Wednesday, 5 August 2015

30. शिक्षण-प्रशिक्षण — गिरिजेश


__शिक्षण-प्रशिक्षण__
प्रिय मित्र, शिक्षण-प्रशिक्षण समाज की सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों में से एक है. मेरे जीवन का गत दो दशकों से अधिक का समय शिक्षा-जगत में हस्तक्षेप करने में लगा और तरह-तरह के प्रयोग करने के अवसर मिलते गये. उनमें सफल सिद्ध होने वाले प्रयोगों में से एक महत्वपूर्ण प्रयोग शिक्षण-प्रशिक्षण का भी रहा.
जैसे समाज के किसी भी दूसरे उपयोगी काम को करने के लिये हमें विशेष प्रशिक्षण से गुज़रना होता है, वैसे ही शिक्षण-कर्म में निपुण होने के लिये भी हमसे विशेष योग्यता और क्षमता की अपेक्षा की जाती है.
इस व्याख्यान को ध्यान से सुनिए और लागू करने का प्रयास कीजिए.
वैज्ञानिक तरीके से अपनी तैयारी करने पर आप अधिक आत्मविश्वास के साथ शिक्षण करेंगे और बेहतर परिणाम भी प्राप्त कर सकेंगे.
इस व्याख्यान के साथ ही इस विषय पर इस लिंक पर उपलब्ध यह लेख भी पढ़ने का अनुरोध कर रहा हूँ.
आशा है कि प्रस्तुत व्याख्यान शिक्षकीय-कर्म में लगे हुए या लगने जा रहे युवा मित्रों की विशेष सहायता कर सकेगा.
मेरा यह व्याख्यान इस श्रृंखला का तीसवाँ व्याख्यान है.
यह प्रयास युवा-शक्ति की सेवा में विनम्रतापूर्वक समर्पित है.
कृपया इस प्रयास की सार्थकता के बारे में अपनी टिप्पणी द्वारा मेरी सहायता करें.
ढेर सारे प्यार के साथ आपका गिरिजेश
इसका लिंक है http://youtu.be/LX4_KLmHces

____ राष्ट्रवाद — Himanshu Kumar

Himanshu Kumar जी की धारदार कलम से दो-टूक सच _____
सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिक इस समय दो खेमे में बंटे हुए दिखाई दे रहे हैं .
एक तरफ वो हैं जो याकूब की फांसी के विरोध में हैं
और दूसरे जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं .

जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं उनमे भी दो तरह के लोग हैं.

पहले वो लोग हैं जो कहते हैं कि याकूब को जो फांसी हुई है वह कोई साम्प्रदायिक निर्णय नहीं है
उनका कहना है कि इसलिए इस फांसी को लेकर जो लोग हल्ला मचा रहे हैं वह गलत कर रहे हैं और साम्प्रदायिक आधार पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर हमला कर रहे हैं .

फांसी के समर्थन में दूसरा तबका मोदी भक्त वर्ग का है जो इस फांसी के बहाने फिर से मुसलमानों को नीचा दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है.
ये लोग अभद्र और भड़काऊ भाषा और जुमले इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि मुसलमानों को चिढ़ा सकें .
ये लोग हल्ला मचा रहे हैं कि जो भी फांसी का विरोध कर रहे हैं, वह सभी लोग आतंकवादियों के समर्थक हैं.

इसी तरह फांसी के विरोध में भी दो तरह के लोग हैं.

पहले वो लोग हैं जो किसी को भी फांसी देने के खिलाफ़ हैं.
ये लोग पहले से ही किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते रहे हैं.
लेकिन जब ये किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते हैं तो इन्हें भक्त जन तुरंत आतंकवादियों के एजेंट घोषित कर देते हैं .

फांसी के खिलाफ़ दूसरी तरह के जो लोग हैं जो मानते हैं कि याकूब को मुसलमान होने के कारण फांसी दी गयी है इसलिए हम इस बात का विरोध कर रहे हैं .

इनमे भी दो तरह के लोग हैं पहले वो लोग हैं, जो भारत में साम्प्रदायिक राजनीति, लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यवाद, हिंदुत्व के नाम पर भारतीय जनता का साम्प्रदायिकरण और संघ कुनबे द्वारा जानबूझ कर मुसलमानों को नीचा दिखाने के विरोध में हैं .

फांसी का विरोध करने वाले बहुत सारे मुस्लिम भी हैं जो इस फांसी को मुसलमानों को डराने के कदम के रूप में देख रहे हैं .
ये लोग जो प्रतिक्रिया कर रहे हैं उसका आधार बस यही है कि अगर वह मुसलमान ना होता तो उसे फांसी ना होती और यह कदम मुसलमानों को डराने के लिए लिया गया है इसलिए हम इसके विरोध में हैं .

याकूब की फांसी के बाद मुसलमानों के मन में डर और गुस्सा बिलकुल स्वाभाविक बात है.
डर को ठीक से समझना ज़रूरी है.
डर याकूब के लिए नहीं है. याकूब तो मर गया उसके लिए अब क्या डर?
मुसलमानों का डर तो उनके खुद अपने लिए है.
मुसलमान डर कर सोच रहे हैं की क्या मुसलमान होने के कारण हमें भारत में अब डर कर रहना पड़ेगा?
इसलिए काफी सारे मुसलमान इस डर से निजात पाने के लिए इस फांसी के विरोध में आवाज़ उठा रहे हैं.

आपको खुद याद होगा कि आपने दिल्ली में दामिनी कांड के बाद किस तरह से बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन किया था.
वह भी आपके अपने डर की ही परिणिति थी.
आप दामिनी के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी या अपनी बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए के लिए सड़कों पर उतरे थे.

इसी तरह भारतीय मुसलमान भी याकूब के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठा रहे हैं
और कह रहे हैं कि भारत में अगर किसी को मुसलमान होने के कारण फांसी दी जाती है तो वह गलत है .
इसलिए फांसी के विरोध में उठने वाली किसी भी तरह की आवाज़ को आतंकवादी समर्थक कहना गलत होगा .

