Tuesday, 23 December 2014

आलोक तोमर की असलियत पता है? by आलोक तोमर

Anil Janvijay - "आप में से कितने लोग इस पत्रकार को पहचानते हैं? एक सप्ताह बाद ही 27 दिसम्बर को इसका जन्मदिन है। यह व्यक्ति कवि भी था। इसकी एक कविता प्रस्तुत है :

मैं डरता हूँ कि मुझे डर क्यों नहीं लगता,
जैसे कोई बीमारी है अभय होना,
जैसे कोई कमजोरी है, निरापद होना
जो निरापद होते हैं,भय व्यापता है उन्हें भी
पर भय किसी को निरापद नहीं होने देता

आलोक तोमर को विनम्र श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत है.
उनका ही लिखा ईमानदार आत्मसाक्षात्कार और स्वयं पर ही कटाक्ष का एक पठनीय लेख !

आलोक तोमर की असलियत पता है?
Tuesday, 27 December 2011 12:09 Written by आलोक तोमर
अब आलोक तोमर को मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता। मेरी अपनी विनम्र राय में आलोक तोमर एक फर्जी आदमी है। साहित्यकार और उसमें भी कवि बनने निकले थे। बाकायदा इलाहबाद जा कर महादेवी वर्मा, इलाचंद्र जोशी, नरेश मेहता और उपेंद्र नाथ अश्क आदि से मिल आए थे। लेकिन फिर कविता पीछे रह गई और चूंकि पत्रकारिता में नाम और दाम दोनों थे इसलिए साहित्य के चोर दरवाजे से पत्रकारिता में घुस गए।
इस बात का बहुत डंका पिटता है कि आलोक तोमर ने एमए हिंदी साहित्य की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक पाए थे और यह रिकॉर्ड अभी तक बना हुआ है। अब आपको उनकी इस डिग्री की पोल बता रहे हैं। साहित्य वगैरह पढ़ते रहते थे इसलिए कोर्स में जो किताबे थी, वे ज्यादातर पहले से पढ़ रखी थी। घर वाले डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए बीएससी भी कर रखी थी। अंग्रेजी भी मां ने ठीक ठाक सिखा दी थी। आलोक तोमर ने अपनी उत्तर पुस्तिका में अपनी ही कविताएं कभी धर्मवीर भारती और कभी अज्ञेय के नाम से विशेष टिप्पणी के तौर पर लिख दी। फिर टूटी फूटी अंग्रेजी में कीट्स, शैले, वर्डसवर्थ आदि के नाम से पेल दी, बहुत साल पहले दिवंगत हो चुके महावीर प्रसाद द्विवेदी को आलोचना और धर्मयुग पत्रिकाओं में लिखते हुए उनके उद्वरण लिख दिए और इस चकाचौंध में टॉप कर गए। सार यह है कि आलोक तोमर की एमए की डिग्री फर्जी है।
अब जरा पत्रकार आलोक तोमर की बात करते हैं। ग्वालियर के स्वदेश में काम कर रहे थे। अखबार संघ परिवार का था मगर आलोक तोमर मार्क्‍सवादी पार्टी की छात्र शाखा एसएफआई के सदस्य थे। संघ परिवार ने दयाकर के संघ कार्यालय में रहने के लिए कमरा दिया तो वहां कार्ल मार्क्स की तस्वीर ले जा कर टांग दिया। दूसरे दिन बाहर कर दिए गए। स्वदेश में काम करते हुए रिपोर्टिंग की और कुछ दिनों बाद घटना स्थल पर नहीं जाते थे, फोन पर ही सारी जानकारियां वे लेते थे और हिट रिपोर्टर कहे जाते थे। दिल्ली आ कर यूएनआई में काम किया, वहां एक दिवंगत खिलाड़ी से शतक बनवा दिया, नौकरी से निकाल दिए गए, कुछ दिन बाद जनसत्ता में प्रभाष जोशी ने काम और नाम दोनों दिलवाए और वहां दस साल पूरे करने के पहले एक लेख में शरारत करने के इल्जाम में बाहर कर दिए गए। यहां पर उन्हें संदेह का लाभ देना पड़ेगा क्योंकि लेख में हेर फेर करने के लिए हिंदी की टाइपिंग आनी जरूरी हैं और वह आलोक तोमर को आजतक नहीं आती।
जनसत्ता की नौकरी गई तो शब्दार्थ फीचर्स खोल लिया। उसके पहले भी नाम बदल कर इधर उधर लिखते रहते थे। शब्दार्थ फीचर्स का ऑफिस कनॉट प्लेस की एक पिछली गली में मोटर पार्टस के एक गोदाम के कोने में था। शब्दार्थ चल निकली और जब इंटरनेट का जमाना आया तो डेटलाइन इंडिया शुरू कर दी। सिर्फ आश्चर्य है कि सिर्फ तीन चार घंटे में आलोक तोमर रोज एक लेख भी लिख देते हैं और दर्जनों खबरें भी और इससे शक होता है कि कहीं वे चोरी, चकारी तो नहीं करते। आज तक पकड़े नहीं गए हैं।
