Sunday, 6 September 2015

Sanjay Jothe - महाभारत का युद्ध और कृष्ण की उपलब्धि




कृष्ण पर बात करते हुए महाभारत की विभीषिका से जुडा एक भयानक प्रश्न उभरता है. इस सन्दर्भ में आदरणीय Girijesh Tiwari जी के मित्र श्री सुदर्शन जी ने एकप्रश्न उठाया है. प्रश्न मुझसे किया गया है सो उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूँ.

महाभारत युद्ध करवाकर कृष्ण को या भारत को क्या मिल गया ? अर्जुन भागकर सन्यासी हुआ ही जा रहा था. उसे बहला फुसलाकर ऐसा सर्वनाशी युद्ध कराकर किसको क्या मिला? खासकर तब जब कि यह सिद्ध हो चुका है कि महाभारत के बाद भारत कभी अपने पैरों पर खडा नहीं हो सका है. न सामरिक आर्थिक रूप से न धर्म दर्शन और विज्ञान के क्षेत्र में ही.

धर्म दर्शन की ही बात करें तो कृष्ण ने जिन दार्शनिक अनुशासनों का वर्णन या उल्लेख किया है उनके परे जाकर उनके बाद कोई मौलिक खोज हो ही नहीं पा रही है. अभी भी जो षड्दर्शन ज्ञात हैं उनमे से सर्वप्रमुख सांख्य, योग, मीमांसा आदि दर्शन कृष्ण के जमाने में मौजूद हैं, और कृष्ण स्वयं ही वेदान्त के हिस्से बन जाते हैं. इस अर्थ में उनके बाद नए और मौलिक दर्शन बहुत ही कम आये हैं. कृष्ण की एक अज्ञात इतिहास में कोई अन्य तस्वीर हो सकती है लेकिन ज्ञात इतिहास से इतना ही जाहिर होता है कि पूरा भारतीय धर्म दर्शन, विज्ञान, नैतिकता इत्यादि ठीक वहीं की वहीं जम गयी है जहां कृष्ण ने महाभारत का यद्ध ख़त्म किया था.

उसके बाद की भारत की कहानी मौलिकता के अभाव की और गुलामी की कहानी है. बीच में बुद्ध (ज्ञात इतिहास के अनुसार) महावीर और अन्य लोग आते हैं लेकिन आज की मुख्यधारा के समाज मनोविज्ञान में उनका अस्तित्व नगण्य है. पूरा भक्ति आन्दोलन भी कृष्ण और उनके कथित आदि रूप राम या विष्णु से ही प्रेरित है. वैष्णवी भक्ति उस पर छाई हुई है. कबीर इत्यादी की विद्रोही प्रस्तावनाओं को भी वैष्णवी भक्ति की खोल में दबाकर मार दिया गया है. कोई नया विमर्श वहां भी नहीं उभर सका है. जो उभरा भी वो पुराने खोल में दबाकर घोंट दिया गया है.

इसलिए सुदर्शन जी द्वारा उठाया गया ये प्रश्न असल में भारत की पूरी आध्यात्मिकता और दार्शनिकता पर बहुत ही भारी पड़ता है. ये ऐसा प्रश्न से जिससे बचने में ही भलाई समझी जाती है.

इसका कोई सरल सा उत्तर हो भी नहीं सकता . प्रश्न जितना सरल होता है उत्तर उतना कठिन होने को बाध्य होता है. ये प्रश्न इतना सरल जीवंत और इतना अस्तित्वगत है कि कोई भी एक उत्तर इसके साथ न्याय नही कर सकता .

फिर भी ऐसा लगता है कि चूँकि कृष्ण पूर्व और कृष्ण पश्चात का इतिहास मिटा दिया गया है इसलिए इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना असंभव है. जो समाज कृष्णों को मिटा दे वहां प्रश्नों की क्या हैसियत ? अगर पोगा पंडितों ने कृष्ण को व्यवसाय न बनाया होता तो एक ईमानदार इतिहास की संभावना बन सकती थी और उसमे से कोई उत्तर निकाला जा सकता था. लेकिन वह हो न सका. कृष्ण खुद इस पूरे घमासान में विक्टिम की तरह नजर आते हैं, निदा फाजली की एक गजल है- "मैं देवता की तरह कैद अपने मंदिर में" "बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है". कृष्ण भी इसी तरह कैद हैं. पौराणिक इतिहास की धुंध में लहरा रहे वक्त के खंजर से उनके सत्व की ह्त्या की गयी है. हालाँकि उन्हें एक ऐतिहासिक पुरुष मानने के लिए साक्ष्य मौजूद नहीं हैं फिर भी मान लें कि अगर वे ऐतिहासिक हैं तो उनके खिलाफ षड्यंत्र ठीक उसी कोटि के हैं जिस कोटि के बुद्ध के खिलाफ रचे गए हैं.

इस प्रश्न का उत्तर इसलिए भी कठिन है क्योंकि हम नहीं जानते कि इस युद्ध के द्वारा कृष्ण क्या बचाना चाहते थे. अगर उन्होंने वह सब बचा लिया है जो आज हमारे सामने है तो निश्चित ही कृष्ण समझदार साबित नहीं होते. अगर उन्होंने ऐसा कुछ बचा लिया था जिसे हम नहीं पहचान सके हैं तो हम नासमझ साबित होते हैं. फिर इतिहास की धुंध में कृष्ण अकेले नहीं हैं. इसलिए यह प्रश्न बहुत जटिल बन जाता है.

बहुत स्वाभाविक से प्रेक्षणों पर उत्तर निर्मित किया जाए तो एक संभावित उत्तर यही बनता है कि महाभारत के युद्ध के सन्दर्भ में कृष्ण का निर्णय और प्रयास एकदम व्यर्थ गया, शायद ये आत्मघाती निर्णय था. न केवल पांडव कुल या कौरव कुल सहित उनके शुभचिंतकों का बल्कि खुद यदुवंश का नाश भी इसी महाभारत से जुडा हुआ है. हिन्दुओं में कृष्ण के बाद जिस सर्वविनाशी कल्कि की धारणा है उसकी शायद जरूरत ही नहीं है. कृष्ण ही पर्याप्त सर्वनाश करके जा चुके हैं.

लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि महाभारत के युद्ध की सफलता या असफलता से ही हमें कृष्ण का मूल्यांकन करना चाहिए. ये सही मार्ग नहीं है. युद्ध हमेशा विवशता का विषय होते हैं स्वेच्छा का नहीं. हमें उन बातों पर फोकस करना चाहिए जहां कृष्ण अपनी स्वतंत्रता से और प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश कर रहे हैं. उस अर्थ में देखेंगे तो महाभारत के कलंक से उन्हें बचाया जा सकता है. हालाँकि अन्य और भी अनेक कलंक हैं जो और उनके मस्तक पर लगे हुए हैं, उनकी बात भी की जानी चाहिए... वो फिर कभी.

https://www.facebook.com/sanjay.jothe/posts/10206845364360227

Sanjay Jothe - विद्रोही कृष्ण के व्यक्तित्व का सत्य और उसके चतुर्दिक आभामण्डल का षड्यन्त्र



(महीनों पहले यह लेख लिखा था, ऐसे लेख छापने में अखबारों, पत्रिकाओं को डर लगता है. कोई छापता नहीं सो यहाँ दे रहा हूँ)
https://www.facebook.com/sanjay.jothe/posts/10206841704348729
कृष्ण को नजरअंदाज करना मुश्किल है. वे बार बार बुलाते हैं. उनमे ऐसा बहुत कुछ है जो भविष्य का है. लेकिन वे आज तक अपने पूरे रूप में खिलकर नहीं आ सके हैं. इसको समझना चाहिए. जो लोग भी कृष्ण को प्रेम करते हैं उन्हें कृष्ण को इस नयी दृष्टि से जरुर देखना चाहिए. 
कृष्ण को देखने या दिखाने का जिस भाँती का पारम्परिक आग्रह इस देश में इस समाज में बना हुआ है वह बहुत भयानक सच्चाई की तरफ इशारा करता है. कृष्ण जैसे व्यक्तित्व को रूढ़िवादी फ्रेम में रखकर उनके असल चमत्कार की ह्त्या कर देना इस समाज की विशेषता है. दुर्भाग्य यह भी है कि यह काम कृष्ण तक ही नहीं रुक गया है. भारतीय इतिहास में जितने भी महानायक है सभी को हर संभव अर्थ में सीमित और खंडित किया गया है ताकि वे धर्म के व्यापार के लिए फायदेमंद बने रहें.

अन्य लोगों की बात न करके सिर्फ कृष्ण को भी एक केस स्टडी की तरह लिया जाए तो पता चलता है कि हम हज़ारों साल से किस दुर्भाग्य में जी रहे हैं. कृष्ण के जीवन में बहुत सारे पहलू हैं जो एकदम नयी मनुष्यता, स्वतन्त्रता और मौलिक क्रान्ति की तरफ ले जाते हैं. सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने और उनके परे जाकर मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करने में कृष्ण सबसे आगे नजर आते हैं. वे न केवल पारम्परिक अर्थ के सामाजिक चलन को तोड़ते हैं बल्कि सबसे भयानक और विवादास्पद माने गए लैंगिक अनुशासन के आग्रह को भी तोड़कर निकल जाते हैं. इस तरह किसी भी अर्थ में पुरानी और दकियानूसी धारणाओं को वे उन्ही की जमीन पर खड़े होकर ललकारते रहे हैं.

गीता के कृष्ण और भागवत या गीत गोविन्द के कृष्ण में जो अंतर बनाया गया है उसे देखकर लगता ही नहीं है कि ये एक ही व्यक्ति है. अधिकाँश लोगों को इस भाँती कंडीशन किया गया है कि वे गीता के कृष्ण का सम्मान करें और भागवत और गीत गोविन्द के रसिक बिहारी से दूर रहें. इसलिए दूर रहें कि समाज में अगर प्रेम की प्रेरणा बलवती हो गयी तो अमीर गरीब के विभाजन का क्या होगा? स्त्री पुरुष के विभाजन का क्या होगा? वर्ण और जाति का क्या होगा? ये बहुत गौर करने लायक बात है. धर्म का जो स्वरुप हम देखते हैं उसमे कृष्ण के अखंड रूप को झेलने या स्वीकार करने की ज़रा भी हिम्मत नहीं है. उनकी पूजा जरुर करेंगे लेकिन उनकी सुनेंगे नहीं.

कृष्ण के व्यक्तित्व को तोड़कर और काटकर उन टुकड़ों में चुनाव किया जाता रहा है. कुछ लोग एकदम बाल गोपाल को ही फुद्काते रहते हैं, उसे किशोर या जवान नहीं होने देते. कुछ लोग प्रौढ़ हो चुके कृष्ण की परिक्रमा कर रहे हैं और अधिकाँश लोग उन्हें मनुष्य की बजाय इश्वर मानकर उनसे हो सकने वाले सारे लाभ पर पूर्ण विराम लगाकर बैठे हैं. आपके सर्वश्रेष्ठ मनुष्यों को अगर इश्वर का अवतार कह दिया जाए तो उनके नाम पर मंदिर, चन्दा और धर्म का धंधा खूब फलेगा फूलेगा लेकिन लोगों में कृष्ण की तरह दुस्साहसी, शूरवीर और क्रांतिकारी होने का स्कोप ही ख़त्म हो जाएगा. एक तरफ धर्म का ढांचा मजबूत होता जाएगा और दूसरी तरफ लोगों में नए जीवन और नयी स्वतंत्रता के सपनों का गर्भपात हो जाएगा. यह अवतारवाद की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. इसके बाहर निकालकर अगर कृष्ण को एक इंसान की तरह देखें तो बहुत तरह की उम्मीद जगाई जा सकती है.

यह एक स्थापित तथ्य है कि धर्म की लूट मचाने वाला वर्ग अपने महापुरुष को कभी इंसान नहीं बनने देगा, वो उसे हमेशा आकाश की तरफ धकेलता जाएगा जबतक कि वो अवतार ही न बन जाए. अवतार बनते ही उसकी मनुष्य होने की या मनुष्य के काम आ सकने की सारी संभावना ख़त्म हो जाती है. और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि फिर ऐसे अवतार या ईश्वर की शिक्षाएं आप तक सीधे सीधे नहीं आ सकती, न आपकी प्रार्थना उसतक सीधे पहुँच सकती हैं. उन्हें किसी पंडित पुरोहित के माध्यम से ही आना या जाना होगा. और यही सारा खेल है. इसी कारण इस देश में धर्म एक ऐसी चीज है जिसमे आज की जिन्दगी के सवालों का जवाब देने की ताकत ही नहीं बची है. अक्सर यही होता है कि अतीत में जो उत्तर दिए जा चुके हैं उनके संगत नए सवाल ढूंढकर लाते रहिये और एक पाखण्ड के झूले में झूलते रहिये.

