसीदास पांच भौतिक शरीर का परित्याग कर शाश्वत यशःशरीर में प्रवेश कर गए।

http://www.ignca.nic.in/coilnet/tulsi002.htm

____RAPE CASES & FALSE ALLEGATIONS____

good morning my dear friend, in our society now a days people have become mad to rape a girl and hang her with a rope from a tree. there are so many cases in previous months.

but there are many false allegations also against many young-men and gentlemen. Last evening one of my sons was blamed to mishandle a neighbor girl. the girl is minor. she is a student of class VI and was laughing after accusing him. she changed her statement twice. it was clear to every person listening the story that the allegation was totally baseless and false. her mother lives in this house with her two daughters and a son for their study. She was accusing and abusing continuously. when the boy was called. he explained the whole story. the statement of the mother and daughter of biting the boy changed twice. every boy is disturbed due to this baseless quarrel. the boy is in my touch since last three years. he is a well disciplined young-man. he has helped me a lot during these years and he does not bear involvement of any boy or girl in any kind of gossip while working. he often scolds the boys and girls not to waste their time and work seriously.

One of my friends Late Comrade Khurshid Anwar was blamed of rape by Madhu Kishwar and a caucus helping her. she is a high profile lady running an N.G.O. Khurshid Anwar was tortured badly for many months in every way possible by circulating the video of the girl's statement and writing against him on facebook by the gang behind the allegation. he was cornered so badly that he came to the last decision to commit suicide. He was a rebel pen-person writing continuously against all the wrongs in Islamic terrorism and could not be controlled by any threatening of the fanatic elements.

Eve-teasing, molestation, dowry torture and rape are serious blames and any girl can accuse any boy at any time and then none of us is ready to even listen explanations of the boy or man. everybody stands with the girl. two of my live friends have faced such allegations in last months.

the problem of rape - both real and false - is increasing badly daily. No body knows how to handle it. We are trying to create social awareness among the youth in every way possible in our limitations.
- girijesh

_____सवाल फैसले का : सलाह आपकी : तरीका जनवाद का_____

प्रिय मित्र, अचानक आज फिर एक निर्णय के दोराहे पर खड़ा हूँ. मुझे अपना मकान बदलना पड रहा है. जिस मकान में अभिषेक पण्डित जी सपरिवार किराये पर रहते हैं, उसमें उनके बगल वाले हिस्से में उनके साथ रहने के लिये उस मकान में 9000+बिजली का खर्च करने के पक्ष में निर्णय लिया जा रहा है.

जिस मकान में मैं पिछले तीन वर्षों से हूँ, इसमें कमरे छोटे हैं, जगह थोड़ी कम है, नमी, गन्दगी जैसी कुछ और असुविधाएँ हैं. और इसका किराया भी 4000+ बिजली था. उसका किराया 9000 + बिजली होगा. इस जगह से उसकी दूरी दस मिनट पैदल की है. उसमें इससे अधिक कमरे भी हैं, अधिक जगह भी है और बच्चों की साइकिलें खड़ी करने की भी भरपूर जगह है.

अगर इस फैसले पर कल शाम को मेरे बच्चे पर लगाये गये चरित्र सम्बन्धी झूठे आरोप की अचानक घटी घटना के कारण मुझे आज नहीं भी पहुँचना पड़ता, तो भी मुझे अपने विज्ञान-प्रयोगशाला और पुस्तकालय के लिये कम से कम एक और कमरा आने वाले दिनों में आस-पास भाड़े पर जुटाना ही पड़ता.

अब अचानक यह 5 हज़ार का बोझ हमारी 'Personality Cultivation Project व्यक्तित्व विकास परियोजना की अर्थव्यवस्था पर बढ़ने जा रहा है. इस परियोजना के केन्द्र में मेरी कामना है कि कुल लगभग 150+ (नौ, दस, ग्यारह, बारह और प्रतियोगिता के तीस-तीस के हिसाब से) बच्चे एक साथ निःशुल्क सीख सकें.

