Thursday, 13 June 2013

दिल्ली की गरमी में भा.ज.पा. - गिरिजेश




मेरे प्यारे दोस्तो और साथियो, 
न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि हमारा प्यारा विश्वगुरु भारत राष्ट्र आज संकट के भीषण दौर से गुज़र रहा है!
भारतीय धनतन्त्र की संसदीय नौटंकी के नागनाथ बनाम साँपनाथ वाले खुले खेल के प्रमुख विपक्षी दल भा.ज.पा. पर इस बार की गर्मी का असर कुछ अधिक ही हुआ लग रहा है! 
ऐसे भी दिल्ली की गर्मी जानलेवा कही जाती रही है! 
मगर क्या इस बार दिल्ली की यह बदनाम गर्मी माननीय आडवानी जी के दिमाग़ पर मारक असर कर रही है? 
या फिर वह बूढ़े घोड़े की तरह बेचारगी के शिकार हो कर सठिया गये हैं और सटक गये हैं? 
या फिर माननीय मोदी जी महात्मा गाँधी जी वाले गुज़रात के माहौल को गरमाने के बाद दिल्ली के दिलेर 'दिल वालों' का दिल दहलाने पर बज़िद हो गये हैं? 
आप में से जिस किसी के पास विश्वस्त सूत्रों से कोई भी विश्वसनीय ख़बर जैसे ही पहुँचे, उसका परम पुनीत कर्तव्य बनता है कि हर आम और ख़ास को ख़बरदार करे! 
क्योंकि यह तो तय है कि खल्क ख़ुदा का, मुल्क बादशाह का और हुक्म शहर कोतवाल का ही है! मगर अब विकट प्रश्न है कि विश्व भर के हिन्दुओं की एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी भा.ज.पा. किसकी है ? यह तो ज्ञानगुफा में साधना लीन आर.एस.एस. के त्रिकालदर्शी विशेषग्य ही अब शायद बता सकते हैं कि उनकी रिमोट-चालित भा.ज.पा. परम कट्टरवादी माननीय आडवानी जी की है या फिर हिन्दू-ह्रदय-सम्राट माननीय मोदी जी के 'मोदी गिरोह' वाले खूँखार भेड़ियों की....
यह सवाल क्या इतना मुश्किल है कि इतनी बुरी तरह से फँस गया है? 
अभी फाइनल नतीज़ा तय हो ही नहीं पा रहा है! 
आपकी भविष्यवाणी क्या है? 
परन्तु कृपा करके कम से कम भगवान श्री राम के नाम पर पानी पी-पी कर कोसिए तो मत! 
अरे इहलोक बिगड़ने से तो डरिए ही और परलोक जाने से भी तो डरना ही पड़ेगा न!
है कि नहीं? 
आप सब के उत्तर का बेकरारी से इन्तेज़ार रहेगा मुझे! 
लौटती डाक से उत्तर भेजना मत भूलियेगा!
ढेर सारे प्यार के साथ - आप का ही गिरिजेश