कृष्ण जैसे व्यक्ति के साथ अगर ये सब हो सकता है तो यह अपने आपमें एक घबरा देने वाला तथ्य है. कृष्ण जिस तरह से प्रयोगवादी हैं जिस तरह से प्रेम के सम्मान और समर्थन में छाती ठोककर खड़े हैं वह अन्य किसी भी महापुरुष से भिन्न है. अन्य महापुरुषों ने प्रेम या मैत्री के सम्मान में प्रवचन दिए हैं. लेकिन कृष्ण उन थोड़े से लोगों में हैं जो सिर्फ बोलते नहीं हैं करके भी दिखाते हैं. स्त्री पुरुष संबंधों में उनकी राय हम सब जानते हैं. वे न सिर्फ अपने प्रेम के लिए समाज से भिड जाते हैं बल्कि अपनी बहन सुभद्रा के प्रेमी अर्जुन को भी उकसाते हैं वह उसका अपहरण कर उससे विवाह कर ले. वे स्त्री के प्रेम और उस प्रेम की सारी संभावनाओं के समर्थन में सदा से खड़े हैं. वे अन्य बहुत अर्थों में पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़ने का भी साहस दिखाते हैं.

इन बातों से कहीं आगे जाकर उनका सबसे बड़ा और मौलिक साहस ये है कि वे ब्रह्मचर्य और लैंगिक अनुशासन के भयानक बोझ को एकदम उतारकर फेंक रहे हैं. वे गृहस्थों के लिए धर्म और संस्कृति की एक नयी दृष्टि दे रहे हैं. हालाँकि यह बहुत समय तक शुद्ध नहीं रह पाती है और जल्दी ही स्वयं कृष्ण के नाम पर नैतिकता और अंधविश्वासपूर्ण मान्यताओं से भरा एक नया साहित्य तैयार हो जाता है. कृष्ण को इस तरह लगभग मिटा ही दिया गया है. उनका सिर्फ उतना भर हिस्सा “धर्म के म्यूजियम” में रखा गया है जितने से संगठित धर्म को और पोंगा पंडितों को फायदा हो सके.

पोंगा पंडितों ने सिर्फ बुद्ध की ही ह्त्या नहीं की है. बहुत गौर से देखिये, उन्होंने कृष्ण के साथ और भी भयानक बर्बरता दिखाई है. कृष्ण जैसे महाक्रान्तिकारी और एक मानवतावादी के मुंह से ऐसी बातें कहलवा ली गईं हैं जो उनके जीवन और आचरण से ज़रा भी मेल नहीं खाती हैं. जो व्यक्ति प्रेम को और मैत्री को इतना सम्मान देता है उसके मुंह से वर्ण व्यवस्था की प्रशंसा करवा लेना – ये चमत्कार है. ये बात सोचकर ही कष्ट होता है कि कृष्ण जैसा व्यक्ति इस तरह की मूर्खताओं के समर्थन में खड़ा हो सकता है. लेकिन इस देश में चुंकी इतिहास लिखा नहीं जाता इसलिए कोई भी महापुरुष हो, उसका जीवन चरित्र और शिक्षाएं हमेशा पोंगा पंडित वर्ग की दया पर निर्भर होती हैं. अगर उस महापुरुष की शिक्षा से धर्म के नाम पर कर्मकांड चल सकेगा, चंदे और दक्षिणा का धंधा चल सकेगा तो ही उस महापुरुष की शिक्षा का प्रचार हो सकेगा. अन्यथा उसे पुराण कथाओं की धुंध में घसीट के ऐसी जगह बाँध दिया जाएगा कि हजारों साल तक उसका पता भी नहीं चलेगा.

गौतम बुद्ध और तीर्थंकर महावीर सहित जैनों के तेईस अन्य तीर्थंकरों को देखिये, उन्होंने कर्मकांडों को एकदम नकार ही दिया था. नतीजा साफ़ है, धर्म का व्यवसाय करने वालों ने इन सबको मिटा डाला. कृष्ण फिर भी बचे हुए हैं, वे किसी की दया से नहीं बचे हैं. वे बचे हैं तो इसका कारण ये है कि वे इतने बहुआयामी और प्रचंड रूप से जीवंत हैं कि कर्मकांडी षड्यंत्रकारी उन्हें आज तक पूरी चबा कर निगल नहीं सके हैं. कृष्ण अपनी ही पाषाण मूर्ती को तोड़कर बार बार बाहर निकल आते हैं.

कृष्ण, शिव, बुद्ध, नानक, कबीर और गोरख जैसे अनेक क्रान्तिदृष्टा इस देश में हुए हैं. लेकिन उनको योजनापूर्वक मिटाया गया है. कृष्ण के साथ भी यह खेल चलता रहा है. और आज भी चल रहा है. एक ज़िंदा षड्यंत्र है जो आज भी चल रहा है. कृष्ण का व्यक्तित्व इतना बड़ा और ज्वलंत है कि हजारों साल बाद आज तक उसकी आग को बुझाने के लिए हर साल बड़े बड़े आयोजन करने होते हैं.