आप में से ज्यादातर जानते होंगे कि आलोक तोमर दो बार तिहाड़ जेल हो आए हैं। पहली बार पुलिस कमिश्नर के के पॉल से एक दुखी आत्मा की वजह से झगड़ा मोल ले लिया था और फिर जिस पत्रिका के वे संपादक बनाए गए थे उसमें पैगंबर का कार्टून छापने के इल्जाम में जेल गए और अपने आपको देश ही नहीं, पूरी दुनिया के पत्रकारों का हीरो साबित करने की कोशिश की। इस मामले में वे पत्रिका के मालिक को भी जेल यात्रा करवा चुके हैं। इस मालिक बेचारे का कसूर यह था कि अरबपति होने के बावजूद या शायद उसी के कारण वह पुलिस के हवलदार से भी डरता था और जैसे ही आलोक तोमर थाने पहुंचे, मालिक ने अपने टीवी चैनल पर गिड़गिड़ा कर कहा कि माई बाप मेरा कसूर नहीं है। मैंने तो आलोक तोमर को नौकरी से निकाल दिया है। बेचारा इस एक बयान पर सह अभियुक्त बन गया।
दूसरी बार आलोक तोमर जेल गए थे तो वह कोई प्रेस की आजादी का मामला नहीं था। उन पर धारा 420 के तहत सीधे जालसाजी का आरोप लगा था जिसके अनुसार उन्होंने अपनी भूतपूर्व कंपनी का एक चेक फर्जी एकाउंट में कैश करवा लिया था। हालांकि इस फर्जी एकाउंट से आलोक तोमर का कोई लेना देना नहीं था और न उन्होंने एकाउंट खुलवाया था मगर इस पूरे गोरख धंधे की जानकारी उन्हें थी, इसलिए उन्हें बहुत नाटकीय तरीके से हवाई जहाज से उतरते हुए पकड़ा गया। जेल से निकलकर वे सीधे एक ताकतवर मुख्यमंत्री के पास गए, पूरी कहानी सुनाई, यह भी बताया कि कंपनी का मालिक कार्टून वाले मामले में कानूनी खर्चा तक नहीं दे रहा और मुख्यमंत्री ने मालिक को जो झाड़ पिलाई, अगली पेशी में आधे घंटे में मामला खारिज हो गया।
इन दिनों आलोक तोमर एक टीवी चैनल में काम करते हैं और वहां सलाहकार संपादक हैं। न उनके आने का वक्त तय हैं और न जाने का। जाते हैं और सलाह दे कर खिसक लेते हैं। बाकी समय डेटलाइन इंडिया को देते हैं। अब यह पता नहीं कि ठाकुरवाद की वजह से या वाकई उनकी पत्रकारिता के प्रति सम्मान भाव से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह उन पर बहुत कृपालु हैं और कभी वेबसाइट को विज्ञापन दे देते हैं और कभी मासिक आधार पर जनसंपर्क विभाग से वेबसाइट के लिए भुगतान करवाते रहते हैं। ऐसी ही कृपा मध्य प्रदेश सरकार की भी है।
कहानी लंबी हो रही है इसलिए चलते चलते बता दिया जाए कि भारतीय पत्रकारिता में आलोक तोमर से बड़ा शराबी शायद ही कोई दूसरा पैदा हुआ हो। हालांकि अब वे शराब छोड़ने की घोषणा कर चुके हैं लेकिन बीच-बीच में डंडी मार लेते हैं। पत्रकारिता में उनके सरोकार प्रभाष जोशी से शुरू होते हैं और शायद उन्हीं के साथ खत्म हो गए हैं। प्रभाष जोशी अपने इस सबसे प्रिय शिष्य को जीवन जीनेका सलीका नहीं सिखा सके। अब आप ही बताइए कि ऐसे आलोक तोमर पर आप कितना विश्वास करेंगे, जिसे आम तौर पर हर नौकरी से निकाला ही गया हैं? आज तक में गए तो सिर्फ चार महीने काम किया और इस्तीफा दे कर निकल लिए। वहां से जैन टीवी चले गए। वेतन नहीं मिला तो मालिक को ही मार बैठे।
पायोनियर गए तो उड़ीसा के चक्रवात से ले कर कारगिल के हालात पर लिखा लेकिन एक दिन अचानक एनडीटीवी में जी मंत्री जी लिखने पहुंच गए। फिर स्टार के लिए केबीसी लिखने मुंबई पहुंचे और बिग बी से पता नहीं क्या हुआ कि चालीसवें एपिसोड के बाद प्रोग्राम छोड़ कर स्टार के खर्चे पर अगले दिन दार्जिलिंग में छुट्टियां मना रहे थे। प्रभाष जोशी सही कहा करते थे कि आलोक तोमर प्रतिभाशाली हैं मगर उनके अंदर काम करने का सातत्य नहीं हैं और ऐसी प्रतिभाएं खुद विस्फोट हो कर नष्ट हो जाती है। आप सब आलोक तोमर के नष्ट होने की प्रतीक्षा कीजिए।