पिछले दिनों मुझे युवा लड़के लड़कियों के एक प्रशिक्षण शिविर में बुलाया गया .
मुझे राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता पर बोलने के लिए कहा गया.
मैंने वहाँ मौजूद ग्रामीण शिक्षित युवाओं से पूछा कि बताइये कि दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्र कौन सा है ?
सबने एक स्वर में कहा कि भारत .

मैंने अगला सवाल पूछा कि अच्छा बताओ कि सबसे अच्छा धर्म कौन सा है ?
सबने कहा हिंदू धर्म,

मैंने पूछा कि अच्छा बताओ सबसे अच्छी भाषा कौन सी है ?
कुछ ने जवाब दिया की हिन्दी, कुछ युवाओं ने जवाब दिया कि संस्कृत सर्वश्रेष्ठ भाषा है .

मैंने उन युवाओं से अच्छा अब बताओ कि दुनिया का सबसे बुरा देश कौन सा है ?
सारे युवाओं ने कहा की पाकिस्तान,

मैंने पूछा सबसे बेकार धर्म कौन सा है ?
उन्होंने कहा इस्लाम ?

मैंने इन युवाओं से पूछा कि क्या उन्होंने जन्म लेने के लिए अपने माँ बाप का खुद चुने थे ?
सबने कहा नहीं .

मैंने पूछा कि क्या आपने जन्म के लिए भारत को या हिंदू धर्म को खुद चुना चुना था ?
सबने कहा नहीं .

मैंने कहा यानि आपका इस देश में या इस धर्म में या इस भाषा में जन्म महज़ एक इत्तिफाक है .
सबने कहा हाँ ये तो सच है .

मैंने अगला सवाल किया कि क्या आपका जन्म पाकिस्तान में किसी मुसलमान के घर में होता
और मैं आपसे यही वाले सवाल पूछता तो आप क्या जवाब देते ?
क्या आप तब भी हिंदू धर्म को सबसे अच्छा बताते ?
सभी युवाओं ने कहा नहीं इस्लाम को सबसे अच्छा बताते .

मैंने पूछा अगर पाकिस्तान में आपका जन्म होता और तब मैं आपसे पूछता कि सबसे अच्छा देश कौन सा है तब भी क्या आप भारत को सबसे अच्छा राष्ट्र कहते ?
सबने कहा नहीं तब तो हम पाकिस्तान को सबसे अच्छा देश कहते .

मैंने कहा इसका मतलब यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है हम उसी धर्म और उसी देश को सबसे अच्छा मानते हैं .
लेकिन ज़रूरी नहीं है की वह असल में ही वो सबसे अच्छा हो.
सबने कहा हाँ ये तो सच है.

मैंने कहा तो अब हमारा फ़र्ज़ यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है उस देश में और उस धर्म में जो बुराइयां हैं उन्हें खोजें और उन् बुराइयों को ठीक करने का काम करें .
सभी युवाओं ने कहा हाँ ये तो ठीक बात है .

इसके बाद मैंने उन्हें संघ द्वारा देश भर में फैलाए गए साम्प्रदायिक ज़हर और उसकी आड़ में भारत की सत्ता पर कब्ज़ा करने और फिर भारत के संसाधनों को अमीर उद्योगपतियों को सौपने की उनकी राजनीति के बारे में समझाया .
मैंने उन्हें राष्ट्रवाद के नाम पर भारत में अपने ही देशवासियों पर किये जा रहे अत्याचारों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें आदिवासियों, पूर्वोत्तर के नागरिकों, कश्मीरियों पर किये जाने वाले हमारे अपने ही अत्याचारों के बारे में बताया.

मैंने उन्हें हिटलर द्वारा श्रेष्ठ नस्ल और राष्ट्रवाद के नाम पर किये गये लाखों कत्लों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें यह भी बताया की किस तरह से संघ उस हत्यारे हिटलर को अपना आदर्श मानता है .

मैंने उन्हें बताया की असल में हमारी राजनीति का लक्ष्य सबको न्याय और समता हासिल करवाना होना चाहिए .
हमने भारत के संविधान की भी चर्चा करी .
इन युवाओं में काफी सारे मोदी के भक्त भी थे .
लेकिन इस प्रशिक्षण के बाद वे मेरे पास आये और उन्होंने कहा कि आज आपकी बातें सुनने के बाद हमारी आँखें खुल गयी हैं.

असल हमें इस तरह से सोचने के लिए ना तो हमारे घर में सिखाया गया था ना ही हमारे स्कूल या कालेज में इस तरह की बातें बताई गयी थीं.
मुझे लगता है की हमें युवाओं के बीच उनका दिमाग साफ़ करने का काम बड़े पैमाने पर करना चाहिए. क्योंकि उनका दिमाग खराब करने का काम भी बड़े पैमाने पर चल रहा है .

{ August 01, 2015 

____ गुनाह ____




हमको तो ज़माना अभी ललकार रहा है,
बढ़-बढ़ के डींग मारता, धिक्कार रहा है.

करता ही चला जा रहा है घालमेल भी,
मुश्किल है ज़माने के साथ ताल-मेल भी.

बच्चों को सच सिखाना बुरा है गुनाह है,
इन्साफ़ की पुकार लगाना गुनाह है.

झपसट बहुत भले यहाँ ख़िदमत गुनाह है,
दुनिया को बदलने का अहद भी गुनाह है.

देते नहीं दगा कभी, करते नहीं फ़रेब,
देना है बहुत लोगों को, ख़ाली है अपनी ज़ेब.

करते रहे गुनाह सभी बार-बार हम,
चलते ही चले जा रहे, लेते भी नहीं दम.

हम भी तो ज़माने के भी काबिल कहाँ रहे,
आसान काम अपने हैं, मुश्किल कहाँ रहे !
 ─ गिरिजेश (21.7.15.)

