Monday 10 September 2012

"वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराज सहोदरः!" - गिरिजेश



चिकित्सक का मरीज़ के नाम खुला पत्र
प्यारे मरीज़, नमस्ते!
और आपकी तबीयत कैसी है? बहुत दिनों से आपसे अपनी बात कहने की तमन्ना थी, मगर हिम्मत जवाब दे जाया करती थी। आप पूछेंगे - भला क्यों? क्योंकि मैंने ही आपकी हाल-चाल पूछने का ठेका ले रखा है, न! क्या कभी आपने भी ज़रूरत महसूस की कि डाक्टर साहब आपकी क्या हाल-चाल है? एक हाथ से ताली अगर बजती रही है, तो इसके पीछे ज़रूर एक खुला रहस्य है। भला हो भारत रक्षा दल का कि अपने सौजन्य से उन्होंने देर से ही सही, मुझे भी अपने हिस्से का सच कह लेने का अवसर दिया, ताकि मेरे मन का गुबार भी निकल जाये और मेरा भी जी हल्का हो सके। 
आइए, अपनी हाल-चाल अब आपको सुना ही दें! आप की दुआ से बचपन में मास्टर साहब कहा करते थे कि तुम ही तो हो, जो मेरा नाम रोशन करोगे। देर रात तक ओवरटाइम खट कर घर लौटने वाला मेरा बेचारा बाप मुझे अपने बुढ़ापे की लाठी बताता था। खूब मशक्कत की थी मैंने भी पढ़ने-लिखने में और जिस दिन पी.एम.टी. पास किया, मेरी निरक्षर माँ ने कथा कहायी थी। धीरे-धीरे गुज़रते हुए वक्त के साथ अपने परिवार का सबसे बड़ा खर्चा बन कर मेरी पढ़ाई बढ़ती चली गयी और एक दिन वह आया, जब मैंने खुद को इस फैसले के कगार पर खड़ा पाया कि नौकरी करूँ या नहीं! मैं कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था, सो नतीजतन अपने सीनियरों का दरवाज़ा खटखटाया। उनकी मानी और सरकारी नौकरी शुरू कर दी। ‘‘आम के आम, गुठलियों के दाम’’ - बचपन में रटे गये इस मुहावरे का असली मतलब जब समझ में आया, तब तक मेरी कोरी भावुकता, खोखला आदर्शवाद, नकली नैतिकता, दिखावटी ईमानदारी, ओढ़ी हुई कर्तव्यनिष्ठा तथा तथाकथित मानवीय संवेदना - सब गधे के सींग की तरह गायब हो चुकी थी। ज़माने की रफ़्तार को देखते हुए मैंने भी खुद को दुनियादार, मतलबी, मक्कार, सुविधाभोगी, दोमुहाँ और कामचोर बना लिया था। अब अपने सीनियरों की देखा-देखी मैं भी नौकरी करता तो हूँ, मगर केवल कागज़ पर। हकीकत में तो मैं महज़ आराम ही फ़रमाता हूँ। अपने आदर्श पुरखों के इस सूत्र को मैं अच्छी तरह रट चुका हूँ और अपने जीवन में इसी को पूरी तरह से लागू कर  रहा हूँ - ‘‘किस-किस को याद कीजिए, किस-किस को रोइए; आराम बड़ी चीज़ है, सिर ढक के सोइए।’’
वेतन तो दहेज की तरह पक्की गारण्टी के साथ मेरे खाते में पहुँच ही जाता है। मगर मेरा वेतन से क्या होने का? वह तो किसी भी तरह से मेरी ऐयाशियों, मेरी इकलौती बीवी के नखरों को पूरा कर पाने के लिए नाकाफ़ी है। अकेले वेतन के सहारे मैं न तो अपने कुत्ते को दूध ही पिला पाऊँगा, न अपनी नयी-नवेली टाटा-इण्डिका को तेल और ड्राइवर को तनख्वाह ही दे पाऊँगा। और आप तो जानते ही हैं कि आदमी और उसके शरीर के बारे में पूरी-पक्की जानकारी है मुझे। बाद मरने के हाथ कुछ भी नहीं आने का। यही तो बात है कि जीते-जी