Tuesday, 25 November 2014

__"रहने दो, रँगें सियारो ! रहने दो..."- अमरनाथ 'मधुर'__




बहुत खूब मित्र 'मधुर', इसी साफ़गोई का मैं कायल हूँ.

"लोगों को शायद ये पसंद नहीं है कि कोई खाते कमाते सामाजिक कार्यों में भागीदारी करे .वो चाहते हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता को तो भूखे ही मरना चाहिए. बहुत सारे लोग भूखे मर गए, बीमारी में तड़फ तड़फ कर मर गए और बहुत सारे आज भी परेशान हाल हैं उन्हें नोबुल प्राइज तो दूर ठीक से कहीं से कोई इमदाद भी नहीं मिली है. जो कुछ सौ पचास रूपये की मदद कभी कभाक कुछ लोग कर देते हैं वो उसे एहसान समझते हैं जहां हॉल टाइमर को कुछ देते हैं वो भीख की तरह दिया जाता है और काम पूरे अधिकार से लिया जाता है .ऐसे बदल जाएगा समाज ? ऐसे हो जायेगी क्रान्ति ? रहने दो रँगें सियारों रहने दो ."

अमरनाथ 'मधुर' - "मान्यवर मेरी छोटी सी बात को इतने बड़े विचारकों के वक्तव्य के साथ क्यों नत्थी कर दिया है ? मैंने तो इनमें से किसी को भी नहीं पढ़ा है. लेकिन दो प्रश्न जरूर पूछना चाहूँगा कि यदि इनमें से किसी को या अन्य किसी भी सामाजिक कार्य करने वाले को नोबुल पुरस्कार मिलता तो क्या ये सवाल नहीं पूछे जाते ? ध्यान रहे कि लोगों ने मदर टेरेसा पर भी सवाल किये थे .
दूसरा सवाल जब आप कहते हैं कि 'देश ही नहीं दुनिया भर के 'कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों' के बीच सुर्खियों में रहने वाले सत्यार्थी आज अपने जुगाड़ की बदौलत 'नोबल शांति पुरस्कार' के लिए नामित हो गये हैं.'

लेकिन सब लोग तो यही पूछ रहे हैं कि 'कैलाश सत्यार्थी कौन है ?' अगर ये इतने ही 'कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों' के बीच सुर्खियों में रहने वाले थे तो तमाम टी वी चैनल इनके बारे में पहले से कुछ न कुछ प्रचारित प्रसारित करते रहते जबकि सच यही है कि उनके काम को किसी न्यूज चैनल ने पहले नहीं दिखाया है .

कहना तो नहीं चाहता हूँ लेकिन कह रहा हूँ कि मैं थोड़ा सा इस आंदोलन से पूर्व परिचित हूँ . मेरठ में साथी स्टालिन और साथी प्रभातराय ने इस आंदोलन में बहुत काम किया है. उसका कितना आम जनता को फायदा हुआ और कितना आंदोलन से जुड़े लोगों को इस विषय पर कुछ कहना ठीक नहीं होगा . मैं इतना जरूर कहूँगा कि इस आंदोलन में काम करने से पहले भी वो खा कमा रहे थे और आज भी खा कमा रहे हैं .

लेकिन लोगों को शायद ये पसंद नहीं है कि कोई खाते कमाते सामाजिक कार्यों में भागीदारी करे .वो चाहते हैं कि सामाजिक कार्यकर्ता को तो भूखे ही मरना चाहिए. बहुत सारे लोग भूखे मर गए, बीमारी में तड़फ तड़फ कर मर गए और बहुत सारे आज भी परेशान हाल हैं उन्हें नोबुल प्राइज तो दूर ठीक से कहीं से कोई इमदाद भी नहीं मिली है.

जो कुछ सौ पचास रूपये की मदद कभी कभाक कुछ लोग कर देते हैं वो उसे एहसान समझते हैं
जहां हॉल टाइमर को कुछ देते हैं वो भीख की तरह दिया जाता है और काम पूरे अधिकार से लिया जाता है .
ऐसे बदल जाएगा समाज ?
ऐसे हो जायेगी क्रान्ति ?
रहने दो रँगें सियारों रहने दो ."