(अपने बारे में यह लेख काफी पहले खुद आलोक तोमर ने लिखा है. उनका यह लेख डेटलाइन इंडिया से साभार लेकर यहां प्रकाशित की जा रही है.)
http://old1.bhadas4media.com/…/1357-2011-12-27-06-39-03.html

____उग्रता और आत्मालोचना___

प्रिय मित्र,
आप सब के स्नेह के लिये मैं ऋणी हूँ.
इस क़र्ज़ से उबर पाना मेरे लिये नितान्त असम्भव है.
कल रात ज़िन्दगी ने मुझे एक बार फिर दरेर दिया.
झटका तगड़ा था, सो मन भिन्ना गया.
और नतीज़ा रहा कि आज का पूरा दिन अस्तव्यस्त रहा.
दिन भर पूरी तरह आराम किया.
बच्चों से बातें की. Amit Singh से फोन से बात की.
अपनी अस्त-व्यस्त विकास-यात्रा की सीमाओं के बारे में ख़ूब सोचा
और कठोरता के साथ आत्मालोचना की. अभी मन शान्त और स्थिर है.
और तब जाकर अब मुझे एक बार फिर
अपनी अव्यावहारिकता, मूर्खता, दम्भ, उग्रता और आतुरता की सघनता का एहसास हुआ.
मुझसे अभी और भी अधिक संतुलन, धीरज और सहनशक्ति की अपेक्षा की जाती है.
स्वाभिमान की खोल में छिपे अपने दम्भ के चलते
अपनी उग्रता से
अपने जिन भी मित्रों को
मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में
जाने-अनजाने कभी भी मार्मिक पीड़ा पहुँचायी,
उन सभी से अन्तर्मन से ईमानदारी के साथ क्षमायाचना करता हूँ.
उम्मीद करता हूँ कि
जब ज़िन्दगी दुबारा परीक्षा लेगी,
तो मैं और सहज होकर निखर सकूँगा.
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (22.12.14).

___शिक्षा और सूचना___

शिक्षा क्या है ! सूचना क्या है ! दोनों में अन्तर क्या है !
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था हमें बाज़ार के हवाले कर देती है — तब भी जब हम शैशवावस्था में ही इंग्लिश मीडियम प्राइवेट स्कूल के हवाले अपना बचपन कर देते हैं. और तब तो और भी जब हमें सरकारी विद्यालय की खिचड़ी-छाप शिक्षा ही मयस्सर हो पाती है. प्राथमिक शिक्षा से ले कर माध्यमिक और उच्च शिक्षा तक देने वाले सभी शिक्षा-संस्थान आज पूरी तरह बाज़ार के लिये उपभोक्ता और उत्पाद बनाने का कारखाना बन चुके हैं. तब तो और भी जब हम किसी रोज़गार के लिये कोई प्रतियोगी परीक्षा देने की तैयारी कर रहे होते हैं, हम पूरी तरह बाज़ार पर आश्रित होते हैं. बाज़ार हमें हर स्तर पर हर तरीके से केवल और अधिक मुनाफ़ा पैदा करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करता है.

हमारे सामने विचार करने का विषय है कि यह शिक्षा-व्यवस्था हमें शिक्षा के नाम पर क्या दे रही है !
आइए, एक तरफ़ से देखने और पड़ताल करने का प्रयास करते हैं. प्रवेश परीक्षा देने का चलन सभी विद्यालयों में चल रहा है. जो विद्यालय पिछले सत्र में अपने ही विद्यार्थियों को शिक्षा दे चुके होते हैं और वार्षिक परीक्षा में उत्तीर्ण कर चुके होते हैं, वे भी उन छात्रों को अगले सत्र के आरम्भ में प्रवेश-परीक्षा देने और उत्तीर्ण होने पर ही पुनः अगली कक्षा में प्रवेश लेने का पात्र मानते हैं. जब किसी छात्र को विद्यालय में वार्षिक परीक्षा में अगली कक्षा में पढ़ने के योग्य प्रमाणित कर दिया गया, तो फिर उसी छात्र को उसी संस्था में प्रवेश-परीक्षा से गुज़ारने की क्या आवश्यकता है !

प्रवेश लेने के बाद छात्र को शिक्षा लेने के लिये पाठ्य-पुस्तकों का सहारा लेना होता है. प्रत्येक कक्षा के प्रत्येक विषय की प्रत्येक किताब में लगभग बीस अध्याय होते हैं. प्रत्येक विद्यालय वर्ष भर में लगभग 200 दिन शिक्षा का काम करता है. एक घंटी प्रतिदिन के हिसाब से एक पाठ के लिये शिक्षक और छात्र दोनों के पास मात्र दस घंटियाँ होती हैं. प्रत्येक कक्षा में लगभग चालीस या उससे अधिक ही छात्र-संख्या होती है. प्रत्येक घंटी में लगभग दस मिनट शिक्षक के आने-जाने और छात्रों के अगली घंटी की पाठ्य-सामग्री सामने निकालने में खर्च हो जाते हैं, तो वस्तुतः घंटी का समय मात्र तीस मिनट ही कार्यकारी समय के रूप में उपलब्ध हो पाता है. क्या सबसे अधिक ज़िम्मेदार और मेहनती शिक्षक के भी लिये यह सम्भव है कि वह चालीस मिनटों की दस घंटियों में एक पाठ के शब्दार्थ लिखा ले, आदर्श वाचन कर-करा ले, पाठ को समझा ले, प्रश्नों के उत्तर लिखा ले और उनको जाँच कर त्रुटिसुधार करवा ले जाये ! निश्चय ही हमारा उत्तर नकारात्मक होगा. फिर इतने लम्बे पाठ्यक्रम और इतनी बोझिल पाठ्य-पुस्तकों के लिखे जाने का क्या लाभ है !

आइए देखें, शिक्षा के नाम पर वास्तव में होता क्या है ! सामान्यतः शिक्षक चन्द पाठों को विस्तार में गम्भीरता से पढ़ाता है. अगले कुछ पाठों को तेज़ी से पढ़ा देता है. शेष पाठों को या तो छूता ही नहीं या अगर छूता भी है, तो केवल ऊपरी तौर पर खानापूर्ति करने के नाम पर प्रबन्धक की फटकार सुनने से बचने के लिये छात्रों के ऊपर एहसान करता है. अधिकतर शिक्षकों का कोर्स कभी पूरा होता ही नहीं. ईमानदारी से पढ़ाने पर भी वह हो ही नहीं सकता. और अधिकतर शिक्षक केवल उतना ही काम करते हैं, जिसमें उनकी नौकरी बची रह जाये. वे केवल तीस प्रतिशत काम करते हैं और सत्तर प्रतिशत कामचोरी करते हैं. यह मूलतः बोझिल पाठ्यक्रम और कामचोर शिक्षक के बीच का अन्तर्विरोध है.