मैं धरती के स्वर्ग का सारा सुख भोग लेना चाहता हूँ। ताकि मरते वक्त अफसोस न रहे। क्या मेरी यह सोच ग़लत है? मेरी चाहत है कि मुझे अपने कब्ज़े में हर वह चीज़ चाहिए, जो किसी भी धन-पशु के स्टेटस-सिम्बल के लिए ज़रूरी है। और बेचारी सरकार जब मुझे सब कुछ दे ही नहीं सकती, तो इधर-उधर हाथ-पैर मारना आखिरकार मेरी मजबूरी बन जाती है कि नहीं? भला आप ही बताइए - मैं किसान तो हूँ नहीं, और न मैं दूकानदार ही हूँ। मेरी तो खेती-बाड़ी आप ही की बीमारी है। मुझे तो बस आपकी मजबूरी का ही एकमात्र सहारा है। खुदा खैर करे! आप इसी तरह बीमार बने रहें और मैं चैतरफा चाँदी काटता रहूँ। आप पूछेंगे - अरे डाॅक्टर साहब, यह चैतरफा चाँदी काटने का क्या चक्कर है? पूछिए! पूछिए! मगर घबड़ा क्यों रहे हैं? भाई, जरा धीरज रखिए, न! धीरे-धीरे कर के आपको हर चक्कर के बारे में इतनी अच्छी तरह समझा दूँगा कि आप चक्कर पर चक्कर खाते घनचक्कर की तरह चैतरफा भन्नाते फिरेंगे। इतना तो आप भी जानते ही हैं कि ‘‘बन का गीदड़, जायेगा किधर?’’ भइया मेरे, अगर पैदा होने की गलती कर ही चुके हैं, तो कभी न कभी आपको भी बीमार तो पड़ना ही पड़ेगा, और एक बार बीमार पड़े नहीं कि मेरे शिकन्जे में जकड़े जाने से आपको आपका तथाकथित खुदा भी नहीं बचा पायेगा। और फिर कौन नहीं चाहता देर-सबेर, रात-बिरात, काँखते-कराहते, उठा-पठा कर ले आये जाने पर अपनी जान किसी भी कीमत पर बचा ले जाना? ऐसे में जैसे बहेलिया चिड़ियों को फँसाने के लिये पेड़ के नीचे चारा बिछा कर, जाल फैला कर खुद दुबक जाता है, वैसे ही मैं भी अपनी सरकारी कुर्सी छोड़ कर अपने वार्ड-ब्वाय, कम्पाउण्डर, नर्सों व दाइयों को इशारा कर के अपने आवास में घात लगाये आप ही का इन्तेज़ार करता रहता हूँ।
अचानक काल-बेल घनघनाती है और मेरा शातिर दिमाग मेरे मक्कार चेहरे पर  कुटिल मुस्कान उभर आने से रोक नहीं पाता है और आपके अन्दर घुसते ही मेरा रटा-रटाया एक अदद सवाल आपकी ओर आटोमैटिक तरीके से उछाल दिया जाता है - ‘‘आइए, आइए, अब कैसी तबीयत है आपकी?’’ मानों मैं आपकी दुर्गति से नावाकिफ़ हूँ! और फिर आधे-अधूरे मन से आपकी दर्द भरी दास्तान को गम्भीर भाव चेहरे पर उगा कर सुनने की मेरी मजबूरी मेरे आराम में खलल डाल कर मेरे चन्द मिनट चुराती तो है, मगर आपकी जेब से निकला पचास रुपये का नोट मेरी जेब में आ गिरता है और मुझे मेरे वक्त की मुकम्मिल कीमत हासिल हो जाती है। तब जा कर कहीं अर्जुन के गाण्डीव की तरह मैं अपना पैड खिसकाता हूँ और उस पर अंग्रेज़ी में ही सब कुछ लिखता चला जाता हूँ। ताकि आपके खून-पसीने की गाढ़ी कमाई हड़पने की मेरी बेशर्म साज़िश की जानकारी कम से कम आपको तो न ही हो पाये। अपनी कलम से घसीटे चन्द शब्दों के सिवाय मैं आपको देता कुछ भी नहीं। केवल खाली-पीली सलाह दे देता हूँ - चाहे उसे लागू करना आपके बूते में हो भी या नहीं - इससे मुझे कुछ भी लेना-लादना है ही नहीं। मेरी तो एक ही मन्शा रहती है और वह है आपको अच्छी