___होश गुम होने का सवाल___


Manu Bhandari — "सर, इन्सान का होश कब गुम होता है और क्या इन्सान ठीक हो सकता है ?"(sir insan k hosh kb gum hote h or kya insan thik ho skta h)
उत्तर : — बेटी, तुम्हारा प्रश्न बारीक है.
मेरी समझ है कि किसी भी इन्सान का दम्भ बढ़ते जाने से उसका होश गुम हो जाता है. यह दम्भ अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग कारणों से बढ़ सकता है. किसी भी मामले में ख़ुद को वी.आई.पी. समझने के भ्रम से व्यक्ति के अहंकार को खुराक मिलती है.

अहंकारी व्यक्ति हरदम 'मैं-मैं' करता रहता है. वह अपने आस-पास के हर व्यक्ति को तरह-तरह से हमेशा तकलीफ़ देता रहता है. कभी अपने बड़बोलेपन से तो कभी अपनी कुटिल विनम्रता से वह लोगों पर अपना सिक्का जमाने की सफल-विफल कोशिश करता रहता है. लोग सहजतापूर्वक उसे एक सीमा तक सहन करते हैं. मगर जब लोगों की सहन-शक्ति जवाब दे जाती है, तो वे प्रतिक्रिया करते हैं. लोगों की प्रतिक्रिया उसके अत्याचार के बराबर और विपरीत ही नहीं होती, बल्कि उससे बहुत अधिक भीषण होती है.

और फिर जब ऊँट को पहाड़ दिख जाता है यानि कि जब अपने से अधिक समर्थ व्यक्ति से उसका साबका पड़ जाता है, तो या फिर उसे अर्श से फर्श पर गिरा दिया जाता है अर्थात् उसकी सामर्थ्य का स्रोत बन्द कर दिया जाता है, तो उसका होश ठिकाने आ जाता है. कई लोगों को ठोकर लगने से उनकी अक्ल बढ़ती जाती है. मगर कई लोग ऐसे भी होते हैं कि ठोकर-दर-ठोकर खा कर भी सम्भल नहीं पाते, उलटे वे अपने सर्वनाश तक अपने दम्भ के भ्रम के शिकार बने रहते हैं.

कहा गया है कि चूक करना मानवीय क्षमता के विकास के लिये आवश्यक है. हर व्यक्ति चूक करता है. मगर कुछ ही दिनों पहले मुझे Amit Singh ने एक बात बताया —
"अगर आप गलती करते हैं, तो मुझे खुशी होती है. 
मगर अगर आप वही गलती दोहराते हैं, तो मुझे क्षोभ होता है."
इस प्रश्न पर प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर आधुनिक मनोविज्ञान तक (Id-ego-super ego —Sigmund Freud) बार-बार विचार और विश्लेषण किया गया है. गीता इसे इस रूप में प्रस्तुत करती है —

"ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोSभिजायते || 2-62||

ध्यायतः – चिन्तन करते हुए; विषयान् – इन्द्रिय विषयों को; पुंसः – मनुष्य की; सङ्गः – आसक्ति; तेषु – उन इन्द्रिय विषयों में; उपजायते – विकसित होती है; सङ्गात् – आसक्ति से; सञ्जायते – विकसित होती है; कामः – इच्छा; कामात् – काम से; क्रोधः – क्रोध; अभिजायते – प्रकट होता है |

(इन्द्रियाविषयों का चिन्तन करते हुए मनुष्य की उनमें आसक्ति उत्पन्न हो जाति है और ऐसी आसक्ति से काम उत्पन्न होता है और फिर काम से क्रोध प्रकट होता है |)

"क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥2-63॥


क्रोधात् – क्रोध से; भवति – होता है; सम्मोहः – पूर्ण मोह; सम्मोहात् – मोह से; स्मृति – स्मरणशक्ति का; विभ्रमः – मोह; स्मृति-भ्रंशात् – स्मृति के मोह से; बुद्धि-नाशः – बुद्धि का विनाश; बुद्धि-नाशात् – तथा बुद्धिनाश से; प्रणश्यति – अधःपतन होता है |

(क्रोध से पूर्ण मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मरणशक्ति का विभ्रम हो जाता है | जब स्मरणशक्ति भ्रमित हो जाति है, तो बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का अधःपतन होता है |)
(साभार सन्दर्भ - http://www.srimadbhagavadgitahindi.blogspot.in/2013/04/2-2-63-bg-2-63-bhagavad-gita-as-it-is.html)