अब देखते हैं कि शिक्षा देने के नाम पर शिक्षक क्या देता है और शिक्षा लेने के नाम पर छात्र क्या पाता है ! शिक्षक पाठ के अन्त में दिये गये प्रश्नों के निश्चित उत्तर लिखवा देता है. छात्र उन उत्तरों को रट लेता है. रट लेने के बाद परीक्षा में वह पूछे गये प्रश्नों के उन्हीं उत्तरों को ही लिख देता है. मूल्यांकन के समय परीक्षक द्वारा उसे थोक भाव से अंक दे दिये जाते हैं. ऐसा होने का कारण है कि इस समय देश में चल रही वर्तमान मूल्यांकन-पद्धति में शासन का एक ही निर्देश ईमानदारी से लागू किया जाता है कि किसी को फेल न किया जाये. और जनरल मार्किंग की व्यवस्था में कोई फेल नहीं होता. जब छात्र और शिक्षक दोनों को पूरी गारन्टी है कि कोई फेल नहीं होगा, तो पढ़ते-पढ़ाते समय कक्षा में माहौल कितना गम्भीर रह सकता है — यह बहुत आसानी से समझ में आ जाने वाली बात है.

परिणाम यह है कि हर शहर के हर बाज़ार में छोटे-बड़े कोचिंग-सेन्टर्स ख़ूब अच्छी तरह पनप रहे हैं. वही शिक्षक अपने विद्यालय में नौकरी करने के नाम पर कामचोरी करता है, विषय-वस्तु की केवल झलक दिखा देता है और अपनी कोचिंग में पढ़ने के लिये छात्रों पर दबाव बनाता है. चूँकि उसके हाथ में प्रैक्टिकल के नम्बर होते हैं. इसलिये भी छात्र उसकी कोचिंग के ग्राहक बनने को तैयार हो जाते हैं. और अब तो हर स्तर पर ट्यूशन और कोचिंग का प्रचलन इनता बढ़ चुका है कि बड़ी बड़ी इमारतों वाले विद्यालय केवल फीस जमा करने और परीक्षा देने के ढहते हुए केन्द्र बन कर रह गये हैं. और उनकी तुलना में बहुत कम व्यवस्था दे पाने वाले शिक्षा बेचने की दूकानों के रूप में चल रहे कोचिंग सेन्टर्स में छात्रों-छात्राओं की ठसाठस भीड़ उमड़ती रहती है.

अब पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी की अन्तर्वस्तु के बारे में विचार करें. चन्द चुने हुए प्रश्न और उनके सेट उत्तर परीक्षा में वर्ष-दर-वर्ष पूछे और लिखे जाते हैं. अगर गत दस वर्षों के प्रश्न हल कर लें, तो ग्यारहवें वर्ष के प्रश्न-पत्र की तैयारी अपने आप हो जाती है.

मगर अभी तो अधिकतर छात्र इतना भी नहीं करते. वे केवल एक रफ़ नोटबुक लेकर क्लास करने आते हैं और उसी में अपने सभी विषयों के क्लास-नोट्स लिखते रहते हैं. पाठ्य-पुस्तकों को ढोने के लिये वे तैयार नहीं होते. और तय है कि वह रफ़ नोटबुक उनको परीक्षा की तैयारी के समय मिल ही नहीं सकती और अगर मिल भी गयी, तो यह छाँटना उनके लिये असम्भव होता है कि अमुक विषय के नोट्स कहाँ-कहाँ बिखरे हैं. अब वे क्वेश्चन-बैंक और श्योर शॉट सीरीज़ पर निर्भर करने को बाध्य होते हैं. जो कुछ शिक्षा के नाम पर हमें दिया जा रहा है, वास्तव में यह शिक्षा है ही नहीं. यह मात्र सूचना है.

शिक्षा का उद्देश्य है मानव-मस्तिष्क को ख़ुराक देना. मानव-मस्तिष्क को और सक्रिय बनाना. मस्तिष्क कब अधिक सक्रिय हो सकता है ! जब उसके सामने चुनी-चुनाई प्रश्नोत्तर पद्धति से सीमित और निर्धारित मात्रा में उत्तर के नाम पर कुछ सूचनाएँ उपलब्ध करा दी जायें, तो निश्चित तौर पर उस व्यक्ति के दिमाग को सन्तुष्ट कर दिया जाता है. परिणाम यह होता है कि अब वह दिमाग तृप्त और शान्त हो जाता है. क्या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के नाम पर भी हम केवल सूचनाएँ ही जुटाते नहीं रह जाते हैं ! ऐसी सूचनाओं का हमारे जीवन में आगे कोई उपयोग होता ही नहीं. क्या चन्द सूचनाओं को रट लेना शिक्षित होना है ! हमारा उत्तर निश्चय ही होगा — नहीं.