कृपया ध्यान दें कि यह पोस्ट मैं आप से पैसे की माँग करने की मंशा से नहीं लिख रहा हूँ. जैसा कि पिछले वर्ष त्रात्स्कीवादी राजेश त्यागी ने मेरे ऊपर आरोप लगाया था और अनेक मित्रों ने उनके उस गलत आरोप का खण्डन भी किया था.

इस मुद्दे पर जिन भी मित्रों का नम्बर मेरे पास थे, मैंने उन सबको इस आशय का एस.एम्.एस. किया. और उसके उत्तर के रूप में से मेरे दो बच्चों द्वारा एक-एक हज़ार के सहयोग का आश्वासन भी मुझे मिल चुका है.

यह पोस्ट मैं केवल आपकी सलाह लेने के लिये आप तक भेज रहा हूँ, ताकि यह फैसला भी मेरी ज़िन्दगी के दूसरे फैसलों की तरह ही जनवादी तरीके से लिया जाये. आप मेरे मित्र हैं और इसीलिये इस फैसले में भी आप का मत मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अभी तक के सभी फैसलों में रहता रहा था.

ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (26.9.14. शाम 5.21)

श्रीलंका का 'चे ग्वेरा' - रोहाना विजेवीरा

____पढ़ें और जानें____
कौन था श्रीलंका का 'चे ग्वेरा'? - चार्ल्स हैवीलैंड बीबीसी न्यूज, जाफ़ना, श्रीलंका 15 नवंबर 2014
रोहाना विजेवीरा

लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के उभार के दौरान ही श्रीलंका सरकार के ख़िलाफ़ एक और हथियारबंद संघर्ष हुआ था जिसके बारे में बाहरी दुनिया को बहुत कम मालूम है.
श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा ने सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ जनता को गोलबंद कर हथियारबंद संघर्ष छेड़ा था.
विजेवीरा क्यूबाई क्रांति के नायक चे ग्वेरा की तरह ही दिखते थे. एक ग़रीब परिवार में पैदा हुए विजेवीरा सोवियत संघ की यात्रा के दौरान स्टालिन से प्रभावित थे.
ग्रामीण और ग़रीब आबादी को गोलबंद कर उन्होंने श्रीलंकाई सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ दिया था.
दो बार तख़्तापलट की कोशिशों के बाद उन्हें पकड़ लिया गया और चे ग्वेरा की तरह उनकी मौत भी हिरासत में हुई.
इस संघर्ष में क़रीब 70,000 लोगों की जानें गईं.

पच्चीस वर्ष पहले, 13 नवंबर 1989 को इस खूनी संघर्ष को चलाने वाले कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा की हिरासत में मौत हो गई थी.
बीबीसी विटनेस प्रोग्राम में बात करते हुए विजेवीरा के वकील और दोस्त प्रिंस गुनासेकरा ने बताया, "मैंने उनकी मृत्यु के बारे में सुना. असल में, हमें इसकी आशंका पहले से थी."
जब उत्तर की तरफ तमिल संघर्ष अपने उफान की ओर था तो देश के दक्षिणी हिस्से में भी हिंसा चरम पर थी. विजेवीरा की जनथा विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) या पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ने उन लोगों को मार डाला जो उनकी विचारधारा को नहीं मानते थे.
विजेवीरा श्रीलंका के सुदूर दक्षिण में एक कम्युनिस्ट ग्रामीण परिवार में 1943 में पैदा हुआ थे.
उनकी मृत्यु के बाद एक समय उनके सहकर्मी रहे विक्टर इवान ने लिखा है, "उनके माता-पिता ग़रीब और सामान्य थे."