"जारी रहेगी जंग अँधेरे के खिलाफ़ !" - गिरिजेश

जारी रहेगी जंग अँधेरे के खिलाफ़ !"
अभी है अँधेरा...
पसरा चारों ओर....
काला भूतिया घुप घटाटोप दमघोटू !
साँय-साँय कर रहा सन्नाटा,
जारी साजिशें, उड़ते चमगादड़,
गुर्राते भेड़िये, मस्त गिद्ध,
गश्त कर रहे सियार और लोमड़ियाँ,
चमक रहीं गोल-गोल आँखें उल्लुओं की,
नोच रहे गरम इन्सानी गोश्त...
जारी है दावत प्रेतों की !

कितनी शिद्दत से महसूस हो रही है
ज़रूरत रोशनी की....
काश नहीं होता अँधेरा,
होती जगमग करती रोशनी....
और होती उस रोशनी में
लुका-छिपी खेलती
झिलमिल करती
उछलती-कूदती
नाचती-झूमती
ज़िन्दगी की रंगबिरंगी सच्चाई !

नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है
अँधेरे का अमानुषिक अपराध,
तार-तार कर देने के लिये
अँधेरे की विद्रूप चादर को
तलाश है एक चिन्गारी की !
रोशनी के लिये
चिन्गारी की ज़रूरत है....

असह्य हो चुकी तलाश की तड़प,
अब यह ज़रूरत पूरी करनी ही है,
निकलना ही पड़ा है मुझे भी
तलाश में रोशनी की !
अँधेरे में अटपटे पड़ते पैर
सतर्क हो गये हैं और भी,
हाथ निभा रहे हैं आँखों की भूमिका,
दिमाग लीन है ताल देने में,
हाथों और पैरों के बीच जारी सरगम की लय के साथ !

समझ चुका चिन्गारी जगाने का तरीका,
देखो, तुम भी सीखो,
रगड़ रहा हूँ माटी को
पीसता हूँ, सानता हूँ,
बनाना है दीपक !

नहीं, नहीं,
नहीं हो पा रहा मुझसे कुछ भी....
क्यों, ऐसा क्यों हो रहा है आख़िर !
माटी भी साथ नहीं,
कुछ भी तो हाथ नहीं,
ज़र्रा-ज़र्रा रेशा-रेशा टूटी-फूटी बिखरी माटी,
तिनका-तिनका बिखरे सपनों की तरह !
बिखरे हैं धड़ाम-से गिरे आईनों के टुकड़े....
चुभ रही उनकी किरिच चुपके-चुपके
छाती में मेरी बायीं ओर
दमकने वाले हीरे की कनी में !

कल-कल तक ऐसा तो नहीं रहा,
सुरभित थे रंग-बिरंगे फूल,
उड़ती-इठलाती थीं तितलियाँ,
मौत के ठण्डे क्रूर पंजों में आज
जकड़े जा चुके हैं सारे कोमल फूल,
सूख चुकी हैं सारी पंखड़ियाँ,
झेल नहीं पा रहीं
पछुंवा हवा के झकोरों को !
इधर से उधर उड़ा ले जा रही है हवा,
सूखी पंखड़ियों को
बिखेर रही है टूटे सपनों की तरह....
कौन-सा मौसम है यह ?
सावन, वसन्त या कि पतझड़ !
जो भी हो इतना बीमार क्यों है भाई !

चिन्गारी जगाने के लिये टकरा रहा हूँ मैं
कठोर शिलाखण्डों को तड़ातड़ लगातार,
निकलेगी ही चिन्गारी,
बनेगा ही दिया,
जलेगी ही ज्योति एक दिन !
तब तक मैं नहीं रहा अगर
तो भी क्या हुआ, तुम तो रहोगे ही,
तुम भी करते जाना कोशिश मेरी ही तरह,
भर देना स्नेह से दिये को,
जला लेना अपना नन्हा-सा दिया,
बचाते रहना लौ को अन्धड़ से !