तरह से अपने लासे में लथेड़ देने की। मेरा परचा आपको तरह-तरह की जाँच करने वालों की दूकानों के चक्कर लगवाता है और ज़रूरी हो या गै़र-ज़रूरी - कितनी जाँच करवानी है - इसका भी फैसला मैं ही कर सकता हूँ, केवल मैं। हर जाँच पर मेरा कमीशन सूरज ढलते ही बन्द लिफाफे में मेरे पास घर बैठे ही पहुँच जाता है। और जनाब, जितनी अधिक जाँच, उतना मोटा लिफाफा! यही असली वजह है कि मैं आपकी तरह-तरह की अधिक से अधिक जाँचें करवा डालने पर आमादा हो जाता हूँ। तो यह रहा आपकी मजबूरी और मेरी कमाई का एक और फन्दा।
अब आइए, अपनी दवाई के कच्चे चिट्ठे के बारे में भी सच्चाई जान ही लीजिए। यकीन कीजिए, बहुत दिनों के बाद आज सच बोलने पर आमादा हूँ। अब यकीन करना - न करना आप पर है। दरअसल, हकीकत तो यह है कि अधिकतर मर्ज़ कोई दवा न लेने पर भी शरीर की बनावट के चलते अपने-आप ठीक ही हो जाते हैं। मगर वहम का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं रहा है। और फिर आज तो प्रचार का ज़माना ही है। तो फिर आप ही प्रचार के जंजाल में न फँसें - यह कैसे मुमकिन है? क्या खूब प्रचार है! ‘‘अपना इलाज खुद मत करें! हर हाल में अपने डाक्टर की सलाह मानें!’’ चाहे आपकी ज़ेब में फूटी कौड़ी भी हो या न हो। मगर मैं तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की महँगी से महँगी दवाएँ ही आपके हलक से नीचे उतारने की तिकड़म भिड़ाने की साज़िश में शरीक हूँ ही। आख़िर क्यों न होऊँ? मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव लोग अपनी-अपनी कम्पनी की गिफ़्ट, डील और कमीशन मुझ तक पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी का ईमानदारी और निष्ठा से संकल्प ले चुके हैं। अब अगर इतने फन्दों के बावज़ूद भी आप ज़िन्दा बच जाते हैं, तो आपकी किस्मत! वरना अपने-अपने नर्सिंग-होम खोल कर बैठे हुए एक से एक घाघ मगरमच्छों के चंगुल में आपको फँसना ही पड़ेगा। चाहे आप अपनी औकात के चलते ममता नर्सिंग-होम में पहुँच जायें, जहाँ पीले तिरपाल की सुहानी छाया में आपकी चीड़-फाड़ पूरी कर दी जाती है, मगर दलाल को हर केस पर नकद पन्द्रह सौ रुपये तुरन्त भुगतान कर दिये जाते हैं। या फिर आपकी दौलत के नशे में धुत आपके तीमारदार आपको हेरिटेज के हवाले कर दें, जहाँ से आपकी लाश भी बिल पूरा चुका देने के बाद ही आपके वारिसों के कब्ज़े में आने दी जाती है। भइया मेरे, चैंकिए मत! हाँ, हेरिटेज वाला भी अपना ब्रीफ़केस लिये इसी सोफ़े पर आ कर बैठता है, जिस पर इस वक्त आपकी तशरीफ़ रखी हुई है। और एक कप चाय के बदले ‘थैंक यू सर!’ के साथ मेरे हिस्से का कमीशन सादर मुझ तक पहुँचाता रहता है।