चे ग्वेरा से प्रभावित
विजेवीरा ने सोवियत संघ की यात्रा की और स्टालिन से प्रभावित हुए. लेकिन, वो अपने लहराते बालों और लाल सितारे वाली गोल टोपी के साथ क्यूबाई क्रांति के हीरो रहे चे ग्वेरा की तरह दिखना पसंद करते थे. विजेवीरा की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और छह बच्चों को एक पोत में बंद कर दिया गया था, जिनका आज तक पता नहीं चला.

एक समय उनके वकील रहे पी राजानायागम कहते हैं, "वह बहुत करिश्माई और प्रभावशाली वक्ता थे और बिना किसी लिखित भाषण के ही तीन चार घंटे बोल सकते थे."
ग्रामीण और ग़रीब लोगों में उनका ख़ासा प्रभाव था.
हालांकि विजेवीरा की जनजातीय पहचान भी इसका एक कारण था. श्रीलंका (तब सीलोन) की आबादी एक मिश्रित जनजातीय आबादी थी और विजेवीरा का आधार बहुसंख्यक सिंघलियों के बीच अधिक था.

सत्ता को दोष
पढ़े-लिखे सिंघली अपनी बेरोज़गारी के लिए सत्ता को दोष देते थे.
वर्ष 1971 में विजेवीरा जेल में बंद थे और वहीं से उन्होंने विद्रोह को संचालित किया, लेकिन यह असफल रहा और जेवीपी के हज़ारों सदस्य मारे गए.
उस समय श्रीलंका में जेवीपी नेता के ख़िलाफ़ एक पोस्टर आम था- "बर्बरों को मारो."

प्रिंस गुनासेकरा - विजेवीरा के दोस्त और उनके वकील गुनासेकरा अब लंदन में रहते हैं.
वर्ष 1982 विजेवीरा ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा. हालांकि वह तीसरे नंबर पर रहे. 1980 के दशक के अंत में जेवीपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद विजेवीरा एक बार फिर हिंसक विद्रोह की साजिश रचने लगे.

टॉर्चर
उनकी पार्टी का तर्क था कि लिट्टे के साथ शांति वार्ता चलाना सिंघलियों को बेचने जैसा है.
प्रिंस गुनासेकरा कहते हैं कि यह राष्ट्रपति ही थे जिन्होंने जेवीपी के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों को उकसाया.
जेवीपी में जो थे और जिनका उससे संबंध था उन्हें उठा लिया गया, टॉर्चर किया गया और मार दिया गया.
जेवीपी ने भिक्षुओं, शिक्षाविदों, यूनियन नेताओं, यहां तक कि अभिनेता से नेता बने लोकप्रिय विजया कुमारतुंगा की हत्या की. विजया की पत्नी चंद्रिका कुमारतुंगा बाद में राष्ट्रपति बनीं.
बीबीसी सिंघला के संपादक प्रियाथ लियानागे के अनुसार, "जेवीपी कंगारू कोर्ट लगाते थे तो सरकार के पास हत्या करने वाले गिरोह और उत्पीड़न केंद्र थे. वर्ष 1989 में यहां चारों ओर हिंसा थी."

लापता लोग
गुनासेकरा बताते हैं कि सरकार ने हरे-भरे जंगलों से लेकर बौद्ध विहारों तक पर बदले का कहर ढाया.
उन्होंने कहा कि जेवीपी समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया, उनका सिर क़लम किया गया और उनके सिरों को खंभों पर लटकाया गया.
उनके अनुसार, वर्ष 1989 में रोहाना विजेवीरा को एक चाय बगान में परिवार समेत गिरफ़्तार कर लिया गया और हिरासत में उनकी मौत हो गई.
जेवीपी का विद्रोह इस तरह ख़त्म हो गया, लेकिन सुरक्षा बल महीनों तक समर्थकों को तलाशते रहे. इनमें हज़ारों आज तक लापता हैं.