जलता रहेगा दिया, पसरता रहेगा उजाला,
तार-तार हो जायेगा अँधेरे का दौर,
फिर तो मयस्सर होगी ही रोशनी
मुझको, तुमको, हम सबको
आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों,
लड़ते जाना है, बढ़ते जाना है ऐसे ही बरसों,
आज उनका है, सही है,
कल तो हमारा ही होगा.
— गिरिजेश

____असमाधेय त्रासदी की यन्त्रणा___


प्रिय मित्र, ढेर सारी सकारात्मक सम्भावनाओं को दिन-प्रतिदिन दरकिनार करते जा रहे एक महत्वपूर्ण युवा साथी की मनोदशा अतिशय शोचनीय स्थिति की ओर तेज़ी से बढ़ते देख रहा हूँ. ऐसे तो वह वर्षों से समस्याग्रस्त रहे हैं. परन्तु पिछले कुछ महीनों में उनके व्यक्तित्व को सतत त्रस्त, असहाय और असमाधेय होते जाते देखना पड़ रहा है. 

न जाने क्यों मुझे कल से ही ऐसा लग रहा है कि हमारे समाज के लिये ढेर सारी चीज़ें बेमानी हो चुकी हैं. ऐसी अनुपयोगी हो चुकी चीज़ों में सहज मानवीय सरोकार की चीज़ें - सम्वेदना, सहानुभूति और सलाह भी शामिल है. इन्सान अपनी मूल अवस्थिति से सुई बराबर भी हिलने को तैयार आज भी नहीं है. दुर्योधन तो खैर मिथकीय खलनायक के रूप में स्थापित है ही. कोई दूसरा भी, जो ख़ुद को दुर्योधन से बेहतर समझता और मानता है, अपनी मनोदशा और जड़ता की विसंगति को अच्छी तरह जानते-समझते हुए भी ख़ुद अपनी गति को दिशाबद्ध करने के लिये तैयार नहीं है. 

ऊपर से तुर्रा यह कि मुखौटों के ऊपर मुखौटे लगाये लोग, नकली मुस्कान से दूसरों और ख़ुद को भरमाते लोग, धूर्तता से शातिर साज़िश बुनते लोग, अपने और दूसरों के ऊपर भरोसा खो चुके लोग, आकस्मिकता की आशंका से भयभीत लोग, ज़िन्दगी की जंग हार चुके लोग, फ़र्जी हवाई गोले दागने वाले लोग, दूसरों को सुनाने के लिये मधुरतम शैली में एक से बढ़ कर एक सूक्तियाँ कहते-सुनते लोग अन्दर से कितने ढोंगी हैं — यह सोच-सोच कर मन खूब-ख़ूब विषादग्रस्त है. ऐसा लग रहा है कि जिस समाज में जितनी अधिक विकृतियाँ होती हैं, उसमें उतनी ही अधिक वर्जनाएँ भी होती हैं. और ऐसे ही समाज में अनावश्यक तौर पर ख़ूब अच्छी तरह अभिनय करते हुए बहुत ही आकर्षक और उपदेशात्मक शैली में सूक्तियाँ भी गढ़ी और प्रचारित की जाती हैं. यह समूचा अभिनय सारहीन होने पर भी नितान्त भ्रम में जीने वाले लोगों का सम्बल बना हुआ है.

सहजता हो, तो सूक्तियों की, कटूक्तियों की, व्यंग्य की, उपहास की, अपमान की और अवसाद की जगह कहाँ शेष रह सकती है. और अगर ये सभी अभी भी सशक्त तरीके से प्रचलन में बने हुए हैं, तो इसका सीधा आशय यही है कि हमारे समाज में बहुत कुछ सकारात्मक तो है, मगर अभी तक सहजता के स्तर तक हमारा वैयक्तिक या सामाजिक विकास हो ही नहीं सका है. ऐसे में अनावश्यक तौर पर दूसरे लोगों से सम्भावनाओं और अपेक्षाओं के भ्रम में जीना और उन अपेक्षाओं के विपरीत उनका चिन्तन, वक्तव्य और आचरण होने पर उलटे स्वयं ही प्रताड़ित और पीड़ित होना भी अपने आप में एक असमाधेय त्रासदी ही है. और इस त्रासदी से भी हमारी अपनी मुक्ति सरल नहीं है. 