आजकल कृष्ण के नाम पर जो त्यौहार या कर्मकांड हैं वे प्रेम और मैत्री की स्वतन्त्रता को नहीं बढाते हैं, वहां भी यौन शुचिता, नैतिकता, ब्रह्मचर्य और भेदभाव जैसी बकवास चरणामृत की तरह बांटी जाती है. यहाँ तक की राधा कृष्ण के ठोस और शारीरिक प्रेम को भी दिव्यता और अलंकारों की धुंध में छिपा दिया गया है. उनके इस प्रेम को भी दिव्य बनाकर नष्ट कर दिया गया है. उसकी व्याख्या भी ऐसी “आत्मा परमात्मा” के प्रेम वाले अर्थ में कर दी गयी है कि उसमे इंसानी प्रेम की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लोगों को लगता है कि वे भगवान् हैं तो उन्हें प्रेम करने की छूट है हम ठहरे दीन हीन इंसान हम प्रेम कैसे कर सकते हैं. यह सबसे बड़ा हमला है जो कृष्ण पर आज तक कभी हुआ है. और ये हर साल हर त्यौहार पर होता है. कृष्ण के आचरण की या शिक्षा की व्याख्या ऐसी की गयी है कि उसमे कृष्ण की पूरी क्रान्ति की ह्त्या ही हो गयी है. आज भी यह रुक नहीं रहा है. आज भी कोई भी पोंगा पंडित हो वो अपने किसी भी तरह के दर्शन को मान्यता दिलवाने के लिए सबसे पहले कृष्ण की गीता पर भाष्य जरुर देगा. ये एक मजबूरी है. इस तरह वो न सिर्फ अपनी योग्यता का बखान करते हैं बल्कि अपनी समझ के हिसाब से कृष्ण के व्यक्तित्व को काट पीटकर छोटा करता जाता हैं.

ये विरोधाभासी लगेगा लेकिन इप देख सकते हैं. कृष्ण के नाम पर जितने संप्रदाय हैं उनमे उंच नीच सहित स्त्री पुरुष संबंध और उन संबंधों में स्त्री की स्वतन्त्रता को बहुत बहुत अर्थों में सीमित किया गया है. कृष्ण के नाम पर ब्रह्मचर्य की पारम्परिक धारणा को मजबूत किया जा रहा है.यह बड़ी गजब की बात है.

कृष्ण के जन्म दिवस के अवसर पर उम्मीद करें कि इस देश में कृष्ण को समझने का वातावरण बन सके और कृष्ण पोंगा पंडितों की कैद से आजाद हो सकें.

Friday, 4 September 2015

"यह सबसे अच्छा दौर है क्योंकि यह सबसे बुरा दौर है !


प्रिय मित्र, अगर यह मानवता के दुश्मनों के लिये सबसे अच्छा दौर है, तो यह मानवता के लिये भी सबसे अच्छा दौर है. 
अगर यह हमारे विरोधियों के लिये सबसे अच्छा दौर है, तो यह हमारे लिये भी सबसे अच्छा दौर है. 
अगर यह उनके प्रहार का दौर है, तो यह हमारे पलटवार का दौर है. 
अगर यह उनके लिये उत्पीड़न का दौर है, तो यह हमारे लिये प्रतिवाद का दौर है. 
अगर यह उनके हत्यारों की गोलियों का दौर है, तो यह हमारी छातियों पर गोलियाँ झेलने का दौर है. 
अगर यह उनके लिये हत्याओं का दौर है, तो यह हमारी शहादत का दौर है. 
अगर यह उनके लिये फासिज़्म का दौर है, तो यह हमारे लिये जनवाद का दौर है. 
अगर यह उनके लिये अन्धविश्वास की मूर्खता के प्रचार का दौर है, तो यह हमारे लिये वैज्ञानिक दृष्टिकोण समझाने और उसके साथ अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने का दौर है. अगर यह उनके लिये हमारी हड्डियों में से खून चूस कर अपनी तिज़ोरी भरने का दौर है, तो यह हमारे लिये शोषण-मुक्त समाज के सपने को रूपायित करने के लिये अपनी कूबत भर खटने का दौर है. 
अगर यह ग्लोबल विलेज का दौर है, तो यह समूची दुनिया के जन-गण की मुक्ति के गीत गाने का दौर है. 
अगर यह उनकी झपसटई का दौर है, तो यह हमारे ईमान का दौर है. 
अगर यह झूठ की हुकूमत का दौर है, तो यह सच के विद्रोह का दौर है. 
अगर यह वित्तीय नवउपनिवेशवाद का दौर है, तो यह ही इन्कलाब का भी दौर है. 
जो उनके लिये अच्छा है, वह उनके लिये ही बुरा भी है और जो हमारे लिये बुरा है, वह ही हमारे लिये अच्छा भी है. 
मानवता के इतिहास में अतीत में भी ऐसे दौर बार-बार आते-जाते रहे हैं. 
हर बार हमारे दिलेर पुरखों ने रणक्षेत्र में अपने शौर्य का प्रदर्शन किया है और इतिहास में अपना नाम अपने गरम खून से दर्ज़ कराया है. 
वह उनका दौर था, आज का दौर हमारा दौर है. 
हमें गर्व है कि हमारी ज़िन्दगी में हमारी ज़िद की परीक्षा का यह दौर आया है.
आज का दौर चार्ल्स डिकेन्स के इस कथन को याद करने का दौर है और अपने धैर्य और शौर्य के प्रदर्शन का दौर है. 
ढेर सारे प्यार के साथ और 
अन्तिम साँस तक जूझने के संकल्प के साथ ― आपका गिरिजेश (2.9.15.)
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"वह सबसे अच्छा दौर था, वह सबसे बुरा दौर था, वह बुद्धिमत्ता का दौर था, वह मूर्खता का दौर था, वह विश्वास का युग था, वह अविश्वास का युग था, वह प्रकाश का मौसम था, वह अन्धेरे का मौसम था, वह आशा का वसन्त था, वह निराशा की सर्दी थी। " ― चार्ल्स डिकेन्स

 IT IS THE BEST OF TIMES, IT IS THE WORST OF TIMES 
Charles Dickens ― 
“It was the best of times, it was the worst of times, it was the age of wisdom, it was the age of foolishness, it was the epoch of belief, it was the epoch of incredulity, it was the season of light, it was the season of darkness, it was the spring of hope, it was the winter of despair.” (A Tale of Two Cities)


___ लानत है ज़िन्दगी तुझ पर ! ___

शुक्रिया ज़िन्दगी ! जो तूने मुझे सेवा का संकल्प करने को प्रेरित किया. 
मगर लानत है ज़िन्दगी तुझ पर, जो तूने सेवा करने के चक्कर में मुझे भिखमंगा बना दिया. 
इन्सानियत को प्यार करने और दरिद्रनारायण की सेवा करने के चक्कर में तूने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया.
हर पल दिल को कचोटने और कसकने वाली तड़प को अकेले-अकेले चुपचाप झेलने को मुझे मजबूर कर दिया. 