तस्वीर
हालांकि अब जेवीपी बहुत छोटी पार्टी हो गई है, लेकिन उसकी रैलियों में अभी भी रोहाना विजेवीरा की तस्वीर लगाई जाती है.
आज भी उसके कट्टर समर्थक मौजूद हैं.
एक अनुमान के अनुसार, इस हिंसा में लगभग 70,000 जानें गईं, लेकिन फिर भी लिट्टे की तरह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर कम ही गया.
विजेवीरा की मौत के समय राष्ट्रपति रहे प्रेमदासा और रक्षा मंत्री रंजन विजेरत्ने का बाद में लिट्टे ने हत्या कर दी.
 http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/11/141114_rohana_wijeweera_sri_lankan_stalinist_icon_sr

___ “TRUST NONE, BELIEVE EVERYONE !” ___

प्रिय मित्र,
आज एक बात कहने का साहस कर रहा हूँ. कई दिनों तक कई तरह से सोचने और और ख़ूब अच्छी तरह से विचार करने के बाद आज आपसे कहने की ज़ुर्रत कर पा रहा हूँ. यह जानते हुए भी कि आपको 'अच्छा' नहीं भी लग सकता है — कह रहा हूँ क्योंकि जानबूझ कर न कहना और भी बेईमानी लग रहा है.

हर आदमी अपनी प्राथमिकता और अवस्थिति स्वयं ही निर्धारित करता है और अपने ही चयन के अनुरूप आचरण करता है — चाहे वह छोटा बच्चा हो या तथाकथित परिपक्वता की उम्र तक पहुँचा हुआ हो, चाहे उससे उसे सुख मिले या दुःख, चाहे उसमें उसका हित हो या अहित, चाहे उसके चलते दूसरों का हित हो या अहित.

अगर वह थोड़ा समझदार है, तो भी वह तब तक अपनी अवस्थिति से तनिक भी हटने को तैयार नहीं होता, जब तक उसे अपने किये का परिणाम न मिल जाये. और अगर वह कम समझ रखता है, तब तो परिणाम सामने आने के बाद भी अपनी गति और दिशा नहीं बदल पाता. कई बार वह ख़ुद को बदलना ही नहीं चाहता. कई बार वह चाहता तो है मगर बदल नहीं पाता. उसकी आदतें और तौर-तरीक़े उसकी चाहत पर हर बार भारी पड़ते हैं.

गीता का यह श्लोक हमको अपनी सहायता करने की सलाह देता है. मगर क्या हम इस सलाह को लागू करते हैं. नहीं न !
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ६.५ ॥”
{अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है । (६.५)


Let a man lift himself by his own Self alone, and let him not lower himself; for, this Self alone is the friend of oneself, and this Self is the enemy of oneself. (6.5)}

स्पष्तः यह तथ्य सामने आता है कि ‘स्व’ के विरुद्ध संघर्ष की चर्चा व्यास से माओ तक सभी करते हैं. मगर समस्या तब भी वैसी ही थी, जैसी अभी है. इन्सान अभी भी दूसरों को ही नहीं, ख़ुद अपने आप को भी धोखा देने से बाज़ नहीं आ रहा.

जानते तो हम सभी हैं कि अकेले न तो तृप्ति मिल सकती है और न मुक्ति. छोटे-बड़े हर काम के लिये हमको अपने आस-पास के लोगों की मदद पर निर्भर करना पड़ता है. और लोग हैं कि कथनी-करनी का अन्तर पूरा-पूरा बनाये रखते हैं. लोग जैसा कहते हैं, करते उसके ख़िलाफ़ ही हैं. सब पर यकीन करने वाला मन बार-बार ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करता है. और फिर भी अगली बार ठगे जाने के लिये लोगों पर फिर से एक बार और यकीन करना शुरू करता है.