कबीर याद आ रहे हैं और यह भी कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि वह भी एक सूक्ति के ही रूप में याद आ रहे हैं. फिर भी मेरी अभिव्यक्ति की सीमा का एहसास मुझे है. और अगर कन्धों के नीचे बैसाखी न ले, तो कोई भी विकलांग व्यक्ति अपने दम पर एक भी क़दम आगे नहीं जा सकता. मैं और मेरी औकात भी नितान्त मानसिक विकलांगता से कहीं से तनिक भी कम नहीं है.
हाँ तो कबीर बाबा ने कहा —
"दोस पराया देखि के चले हसन्त-हसन्त;
आपन याद न आवई जाको आदि न अन्त."

उम्मीद कर रहा हूँ कि वक़्त हर बार की तरह ही इस बार भी कोई न कोई अनुकूल-प्रतिकूल रास्ता ख़ुद ही निकलेगा. हर बार की तरह इस बार भी बार-बार हर सम्भव प्रयास कर चुकने के बाद अब मेरी भूमिका केवल watch and wait करने की ही बची है. इसके बजाय अब और अधिक बिलावजह हाथ-पैर मारने और सिर धुनने से भी कोई भी लाभ होने की रंचमात्र भी सम्भावना नहीं दिख रही है.
हाँ, मैं सदा की तरह अभी भी अपराधबोध से ग्रस्त ही हूँ. 
ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश 8.11.14.

_स्टडी-सर्किल और अभिभावक-सम्मेलन_


प्रिय मित्र, आज व्यक्तित्व विकास परियोजना के इस नये केन्द्र पर पहली स्टडी-सर्किल और पहला अभिभावक-सम्मलेन आयोजित किया गया. दोनों ही कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए. स्टडी सर्किल 11 बजे से 1.45 तक और अभिभावकों से विचार-विनिमय 2 से 4 बजे तक चला.
आज जहाँ छात्र-छात्राओं को उनके व्यक्तित्वान्तरण के इस अभियान के बारे में विस्तार से बताया गया. वहीं उनके अभिभावकों से अपनी सन्तान पर पूरा भरोसा करने का अनुरोध किया गया. और 'अंकल जी' से सजग रहने की सलाह दी गयी.

उनको यह बताया गया कि इस समाज में काम लेने के दो तरीके हैं. पहला है काम करने वाले को भयभीत कर के उससे काम करवाना. जो दास-व्यवस्था से आज तक बदलते हुए समाज के रूपों के अनुरूप बदलता रहा है. मगर उसकी मूल अन्तर्वस्तु यथावत है. दास-मालिक अपने दासों को जंजीरों में बाँध कर रखते थे. ख़रीदते-बेचते थे, उनको कोड़ों से पीट कर और भालों से छेद कर उनसे काम लेते थे. बीच-बीच में तनिक भी विद्रोह होने पर किसी एक दास को मार कर लटका देते थे, ताकि दूसरे दासों को सबक मिल सके. उस समाज में भी विद्रोह हुआ और आदिविद्रोही स्पार्टकस के नेतृत्व में गुलामों ने रोम को चुनौती दी.

उसके बाद सामन्तों की भूमि-सम्बन्धों पर आधारित व्यवस्था का लम्बा काल-खण्ड चला, जिसमे सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करवाने के लिये भू-स्वामी अपने भू-दासों को बसा और उजाड़ सकते थे, अपमानित कर सकते थे और बरही से बाँध कर लाठियों से पिटवा सकते थे. वे भी आतंकित करके ही काम करवाते थे.

आज अभी पूँजी, उद्योग, बाज़ार और विज्ञान का युग है. आज किसी भी कर्मचारी से काम लेने वाला उसके सामने होता ही नहीं है. वह न जाने किस देश के किस शहर में हो सकता है. काम करने वाले को उसकी उम्मीद भर की सुविधा मिली होती है. वह एक मोटर-साइकिल, एक ब्रीफकेस और एक मोबाइल फोन लेकर शहर से कसबे तक दिन भर भागता है और कम्पनी का दिया हुआ अपना टारगेट पूरा करता है. टारगेट पूरा करते ही कम्पनी उसको और सुविधाएँ दे कर और बड़ा टारगेट दे देती है. और इस तरह जो युवक रोजगार पा जाने पर बेरोज़गारी से मुक्ति की खुशी मनाता है, वही 40+ का होते ही अपने वर्कलोड के नीचे कराह रहा होता है.