मेरा ज़ुर्म केवल झूठ और झपसटई से नफ़रत है.
और सच के लिये सम्मान और झूठ के लिये नफ़रत भी तूने ही मुझ में बोया.
सच के साथ खड़े होने और मानवता की सेवा करने के पुरस्कार और दण्ड दोनों ही मुझे भरपूर मयस्सर हुए. 
जाने कब तक भिखमंगे की यह भूमिका निभानी पड़ेगी मुझे,
जाने कब इस फन्दे की जकड़ से आज़ाद हो सकूँगा... 
कुछ भी तो पता नहीं !

लोगों की सीमाएँ हैं. उनसे मुझे कोई शिकायत भी नहीं है. 
फख्र है कि मैं वह नहीं करने को बज़िद रहा, जो लोग चाहते थे करवाना मुझ से... 
और नतीज़ा वही, जो हर विद्रोही का पुरस्कार है ! क़दम-क़दम पर ज़लालत !

लानत है ज़िन्दगी, तुझ पर जो ऐसे अनुपम काम के लिये मुझे चुना ! 
मेरा काम मुझे तृप्ति और प्रशंसा के साथ हर क़दम पर अधिकतम अपमान, उपहास, अवहेलना और अवसाद ही दे सका. 
सम्मान की भूख तो रही नहीं. पर अपमान अभी भी कसकता तो है ही. 
इसीलिये लानत है तुझ पर ज़िन्दगी ! 

हालाँकि आज भी मेरा आत्म-संघर्ष जारी है. 
आज भी मैं इन्सान की ज़िल्लत के मुखालिफ़ जारी ज़द्दोजहद में पूरी शिद्दत से जूझ रहा हूँ. आज भी शानदार इन्सान गढ़ने का मेरा काम लगातार जारी है. 
आज भी मैं अपने काम से संतुष्ट भी हूँ और मुझे अपनी सफलता पर गर्व भी है. 

विश्वास की हत्या करने वाले मुट्ठी भर लोगों को शुक्रिया ! 
एक से बढ़ कर एक सारे बहादुर दोस्तों को ढेर सारा प्यार ! 
मगर फिर भी 
लानत है ज़िन्दगी तुझ पर ! 
— तुम्हारा गिरिजेश (31.8.15.)

Thursday, 27 August 2015

____ सवाल 'जन-गण-मन' का ____

Girijesh Tiwari's photo.

Girijesh Tiwari's photo.
इस प्रश्न पर मैं असहमत हूँ.  कवि का स्पष्टीकरण भी कविता को कलंकमुक्त नहीं कर सकता. कविता पर कवि का अधिकार उसे लोकार्पित करते ही समाप्त हो जाता है. यही बिन्दु 'जन-गण-मन' के 'अधिनायक' और 'भाग्य-विधाता' के सम्बोधन के साथ है. इस गीत में तथाकथित सम्बोधित 'ईश्वर' को केवल 'अधिनायक' ही कह कर पुकारा गया. ऐसा क्यों !

दूसरे अब सिन्ध प्रान्त तो पाकिस्तान का अंग है, तथ्यतः उसके स्वतन्त्र भारत के राष्ट्रगान में वर्णन का औचित्य रहा ही नहीं. विशेषतः तब तो और भी जब पाकिस्तान के साथ शत्रुवत सम्बन्धों की आग को हवा देने वाले हाफपैन्टिये साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने में पूरी ताकत लगाते रहे हैं.

पूरा गीत देखिए और ईश-वन्दना के लिये लिखे गये किसी भी गीत से तुलना कीजिए. 
समर्थ कलमकार के शब्द स्वतः बोलते हैं. और जन-गण उनको समझने और उनका विश्लेषण करने में समर्थ होता है.

हिन्दी राष्ट्रगान के पद -
"जनगणमन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिंध गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जयगाथा।
जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।"
++++++++++++++++++++
राष्ट्रगान के बाद वाले पद -

"अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार बाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे
प्रेमहार हय गाँथा।
जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।
दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे
संकटदुःखत्राता।
जनगणपथपरिचायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे।
दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता।
जनगणदुःखत्रायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले –
गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवनरस ढाले।
तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा।
जय जय जय हे जय राजेश्वर भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।"
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इस मुद्दे पर मैं स्वयं यह मत रखता हूँ...
"कितना अन्धा मुसलमान है? नकली ख़ुदा-ख़ुदा को रटता। 
असली देश हमारा अपना, उसकी जय कहने से डरता।

इस अन्धेपन को भी तोड़ो, वरना कर्ज़ दूध का छोड़ो।
रोटी दिया, अनाज खिलाया, पढ़ा-लिखा कर बड़ा बनाया।

देश भला क्या नहीं है माता? क्यों जय कहने में शर्माता?

आर0एस0एस0 गुण्डा-टोली, पर ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्र-गान है। 
देश और इसकी सुन्दरता का ही तो इसमें बखान है।

क्या जन-श्रम से जो उपजी हैं, उन फसलों का गीत गलत है? 
क्या जंगल, नदियों, झरनों की सुन्दरता का गीत गलत है?

क्या अपने पुरखों के घर का गौरव-गान धर्म-द्रोही है? 
अगर यही है धर्म-द्रोह, तो फिर तो बच्चो, यही सही है!