और फिर यह सूत्र सामने आता है — 
“TRUST NONE, BELIEVE EVERYONE !”
ये दोनों विचार देखने में तो परस्पर विरोधी लगते हैं. मगर वास्तव में ये दोनों ही परस्पर पूरक हैं. चूँकि हर काम में दूसरों से मदद लेनी ही पड़ती है, इसलिये सब पर यकीन भी करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता; और चूँकि लोगों की कृपा से अभी तक हर बार विफल होना पड़ा है, इसलिये एक-एक से सजग भी रहना ही पड़ता है. वस्तुतः ख़ुद अपने-आप पर भी विश्वास करने का साहस नहीं होता क्योंकि यह निश्चित नहीं होता कि अन्तिम फैसलाकून घड़ी में अपना ही शरीर और मन साथ देगा या दगा दे जायेगा.

जीवन की यह कैसी विडम्बना है !
ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश (17.11.14.)

____ इन्कलाब ज़िन्दाबाद ! ____


प्रिय मित्र, मैं विनम्रता के साथ आपका अभिवादन कर रहा हूँ.
मैं आज एक बार फिर आप के साथ ज़िन्दगी के सच की चर्चा करना चाहता हूँ.
वर्तमान जनविरोधी व्यवस्था को धनतन्त्र कहते हैं.
समूची धरती पर आदमखोर भेड़ियों की हुकूमत है.
धरती का हमारा अपना हिस्सा भी इसका महज़ एक अंग है.

धरती के हर देश में हुकूमत करने वाले इन भेड़ियों के पास तरह-तरह के हथियार हैं.
वे उनमें से हर एक का इस्तेमाल करते चले जा रहे हैं.
उनका मकसद केवल एक है — अपनी हुकूमत को बनाये रखना.
अपनी हुकूमत कायम रखने के लिये वे किसी भी हद तक पतित होते रहे हैं.
मगर उनकी तो गिनती भी मुट्ठी भर से अधिक नहीं है.
झूठ उनका सबसे शातिर हथियार है.
अन्धविश्वास की ताकत उनकी ताकत है.

समूची धरती पर मेहनतकश इन्सानों की तादाद अरबों में है.
हमारे महान पुरखों ने एक से एक शानदार कारनामे किये हैं.
उनकी सारी की सारी कहानियाँ प्रेरक और रोमांचकारी हैं.
जन-सामान्य की ज़िन्दगी की भीषण यन्त्रणा को दूर करना ही हमारा मकसद है.
सच हमारा सबसे धारदार हथियार है.
विज्ञान की ताकत हमारी ताकत है.

समूची धरती पर आज संक्रमण का अभूतपूर्व दौर चल रहा है.
जीवन के समुद्र में ज्वार-भाटा जारी है.
जीवन जैसा कल था, वैसा आज नहीं है.
जीवन जैसा आज है, कल फिर निश्चय ही वैसा नहीं रहेगा.
युवा आज अधिक तेज़ रफ़्तार से सोच रहे हैं, देख रहे हैं, समझ रहे हैं.
युवा तूफ़ानी रफ़्तार से आने वाले दिनों में आगे बढ़ने जा रहे हैं.
युवाओं के तेवर पर ही मुझे भरोसा है.

इतिहास अगली करवट लेने जा रहा है.
इतिहास को रोका नहीं जा सकता.
इतिहास को पीछे नहीं ले जाया जा सकता.
इतिहास आगे ही बढ़ता है.
वे इतिहास की धारा के विरुद्ध हैं.
उनको प्रतिगामी कहते हैं.
हम इतिहास की धारा के साथ हैं.
हम प्रगतिशील कहे जाते हैं.

आज उनका है.
मगर कल हमारा था.
कल धरती पर मेहनतकश का लाल परचम लहराता था.
लाल परचम हमारे महान शहीदों के बलिदान की याद दिलाता है.
हमने जीवन-संग्राम में केवल मोर्चा हारा है, युद्ध नहीं.
99% मेहनतकश जन और 1% जन-शत्रुओं के बीच का वर्ग-संघर्ष कल भी जारी था.
वह वर्ग-संघर्ष वैसे ही आज भी जारी है.