अब आप ही बताइए, आप ने तो कभी मेरी हाल-चाल जानने की चर्चा भी करने की ज़रूरत नहीं महसूस की, तो भला क्या मेरा ही यह कर्तव्य नहीं बन जाता कि आप को अपनी राम-कहानी का राज़दार बना लूँ। और फिर आप मेरा बिगाड़ भी क्या सकते हैं? आपकी औकात के बारे में मुझे रंचमात्र भी भ्रम नहीं है। ‘‘भेड़ जहाँ भी जायेगी, मूँड़ी जायेगी’’ और बकरी का बेटा हर बार अपने बेटे को रिप्लेस करके बकरीद की दावत के लिए पाक परवरदिगार की राह में सबाब के नाम पर हमेशा से हलाल किया जाता रहा है और हमेशा हलाल किया जायेगा ही। चाँदी के जूते को अपनी गंजी चाँद पर तड़ातड़ ठकठकाते रहने का पवित्र संकल्प जब मैंने ले ही लिया है, तो मुझे आप की ज़िन्दगी के साथ, आप की सेहत के साथ और दो टूक कह दूँ तो आप की ज़ेब के साथ मज़ाक करने से भला कौन रोक सकता है? समझ गये, बच्चू! अभी तो आप चैतरफा मेरी आक्टोपसी भुजाओं में जकड़े हैं। बराय-मेहरबानी, छटपटाइए मत! अमा यार, मज़ा किरकिरा हो जायेगा! दुआ कीजिए कि आप यूँ ही बार-बार लगातार बीमार पड़ते रहें और मैं दिन दूना-रात चैगुना मालामाल होता चला जाऊँ। गिद्ध वहीं चक्कर मारते हैं, जहाँ डाँगर बस्साते हैं। खूबसूरत कुकुरमुत्ता बरसाती कूड़े की सड़ाँध पर ही पनपता है। और मेरी सुख-सुविधा, ठाट-बाट, कोठी-कटरा, चमक-दमक, शान-शौकत, कार-ड्राइवर और पियक्कड़ी में धुत दावतों के मालेगनीमत का असली राज़ और इकलौता ज़रिया है आपकी अपनी बीमारी। कृपया बीमारी से बचने की ज़ुर्रत कभी कीजिएगा मत। अगर अपना नहीं, तो कम से कम मेरी ‘हाल-चाल’ का ही सही, ख़याल रखियेगा।
एकमात्र आप ही का 
अशुभचिंतक
डाक्टर मालामाल
सरकारी अस्पताल
आज़मगढ़

मरीज का चिकित्सक के नाम खुला पत्र     

प्रिय चिकित्सक,
आप चिकित्सक हैं। मानवता की वेदना का निवारण करना, मनुष्य-मात्र को स्वस्थ एवं सक्रिय बनाये रखना तथा मृत्यु से जूझते रोगी को दूसरा जीवन देना आपके व्यवसाय की विलक्षणता है। यही वह विलक्षणता है, जिसने आपको धरती का भगवान बना दिया। आप धरती के भगवान हैं -  THE SECOND GOD. आपकी अपनी गरिमा है, आपकी अपनी नैतिकता है और बीमारी तथा मृत्यु के विरुद्ध युद्ध में आपके अपने गम्भीर उत्तरदायित्व का बोझ रात-दिन आपके कन्धों पर बना रहता है। अपने कर्तव्य का निर्वाह करने की प्रक्रिया में आपको जहाँ अपने विषय की सूक्ष्म विश्लेषण जनित विविधताओं में डूबना-उतराना पड़ता है, वहीं रोगी द्वारा अपना जीवन आपके हाथों में सौंप देने की मजबूरी तथा विशेषज्ञ होने के बोध से आपका प्रयास और भी बोझिल तथा सारवान बन बैठता है। आपकी भूमिका विलक्षण है। मानवता आपके प्रति कृतज्ञ है।
भले आदमी! लोग भले ही आपको धरती का भगवान कह कर सम्मान देते रहे हैं, परन्तु हैं तो आप भी मनुष्य ही और मनुष्य-मात्र की सहज वृत्तियाँ आपके भी मन-मस्तिष्क में अपना खेल खेलती रहती हैं। आज लोभ की प्रवृत्ति के चलते चिकित्सा का पवित्र व्यवसाय कलुषित हो रहा है। संग्रह की आपाधापी आपके विवेक को कलुषित कर रही है। सम्पत्तिशाली वर्गों द्वारा परिचालित आदमी द्वारा आदमी के शोषण पर टिकी आज की व्यवस्था आपके आचरण को भी कलंकित कर रही है। इस व्यवस्था का तर्क है - अधिकतम शोषण, अधिकतम लूट, अधिकतम मुनाफा। यह जघन्य लोलुपता आपको भी लुटेरी जोंकों की कतार में पहुँचा चुकी है। जहाँ जन-सामान्य भीषण महँगाई और दारुण विपन्नता की दोहरी चक्की में पिस रहा है, वहीं आप त्रस्त, बेबस, हाहाकार करती मानवता की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने के चक्कर में अपने दायित्व का निर्वाह करने में चूक कर बैठते हैं।