सूचना-विस्फोट के काल में अधिकतम सूचनाएँ जुटा कर हम अपने मस्तिष्क को और सक्रिय नहीं बना सकते. इसके विपरीत जितनी सूचनाएँ हमारे पास जुटती जाती हैं, हमारा दिमाग उतना ही अधिक तुष्ट, तृप्त और शान्त होता जाता है. नेट पर सूचनाओं के सहज ही उपलब्ध हो जाने के कारण हमारे दिमाग का सोचने का काम कम होता जा रहा है. याद करने और याद रखने की कोशिश करने का काम कम होता जा रहा है. हर सवाल का सामना करते ही हम केवल ‘गूगल’ गुरु पर ही निर्भर हो जाते हैं. ‘गूगलिंग’ से हमको किसी भी विषय पर ऐसी जानकारी तो मिल जाती है, जो उस विषय के बारे में सामान्य सूचना होती है, मगर दिमाग को बेतहाशा मथने और हमको पूरी तरह बेचैन कर देने के लिये ज़रूरी ज्ञान सन्तोषजनक मात्रा में नहीं उपलब्ध हो सकता. हमारा दिमाग तभी बेचैनी से सटीक प्रश्न का समाधान खोजने का प्रयास कर सकता है, जब उसके सामने निश्चित सूचनाओं की शक्ल में सेट उत्तर न हों.

सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने छात्र को प्रश्नों और परिप्रश्नों की भूल-भुलैया में चक्कर लगवाता है. वह अपने छात्र के सामने एक प्रश्न के बाद दूसरा प्रश्न करता चला जाता है और इस पद्धति से परिप्रश्नों की झड़ी लगा कर उसके दिमाग के चारों ओर ऐसा धुआँ फैला देता है, जिसमें वह और भी दिग्भ्रमित हो जाता है. अब वह अपने भ्रम को दूर करने और सही उत्तर की तलाश के लिये बेचैन हो उठता है. अब उसकी जिज्ञासा बढ़ती चली जाती है. अब उसे शिक्षक से अपनी शंका का समाधान पूछने की आवश्यकता महसूस होने लगती है. यह आवश्यकता जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, छात्र वैसे-वैसे और भी शिद्दत से समाधान की तलाश करने पर उतारू होता जाता है. अब जाकर उसे सच्चे मार्गदर्शक गुरु की ज़रूरत महसूस होती है. वरना वह मुदर्रिस, ट्यूसनिया मास्टर और सच्चे मार्गदर्शक गुरु के बीच का अन्तर समझ ही नहीं पाता. अब वह विनम्र होना शुरू करता है.

सुकरात के बारे में दसवीं कक्षा के छात्रों के लिये अंग्रेज़ी में एक पाठ है. वह पाठ दिखाता है कि जैसे ही सुकरात सड़क पर दिखाई देता, युवा कहते — देखो वह सुकरात है. आओ चलें, उससे बात करें. सुकरात से बात करने के दौरान वे उससे प्रश्न करते. चूँकि सुकरात की पद्धति सूचना देने के बजाय प्रतिप्रश्न करने की थी. परिणामस्वरूप वे युवा अपने उस प्रश्न विशेष का उत्तर तो तत्काल नहीं ही पाते थे, बल्कि सुकरात द्वारा उसी मुद्दे पर तड़ातड़ ढेरों परिप्रश्न करने के चलते वे अनेक और भी प्रश्नों का सामना करने तक पहुँच जाते थे. अब इस तरह वे जब पूरी तरह दिग्भ्रमित हो जाते थे, तो उनके अन्दर सच्चे ज्ञान की भूख पैदा हो जाती थी. और वे धीरे-धीरे करके सुकरात के अनुयायी बन जाते थे.

तो अब हम यह कह सकते हैं कि सच्ची शिक्षा वही है, जो मुक्त करती है. “सा विद्या, या विमुक्तये”. सच्चा ज्ञान वही है, जो हमको उस विषय पर इतना सिखा दे कि हम अपनी समस्याओं के समाधान करने के लिये प्रयास करने तक पहुँच जायें. हम अब समझ सकते हैं कि सच्ची शिक्षा हमारे दिमाग को सोचने के लिये प्रेरित करती है और और अधिक सोचने तक पहुँचा देती है. सच्ची शिक्षा इस तरह हमारे दिमाग को और सक्रिय बना देती है. 
आइन्स्टीन ने कहा था — “The value of college education is not learning many facts, but training of mind to think.”
वर्तमान व्यवस्था अधिकतम लोगों को केवल 'साक्षर मूर्ख' बना रही है. यह हमें केवल सूचनाएँ दे रही है. यह हमारे दिमाग को कुन्द कर रही है. यह हमारे सोचने की क्षमता नष्ट कर रही है. गुलाम बनाने के लिये सबसे ज़रूरी होता है कि इन्सान सोचना बन्द कर दे. वह केवल वही और उतना ही समझे-जाने, जो और जितना शासक शोषक प्रभु वर्ग समझाना-जनाना चाहता है. अगर इन्सान किसी भी समस्या पर गहराई से सोचने लगेगा, तो शोषण, उत्पीड़न और नफ़रत पर टिकी इस आदमखोर व्यवस्था को चलाते रहना नामुमकिन हो जायेगा. जो सोचने लगता है, वह मुट्ठी-भर वैभवशाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिकान के लाभ के लिये चल रही इस व्यवस्था के लिये ख़तरनाक हो जाता है. वह इस व्यवस्था को बलपूर्वक उलट कर मानवोचित गरिमा वाली जनपक्षधर व्यवस्था स्थापित करने के लिये कसमसाने लगता है.