हमारी आवाज़ ग्रुप से -
Nilakshi Singh - एक उलझन है. भारत विश्वगुरु कब था?
Pradeep Kumar - हा हा हा ...बहुत सही गिरिजेश जी
Girijesh Tiwari - मुझे भी समझ में नहीं आता कि अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यों यही बात विश्व-विजय पर आमादा हिन्दू-ह्रदय-सम्राट माननीय मोदी जी के अश्वमेध के घोडे के पीछे दौड़ते पैदल फेचकुर फेंकते रहने पर भी पूरा दम लगा कर लगातार चोकरते रहते हैं कि अखण्ड भारतवर्ष बार-बार खण्डित भले होता रहा है मगर वही विश्वगुरु था, है और रहेगा - चाहे उनके आका अति महाबली अमेरिका की कृपा से खुद विश्व ही रहे या न रहे!
Shail Tyagi Bezaar - sir ab to sukhad din aane wale hain, raam raajya qaayam hone wala hai hai , sab kuchh modimay aur raam'may ho jayega:D
Girijesh Tiwari - अरे भैया, कहीं राम-राज्य लाते-लाते लाने वालों का ही राम-नाम सत्य न हो जाये! इस कलमुँही राजनीति का कभी कोई भरोसा रहा है क्या? इसके खेल में दीखता कुछ है और होता है कुछ और ही! सो असली मामला तो परदे के पीछे बैठे इन सभी कठपुतलियों को नचाने वाली अंगुलियों को घुमाने वाला चुप्पा जोकर ही जानेगा न! हम-आप तो केवल दर्शक ही ठहरे! जो भी दिखाया जायेगा खेल के नाम पर देखना ही पडेगा हम सब को! कल तक मोदी जी राम-राज्य ला रहे थे, आज आडवानी जी राम-राम करते रूठे हैं, कल का खेल कुछ और ही होगा! अब एक ही खिलाड़ी कब तक खेल सकता है? टी.आर.पी. का भी तो सवाल है!
Shail Tyagi Bezaar - mujhe to is 'raam' naam me hee kuchh gadbad maaloom hoti hai
Girijesh Tiwari - गड़बड़ ज़रूर होगी, नहीं तो बहुतै पुरानी कहावत है भैया जिसको हमारे चतुर पुरखे ऐसे ही थोड़े कह गये हैं - "मुँह में राम, बगल में छूड़ी, आयल बघवा ले गयल मूड़ी" !

Friday, 7 June 2013

कहानी : बेघर का घर - गिरिजेश



प्रिय मित्र, यह कहानी एक ऐसे इन्सान की कहानी है, जो दुनिया बदलने के काम में लगता है| उसे अपने अभियान में आगे बढ़ने के लिये अपना घर-परिवार छोड़ कर ‘सड़क का आदमी’ बनना पड़ता है| हर कदम पर उसे तरह-तरह के लोगों से मिलने और जुड़ने का मौका मिलता जाता है| उनमें से भी बहुत-से लोग अलग-अलग कारणों से पीछे छूटते रहते हैं और नये-नये सम्पर्क-सम्बन्ध बनते चले जाते हैं| और इस तरह उसका अभियान नित नूतन ऊर्जा के साथ आगे बढ़ता रहता है|

'व्यक्तित्व विकास परियोजना' आरम्भ करने से वर्षों पहले आजमगढ़ के राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कॉलेज में बच्चों को यह सुनायी गयी थी|.

मेरा यह व्याख्यान इस श्रृंखला का यह सोलहवाँ व्याख्यान है| यह प्रयास युवा-शक्ति की सेवा में विनम्रतापूर्वक समर्पित है|

कृपया इस प्रयास की सार्थकता के बारे में अपनी टिप्पड़ी द्वारा मेरी सहायता करें| 

इसका लिंक यह है - http://youtu.be/YA0OqBgYUYE

ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

Thursday, 6 June 2013

एक क्रान्तिकारी की अन्तिम इच्छा




(कृपया इसे स्वयं भी पढ़ें और अपने मित्रों को भी पढ़वायें)

मेरी अन्तिम इच्छा” 

मैं, महादेव खेतान - उम्र लगभग 76 वर्ष, पुत्र स्व० श्री मदनलाल खेतान, अपने पूरे सामान्य होशो–हवास में अपनी अन्तिम इच्छा निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त कर रहा हूँ|

मैं अपनी किशोरावस्था (सन 1938-39) में ही मार्क्सवादी दर्शन (द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद) के मार्गदर्शन में उस समय देश, नगर तथा शिक्षण-संस्थाओं में चल रहे ब्रिटिश गुलामी के विरोध में ज़ुल्म और शोषण के विरोध में स्वाधीनता संग्राम, क्रान्तिकारी संघर्ष, मज़दूर-आन्दोलन और किसी न किसी संघर्ष से जुड़ गया था| उसी पृष्ठभूमि में मुझे अध्ययन और आन्दोलन को एक साथ समायोजित करते हुए सृष्टि और मानव तथा समाज की विकास-प्रक्रिया को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने, उसको देखने और समझने का अवसर मिला|