इसको गाना राष्ट्र-प्रेम है, इसमें ख़ुदा कहाँ घुस आया?
http://young-azamgarh.blogspot.in/2012/06/blog-post_28.html


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=881569435256385&set=a.105206802892656.11456.100002100112490&type=1
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का पत्र 'जनगण मन'

(आज कुछ मित्रों ने बहुत हैरत में डालनेवाला सवाल किया कि क्या यह सच है कि ‘जनगण मन’ गीत रवीन्द्रनाथ ने वर्ष 1911 में जाॅर्ज पंचम के भारत आगमन पर उनकी स्तुति में लिखा था; केवल यही नहीं, उन्होंने ख़ुद यह गीत उनके समक्ष गाया भी था? इस सवाल ने न केवल मुझे डरा दिया बल्कि एक बार फिर से अफ़वाह की ताक़त का एहसास कर दिया। मैं लोगों की आँखों पर पड़े झूठ के पर्दे को हटाने के उपक्रम में सुविख्यात रवीन्द्र साहित्य विशेषज्ञ पुलिनविहारी सेन को इसी संदर्भ में लिखी रवीन्द्रनाथ की एक चिट्ठी का उल्लेख करना चाहता हूँ। मित्रों से मेरा निवेदन है कि इसे आप अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ ताकि कुहासे की धुंध छँटे और रवि बाबू पर से इस तोहमत का साया दूर हो सके। -- उत्पल बैनर्जी)

प्रियवर,
तुमने पूछा है कि ‘जनगण मन’ गीत मैंने किसी ख़ास मौक़े के लिए लिखा है या नहीं। मैं समझ पा रहा हूँ कि इस गीत को लेकर देश में किसी-किसी हलक़े में जो अफ़वाह फैली हुई है, उसी प्रसंग में यह सवाल तुम्हारे मन में पैदा हुआ है। फ़ासिस्टों से मतभेद रखने वाला निरापद नहीं रह सकता, उसे सज़ा मिलती ही है, ठीक वैसे ही हमारे देश में मतभेद को चरित्र का दोष मान लिया जाता है और पशुता भरी भाषा में उसकी निन्दा की जाती है -- मैंने अपने जीवन में इसे बार-बार महसूस किया है, मैंने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया। तुम्हारी चिट्ठी का जवाब दे रहा हूँ, कलह बढ़ाने के लिए नहीं। इस गीत के संबंध में तुम्हारे कौतूहल को दूर करने के लिए। 

एक दिन मेरे परलोकगत मित्र हेमचन्द्र मल्लिक विपिन पाल महाशय को साथ लेकर एक अनुरोध करने मेरे यहाँ आए थे। उनका कहना यह था कि विशेष रूप से दुर्गादेवी के रूप के साथ भारतमाता के देवी रूप को मिलाकर वे लोग दुर्गापूजा को नए ढंग से इस देश में आयोजित करना चाहते हैं, उसकी उपयुक्त भक्ति और आराधना के लिए वे चाहते हैं कि मैं गीत लिखूँ। मैंने इसे अस्वीकार करते हुए कहा था कि यह भक्ति मेरे अंतःकरण से नहीं हो सकेगी, इसलिए ऐसा करना मेरे लिए अपराध-जैसा होगा। यह मामला अगर केवल साहित्य का होता तो फिर भले ही मेरा धर्म-विश्वास कुछ भी क्यों न हो, मेरे लिए संकोच की कोई वजह नहीं होती -- लेकिन भक्ति के क्षेत्र में, पूजा के क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश गर्हित है। इससे मेरे मित्र संतुष्ट नहीं हुए। मैंने लिखा था ‘भुवनमनोमोहिनी’, यह गीत पूजा-मण्डप के योग्य नहीं था, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी ओर इस बात को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह गीत भारत की सार्वजनक सभाओं में भी गाने के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यह कविता पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के आधार पर लिखी गई है। ग़ैरहिन्दू इसे ठीक से हृदयंगम नहीं कर सकेंगे। मेरी कि़स्मत में ऐसी घटना एक बार फिर घटी थी। उस साल भारत के सम्राट के आगमन का आयोजन चल रहा था। राज सरकार में किसी बड़े पद पर कार्यरत मेरे किसी मित्र ने मुझसे सम्राट की जयकार के लिए एक गीत लिखने का विशेष अनुरोध किया था। यह सुनकर मुझे हैरानी हुई थी, उस हैरानी के साथ मन में क्रोध का संचार भी हुआ था। उसी की प्रबल प्रतिक्रियास्वरूप मैंने ‘जनगण मन अधिनायक’ गीत में उस भारत भाग्यविधाता का जयघोष किया था, उत्थान-पतन में मित्र के रूप में युगों से चले जा रहे यात्रियों के जो चिर सारथी हैं, जो जनगण के अंतर्यामी पथ परिचायक हैं, वे युगयुगांतर के मानव भाग्यरथचालक जो पंचम या षष्ठ या कोई भी जाॅर्ज किसी भी हैसियत से नहीं हो सकते, यह बात मेरे उन राजभक्त मित्र ने भी अनुभव की थी। क्योंकि उनकी भक्ति कितनी ही प्रबल क्यों न रही हो, उनमें बुद्धि का अभाव नहीं था। आज मतभेदों की वजह से मेरे प्रति क्रोध की भावना का होना, दुश्चिन्ता की बात नहीं है, लेकिन बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना एक बुरा लक्षण है। 

इस प्रसंग में और एक दिन की घटना याद आ रही है। यह बहुत दिन पहले की बात है। उन दिनों हमारे राष्ट्रनायक राजप्रासाद के दुर्गम उच्च शिखर से प्रसादवर्षा की प्रत्याशा में हाथ फैलाए रहते थे। एक बार कहीं पर वे कुछ लोग शाम की बैठक करने वाले थे। मेरे परिचित एक सज्जन उनके दूत थे। मेरी प्रबल असहमति के बावजूद वे मुझे बार-बार कहने लगे कि मैं यदि उनके साथ नहीं गया तो महफि़ल नहीं जमेगी। मेरी वाजिब असहमति को अंत तक बरक़रार रखने की शक्ति मुझे विधाता ने नहीं दी। मुझे जाना पड़ा। जाने के ठीक पहले मैंने निम्नांकित गीत लिखा था --
‘‘मुझे गाने के लिए न कहना ...’’ 
इस गीत को गाने के बाद फिर महफि़ल न जम सकी। सभासद बुरा मान गए। 

बार-बार चोट खाकर मुझे यह समझ में आया कि बादलों की गति देखकर हवा के रुख़ का अनुसरण कर सकें तो जनसाधारण को खु़श करने का रास्ता सहज ही मिल जाता है, लेकिन हर बार वह श्रेयस्कर रास्ता नहीं होता, सच्चाई का रास्ता नहीं होता, यहाँ तक कि चलतेपुर्ज़े कवि के लिए भी वह आत्मा की अवमानना का पथ होता है। इस मौक़े पर मनु के एक उपदेश की याद आ रही है जिसमें उन्होंने कहा है -- सम्मान को ज़हर-जैसा मानना, और निंदा को अमृत-जैसा मानना। इति।

10.11.1937 शुभार्थी
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 
श्री विनीत तिवारी के सौजन्य से — 

Ashok Verma Kabeerji, Ravindra Nath Tagoreji ka jo patra aapne share kiya hai usase jis prashn ka nirakaran ho jane ki aasha thi us prashna ka nirakaran nahin huaa lagta... ya main is patra jo samajh nahin saka...