_____ सृजन और/या विरोध की मनोदशा और परिणति _____





पठनीय व्यंग्य ! 
- - फाँसी की राजनीति बनाम फाँसी पर राजनीति - -
{तीख़ी प्रतिक्रियाओं की उम्मीद के साथ पुनर्प्रस्तुति}

_____ सृजन और/या विरोध की मनोदशा और परिणति _____
केवल विरोध के लिये विरोध और प्रतिवाद करने वाले दिमाग केवल नकारात्मक तरीके से सोचते रहने के चलते सृजनात्मक क्षमता से वंचित होते चले जाते हैं. धीरे-धीरे करके वे सकारात्मक दृष्टि से दुनिया को देखने, समझने और बदलने के सृजनात्मक प्रयोगों में लग सकने में असमर्थ हो जाते हैं. जब तक व्यापक स्तर पर प्रगतिशील परिवर्तनकामी वाम शक्तियों द्वारा रचनात्मक और सकारात्मक प्रयास और प्रयोग नहीं शुरू होंगे, तब तक सामान्य जन तक पहुँचना और उनको अपने साथ गोलबन्द कर सकना तो बहुत दूर की बात है. आम लोगों के बीच हर मौके पर केवल अपनी उल्टी-पल्टी हरकतों और वक्तव्यों के चलते केवल हास्यास्पद ही बने रहना वाम के हिस्से की विसंगति है. यह समझना हमारे लिये सबसे ज़रूरी है कि सतत सृजन ही दुनिया के आगे बढ़ते जाने के पीछे की द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया का मूल कारक है, न कि प्रतिरोध, प्रतिवाद और प्रतिशोध. यह केवल गौण कारक ही हो सकता है. 'निषेध के निषेध' का यही अभिप्राय है.

"जिनसे कुछ नहीं हो पाता वे वाम की झण्डी अपने माथे पर टांग लेते हैं और इनका एक सूत्रीय एजेंडा है........... विरोध
उत्तर का भी विरोध, दक्खिन का भी विरोध, पूरब का भी विरोध, पश्चिम का भी विरोध, धरती का भी विरोध, आसमान का भी विरोध.........विरोध विरोध और विरोध।
वो तो सम्भव नहीं है नहीं तो ये अपने पैदा होने का भी विरोध दर्ज कराते।
इन्ही जैसे उल्लुओं की वजह से वाम का आज कोई नाम भी नहीं बचा लेने वाला.."

अराजक मलंग -
कामरेड याकूब अमर रहें.......

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अपने फन्ने मियाँ बड़के क्रांतिकारी हैं। रोजे में पानी बँटवाते हैं बाकी दिन बांटा हुआ पानी खुद पीते हैं। इसी तरह उनके एक दोस्त भी हैं पंडित गेरू प्रसाद, नवरात्रि में हमेशा अपनी बटलोई लेकर अलग हो जाते हैं जी भर कर मुर्गा मटन पकाते हैं और दोनों दोस्त दबा के खाते हैं। मजे से जिंदगी चल रही थी। साथ साथ "दास कैपिटल" और लेनिन माओ को नियमित बांचा करते दोनों दोस्त, दारू गाँजा और बाकी सभी क्रांतिकारी शय और असबाब पर्याप्त मात्रा में रहता है दोनों की पोटली में.........
सुबह सुबह खैनी रगड़ते हुए फन्ने मियाँ गेरू पंडित के बरामदे में आये। मुँह पर काली स्याही पोते हुए थे।

पंडित ने देखते ही चुहल से पूछा-
- का हुआ कामरेड? मुंह काहे काला किये फिर रहे हो......
फन्ने मियाँ ने खैनी आगे बढ़ाते हुए कहा- कुछ नहीं, आज हम दिन भर ऐसे ही रहेंगे। हम पूँजीवादी व्यवस्था की दोगली नीतियों के शिकार अपने कामरेड याकूब की शहादत पर शोक प्रकट करेंगे।
अभी पंडित कुछ बोले तब तक फन्ने मियाँ खैनी का बीड़ा मुंह में दाबते हुए फिर बोल पड़े,
- जानत हौ पंडित......अगला(मेनन) बहुत शांतिप्रिय रहा। फांसी के फंदे पर भी बुदबुदा रहा था कि अल्लाह उसे फांसियाने वालों को माफ़ कर दे।

पंडित ने उदासी से मियाँ के कंधे पर हाथ रखा और बोले- 
देखो मियाँ, अगला भले ही आस्तिक रहा हो लेकिन काम तो उसने क्रांतिकारी ही किया। पूँजीवादी साले चाहे लालगढ़ या पिथौरागढ़ के सी.आर.पी.ऍफ़. के जवान हों, या मुम्बई में बैठे निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के बाशिंदे..........
इन सालों का मरना ही जरुरी है चाहे धमाकों में या बारूदी सुरंगों से या घात लगा कर की गयी अचानक गोलीबारी से।
कामरेड याकूब तो भी नीतिज्ञ थे जो इन दू कौड़ी के पूँजीपतियों को बीस साल तक चकमा देते रहे..........

फन्ने मियाँ की आँखों में चमक आ गयी।
- यार कामरेड! ऐसे दिलेर और जांबाज क्रांतिकारी का तो शहीदोत्सव होना चाहिए।

पंडित- आदर्शों के आधार पर तो तुम्हारी बात सही है कामरेड, लेकिन एक बात ध्यान में रखो.....
कई बार क्रांतिकारी गतिविधियाँ भूमिगत होकर जारी रखनी पड़ती हैं, नहीं तो हमको तुमको भी कामरेड दाऊद की तरह निर्वासित होना पड़ सकता है या कामरेड लादेन की तरह कुत्ते की मौत मार दिया जा सकता है।

बात फन्ने मियां की समझ में आ गयी लेकिन फिर भी क्रांति की लहर ऐसे ही थोड़े ठण्डी होती है।
सोचनीय मुद्रा में फन्ने मियाँ- वो तो ठीक है पंडित..... लेकिन इस अमानवीय ह्त्या के विरोध में हमे कुछ तो करना चाहिए।