मेरी यह पुष्ट धारणा बनी कि आज भी प्रकृति के वैज्ञानिक सिद्धान्तों और मानव-विकास की प्रक्रिया में उसको समझने के प्रयास तथा उससे या उनसे संघर्ष करते हुए उनको अपने लिये अधिक से अधिक उपयोगी बनाने में हज़ारों बरस के मानव प्रयास ही सृष्टि, मानव और समाज का असली और सही इतिहास है| यहाँ मैं मानव के ऊपर किसी दिव्य शक्ति या ईश्वर को नहीं मानता हूँ| यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है, जिसके फलस्वरूप आज के मानव का विकास हमारे सामने है| यह प्रक्रिया आगे भी तेजी से चलती जायेगी, चलती जायेगी| 

अस्तु, मेरी मृत्यु पर ईश्वर और उसके दर्शन पर आधारित कोई भी, किसी भी प्रकार का, किसी भी रूप में, धार्मिक अनुष्ठान, कर्मकाण्ड, पाठ, यज्ञ, ब्राह्मण-भोजन अथवा दान आदि, पिण्डदान तथा पुत्र का केश-दान (सिर मुड़ाना या बाल देना) आदि-आदि कुछ नहीं होगा तथा दुनिया के सब से बड़े झूठ (राम-नाम) को मेरा शव दिखा कर (सत्य) घोषित और प्रचारित करने का भी कोई प्रयास नहीं होगा| मेरे शव को सर्वहारा के लाल झण्डे में लपेट कर “दुनिया के मज़दूरो, एक हो!” “कम्युनिस्ट आन्दोलन तथा पार्टी विजयी हो!” आदि-आदि नारों के साथ मेरे जीवन भर के परिश्रम से विकसित करेन्ट बुक डिपो से उठा कर बड़े चौराहे स्थित मेरे भाई तथा साथी कामरेड रामआसरे की मूर्ति के नीचे ले जाकर मेरे शव को अपने साथी को अन्तिम लाल सलाम करने का अवसर प्रदान करें तथा वहीं पर लखनऊ स्थित संजय गाँधी पो० ग्रे० इन्स्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइन्स के अधिकारियों को बुलाकर मेरा शव उनको दे दें, ताकि न सिर्फ़ ज़रूरतमन्द लोगों को मेरे शरीर के अंगों से पुनर्जीवन मिल सके, बल्कि आने वाली डॉक्टरों की पीढ़ी के अध्ययन को और अधिक से अधिक उपयोगी बनाने में मेरे शरीर का योगदान हो सके|

इसके बाद समय हो और मित्रों की राय पड़े, तो वहीं रामआसरे पार्क में सभा करके अगर मेरे जीवन के प्रेरणादायक हिस्सों के संस्मरण से आगे आने वाली संघर्षशील पीढ़ी को कोई प्रेरणा मिल सके, तो उसका ज़िक्र कर लें| वरना मित्रों की राय से सबके लिये जो सुविधाजनक समय हो उस समय यहीं रामआसरे पार्क में लोगों को बुला कर संघर्षशील नयी पीढ़ी को प्रेरणादायक संस्मरण दे कर ख़त्म कर दें| यही बस मेरी मृत्यु का आखिरी अनुष्ठान होगा| इसके बाद या भविष्य में भी कभी कोई दसवाँ, तेरही, कोई श्राद्ध, कोई पिण्डदान आदि कुछ नहीं होगा और मैं यह ख़ास तौर पर कहना चाहता हूँ कि किसी भी हालत में, किसी भी जगह और किसी भी बहाने से कोई मेरा मृत्युभोज (तेरही) नहीं होने देगा| अपने परिवार के बुज़ुर्गों से मेरा अनुरोध है कि मेरी मृत्यु पर अपने जीवन-दर्शन या आस्थाओं, अन्धविश्वासों और अपने जीवन-मूल्यों को थोपने की कोशिश न करें, मुझ पर बड़ी कृपा होगी| घर पर लौट कर सामान्य जीवन की तरह सामान्य भोजन बने| “चूल्हा न जलने” की परम्परा के नाम पर न मेरी ससुराल, न मेरे पुत्र की ससुराल से और न ही किसी अन्य नातेदार-रिश्तेदार की ससुराल से खाना आयेगा|