Kabeer Up ashok ji yh bhas aage bdhna chahiye


इसी विषय पर निम्न सन्दर्भ भी पठनीय है. 

___ SUCCESS AND FAILURE ___

What is responsible for our success !
What is behind our failure !

Both of us try to win and are afaid of defeat.
Both of us work as much as we can.

Do you love your work ?
I do love mine.

I am proud of my performance.
I am serious for my target.

You are not.
You are ashamed of your's.

It is the point where we differ.
This difference gives us success or failure.
This is why I succeed.

Due to it only you fail on every step of your life.
Your cunning steps expose you.

I take the life as it is and enjoy it.
You take the life as a melody and repent.

We both have only one life to live.
We both have only one chance to perform.

I am serious.
You are not.

I perform my best.
You perform your worst.

I represent the 99% of humanity.
And you only 1%.

I have won and shall win.
You are to be defeated at last.
It is the fate of our struggle of life.

- girijesh 25.8.15. (9:45pm)

युवा मन - समस्याएँ और समाधान : शिष्य-गुरु सम्वाद



अराजक मलंग - गुरुवा के नाम एक पाती
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सुनो गुरुवा!!
आज एक लड़का आया हमरे पास, परेशान था बहुत। छब्बीस साल का वह लड़का अपनी जिन समस्याओं को लगभग एक घण्टे तक बताता रहा मुझे, ऐसा लगा कि अपना ही बचपन फिर से जीते हुए देख रहा हूँ मैं। यह अलग बात है की यह समस्याएं मेरे जीवन में बहुत जल्दी ही उग आई थीं और निश्चित तौर पर अनजाने ही सही लेकिन इनसे उभर पाने में तुम्हारा योगदान मेरे माँ पिता दोस्त या किसी भी अज़ीज़ से कही ज्यादा था। बहरहाल उस लड़के की समस्या और मेरा समाधान दोनों सुन कर अपनी राय जरूर दो............

काहे कि मेरा मार्गदर्शन कर सके ऐसी सामर्थ्य और जिद तुम्हारे अलावा किसी और में नहीं है।
चलो पहले समस्याएं सुनते हैं-----

वह लड़का ज़हीन है लेकिन उसकी ज़ेहनियत ही उसके अवसाद का कारण भी है। निम्न मध्यम वर्ग के ग्रामीण परिवेश से उभर कर वह कस्बाई माहौल में आया जब उसकी मुलाक़ात एक ईमानदार वामपंथी से हुई और अपने ग्रेजुएशन का पूरा समय उसने मार्क्स, लेनिन, फिदेल और गोर्की से लेकर भगत सिंह और यशपाल को पढ़ते हुए बिताया। उसके मन के कमजोर तट पर सामाजिक परिवर्तन की लहरें अपने भरपूर वेग से टकराने लगीं, वर्गरहित समाज की परिकल्पना से अभिभूत लड़का फांसी पाने, गोली खाने या एक स्थिर समाज की रचना में अपनी अभिन्न भूमिका को लेकर अतिशय जागरूक हुआ।

विभिन्न दलों और संगठनो से जुड़ा। पढ़ाई बाधित हुई। और सब जगह से घूम-घाम के वापस आने पर उसे लगा कि वह तो कुछ कर ही नहीं पाया। उसके पास अपने बूढ़े माँ बाप की जिम्मेदारी भी है और एक बेहतर समाज की रचना के क्रम में अपनी भूमिका निर्वाह की इच्छा भी। देश भर के चौदह विश्वविद्यालयों से नकार दिए जाने के बाद, किसी लड़की के लिए दिल में सौम्य सम्वेदनानाएँ होने के बाद भी अपनी निम्नतम स्थिति ने उसे अवसाद के चरम पर पहुंचा दिया है........

वह मुझसे मेरी प्रसन्नता का कारण पूछ रहा था (सुन कर हंसी भी आई काहे की तुम जानते हो इस दुनिया में मुझसे ज्यादा फ्रस्टेटेड व्यक्ति बहुत कम ही हैं)

एक घंटे तक उसको भरपूर चुप्पी साधे सुनने के बाद मुझे लगा कि इस फ्रस्टेशन का कोई कारण है ही नहीं। उसकी समस्या है उसका अपने लक्ष्य के प्रति दिग्भ्रमित होना.......

मैंने उसे जो सुझाव दिए वो ये हैं-
" देखो गुरु! वास्तविकता यह है कि आज वामपंथ के नाम जंगलों में पठारों पर खदानों में मारे जा रहे हरहुवा कतवरुवा वे लोग हैं जो रंगदारी अपहरण या पैसो के आपराधिक लेन-देन का हिस्सा भर हैं, कोई वृंदा करात कभी बंदूक नहीं उठाती....... वे मजदूरों के नाम पर शाब्दिक लफ़्फ़बाजी करती हैं, स्वयंसेवी संस्थाओं के नाम पर अपने घर में दारु की बोतलें सजाती हैं, कोई भी स्थापित मठाधीश हमेशा यही चाहेगा कि उसके पास आवारा लड़कों-लड़कियों का एक ऐसा समूह हो, जो उनकी लखटकिया गोष्ठियों में पानी देने या कुर्सियां ढोने का काम बिना किसी पारिश्रमिक के करे...........