- अरे तो मियाँ लाओ थोड़ी सियाही, हम भी अपना विरोध प्रदर्शित करने के लिए मुंह काला कर लेते हैं।
फन्ने मियां ने पंडित को ऐसे देखा मानो अगले ही क्षण दोनों शहीद होने जा रहे हों........
हाथों में थामा हाथ कुछ और मजबूती से पकड़ लिया।
जोरदार नारा लगाया- 
कामरेड याकूब अमर रहें.........
कुछ ही दूर पर लोगों का झुण्ड दोनों की बात सुन कर खींसे निपोर रहा था। 
लोग कह रहे थे - "ऐसे चूतिये साले हर गाँव क्षेत्र में मौजूद हैं, जिनसे कुछ नहीं हो पाता, वे वाम की झण्डी अपने माथे पर टांग लेते हैं और इनका एक सूत्रीय एजेंडा है........... विरोध !
उत्तर का भी विरोध, दक्खिन का भी विरोध, पूरब का भी विरोध, पश्चिम का भी विरोध, धरती का भी विरोध, आसमान का भी विरोध.........विरोध, विरोध और विरोध।
वो तो सम्भव नहीं है, नहीं तो ये अपने पैदा होने का भी विरोध दर्ज कराते।
इन्ही जैसे उल्लुओं की वजह से वाम का आज कोई नाम भी नहीं बचा लेने वाला........."
- मलंग

उच्च शिक्षा को WTO-GATS के सुपुर्द करने के खिलाफ़ - अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच



अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच
उच्च शिक्षा को WTO-GATS के सुपुर्द करने के खिलाफ़ आवाज़ उठाओ!
WTO भगाओ!! शिक्षा बचाओ!!!

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मातहत उच्च शिक्षा क्षेत्र को वैश्विक व्यापार के लिये खोलने के लिये भारत सरकार ने WTO के पटल पर इस सम्बन्ध में ‘प्रस्ताव’ रख कर इसकी पूरी तैयारी कर ली है। इसके तहत WTO के 160 सदस्य देशों में शिक्षा का व्यवसाय करने वाली फर्मों को हमारे देश में कालेज, विश्वविद्यालय एवं अन्य तकनीकी अथवा पेशेवर (प्रोफेशनल) संस्थाएँ स्थापित कर उन्हें व्यावसायिक मुनाफे के लिये चलाने की पूरी छूट होगी। उक्त ‘प्रस्ताव’ के मन्ज़ूर होते ही WTO के व्यापार सम्बन्धी नियम उच्च शिक्षा क्षेत्र में लागू हो जायेंगे। ऐसा होते ही जनता का शिक्षा का अधिकार, जिसे सुनिश्चित करना सरकार की लोकतान्त्रिक जिम्मेदारी है, पूरी तरह खत्म हो जायेगा। WTO की शर्तो के तहत बेलगाम निजीकरण एवं बाज़ारीकरण से शिक्षा न केवल गरीबों के हाथ से निकल जायेगी, बल्कि जो इसका खर्च उठा सकते हैं उन्हें भी केवल नाममात्र की शिक्षा ही मिलेगी। ऐसा इसलिये क्योंकि बाज़ारीकरण के चलते शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटक जायेगी और साथ ही पाठ्यक्रम व शिक्षापद्धति में भी गिरावट होगी। इसके साथ ही हमारे शैक्षणिक संस्थाओं की अकादमिक स्वायत्तता, शोध की स्वतन्त्रता और लोकतान्त्रिक परिपाटियों में ह्रास होगा। अगर एक बार शिक्षा वैश्विक बाजार के हवाले हो गयी तो इतना निश्चित है कि भारत सरकार शिक्षा का व्यापार करने वाले देशी-विदेशी कार्पोरेट के हितों का संरक्षण करने के लिये बाध्य होगी, भले ही इससे देश के अध्यापकों और विद्यार्थियों का अहित हो। अगर भारत के हम सब लोग और खासतौर से शिक्षक व विद्यार्थी समुदाय, उच्च शिक्षा में WTO को दिये गये भारत सरकार के ‘प्रस्ताव’ को वापस कराने में सफल नहीं होते हैं तो हमारा शिक्षा-तन्त्र हमेशा के लिये विश्व व्यापार संगठन के चंगुल में फँस जायेगा और इसका भविष्य अन्धकारमय हो जायेगा।

व्यापार-वार्ताओं में तेजी का दौर : विश्व व्यापार संगठन की सामान्य परिषद की विशेष बैठक नवम्बर 2014 में जिनेवा में आयोजित हुई जिसमें दोहा दौर की वार्ताओं के बढ़ते कार्यक्षेत्र को सीमित करने के लिये संघर्षरत अल्प-विकसित एवं विकासशील देशों के दस वर्ष लम्बे प्रतिरोध को व्यवस्थित रूप से दबाने की प्रक्रिया अपने चरम पर पहुँच गयी। यहाँ तय किया गया कि जुलाई 2015 तक व्यापार वार्ताओं के ‘कार्यक्रम’ को अन्तिम रूप दिया जाये और दिसम्बर 2015 में विश्व व्यापार संगठन के मन्त्री-स्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया जाये, जो इसका शीर्ष निकाय है। यह सम्मेलन अल्प-विकसित तथा विकासशील देशों तथा पूरी दुनिया के मेहनतकश आवाम के लिये अत्यन्त घातक होगा। दसवीं मन्त्री-स्तरीय बैठक में लिये गये निर्णय के बाद कृषि के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी सेवाएँ एवं जनता के सभी हक व्यापार के दायरे में आ जायेंगे। लूट की इस योजना से देशों की संप्रभुता खत्म होगी। खतरे को भाँपते हुए पूरी दुनिया के अनेक संगठनों ने दसवें मन्त्री-स्तरीय सम्मेलन के विरोध का संकल्प लिया है। संकट के इस दौर में शिक्षा प्रेमी चुप नहीं बैठ सकते।