प्रिय मित्र, क्या आप इस विश्लेषण से सहमत नहीं हैं ! असहमति के लिये सहमत होने पर ही हम-आप विचार-विनिमय करते हैं. ऐसा बिलकुल हो सकता है कि मेरा विश्लेषण पूरी तरह गलत हो. ऐसे में मेरा पथ-प्रदर्शन का दायित्व आप सभी विद्वान् मित्रों का दायित्व है. क्या आप इस मुद्दे पर सदा की तरह ही मुझे सिखाना पसन्द करेंगे ! कृपया मेरा मार्ग-दर्शन करें.
विनम्र जिज्ञासा के साथ — आपका गिरिजेश (24.12.14)
( इस लेख के बाद '__कैसा हो शिक्षा का स्वरूप__' शीर्षक लेख इस लिंक पर देखें - 
http://young-azamgarh.blogspot.in/2014/12/blog-post_23.html )

Sunday, 14 December 2014

____ आख़िर क्या करें हम ? ____


"हार मान कर घर बैठ जायें 
या औरों की तरह बिकाऊ बन जायें !"
प्रिय मित्र, 
कल शाम एक मित्र ने एक संस्मरण सुनाया. 
संस्मरण प्रेरक था.
मेरा मनोबल बढ़ गया. 
आप को भी सुना रहा हूँ. 
शायद आपको भी प्रेरित कर सके.

कभी किसी जगह बहस जारी थी. 
एक पक्ष यथास्थितिवादी था.
दूसरा पक्ष परिवर्तनकामी था.

पहला बोला —
इस देश में कुछ भी नहीं बदल सकता.
इस देश के लोग इसी तरह जीते रहे हैं.
इस देश की जनता स्वार्थी है.
इस देश की जनता ऐसे ही नेताओं को चुनती रही है.
इस देश को ऐसे ही नेता ठगते-लूटते रहेंगे.
इस देश की जनता इसी तरह बर्दाश्त करती रही है.
इस देश की जनता आगे भी इसी तरह बर्दाश्त करती रहेगी.

दूसरा बोला —
हमारे बूते में जितना है, 
व्यवस्था बदलने के लिये प्रयास कर रहे हैं.
अगर हमारे बूते में होता, 
तो अब तक व्यवस्था बदल चुके होते.
अगर अभी तक व्यवस्था वैसे ही चल रही है,
तो इसका सीधे-सीधे एक ही मतलब है.
इसका मतलब है कि अभी हमारा बूता कम है.
अभी व्यवस्था बदल देने भर को हमारी कूबत नहीं है.

अभी तक व्यवस्था नहीं बदल सकी, 
तो ऐसे में हमें क्या करना है !
हमारे सामने तीन विकल्प हैं —

पहला विकल्प है कि 
औरों की तरह 
हम भी झुक जायें और बिक जायें.
बिक कर हम भी सुविधाभोगी बन जायें
बिकाऊ लोगों को व्यवस्था सारी सुविधाएँ मुहैया कर देती है.
.
दूसरा विकल्प है कि 
औरों की तरह 
हम भी थक जायें और हार मान लें.
हार मान कर घर बैठ जायें और 
हमेशा लोगों को उनके पिछड़ेपन के लिये कोसते रहें.

तीसरा विकल्प है कि 
हम अपनी मुट्ठियाँ कस कर भींच लें.
हम और अधिक लोगों से दोस्ती करने की कोशिश करें.
हम और अधिक शिद्दत से अपने क़दम बढायें. 
हम और अधिक ज़िद के साथ क़दम-दर-क़दम आगे बढ़ते जायें. 
हम और अधिक मेहनत से अपना काम आगे बढ़ाते रहें.
हम इस उम्मीद के साथ जूझते रहें कि 
कभी तो हमारे भी बूते में दुनिया बदलने का काम होगा.
कभी तो हमारा भी बूता इतना बढ़ सकेगा कि 
हम भी व्यवस्था बदलने में निर्णायक भागीदारी कर सकें.

हम तो पूरी शिद्दत से 
इस व्यवस्था से जूझने का 
मन बना कर ही घर से निकले हैं.
हमारा दो टूक फैसला है कि 
जब तक हम इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल नहीं लेते, 
तब तक न तो हार मानेंगे और 
न ही बिकने को तैयार होंगे.
हम इस आदमखोर व्यवस्था से आजीवन लड़ते रहेंगे. 
हमारे और व्यवस्था के बीच 
जीवन-मरण का यह संघर्ष 
हर-हमेशा जारी रहेगा.
या तो तुम नहीं या फिर हम नहीं.
आर-पार का फ़ैसला इससे कम पर नहीं होने का.

प्रिय मित्र, 
आपके भी सामने यही तीन विकल्प हैं.
आपको इनमें से कौन-सा विकल्प चुनना है.
कृपया विचार कीजिए.
अगर आमरण लड़ने का मन बना सकें, 
तो व्यवस्था-परिवर्तन के इस संघर्ष में अपनी भूमिका चुनिए.
अपने दोस्तों के साथ पीठ से पीठ और कन्धे से कन्धा सटा कर खड़े रहिए.
हम सभी एक साथ मिल कर 
मुट्ठी भर जनविरोधी लुटेरों से 
मानवता की मुक्ति के लिये जूझेंगे.
अन्तिम विजय हमारी होगी.
इन्कलाब ज़िन्दाबाद !
ढेर सारे प्यार के साथ 
— आपका गिरिजेश

 (14.12.14.)

Thursday, 11 December 2014

आइए लिखना सीखें : कलम का कमाल !