उसके दूसरे दिन से बिलकुल सामान्य जीवन और सामान्य दिनचर्या, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो, घर व दूकान की दिनचर्या बिना किसी अनुष्ठान के शुरू हो जाये तथा मेरी मृत्यु पर मेरी यह अन्तिम इच्छा काफ़ी बड़े पैमाने पर छपवा कर न सिर्फ़ नगर में वृहत तरीके से मय अखबारों के व सभी तरह के राजनैतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं को बँटवा दें तथा करेन्ट बुक डिपो व मार्क्सवादी आन्दोलन व साहित्य से सम्बन्धित सभी लोगों को डाक से भेजें, ताकि इससे प्रेरणा लेकर अगर एक प्रतिशत लोगों ने भी इसका अनुसरण करने की कोशिश की, तो मैं अपने जीवन को सफल मानूँगा|

मेरे जीवन में होल-टाइमरी के बाद सन् 1951 से अभी तक जो कुछ भी मैंने बनाया है, वह करेन्ट बुक डिपो है, जो किसी भी तरह से कोई भी व्यापारिक संस्थान नहीं है, बल्कि किसी उद्देश्य विशेष से मिशन के मातहत एक संस्था के रूप में विकसित करने का प्रयत्न किया था| मेरे पास न एक इंच जमीन है और न कोई बैंक-बैलेन्स है| मेरे जीवन का एक ही मिशन रहा है कि देश और विदेशों में तमाम शोषित-उत्पीड़ित जनसमुदाय, जो न सिर्फ़ अपने जीवन के स्तर को सम्मानजनक बनाने के लिये, बल्कि उत्पीड़न और शोषण की शक्तियों के विरोध में उनको नष्ट करने के लिये जीवन-मरण के संघर्ष करते रहे हैं, कर रहे हैं और करते रहेंगे - उनको हर तरह से तन, मन और धन से जो कुछ भी मेरे पास है, उससे मदद करूँ, उनको प्रेरणा दूँ और अपनी यथा-शक्ति दिशा दूँ| इसी उद्देश्य से मैंने करेन्ट बुक डिपो खोला, इसी उद्देश्य के लिये इसे विकसित किया| कहाँ तक मैं सफल हुआ - इसका आकलन तो इन संघर्षों की परिणित ही बतायेगी| जितना, जो कुछ मुझे इस समय आभास है, उससे मुझे कोई असन्तोष नहीं है|

मेरी मृत्यु के बाद मेरा ये जो कुछ भी है, उसके सारे Assets (परिसम्पत्ति) और Liability (उत्तरदायित्व) के साथ इस सबका एकमात्र उत्तराधिकारी मेरा पुत्र अनिल खेतान होगा| मैंने कोशिश की है कि मेरी मृत्यु तक इस दुकान में कोई ऐसी liability नहीं रहे, जिसके लिये मेरे पुत्र अनिल को कोई दिक्कत उठानी पड़े| मेरी यह इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा पुत्र अनिल खेतान भी मेरे जीवन के इस मिशन को, जिसके लिये मैंने करेन्ट बुक डिपो खोली व विकसित की है – उसको अपना सब कुछ निछावर करके भी आगे बढ़ाता रहेगा, उसी तरह से विकसित करता रहेगा और प्रयत्न करेगा कि उसके भी आगे की पीढ़ियाँ यदि इस संस्थान से जुड़ती हैं, तो वे भी इस मिशन को अपनी यथाशक्ति आगे बढ़ाते हुए विकसित करेंगी|

मैं यह आशा करता हूँ कि मेरी ही तरह मेरा पुत्र भी किन्हीं भी विपरीत राजनैतिक परिस्थितयों में डिगेगा नहीं और बड़े साहस व आत्मविश्वास के साथ झेल जायेगा और यह नौबत नहीं आने देगा कि पीढ़ियों के लिये प्रेरणा और दिशा स्रोत करेन्ट बुक डिपो बन्द हो जाये| 