साम्राज्यवाद के बढ़ते कदम : WTO ने दुनिया को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है - 1. विकसित, 2. विकासशील, और 3. अल्प-विकसित। विकसित एवं विकासशील व अल्प-विकसित देशों के बीच की असमानता वस्तुतः साम्राज्यवादी लूट का नतीजा है। WTO का गठन विकसित देशों के हितों के संरक्षण के लिये हुआ है और यह विकासशील देशों के हितों के खिलाफ़ है। भारत जैसे विकासशील देशों ने WTO की सदस्यता देश के कार्पोरेट घरानों हितों के लिये ग्रहण की और जनता को आश्वस्त किया है कि विकास से निकले ‘रिसाव’ (ट्रिकल डाउन) से उसे भी लाभ मिलेगा। विगत दो दशकों में विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत किये गये विभिन्न समझौतों की वजह से सभी देशों में वर्गीय और सामाजिक असमानताओं (यथा जाति, नस्ल, लिंग, भाषा एवं विकलांगता सम्बन्धी) तथा राष्ट्रों के बीच गैर-बराबरी की स्थिति गम्भीर हुई है और दसवीं मन्त्री-स्तरीय बैठक में विश्व व्यापार संगठन के क्रियाकलाप में प्रस्तावित विस्तार से इसकी प्रक्रिया और तेज होगी। विडम्बना यह है कि ‘दोहा चक्र व्यापार वार्ता’ को ‘दोहा विकास एजेंडा’ भी कहा जाता है, क्योंकि गरीब देशों को लुभाने के लिये इसमें कुछ ‘राहत उपाय’ भी किये गये हैं। 

गैट्स और शिक्षा : विश्व व्यापार संगठन मुख्य रूप से तीन एकीकृत बहुपक्षीय समझौतों पर आधारित है – 
1.‘जनरल एग्रीमेन्ट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ़’, 1994 (गैट/GATT; व्यापार एवं शुल्क सम्बन्धी सामान्य समझौता), 
इसमें कृषि सम्बन्धी समझौता ‘एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर’ भी शामिल है; 
2. ट्रेड रिलेटेड इन्टेलेक्चुअल प्रापर्टी राइट्स (ट्रिप्स/TRIPS, व्यापार सम्बन्धी बौद्धिक सम्पदा अधिकार), एवं 
3. ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेज़’ (गैट्स/GATS, ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेज़” या सेवा क्षेत्र में व्यापार के लिये आम समझौता)। इसी तीसरे समझौते के तहत शिक्षा के अर्थ का अवमूल्यन करते हुए उसे ‘व्यापारिक सेवा’ के अन्तर्गत रखा गया। समझौते के अनुसार शिक्षा का व्यापार गैट्स परिषद (सेवा व्यापार परिषद) द्वारा प्रशासित होगा। विडम्बना यह है कि यह परिषद इन्हीं नियमों से मनोरंजन के क्लब और मदिरालयों जैसी ‘सेवाओं’ का भी नियमन करेगी। यदि विदेशी विश्वविद्यालय देश में ज्ञान के प्रसार एवं विनिमय के लिये आते और इनका उद्देश्य परस्पर शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों का विकास होता तो इनके विरोध की आवश्यकता नहीं थी। भारत के इतिहास में इस तरह का परस्पर लेन-देन होता रहा है और स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी एवं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी इसे प्रोत्साहित किया। 

लेकिन विश्व व्यापार संगठन के दौर में ऐसी बात नहीं है। इसके अन्तर्गत तो विदेशी विश्वविद्यालय केवल मुनाफा कमाने आ रहे हैं। यही नहीं, अनेक दोयम दर्जे के विश्वविद्यालय भी यहाँ अपनी शाखा खोलकर मुनाफा कमायेंगे। सन 2000 में हुए विश्व बैंक के एक सर्वेक्षण रपट से यह प्रमाणित है कि विकसित देशों के जाने-माने विश्वविद्यालयों ने पिछड़े देशों में घटिया दर्जे की शाखाओं की स्थापना की। इसमें एक और खतरनाक बात यह है कि भारत सरकार ने अपने ‘प्रस्ताव’ में विदेशी सेवा-प्रदाताओं को पूर्ण राष्ट्रीय व्यवहार का वायदा किया है जिससे विदेशी संस्थानों को देश के संस्थानों के समकक्ष सुविधाएँ मिलेंगी और यह जनता के धन को विदेशी संस्थानों को सौपने का मात्र एक बहाना होगा ।

आन्तरिक विनियमन : विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत विधिमान्य एजेंसी है - व्यापार नीति समीक्षा तन्त्र (ट्रेड पॉलिसी रिव्यु मेकेनिज़्म या TPRM)। इसी के तहत निर्मित अधिकृत निकाय विभिन्न देशों की व्यापार नीतियों की वार्षिक समीक्षा करेगा और देशों को सम्बन्धित नीतियों में बदलाव के लिये सुझाव देगा। WTO के निकायों द्वारा इस तरह के कार्य देश के आन्तरिक मामलें में दखल एवं उसकी संप्रभुता का हनन है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि WTO सदस्य देशों के नीति दृष्टिकोण को अपने अनुकूल प्रभावित करेगा। विकासशील एवं अल्प-विकसित देश इस प्रावधान के शिकन्जे में फँस जायेंगे। व्यापार नीति समीक्षा तन्त्र के अधिकारियों के पास मानव संसाधन मन्त्री एवं मन्त्रालय के सचिवों से मिलने का पूरा अधिकार होगा और वे शिक्षा के कथित सुधार के अपने एजेंडा को लागू कराने के लिये वार्षिक समीक्षा व पूछताछ करेंगे। मानव संसाधन मन्त्री भारत की जनता से ज्यादा इस संस्था के प्रति जवाबदेह होंगे। सं.प्र.ग. शासन में विश्व व्यापार संगठन की माँग के अनुसार आन्तरिक विनियमन को परिवर्तित करने के लिए उच्च शिक्षा सम्बन्धित छः विधेयक संसद में रखे गये लेकिन कोई विधेयक पारित नहीं हुआ। इस बात की पूरी सम्भावना है कि मौजूदा सरकार इसी तरह का विधेयक लाये और उसे पारित कराने का प्रयास करे। इस दिशा में इस सरकार ने दिल्ली विवि व अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में ‘च्वॉएस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम’ थोप दिया है और समान विश्वविद्यालय कानून बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। 