मोदी न हो तो ज़िंदगी कितनी बोर हो जाएगी? - वुसतुल्लाह ख़ान बीबीसी पाकिस्तान

गोलगप्पा, सुनहरा अतीत, ख़राब वर्तमान, दूसरे की मां को बुरा भला कहने के साथ अपनी मां के चरण छूने की आदत, ख़ुद पे तरस ख़ाने की मसरूफ़ियत, किसी की गाड़ी ठोककर उसी को क़सूरवार साबित करने का हुनर.

दहेज़, कुर्ता पायज़ामा, बीड़ी की बू, पोस्टर में लगी लड़की की ख़ुशबू, सास-बहू का रिश्ता, अब्बा की मौक़ा-बे-मौक़ा डांट, महबूबा को बीवी बना लेने की जल्दी, गोरे पांव की मैल से फ़टी एड़ी, मोज़े से निकला साँवला अंगूठा, हवा के ज़ोर से मर्लिन मुनरो की स्कर्ट की तरह उड़ जाने वाली मक़रूज़ किसान की धोती.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई, एआर रहमान का ऑर्केस्ट्रा, लाहौरी मुर्ग छोले, श्रीनगर, दिलीप कुमार. हरियाणवी जाट, दरिया-ए-सिंध, बादशाही मस्जिद लाहौर, ताजमहल की सामने गड़ी वीआईपी बैंच के आसपास मंडराते फ़ोटोग्राफर.

सूरत के हीरा तराश, एमक्यूएम, इस्लामाबाद, हसीना वाजिद, गाँधी कैप, दीवान-ए-ग़ालिब, राम जन्म भूमि, ख़ुदक़श बमबार, समझौता एक्स्प्रैस, गोल आसामी चेहरा, राजस्थानी माँड, भगत सिंह की याद, ढाका का लिब्रेशन म्यूज़ियम, कराची हलवा, तालिबान, चाइना का माल, जामदानी साड़ी, लक्ष्मण का कार्टून, नक्सलाइट्स, पान की पीक मुँह में भरकर बैठने वाला सरकारी क्लर्क-बाबू.

बिहार राज्य, टैगोर, शोले की बसंती. हाफ़िज़ सईद, सुंदरबन, नेपाली कम्युनिस्ट, आम का बाग, मायावती, ड्रोन, इडली-सांभर, दाऊद इब्राहीम.

खजुराहो के मंदिर, सिंधी अलगोज़ा, अंग्रेज़ के ज़माने को याद करती नानियाँ-दादियाँ, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, हज़ारा शिया, अज़मेर शरीफ़, बदाँयूं का पेड़ा, दार्जिलिंग चाय, शांति निकेतन, दर्रा-ए-ख़ैबर, सरदार की पग, हसीन औरत की गोद में बैठे बच्चे से बातें करने की कोशिश, पुरानी दिल्ली की गलियाँ, अरुंधती राय का गुस्सा.

पंजाबी फ़िल्म का उधम, आईएसआई, बस के पीछे से निकलने वाला काला धुआँ, गुजराती डांडिया, केरल का समंदर, बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स, टाटा ट्रक, गऊशाला, हांफ़ता हुआ पंडित, ब्रेड पकौड़ा, गंगा, झोपड़पट्टी, अलीगढ़, आसिफ़ ज़रदारी, अमरीका, मिग 21, चार मीनार, अमीर ख़ुसरो, लस्सी, आबिदा परवीन, एनआरआई, रामसेना, अब्दुल सत्तार ईदी, ग्वालियर गायकी.

बनारस की सुबह, बेसन की रोटी, लहसुन की चटनी, एमएफ़ हुसैन का घोड़ा, दरगाह निज़ामुद्दीन, जयपुर का पत्थर, ताड़ी, आधी रात को आने वाली बाँसुरी की आवाज़, सुबह का भजन, दाल मखनी, अज़ान, सरदारों पठानों शेखों और बनियों के लतीफ़े, सड़कछाप छिछोरापन, लता की आवाज़, लद्दाख का सन्नाटा, नेहरू फ़ैमिली.

बंगाली रोसोगुल्ला, केले का पत्ता, कड़ाही गोश्त, चमेली, सरसों का खेत, ग़ुलाम अली, बाघा-अटारी, मीठी इमली, कथक, कीर्तन, बेलगाम टीवी चैनल, दारू, पुलिस, सपेरा, एटम बम, चूड़ियाँ, घघरा, सड़क पर कचरा चुनने वाले बच्चे का पुरसुक़ून चेहरा, ख़ड़ूस पंचायती बुड्ढे, बेलगाड़ी के पहियों से उड़ने वाली गर्द.

जामा मस्जिद, बास्केट, सिपारी, बॉलीवुड, गेरुआँ रंग, दुबई, नूरजहाँ के गीत, जामा मस्जिद के शाही ईमाम, पारसी कम्युनिटी, सुनहरी कल के धुंधले ख़्वाब, दीवारों पर लिखे मर्दाना कमज़ोरी दूर करने के इश्तेहार, बिजली की लोडशेडिंग, मोहल्ले के थड़ों पर शतरंज खेलने वाले बाबे, कॉफ़ी टेबल को पूरी दुनिया समझने वाली बेग़मात.

सावन में कूकने वाली कोयल, शाम के अंधेरे में आहिस्ता-आहिस्ता डूबने वाले नारियल के झुंड, कपास की फ़सल, दीवार से टेक लगाकर पेशाब करने का नशा, घरों में काम करने वाले बच्चे.