वह अब बुरी तरह से पूँजी के लाभ-लोभ के मकड़जाल में फँस चुका है, अब वह न तो चैन से जी सकता है और न सुकून से सो सकता है. वह बी.पी. से लेकर तनाव तक की ढेरों बीमारियों का शिकार हो चुका होता है. वह केवल इस भय से काम करता चला जाता है कि तनिक भी चूक होते ही कम्पनी उसे बाहर का रास्ता दिखा देगी और उसकी जगह किसी नये बेरोज़गार को उससे कई गुना कम मजदूरी पर लगा लेगी. भीषण बेरोज़गारी के इस दौर में 'हायर और फायर' के अधिकार के चलते सिक्के की सेवा में इन्सान दिहाड़ी की गुलामी खटने को अभिशप्त है. इस बीच उसकी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारियाँ भी इतनी बढ़ चुकी होती हैं कि वह बैल की तरह खटने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता. कम्पनी उसकी हड्डी का चूरा बना कर बाज़ार में बेचती रहती है और अपनी तिज़ोरी भरती रहती है.

आज बाज़ार ने हमारी शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, रोज़गार और मनोरंजन सब पर कब्ज़ा कर लिया है. चाहे जिस भी पेशे में हो, आज इन्सान इन्सान की सेवा के लिये नहीं, बल्कि इन्सान की ज़ेब तराशने के लिये काम कर रहा है.

ऐसे में हमें इस आदमखोर व्यवस्था को आइना दिखाने की ज़रूरत है. हमारा प्रयोग प्रतीकात्मक ही सही पर बाज़ारवाद की मानसिकता का मूलतः विरोध करता है. और हमारी कामना है कि इस विरोध के स्वर को समय और साधन जुटते चले जाने के साथ हम और भी व्यापक स्तर पर फैलाते चले जायेंगे. हम आज़मगढ़ को 'आतंकगढ़' कहने वालों को उनके ब्लैक टैग से बड़ी सफ़ेद लकीर लकीर खींच कर मुंहतोड़ जवाब अपने रचनात्मक प्रयोगों के ज़रिये देने का प्रयास कर रहे हैं. हम उनको कह कर नहीं, कर के यह बताना चाहते हैं. यह इकबाल सुहैल के इस शेर से जाना जाने वाला शहर है —

"यह ख़ित्त-ए-आज़मगढ़ है, यहाँ फैजान-ए-तज़ल्ली है यकसाँ:
जो ज़र्रा यहाँ से उठता है, वह नैयर-ए-आज़म होता है."

हमारा प्रयोग वह प्रयोग है जिसके बारे में लोग कहते हैं कि आज़मगढ़ का मतलब है 'आओ-जमो-गढ़ो', यह असली इन्सान गढ़ने का कारखाना है.

अभिभावकों को बताया गया कि काम करने का दूसरा तरीका है — इन्सान को उसकी पूरी आज़ादी देकर उससे अपनी ख़ुद की पहल पर काम करने की उम्मीद करना. 'आज़ादी' का सपना जिसने स्पार्टकस के साथी गुलामों की चमकती हुई आँखों से उगना शुरू किया, उसने इन्सानियत की विकास-यात्रा में अगणित सूरमाओं को पूरी शिद्दत से इन्सानियत के दुश्मनों को ललकारने का माद्दा दिया. उसने जंग-ए-आज़ादी में शिरकत करने वाले एक-एक इन्सान को 'आज़ादी, बराबरी. भाई-चारा' का नारा दिया और 'हक़-इन्साफ़ और इन्सानियत' के पक्ष में खड़े होने का तेवर दिया. इन्सानियत के दुश्मनों के ख़िलाफ़ 1% बनाम 99% की वह लड़ाई आज भी जारी है.

हम आपके बच्चे और बच्ची को पूरी आज़ादी और पूरा सम्मान देते हैं. हम उसको मुसल्सल ईमान के साथ अपने दोस्तों को प्यार करना, अपने हिस्से की मेहनत करना और लोगों की सहायता और सेवा करना सिखाते हैं. हमारे बच्चे हमारे साथ झूठ नहीं बोलते, क्योंकि हम भी अपने बच्चों के साथ झूठ नहीं बोलते. हम उनको खूब-खूब प्यार करते हैं और वे भी हमको पूरे मन से प्यार करते हैं. हम उनको सच्चाई, ईमानदारी, बहादुरी, कुर्बानी और आदर्शों की प्रेरक कहानियाँ सुनाते हैं. हम उनको जीवन और जगत के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करते रहते हैं और उनकी पहलकदमी को उभारने की कोशिश करते हैं.