स्वतन्त्र विनियामक प्राधिकरण : हाल में ही अनेक सेवा क्षेत्रों जैसे कि ऊर्जा, जल, बीमा, दूरसंचार इत्यादि के लिए स्वतन्त्र विनियामक प्राधिकरणों (इंडिपेन्डेन्ट रेग्युलेटरी अथॉरिटी, IRA) की स्थापना की गयी है। इस तरह के प्राधिकरणों का स्पष्ट उद्देश्य यही है कि उच्च शिक्षा संस्थानों के वर्तमान सांविधिक निकायों एवं उनकी स्वायत्तता को खत्म कर दिया जाये और इसी के साथ केन्द्र एवं राज्य सरकार का कानूनी उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही भी खत्म हो जाये। इस तरह के प्राधिकरणों की स्थापना गैट्स के प्रावधानों के प्रति वचनबद्धता को पूरा करने के लिये ही की जा रही है। अन्य सेवा क्षेत्रों के लिये स्थापित किये गये प्राधिकरणों की ही तरह शिक्षा सेवा क्षेत्र के लिये स्थापित होने वाला प्राधिकरण भी जन ‘दबाव’ से मुक्त होगा एवं आन्तरिक तथा विदेशी पूँजी के पक्ष में इस क्षेत्र का विनियमन करेगा। यू.पी.ए. सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं अनुसंधान आयोग’ के गठन का प्रयास शिक्षा सम्बन्धी अन्य विधेयकों के साथ ही विफल हो गया, लेकिन भाजपा ने भी अपने चुनाव घोषणापत्र (2014) में इसी तरह का निकाय बनाने की घोषणा की थी। और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय द्वारा गठित एक कमेटी की रपट में ‘यूजीसी’ को भंग कर उसकी जगह ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा प्राधिकरण’ बनाने की सिफारिश की गयी है। यह WTO के प्रावधानों के अनुपालन की दिशा में उठाया गया कदम ही है।

समय की पुकार : WTO-GATS शिक्षा को उपभोग के माल और विद्यार्थी को उपभोक्ता में बदल देता है। इससे शिक्षा से गरीब तो वंचित होंगे ही, साथ ही वे भी जो पैसा खर्च कर सकते हैं क्योंकि सारी शिक्षा का कार्पोरेट हित में अवमूल्यन कर दिया जायेगा। इसी के साथ शिक्षा की प्रबोधनकारी, परिवर्तनकामी और सशक्तीकरण की भूमिका भी समाप्त हो जायेगी जो व्यक्ति को एक सक्षम नागरिक बनाती है। एक ऐसा नागरिक जिसके मन में समाज की बहुलता के प्रति, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद के प्रति सम्मान हो, जो संवैधानिक व लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक हो और राष्ट्र की संप्रभुता एवं स्वतन्त्रता की रक्षा करने में समर्थ हो। बाजारीकरण के इस ‘प्रस्ताव’ को वापस लेने के लिये मजबूत आन्दोलन की शुरुआत अभी करनी होगी क्योंकि आगे सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे। अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के माध्यम से हम सभी जनहितैषी संगठनों, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, अध्यापकों, छात्रों एवं संघर्षशील जनसमूह से एक साथ संकल्पबद्ध होकर संघर्ष करने की अपील करते हैं, ताकि देश की शिक्षा व्यवस्था पर इस नवउदारवादी हमले को रोका जा सके, उच्च शिक्षा में WTO-GATS को दिये गये ‘प्रस्ताव’ को वापस कराया जा सके और अपने देश को व लोगों को बँधुआ होने से बचाया जा सके।

निवेदक -
अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच | www.aifrte.in
अभाशिअम अध्यक्ष-मंडलः डॉ. मेहर इंजीनियर, प्रो. वसी अहमद, श्री प्रभाकर अराडे, प्रो. जी. हरगोपाल, 
प्रो. मधु प्रसाद, प्रो. अनिल सद्गोपाल, प्रो. के. चक्रधर राव, प्रो. के.एम. श्रीमाली और डॉ. आनंद तेलटुंबडे
संपर्क:- संगठन सचिव- श्री रमेश पटनायक, हैदराबाद; मो. 09440980396, 040-23305266, ईमेल: aifrte.secretariat@gmail.com
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स्थानीय सम्पर्क : ___ व्यक्तित्व विकास केन्द्र ___
निःशुल्क शिक्षण-प्रशिक्षण
(कक्षा नौ से बारह तक सभी विषयों का)
लाइफ़-लाइन अस्पताल की गली के सामने, 
371, झारखण्डी निवास, 
मड़या, रैदोपुर, आज़मगढ़
गिरिजेश तिवारी {फोन : 09450735496}

___FOR Dr. MAYANK TRIPATHI AND Dr. SHUBHI MAYANK DUBEY___




I have only to say that I am proud of you and your tough labour even in the most adverse circumstances.
I want to learn this art from you but many times fail.
mayank my son, love a lot...
you are the personification of my dreams.
and shubhi is the person who taught me how to sacrifice silently. I have nothing except only my pauper love for you and her also.

" in cancer the disease is the king, biology is the Queen and money is the prince, an oncologist is no more than a pawn, but i, a pawn, take a vow to fight for the common people and to never use my skill and knowledge just for the sake of earning money, that will be my best tribute to people who sacrificed their life to make this world a better place. "