दफ़्तर से घर जाती लड़कियों में गढ़ने वाली टपकती आँखें, ताश की बेफ़िक्र बाजी, भरे-भरे सिनेमा, गिलावटी कबाब के मज़े, तूफ़ानी बारिश, भगवान और ख़ुदा की क़सम खाकर कोल्ड्रिंक मँगवाकर ज़बरदस्ती पिलाने वाले घटिया कपड़ा महंगे दाम ग्राहक को थमाने वाले मक्कार दुकानदार, पुरानी किताबों के ठेले को घेरे हुए लड़के लड़कियाँ और अब नरेंद्र मोदी भी.

अगर ये सब कुछ भी न हो तो मुझ जैसे दक्षिण-एशियाई की ज़िंदगी में सिवाय गंभीर बोरियत के क्या रह जाएगा?

___बेटे के अध्यापक को अब्राहम लिंकन का पत्र___

अब्राहम लिंकन (१२ फरवरी, १८०९ - १५ अप्रैल १८६५) अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल १८६१ से १८६५ तक था। ये रिपब्लिकन पार्टी से थे। उन्होने अमेरिका को उसके सबसे बड़े संकट - गृहयुद्ध(अमेरिकी गृहयुद्ध) से पार लगाया। अमेरिका में दास प्रथा के अंत का श्रेय लिंकन को ही जाता है।

अब्राहम लिंकन का जन्म एक गरीब अश्वेत परिवार में हुआ था। वे प्रथम रिपब्लिकन थे जो अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उसके पहले वे एक वकील, इलिअन्स स्टेट के विधायक (लेजिस्लेटर), अमेरिका के हाउस ऑफ् रिप्रेस्न्टेटिव्स के सदस्य थे। वे दो बार सीनेट के चुनाव में असफल भी हुए। 

वकालत - वकालत से कमाई की दृष्टि से देखें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले अब्राहम लिंकन ने बीस साल तक असफल वकालत की. लेकिन उनकी वकालत से उन्हें और उनके मुवक्किलों को जितना संतोष और मानसिक शांति मिली वह धन-दौलत बनाने के आगे कुछ भी नहीं है. उनके वकालत के दिनों के सैंकड़ों सच्चे किस्से उनकी ईमानदारी और सज्जनता की गवाही देते हैं.

लिंकन अपने उन मुवक्किलों से अधिक फीस नहीं लेते थे जो ‘उनकी ही तरह गरीब’ थे. एक बार उनके एक मुवक्किल ने उन्हें पच्चीस डॉलर भेजे तो लिंकन ने उसमें से दस डॉलर यह कहकर लौटा दिए कि पंद्रह डॉलर पर्याप्त थे. आमतौर पर वे अपने मुवक्किलों को अदालत के बाहर ही राजीनामा करके मामला निपटा लेने की सलाह देते थे ताकि दोनों पक्षों का धन मुकदमेबाजी में बर्बाद न हो जाये. इसके बदलें में उन्हें न के बराबर ही फीस मिलती था. एक शहीद सैनिक की विधवा को उसकी पेंशन के 400 डॉलर दिलाने के लिए एक पेंशन एजेंट 200 डॉलर फीस में मांग रहा था. लिंकन ने उस महिला के लिए न केवल मुफ्त में वकालत की बल्कि उसके होटल में रहने का खर्चा और घर वापसी की टिकट का इंतजाम भी किया.

लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई. मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला. सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया. सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ! वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा. तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो.”

आज के हिसाब से सोचें तो लिंकन बेवकूफ थे. उनके पास कभी भी कुछ बहुतायत में नहीं रहा और इसमें उन्हीं का दोष था. लेकिन वह हम सबमें सबसे अच्छे मनुष्य थे, क्या कोई इस बात से इनकार कर सकता है?

लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे. एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा. लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ, और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’. यही मेरा धर्म है’।

बेटे के अध्यापक को अब्राहम लिंकन का पत्र -
अब्राहम लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे।

सम्माननीय महोदय,
मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है।

आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्छीा बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।

आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।

मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्छात है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।

आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।

ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी।
आपका
अब्राहम लिंकन

__ “क्यों” __ – पंकज सिंह

अपने सारे छूट क्यों रहे,
सपने सारे टूट क्यों रहे;
छूट रहे जब सारे अपने,
बचा रहा मैं अब भी क्यों !

इसने तोड़ा, उसने तोड़ा,
जिसने जैसे चाहा छोड़ा;
जिसने जब भी चाहा तोड़ा,
टूट-फूट कर बिखर गया हूँ;
फिर भी ज़िन्दा हूँ मैं क्यों !

क्या अब भी देखेंगी सपने,
सोते-जगते मेरी आँखें;
अगर अभी भी देखूँ सपने,
ये भी क्या सच हो पायेंगे;
या वैसे ही खो जायेंगे !

ओ मेरे अपनों, क्यों रूठे !
ओ मेरे सपनों, क्यों टूटे !
अब तक तो चुप रहता आया,
मगर देर हो जानी है अब....

बहुत प्यार करता हूँ तुमको,
मेरे अपनों, अब भी मुझको;
एक बार तो माफ़ी दे दो,
फिर जो मन चाहेगा करना....

जब मैं ज़िन्दा नहीं रहूँगा,
तब तुम जैसे चाहो जीना;
मस्ती करना, खुश रह लेना,
और धमाल मचाते रहना....

अपनों के हाथों को कस कर,
हर दम ही तुम जकड़े रहना;
और अगर मिल गये गैर तो,
उनको गले लगाते रहना....

याद भले मुझको मत करना,
हर दम आगे बढ़ते रहना;
रंग-बिरंगे इस जीवन के,
रंगों में झिलमिल तुम करना;
जीवन भर मुस्काते रहना....