MEDICAL ETHICS के विपरीत आप फ़र्ज़ी जाँच कराते हैं। पैथोलाजिकल ढाँचा अयोग्य, अक्षम तथा गलत रिपोर्ट देने वाले सहायकों की दुनिया बन चुका है। इस सच को आप भी बखूबी जानते तो हैं ही। मगर हाय रे लालच! अपने कमीशन के मोटे लिफ़ाफ़े की प्रतीक्षा बार-बार आवश्यकता न होने पर भी ज़बरदस्ती जाँच लिखने के लिये आपकी कलम को कुरेदती है। चिकित्सा-जगत को अपमानित करने वाला एक पक्ष और भी है और वह है आपके द्वारा जारी किये जाने वाले प्रमाण-पत्रों की अविश्वसनीयता। चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र को चाटुकारिता अथवा खजूर-छाप के सहारे हासिल कर लेना आज आम बात बन चुकी है। और तो और नकली दवाओं का व्यापार आपके मरीज की जान की कीमत पर होता है। फ़र्ज़ी कम्पनियाँ अधिक कमीशन देकर अपनी नकली दवाएँ आपसे ही लिखवाती हैं।
बताइए, क्या भगवान को ऐसा ही करना चाहिए? नहीं न! तो कृपया अपने विवेक के अनुरूप उचित व्यावसायिक दृष्टि और सूझ-बूझ से अपनी आजीविका जुटायें। आत्म-मंथन करें तथा लोभ की प्रवृत्ति के विरुद्ध जूझते हुए सेवा की भावना के अनुरूप आचरण करें। कमीशनखोरी से बचें। किसी भी परिस्थिति में अपने हस्ताक्षर से जारी प्रमाण-पत्र को विश्वसनीय बनाये रखने के लिये कटिबद्ध रहें। किसी को भी नकली प्रमाण-पत्र न दें। अपनी चादर पर दाग न लगने दें। जन-सामान्य की संवेदना को सम्मान दें। व्यवस्था रूपी राहु मानवता रूपी चन्द्रमा को आज भले ही निगल रहा है, परन्तु इतिहास गवाह है कि पचा नहीं पायेगा। इस संघर्ष में कतिपय विवेकवान लोग अपनी ईमानदारी के बावजूद भयग्रस्त हैं और तटस्थ रहना चाहते हैं, जबकि अधिकतर दूसरे लोग उनकी चुप्पी के षडयन्त्र का शिकार हो कर उसी रास्ते पर चलते जा रहे हैं। आप पर प्रहार करने वाले गुण्डे, माफिया, छोटे-बडे़ नेता और अधिकारी संख्या में, मनोबल में और शक्ति में कमजोर तथा बौने हैं। टकराव की परिस्थिति में समूचा जन-मानस आपके साथ होगा। अपनी रक्षा खुद आप ही को करनी है और सबसे प्रभावशाली शस्त्र हैं - सच्चाई और ईमानदारी। अन्तिम विजय सत्य की ही होती है।
    समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

                             - आपका बेचारा मरीज

1 comment:

  1. mahoday shri,
    apka bahut dhanyawad karta hun, isprakar ke katakshpurn lekh ke liye. main ek voiceover artist hun. apki bina anumati ke maine is patrako apni awaz mein record kiya hain. apko yadi koi appatti naa ho to main ise youtube pe apke naam ke sath prastut karna chahta hu, krupiya uttar de
    dhanyawad

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