हम उनको गलती करने की पूरी छूट और पूरा मौका देते हैं. हम उनको बताते हैं कि चूँकि हम इन्सान हैं, इसलिये अगर हम कोई भी काम पहली बार करने की कोशिश करने जा रहे हैं तो हम गलती ज़रूर करेंगे, और गलती करने पर नुकसान भी होगा. जितनी बड़ी कोशिश होगी, उतना ही अधिक बड़ा नुकसान भी होगा. हम उस नुकसान को बरदाश्त करने का धैर्य और कलेजा भी रखते हैं और उनकी उस गलती को सुधारने का रास्ता भी सोचते हैं और सुझाते हैं.

इस तरह इस प्रयोग के साथ जुड़ने वाला हर इन्सान सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से गुज़रता हुआ वक्त गुज़रने के साथ-साथ देखते-देखते एक शानदार इन्सान में, एक अपराजेय योद्धा में, एक विशेषज्ञ में बदलता चला जाता है. वह अपने आस-पास के लोगों के बीच अपनी उपलब्धियों के सहारे मानदण्ड स्थापित करता है.
इस पत्र के साथ ही संलग्न हैं आज के आयोजन की चन्द तस्वीरें...

ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश 9.11.14.

Saturday, 1 November 2014

A GUIDE FOR PRONUNCIATION IN READING ENGLISH — GIRIJESH





अंग्रेज़ी पढ़ने में सहायक बिन्दु — गिरिजेश
(A GUIDE FOR PRONUNCIATION IN READING ENGLISH)


प्रिय मित्र, व्यक्तित्व विकास परियोजना में अन्य विषयों के साथ छात्र-छात्राओं को अंग्रेज़ी भी सिखाई जाती है|

प्रत्येक भाषा के शब्दों को उसके अक्षरों को मिला कर ही बनाते हैं|

अंग्रेज़ी के अनेक अक्षरों से बनाये गये अलग-अलग शब्दों में उन अक्षरों के एक से अधिक उच्चारण किये जाते हैं|

वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था की सीखने-सिखाने की जटिल पद्धति के चलते अनेक छात्र-छात्राएँ अंग्रेज़ी को कठिन मान कर उससे डरते हैं|

मेरा यह व्याख्यान इस समस्या का आसानी से समझ में आ सकने लायक विकल्प देने का प्रयास करता है|

एक ही अक्षर से किये जाने वाले अलग-अलग उच्चारणों को समझने के बाद उनको मिला कर बने शब्दों का उच्चारण करना सरल हो जाता है.

यह व्याख्यान अत्यन्त संक्षेप में अंग्रेज़ी के अक्षरों से बनने वाले उच्चारणों की चर्चा करता है|

साथ ही दिये गये उदाहरणों का सरल तरीके से विश्लेषण भी करता है|

इसके बाद उस तरह के और भी शब्दों के बारे में सोचने के लिये छात्र-छात्राओं को प्रेरित करने का प्रयास भी करता है|

और अन्त में बाज़ार में उपलब्ध ककहरा के विस्तृत भाषान्तर को आसान और संक्षिप्त तरीके से समझाता है|

अंग्रेज़ी सीखने की प्रक्रिया को सरल बना कर जन-दिशा में रचनात्मक मॉडल खड़ा करने का यह एक प्रयास है|

आशा है कि मेरे इस व्याखान से नये प्रशिक्षुओं को अंग्रेज़ी पढ़ने की बारीकियाँ सीखने में सहायता मिलेगी|

साथ ही उनको अपनी समझ और अपनी विश्लेषण-क्षमता का विकास करने में भी सहायता मिल सकेगी|

मेरा यह व्याख्यान 'व्यक्तित्व विकास परियोजना' की ओर से अपलोड होने वाली इस श्रृंखला का बत्तीसवाँ व्याख्यान है|

यह प्रयास युवा-शक्ति की सेवा में विनम्रतापूर्वक समर्पित है|

कृपया इस प्रयास की सार्थकता के बारे में अपनी टिप्पणी द्वारा मेरी सहायता करें|

ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश (1.11.14.) 
इसका लिंक है — https://www.youtube.com/watch?v=PVaM3sChYCM&feature=youtu.be