मैं यह चाहूँगा कि जैसे मैंने अपने और अपने पुत्र के जीवन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित करने का प्रयत्न किया और किसी भी धर्म या अन्धविश्वास और कर्मकाण्ड से दूर रखा, उसी प्रकार मेरा पुत्र अपने जीवन को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी ईश्वर व धर्म व उस पर आधारित दर्शन, अन्धविश्वास और कर्मकाण्डों से दूर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित करेगा तथा जीवन को न्यूनतम ज़रूरतों में बाँधेगा| ताकि अपनी फ़िज़ूल की बढ़ी हुई ज़रूरतों को पूरा करने के लिये अपने मूल्यों से समझौता न करना पड़े, क्योंकि वही फिसलन की शुरुआत है, जिसका कोई अन्त नहीं है| दुनिया में रोटी सभी खाते हैं, सोना कोई नहीं खाता है| लेकिन सम्मानजनक रोटी की कमी नहीं है और सोने की कोई सीमा नहीं है| और दुनिया के बड़े से बड़े धर्माचार्य विद्वान और बड़े से बड़े धनवान कोई विद्वान नहीं हैं| उसके लिये कोई बुध्दि की आवश्यकता नहीं है, और मानव की ज़रूरतों को पूरा करने में हज़ारों वर्षों से असमर्थ रहे हैं और आगे भी मानवता को देने के लिये इनके पास कुछ नहीं है|

दुनिया में सारे तनावों की जड़ केवल दो हैं - एक धन और दूसरा धर्म| अगर हम अपने को इससे मुक्त कर लें, तो न सिर्फ़ अपना जीवन बल्कि अपने आने वाली पीढ़ियों का पूरा जीवन तनाव-रहित और सुखी बितायेंगे| इन बातों का अगर थोड़ा भी ख़याल रखा और जीवन को इन पर ढालने की थोड़ी भी कोशिश की तो हमेशा सुखी रहेंगे|

इसकी एक बुनियादी गुर की बात और ध्यान रखें कि आप जो जीवन-मूल्य, जीवन-पद्धति और दर्शन को प्रतिपादित करें और यह आशा करें कि आपकी आने वाली पीढ़ी भी उस पर चले, तो यह सबसे ज़्यादा आवश्यक है कि आपका ख़ुद का आचरण और जीवन आपके द्वारा प्रतिपादित मूल्यों पर आधारित हो, आपका ख़ुद का जीवन एक उदाहरण हो| अन्त में कुछ शब्द करेन्ट बुक डिपो के बारे में कहना चाहूँगा| जैसा कि मैं पहले बता चुका हूँ कि यह एक मिशन विशेष के लिये संस्थापित व संचालित संस्था, जिसमें दिवंगत कामरेड रामआसरे, मेरे सहयोध्दा आनन्द माधव त्रिवेदी, मेरी पत्नी रूप कुमारी खेतान, मेरे पुत्र अनिल खेतान, अरविन्द कुमार और सैकड़ों क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं व प्रिय पाठकों का योगदान रहा है| मैं इन सब का ऋणी हूँ और आशा करता हूँ कि ये सब भविष्य में भी वैसा ही करते रहेंगे| उद्देश्य यह है कि इसके द्वारा प्रकाशित व वितरित साहित्य से देश के हज़ारों पाठकों को मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित व प्रेरित श्रेष्ठ सामग्री उपलब्ध होती रहे| इसके संचालन से सम्बन्धित विस्तृत बातें या तकनीकी मुद्दों का निर्णय उपरोक्त व्यक्ति आपस में विचार–विमर्श के ज़रिये तय करते रहें|
- एम. खेतान
4 अक्टूबर 1999 
(मृत्यु : 6 अक्टूबर, 1999, रात्रि नौ बजे)

Monday, 3 June 2013

सवाल 'कल' का : 'जवाब' आपका !


प्रिय मित्र, कल एक युवक ने मुझसे यह प्रश्न किया. "गुरु जी, दस साल के बाद आन्दोलन की हमारी धारा की क्या तस्वीर होगी?"
प्रश्न मन को विचलित करने वाला था. अपनी तरुणाई से अब तक की दशक-दर-दशक की अपनी और अपने सभी साथी-दोस्तों की सभी की सभी सकारात्मक और नकारात्मक गतिविधियों के सारे ही चित्र तड़ातड़ एक के बाद एक मानस-पटल पर नाच गये. साफ़ दिख गया कि हम सब कितने पानी में थे, हैं और रह पायेंगे. 