तुम समाज में परिवर्तन लाना चाहते हो, तो इसके लिये सभी साधन तुम्हे समाज से ही जुटाने होंगे......
व्यक्तियों से लेकर बंदूकों और कलमों से लेकर विचारधारा तक कुछ भी तुम अलग से पैदा नहीं कर सकते। तुम्हें चुनना होगा....... खोजना होगा......... इसी अस्थिर समाज को एक परिष्कृत रूप देना होगा।

और समाज की विडम्बना यह है कि यह उगते हुए सूरज को ही अर्ध्य देता है, खिले हुए फूलों को ही सहलाता दुलारता है, भूखे, नाक बहाते, पिछवाड़े पर गू पोते, लगातार रें-रें करते सुन्दर से सुन्दर बच्चे को भी यह खारिज करता है जब की साफ़ सुथरे मुस्कुराते बच्चे को गोद में बहुत आत्मीयता से जगह देकर बोलता है - हाऊ क्यूट

रिश्ता चाहे जो भी हो, हमेशा 'गिव & टेक' का होता है। अगर आपके पास समाज को कुछ देने की सामर्थ्य है, तभी आप समाज से कुछ पाने यहाँ तक कि अपनी बात कहने का अधिकार रखते हैं।

मैंने उसे समझाया कि विचारधारा कोई भी हो वह ऊर्जा होती है। यह तभी कारगर होगी, जब आप उस का सही तरीके से इस्तेमाल करेंगे, नहीं तो सुकून की तपिश देने वाली आग भी हाथ डालने पर जलाती ही है, मैंने उसे कहा कि मूर्तियों को लात मार कर या धर्मो को गालियाँ बक कर, खुद को नास्तिक सिद्ध करना ही किसी युगद्रष्टा का स्वप्न नहीं होता, न ही उपनाम हटा देने भर से कोई सेक्युलर हो जाता है। रंग कोई भी हो लेकिन झंडा तभी वजनी होता है, जब उसे थामे रखने वाले व्यक्तित्व में वजन हो.........

मैंने उसे कहा कि उसे एक साल समय देना चाहिए खुद को और हर तरह के विचारों से मुक्त रख कर खुद की सामर्थ्य बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए। अपनी एकेडमिक पढ़ाई पूरी करनी चाहिए, जमीन के किसी कोने में अपने खड़े होने भर एक हिस्सा तैयार करना चाहिए और तब अपने आस-पास नजर दौड़ानी चाहिए कि अब अगला चरण क्या हो.......

अभी के लिए तुम्हारा एक ही लक्ष्य है खुद को इतना तैयार करना कि जीवन की अपेक्षाकृत ज्यादा जटिल पेंचीदगियों को समझ पाओ और उनका समाधान खोज पाओ।

पहली बार किसी को इस स्तर पर सलाह दे रहा था, तो खुद भी नर्वस था कि कहीं कुछ गलत न कह जाऊँ, तुम्हें ये सब बताने का भी यही कारण है।"

बाकि तो जो है सो हइये है, मैं स्वस्थ हूँ मस्त हूँ अपना ध्यान रखना......
- तुम्हारा अश्विनी
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प्रिय अश्विनी, अपने बारे में हर इन्सान की तरह तुमको भी यह 'भ्रम' है कि तुम से ज़्यादा 'फ्रस्ट्रेटेड' व्यक्ति कम हैं. मेरी नज़र में तो तुमसे अधिक समर्थ व्यक्ति कम हैं. और मेरे इस मूल्यांकन का आधार धुर बचपन से अभी तक ज़िन्दगी की आपाधापी के दौरान हर मोड़ पर छलाँग लगाने और उस पार निकल जाने वाले तुम्हारे पौरुष के प्रदर्शन में निहित तथ्य हैं.

आज ही नहीं, तभी से जब तुमने अपने दम पर ज़िन्दगी को ललकारना शुरू किया, हर बार ही ख़ूब-ख़ूब तिलमिलाने के बावज़ूद ज़िन्दगी हारती रही और तुम अगली चुनौती के अवसर तलाशने में जुटते चले गये. "युद्धं देहि, युद्धं देहि.." के आह्वान के अलावा तुमने कभी भी किसी से भी कुछ भी नहीं माँगा. और मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि तुम ही हो, जो मेरे न रहने पर भी इसी तेवर में हर अवरोध से आर-पार जूझने का मन बना कर टकराते रहने को बज़िद रहोगे. इसी वजह से मैं तुम्हारे ऊपर गर्व करता हूँ.

"प्रो. लालबहादुर वर्मा ने पिछली बार आज़मगढ़ आने पर कहा था - "ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद!" तुम्हारे यहाँ से मेरे युवक मित्र को वही सलाह मिली और सही सलाह मिली कि जगत की सेवा करने के लिये ही नहीं बल्कि ख़ुद अपने को और अपने परिजनों को भी न्यूनतम सम्मान सहित जीवित रहने भर को अधिकतम सम्भव 'सामर्थ्य' जुटाने को ही प्रत्येक युवा के लिये पहला लक्ष्य और कार्य-भार बनाना उचित होगा.

व्यक्ति के कुछ सहज गुण होते हैं और कुछ अर्जित. अर्जित गुणों में से एक उसका दृष्टिकोण भी है. सामर्थ्य से मेरा अभिप्राय निश्चित तौर पर केवल आर्थिक ही नहीं है. उससे कहीं बढ़ कर यथासम्भव अधिकतम सबल और कार्य-सक्षम शरीर और व्यापक स्वाध्याय के ज़रिये कार्य-क्षमता और दृष्टि-पटल को और अधिक बढ़ाना भी है. लक्ष्य-बद्ध अध्ययन हर ग़रीब युवा के लिये शास्त्र और शस्त्र दोनों बनता रहा है.

इसके अतिरिक्त क्रान्ति के नाम पर इस डाल से उस डाल तक उछलने-कूदने और हड़बड़ी में ताबड़-तोड़ की जाने वाली हर तथाकथित 'क्रान्तिकारी' गतिविधि को कम से कम मैं केवल आतुरता और बचपना ही कहने के लिये विवश हूँ. इसके विपरीत अधितकतर युवाओं द्वारा अपने शानदार वर्तमान का अधिकतम सुनहरा समय केवल दिवा-स्वप्नों में गुज़ारना मेरी दृष्टि में नितान्त अनुचित और भर्त्सनीय ही नहीं है, अपितु वैयक्तिक और सामाजिक स्तर पर किया जाने वाला ऐसा अपराध है. जिसका दण्ड समय तो देता ही है, परन्तु तब जब अवसर गुज़र चुकता है.

मुझे उम्मीद है कि तुम दोनों मुझे नाउम्मीद नहीं करोगे. 
ढेर सारा प्यार - तुम्हारा "गुरुवा" (27.8.15)
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