Mayank Tripathi -
"Finally i got selected in Mch Surgical Oncology at TMC Mumbai, unarguably the best centre for cancer treatment in india and one of the best centres in world. This post is to show my gratitude to people who made me what i am today. My journey from the small sleepy town of Azamgarh to Mumbai has been full of ups and downs and these people stood by me, more so in my downs. Azamgarh is a typical example of mockery of democracy..you can't find a straight 2km road without potholes, literacy is well below national average, more than 40% villages don't have electricity, people are interested more in guns and bombs than how their kids are doing in school. U.P board still teaches A to Z of english in class 6 and you can easily get 80% marks without attending a single day of school. I wonder how lucky i am that i am not a mafia don controlling extortions and kidnapping. Words are not enough to thank people who steered me out of this mess. Since i am an atheist so almighty god has definitely not played any role in my education and struggle. I am thankful to my parents especially my mother who in all odds never stopped believing in me, my inlaws who never behaved like inlaws but my own parents, my mentor Girijesh Tiwari who taught me to think read and analyse, my wife Shubhi Mayank Dubey who encouraged me when i thought i can't make it and taught me how not to live like a nerd. My brother Manish Tripathi and sister Poonam Pandey who bore all familial responsbilities for me. My teachers Prof. R.K.Karwasra and Prof. Sanjeev Parshad who taught me science and art of surgery.My patients who let me touch their most tender parts and allowed me to wield my scalpel so that i can have the feel of the disease My senior Dr. Anand Yadav, who never treated me like a junior but his own brother. My juniors who made Rohtak my second home Ashish Gupta, Hemkant Verma, Vishal Bansal, Tirath Kaushik, Sourabh Nandi, Ankush Sarwal, Saket Srivastava and many more. My another brother Pankaj DrPankaj Saksena who always stood by me from hostel fights to late night outings. My late Mama ji Mr. Shiromani Pandey who took care of my small-small needs and tragically succumbed to poor medical care at Azamgarh.My childhood friends Madan Rai and Viraj Tripathi for whom i always remained Guddu and could never become Mayank. Well there are atleast 30 more names to add(many parted their ways) which is not technically possible for me.
And at the end, in cancer the disease is the king, biology is the Queen and money is the prince, an oncologist is no more than a pawn, but i, a pawn, take a vow to fight for the common people and to never use my skill and knowledge just for the sake of earning money, that will be my best tribute to people who sacrificed their life to make this world a better place." - Mayank

____ शिक्षण-प्रशिक्षण की वैज्ञानिक पद्धति ____


1. हर कक्षा में तीन तरह के छात्र होते हैं. तेज़, औसत और कमज़ोर. कोई छात्र कमज़ोर नहीं होता है. अगर कोई छात्र तेज़ है तो उसका एक ही कारण होता है. उस छात्र ने और उसके शिक्षक ने अतीत में गम्भीरता के साथ काम किया है. और अगर कोई छात्र कमज़ोर है, तो उसका भी एक ही कारण होता है.- उस छात्र ने या उसके शिक्षक ने या छात्र और शिक्षक दोनों ने कभी भी गम्भीरता के साथ काम नहीं किया है. इन दोनों 'कारणों और परिणामों' (causes and effects) का सीधा सम्बन्ध शिक्षण की पद्धति और छात्र और शिक्षक के व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि से जुड़ा है.

2. ज़िम्मेदार शिक्षक अपने छात्र की विफलता के पीछे अपनी ख़ुद की विफलता को देख और महसूस कर सकता है और अपनी पद्धति को बेहतर बनाने के लिये सतत प्रयास और प्रयोग करता रहता है. मगर लापरवाह शिक्षक अपने छात्र के मत्थे उसकी विफलता को मढ़ कर ख़ुद को मुक्त कर लेता है. उसे अपनी विफलता की अनुभूति या अपनी गलती का अपराध-बोध तक होता ही नहीं. इस तरह वैज्ञानिक पद्धति का पहला बिन्दु है — शिक्षक और छात्र दोनों को ही शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान ज़िम्मेदारी और गम्भीरता के साथ काम करना पड़ेगा. कक्षा में गप-शप का हल्का माहौल सीखने-सिखाने के काम को आगे बढ़ने ही नहीं देता.

3. तेज़ छात्रों की रफ़्तार आम तौर से औसत और कमज़ोर छात्रों के विकास में अवरोध उत्पन करती है. एक कमज़ोर शिक्षक अपने छात्रों से जैसे ही पूछता है — "समझ गये!" वैसे ही मुट्ठी भर तेज़ छात्र एक साथ समवेत स्वर में हुआँ-हुआँ कर देते हैं. और फिर औसत और कमज़ोर छात्र अलगावग्रस्त हो जाते हैं और वह मूर्ख शिक्षक अपने शिक्षण की सफलता के नशे में झूम उठता है और आँख बन्द करके आगे बढ़ जाता है. वैज्ञानिक शिक्षण-पद्धति का अनुसरण करने वाले शिक्षक को "समझ गये!" का प्रश्न कभी नहीं पूछना है.

4. सामूहिक रूप से "समझ गये!" पूछने की जगह उसे अलग-अलग क्षमता वाले छात्रों से छिटफुट अलग-अलग प्रश्न करके उनके बोध का अनुमान और आकलन करना होता है. और उनको अपनी बात समझाने में विफल रहने पर धैर्य के साथ दुबारा, तिबारा या कई-कई बार अलग-अलग और भी आसान तरीके से समझाने का प्रयास करने के लिये तैयार रहना होता है. झल्लाने, चिल्लाने, हताश होने या आतुरता से बचना शिक्षक को समझदार बनाने के लिये सबसे ज़रूरी है.

5. समझदार शिक्षक अपने तेज़ छात्रों की टोली को अपने रास्ते का अवरोध बन जाने देने की जगह अपने सहयोग में लगाता है. वह उनको अलग-अलग कमज़ोर छात्रों को समझाने के लिये तैनात कर देता है और उनकी मदद से कम समय में सभी छात्रों को सिखा ले जाता है.

6. वैज्ञानिक पद्धति से काम करने वाले शिक्षक को कॉपी जाँचते समय कभी भी सही का चिह्न नहीं लगाना होता. जो सही है, उसे सही कहा, तो क्या कहा ! इस तरह सही को सही कहने की जगह जो गलत है, उसको गलत के चिह्न से पूरा गलत काटना होता है. और उस गलती का सुधार या अपनी टिप्पणी उसी जगह लिख देना होता है. ताकि छात्र अपनी कॉपी देखे और समझने की कोशिश करे कि उसने क्या और कैसे गलती की है और इसके साथ ही उसी समय उसे सही उत्तर की भी जानकारी मिल जाये.