तब तक आज सक्रिय 'वरिष्ठ' लोगों की पीढ़ी अपनी क्षमता, अक्षमता और अपने पूर्वाग्रहों के साथ मैदान खाली कर चुकी होगी और आज जो युवा सीखने की प्रक्रिया में हैं, तब उनको ही सिखाने की भूमिका में खेलना पड़ेगा. जो युग-जन्य सवाल हमारे सामने आज हैं और हम अभी तक उनके समाधान नहीं दे सके हैं, उनसे अधिक जटिल सवाल ले कर दस साल बाद के नेतृत्वकारी दिमाग से समाधान पाने की उम्मीद करता हुआ तब का तरुण और किशोर जिज्ञासा व्यक्त करेगा. विश्लेषण की जो क्षमता वे आज हासिल कर पा रहे हैं, तब वही क्षमता ही उनको विश्लेषण करने में मदद करेगी.

हमारे साथ जो हुआ, सो हुआ. हमने जो भी जैसे भी सीखा, सीखा. जो कुछ करते बना, कर सके. मगर अगर नयी पीढ़ी के समाज-वैज्ञानिकों को हर मुमकिन क्षमता से लैस करने का अपनी पूरी कूबत भर प्रयास करने में किसी तरह की कोताही हमारे स्तर से की गयी, तो यह भावी भारत के आन्दोलनों के नेतृत्वकर्ताओं के विकास के साथ तो अक्षम्य नाइन्साफी होगी ही, उनके पीछे खड़े होने वाले अगणित अबोध मस्तिष्कों के साथ भी ऐसा ऐतिहासिक छल होगा, जिसका कोई परिष्कार तब होना मुमकिन नहीं हो सकेगा.

आने वाले कल के इंकलाबियों को तैयार करने के दायित्व का निर्वाह करने में हम सब की और भी अधिक प्रभावी भूमिका बन सके, इसके लिये भी मेरा निवेदन है कि हम सब को किसी भी तरह से परस्पर न्यूनतम एकजुटता का ढाँचा खड़ा करने की पहल जल्दी से जल्दी लेनी ही होगी. मेरी समझ है कि हमारे सामने क्रान्तिकारी, प्रगतिशील, जनपक्षधर मित्रों की एकजुटता ही इतिहास द्वारा हमारे लिये दिया गया आज का सबसे प्रमुख कार्यभार है.
आपका क्या मत है? 
- आपका ही गिरिजेश

शब्द-चित्र : मैं छोटू हूँ - गिरिजेश



मैं छोटू हूँ. 
मेरा चाहे जो भी नाम हो, मगर मुझे सभी छोटू ही कहते हैं.
सर्दी, गर्मी, बरसात - मेरी ड्यूटी डेली चलती है. 
कभी कोई छुट्टी नहीं. 
तब तक कोई छुट्टी नहीं, जब तक बेतहाशा बीमार ना पड़ जाऊँ.
मुझे आप हर शहर, हर कसबे, हर चट्टी-चौराहे की चाय की दूकान पर सुबह से शाम तक लगातार खटते देख सकते हैं. 
मेरा काम हर सुबह दूकान की भट्टी सुलगाने से शुरू होता है और सारे बर्तनों को मांजने और झाड़ू लगाने के बाद रात में खत्म होता है. 
मैं लगभग दस साल की उम्र में नौकरी करने के लिये अपना घर-बार, माँ-बाप, भाई-बहन - सबको छोड़ कर दुकान पर आ जाता हूँ. 
दिन के खाने की जगह मुझे दूकान में बेचने के लिये बनने वाले समोसे और ब्रेड-पकौड़े से काम चलाना पड़ता है. 
सबकी तरह खाना तो मुझे रात में ही मिल पाता है.
मैं बड़ा होने तक लगभग दस साल तक 'सेठ' के यहाँ नौकरी करता हूँ और जब खटते-खटते आख़िरकार किसी तरह बड़ा हो जाता हूँ, तो सड़क के किनारे किसी दूसरे नुक्कड़ पर अपनी खुद की गुमटी जुटाता हूँ. उसके सामने एक छोटा-सा छप्पर डालता हूँ. एक बेंच बनवाता हूँ. और इस तरह मैं भी अपनी खुद की चाय की दूकान खोल लेता हूँ और फिर मेरी भी दूकान पर एक नया छोटू खटने के लिये आ ही जाता है. 
तब जा कर मैं भी अपनी शादी करता हूँ और बच्चे पैदा करता हूँ. 
मैं खुद तो पढ़ नहीं सका था. 
आज भी मैं केवल हिसाब-किताब कर ले जाता हूँ. 
मगर मैं अपने बेटे का नाम पड़ोस के नर्सरी स्कूल में ही लिखवाता हूँ. 
अब हर दिन मैं अपने छोटू को खटा कर हर शाम अपने कमरे पर अपने बाल-बच्चों के साथ खाने-सोने जाने लगता हूँ. 
यह कहानी ऐसे ही चलती जा रही है. 
क्या आप इसमें कुछ फेर-बदल करने के चक्कर में हैं? 
नहीं न! 
करियेगा भी मत!
क्योंकि अगर कुछ हुआ, तो फिर आपको डेली चाय कौन पिलाएगा?
....सर जी....!!!