कल फिर हमारा होगा.
कल फिर हमारी धरती पर हमारा लाल परचम लहरायेगा.
आइए, अनोखी आन-बान-शान वाले उस कल को साकार करने का सपना देखें.
आइए, अपने सपने को साकार करने के लिये जो भी कर सकते हैं, कर गुज़रें.
आज मुझे न जाने किसका लिखा यह शानदार शेर बेतहाशा याद आ रहा है.

हिसाब कर लो चाहे जैसे, चाहे जितना भी;
मुझे घटा क' तुम गिनती में रह नहीं सकते | — अज्ञात

ढेर सारे प्यार और पूरी उम्मीद के साथ — आपका गिरिजेश (22.11.14)

__भारतीय इतिहास के शिखर-पुरुष चाणक्य हैं मेरे आदर्श__


प्रिय मित्र,
ज़िन्दगी ज़हर है !
मगर है तो !
ज़हर ही नहीं, जंग भी है !
इतना अधीर मत होइए.
भरोसा रखिए ख़ुद पर और दोस्ती पर !
चलिए न, जो भी चाल आपकी कूबत में है.
चलिए और मुझे अपने तरीके से चलने दीजिए.
शायद अभी भी कुछ कर सकूँ.

पूरी दुनिया में पूँजी का राज है.
पूँजी स्वभाव से ही दोमुँही है !
जो भी कहती है, करती है ठीक उलटा.
दोहरी जुबान का मीठा ज़हर !
मधुर मुस्कान के पीछे जानलेवा साज़िश !
मुखौटे के छेदों के पीछे से घूरती निर्मम हत्यारे की शातिर आँखे !
दोहरी फ़ितरत वाले हैं पूँजी के पुजारी !
मुनाफ़ा ही है उनका ख़ुदा !
इसीलिये तो दोगले हैं धनपशु !
पूँजी का घिनौना चरित्र मुखौटों के पीछे छिपाये नहीं छिपता.
पूँजी की पूरी दुनिया ही दोगली होती है.

शातिर से डरना,
शातिर से भागना,
शातिर को शह देना है.
शातिर का शिकार करने का मन बनाना दिलेरी है.
शातिर का शिकार मासूमियत की बेवकूफ़ी के बस का है क्या !
नहीं न !
जूझना ही होगा !

और इन्कलाबी हाथ-पैर में पत्थर बाँध कर समुद्र में नहीं कूदते.
जूझना है,
क्योंकि लक्ष्य पवित्र है.
अगर केवल लक्ष्य पवित्र है,
तो भी चलेगा !
साधन नहीं भी होगा, तो भी चलेगा !
मन कलुषित तो नहीं,
मंशा दोहरे दोगले लोगों से मानवता को मुक्त कराने की तो है,
साथ जो भी दे, जितना भी दे, जब भी दे...
साधन जो भी मिलेगा, जितना मिलेगा, जब भी मिलेगा,
भागूँगा नहीं,
लडूँगा ही उससे !

न्याय की देवी अन्धी है.
न्याय की आस लिये अदालत नहीं जाऊँगा.
हाथ-पैर दिमाग ही से लडूँगा.
शिकार को 'शातिर' कह कर छोडूँगा नहीं.
उसको परास्त करना है,
तो उससे अधिक चालाकी चाहिए.
भारतीय इतिहास के शिखर-पुरुष चाणक्य हैं मेरे आदर्श.

जब भी मौका मिला,
कुछ लोगों की धुलाई भी करता ही रहा हूँ.
आगे भी मौका मिलेगा ही,
आगे भी धुलाई करूँगा ही.
तब तक घात लगा कर धीरे-धीरे ही चल सकता हूँ.

कभी गुहार लगाऊँ,
तो मदद कीजियेगा.
अगर मेरी कोशिश तनिक भी सफल हो सकी,
तो मुझे नहीं,
उसका श्रेय आपको ही मिलेगा.

ढेर सारा प्यार 

– अब तक की तरह ही अभी भी आपका ही गिरिजेश (1.12.14)