7. सही के नाम पर हर पन्ने पर केवल दो-तीन तिर्यक लकीरें लाल स्याही से खींचना नितान्त अनुचित है. इसकी तुलना में अगर शिक्षक के पास समय नहीं है, तो उसे अपने हस्ताक्षर के ऊपर SEEN लिखना होगा. और अगर उसके पास सही तरीके से कॉपी जाँचने के लिये पर्याप्त समय है, तो उसे CHECKED लिख कर तब अपना हस्ताक्षर करना बेहतर है. कॉपी जाँचने के काम में भी तेज़ छात्रों की कॉपी पहले जाँच कर उनको अन्य छात्रों की कॉपी जाँचने में सहायक के रूप में काम में लगा देना बेहतर है. इससे कम समय में अधिक काम मुमकिन है.

8. अगर कॉपी क्लास-रूम में ही जाँची जानी है, तो जिस छात्र की कॉपी जाँची जा रही है, उसे अपनी कॉपी में सतर्कतापूर्वक देखने के लिये अपने बगल में खड़ा कर देना और बोल-बोल कर उसकी गलती और उसका सुधार समझाते जाना मददगार होता है.

9. वैज्ञानिक पद्धति से काम करने वाले शिक्षक को कभी भी बैठ कर नहीं पढ़ाना है. जिस कक्षा का शिक्षक बैठ जाता है, उस कक्षा के छात्र सो जाते हैं. शिक्षक के लिये तीन काम बताये गये हैं — CHALK, WALK AND TALK. बेहतर शिक्षक बनने के लिये बोल कर, टहलते हुए और ब्लैकबोर्ड-वर्क करते हुए समझाना ज़रूरी है.

10. कक्षा में उपस्थित सभी छात्रों के सुनने लायक ऊँचे स्वर में शुद्ध उच्चारण के साथ बोलना अथवा पढ़ना अच्छे शिक्षण की जान होती है. प्रत्येक वाक्य में अन्तिम अक्षर तक प्रत्येक शब्द का स्पष्ट और सही उच्चारण करने पर ही सभी छात्र सही बोलना या धारा-प्रवाह पढ़ना सीख सकते हैं. अधिकतर शिक्षक शिक्षा के इस प्रथम चरण पर ही धराशायी हो जाते हैं और अपनी विफलता का बीजारोपण कर बैठते हैं. वहीं दूसरी ओर कुछ असंवेदनशील शिक्षक अपने-आप में ही खोये रहते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि बगल के कमरे में कोई और कक्षा चल रही है और उनकी आवाज़ बगल वाले छात्रों और उनके शिक्षक को डिस्टर्ब कर रही है.

11. शिक्षण की सबसे बुरी पद्धति है अपनी कुर्सी में बैठ कर किताब से देख कर आलेख की तरह बोल-बोल कर रफ़ कॉपी पर नोट्स लिखाना. वैज्ञानिक पद्धति से सिखाने का काम तभी सम्भव है, जब शिक्षक अपने छात्र की कॉपी में लिखवाने की जगह उसके दिमाग पर सीधे लिखने में निपुण हो जाये. वह उसे उस मुद्दे को अच्छी तरह से समझा ले जा सके और उससे पूछ कर आश्वस्त हो ले कि उसकी बात उसके छात्रों को समझ में आ चुकी और वे सभी उस औजार का इस्तेमाल सफलता के साथ कर ले जाने में समर्थ हो गये.

12. वैज्ञानिक पद्धति से काम करने वाले शिक्षक की कक्षा में लिखवाने और लिखने की तुलना में समझाने और समझने का काम, याद किये गये उत्तर को सुनने और सुनाने का काम अधिक होता रहता है. इसमें दो-दो छात्रों की टोली बना कर हर टोली में सामने वाले छात्र से उसकी कॉपी लेकर दूसरे छात्र को पूछ कर पुष्ट करना होता है कि वह उत्तर उसके साथी को याद है या नहीं. और शिक्षक के पास रजिस्टर में सबके नाम के सामने उस दिन पूछे गये प्रश्न के लिये yes/no को चिह्नित करना होता है. तभी शिक्षक को अपने सिखा ले जाने पर पूरा आत्मविश्वास बन पाता है.

13. स्वभावतः जो छात्र अभी याद नहीं कर सके हों, उनको सकारात्मक तरीके से प्रोत्साहन देना उनका मज़ाक उड़ाने, अपमानित करने या उनको शारीरिक या मनोवैज्ञानिक दण्ड देने से कहीं बेहतर है. जहाँ शिक्षक का सकारात्मक प्रोत्साहन असफल छात्र से भी चमत्कार करवा सकता है, वहीं किसी भी तरह का नकारात्मक भाव या भय उसे निश्चित तौर पर केवल कुण्ठित और हताश करता है. और वह आगे बढ़ने की जगह पीछे हटता चला जाता है.

14. वैज्ञानिक पद्धति शिक्षण-प्रशिक्षण में मात्रा की तुलना में गुणवत्ता पर अधिक भरोसा करना सिखाती है. अपने छात्र के बोध के धरातल को समझ कर उस स्तर पर उतर कर उसे थोड़ा-थोड़ा करके सिखाना अधिक उपयोगी है. उतना ही खाना खिलाना बेहतर है, जितना पच जाये. ज्ञान की उल्टी करना हास्यास्पद है. तेज़ी से आगे बढ़ने से कोई लाभ नहीं मिलता. हाँ, इसके विपरीत शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान शिक्षक की हड़बड़ी और जल्दीबाज़ी से छात्रों को नुकसान अवश्य होता चला जाता है. जब छात्र के बोध की गुणवत्ता में विकास शुरू हो जाता है, तो मात्रा में वृद्धि स्वयमेव ही होने लगती है. इसलिये किसी भी छात्र-समूह को सिखाना शुरू करते समय आसान से कठिन की ओर, सरल से जटिल की ओर, स्थूल से सूक्ष्म की ओर और दृश्य से अदृश्य की ओर धीरे-धीरे करके बढ़ना होता है. शेष फिर कभी... — गिरिजेश. (5.8.15.) 

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