आस्तिक और नास्तिक - गिरिजेश


प्रश्न:- आस्तिक और नास्तिक का मतलब समझायें|

उत्तर:- जो ख़ुदा के होने और उनके पैगम्बर हज़रत मुहम्मद की चौदह सौ वर्षों पुरानी बातों पर आँख, कान, जुबान और दिमाग पूरी तरह बन्द करके मुसल्सल यकीन करे, वह आस्तिक (मुसलमान) और जो न करे, वह नास्तिक (काफ़िर) कहा जाता है. हिन्दू, ईसाई और दूसरे धर्मों और सम्प्रदायों को मानने वाले लोगों ने भी ऐसी ही मान्यता बना रखी है. 

आस्तिकता के समर्थक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के भी आस्तिक होने का तर्क देते है. ऐसे में यह समझने की ज़रूरत है कि नास्तिक होने के लिए वैज्ञानिक भर होना काफ़ी नहीं है. उसके लिये तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी होना चाहिए. 

और दार्शनिक तो केवल तीन धाराओं में ही हैं - नास्तिक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक. मेरी समझ से सही दर्शन तो वही है, जो जीवन और जगत का केवल विश्लेषण ही करके न रह जाये, बल्कि इसकी सभी समस्याओं का समाधान भी पेश करे और वह भी असली समाधान, न कि काल्पनिक. 

और यह समाधान केवल वैज्ञानिक (द्वन्द्वात्मक ऐतिहासिक) भौतिकवादी दर्शन के पास है. इसके ही अनुयायियों ने ही बार-बार धरती को आस्तिकों के काल्पनिक स्वर्ग से भी अधिक खूबसूरत बनाने के लिये एक से बढ़ कर एक मॉडल बनाने के लिए पूरी कशिश के साथ खूब-खूब सफल/विफल जद्दोजहद की है. बाकी दर्शनों के अनुयायियों ने तो केवल धरती के असली नरक को ही यथावत स्वीकारने या धिक्कारने और नकारने तक ही खुद को समेट लिया है.

एक व्यंग्य : सवाल सिगरेट का - गिरिजेश


मेरे प्यारे दोस्त, ख़ुदा कसम, बेशक ख़ुद ख़ुदा ने ही अपने पाक़ हाथों से इस फानी दुनिया को बनाते समय इन्सानियत की ख़िदमत के लिये जो सबसे शानदार तोहफ़ा बनाया था, उसका नाम तम्बाकू ही है. 

बकौल रसूल हमज़ातोव के खुदा ने भी दुनिया बनाने के बाद तम्बाकूनोशी कर के ही सुकून महसूस किया था और यही वजह है कि ख़ुदा के नेक बन्दों को भी जल्दी से जल्दी ख़ुदा का 'प्यारा' होने के लिये इसी शगल का सहारा लेना ही पड़ता है. 

समूची दुनिया-जहान में यह इकलौती ऐसी नायाब शै है, जो देखते-देखते हमारे शौक से हमारी आदत तक जा पहुँचती है. इसका सोंधा-सोंधा धुँवा हमको इस कदर बेतहाशा पसन्द आता है कि नाक और मुँह के रास्ते फेफड़ों और आमाशय तक ही नहीं जाता, हौले-हौले दिल-ओ-दिमाग तक चलता चला जाता है. तब फिर तरन्नुम का आलम यह होता है कि बेहद मज़ेदार सुरूर बरपा हो जाता है हमारे ऊपर.

और फिर बार-बार और अन्दर और और भी अन्दर तक जा पहुँचने वाला और ख़रामा-ख़रामा सुकून देने और चुपके-चुपके, चोरी-चोरी पहले फ़कत सेहत और फिर आख़िरकार ज़िन्दगी भी चुरा लेने लेने वाला यह मर्ज़ राज कपूर की 'तीसरी कसम' की तरह ही लज्ज़तदार और मज़ेदार है. 

कमबख्त किसी तरह छूटता ही नहीं. सिगरेट छोड़ने के वायदे हैं कि बार-बार इस मासूम दिल की तरह टूटते रहते हैं. अब ऐसे में आप ही बताइए कि भला किया भी क्या जाये और कैसे किया जाये ! ले-दे कर यह मामला दिल का है और दिल है कि जानता तो है मगर मानता ही नहीं....

एक सिगरेट ही तो है, जो पढ़ते समय-लिखते समय, सोचते समय-बोलते समय, अकेले में-भीड़ में, गम में-ख़ुशी में, दिन की शुरुआत करते समय-दिन का अंत करते समय, काम शुरू करने के पहले-काम ख़त्म करने के बाद, दोस्तों के मिलने पर-दोस्तों के बिछड़ने-पिछड़ने पर, बहसों में शानदार तर्क जुटाने में-धारदार तर्कों का पूरी आन-बान-शान के साथ मुकाबला करने में, बिस्तर से सफ़र तक हर जगह हमेशा ही साथ देती रही है. 

यूँ ही तो नहीं कहा गया है कि 'हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाते चले गये...'. और फिर इस नामाकूल ज़िन्दगी का क्या भरोसा! 'यह जान तो आनी-जानी है...' ख़ुदा की कसम दोस्त, यकीन मानिए कि चाहे यह ज़िन्दगी रहे, चाहे जाये. मगर 'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, छोड़ेंगे जग मगर तेरा साथ न छोड़ेंगे' वाला सिगरेट से तह-ए-दिल से किया जाने वाला हमारा परम पवित्र वायदा किसी भी कीमत पर कभी भी नहीं ही टूटने वाला है. 

इस बेदर्द ज़ालिम दुनिया में जलती सिगरेट के आख़िरी कश से अधिक लज़ीज़ और सुकूनदेह और कुछ भी है क्या भला? ज़िन्दगी की आख़िरी साँस तक साथ निभाने वाले ऐसे वफ़ादार साथी को भला छोड़ा भी कैसे जा सकता है! 

और फिर 'तम्बाकूनोशी' जैसे अहम और फैसलाकून मामले में फ़कत खुदा पर ख़ालिस यकीन के अलावा मेरे जैसे घोषित नास्तिक के पास क्या विकल्प है! जब मैं ही नहीं मेरे बहुत-से प्यारे दोस्त इस बेतहाशा बदनाम शगल की गिरफ़्त में हैं, तो ऐसे में महज़ "ख़ुदा-ख़ुदा" करने के अलावा मैं भला और क्या कर सकता हूँ! 

इस वजह से ही मेरे पास उन सब की ओर से ख़ुदा के नाम पर पैरवी करने के अलावा और कोई ज़रिया बचा ही नहीं है. और मेरा तो ख़याल यही है कि इस नामाकूल पैरवी में दूसरे किसी की औकात ही क्या है! ख़ुद ख़ुदा भी इस मामले में न तो मेरी कोई मदद कर सकता है और न ही मेरे दोस्तों की किसी भी तरह से मदद करना उसे पसन्द आयेगा... 

मगर कत्तई ज़रूरी नहीं है कि आप भी इस बात से सहमत हों. आपकी मर्ज़ी जो चाहें, पूरी आज़ादी से करें.

ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

Har Fikr Ko Dhue Mein... Dev Anand, an inspirationwww.youtube.com
https://www.youtube.com/watch?v=cAh67smrTws