Saturday, 31 May 2014

"जारी रहेगी जंग अँधेरे के खिलाफ़ !" — गिरिजेश


अभी है अँधेरा...
पसरा चारों ओर.... 
काला भूतिया घुप घटाटोप दमघोटू !
साँय-साँय कर रहा सन्नाटा,
जारी साजिशें, उड़ते चमगादड़,
गुर्राते भेड़िये, मस्त गिद्ध,
गश्त कर रहे सियार और लोमड़ियाँ,
चमक रहीं गोल-गोल आँखें उल्लुओं की,
नोच रहे गरम इन्सानी गोश्त...
जारी है दावत प्रेतों की !

कितनी शिद्दत से महसूस हो रही है
ज़रूरत रोशनी की....
काश नहीं होता अँधेरा,
होती जगमग करती रोशनी....
और होती उस रोशनी में
लुका-छिपी खेलती
झिलमिल करती
उछलती-कूदती
नाचती-झूमती
ज़िन्दगी की रंगबिरंगी सच्चाई !

नाकाबिल-ए-बर्दाश्त है
अँधेरे का अमानुषिक अपराध,
तार-तार कर देने के लिये
अँधेरे की विद्रूप चादर को
तलाश है एक चिन्गारी की !
रोशनी के लिये
चिन्गारी की ज़रूरत है....

असह्य हो चुकी तलाश की तड़प,
अब यह ज़रूरत पूरी करनी ही है,
निकलना ही पड़ा है मुझे भी
तलाश में रोशनी की !
अँधेरे में अटपटे पड़ते पैर
सतर्क हो गये हैं और भी,
हाथ निभा रहे हैं आँखों की भूमिका,
दिमाग लीन है ताल देने में,
हाथों और पैरों के बीच जारी सरगम की लय के साथ !

समझ चुका चिन्गारी जगाने का तरीका,
देखो, तुम भी सीखो,
रगड़ रहा हूँ माटी को
पीसता हूँ, सानता हूँ,
बनाना है दीपक !

नहीं, नहीं,
नहीं हो पा रहा मुझसे कुछ भी....
क्यों, ऐसा क्यों हो रहा है आख़िर !
माटी भी साथ नहीं,
कुछ भी तो हाथ नहीं,
ज़र्रा-ज़र्रा रेशा-रेशा टूटी-फूटी बिखरी माटी,
तिनका-तिनका बिखरे सपनों की तरह !
बिखरे हैं धड़ाम-से गिरे आईनों के टुकड़े....
चुभ रही उनकी किरिच चुपके-चुपके
छाती में मेरी बायीं ओर
दमकने वाले हीरे की कनी में !

कल-कल तक ऐसा तो नहीं रहा,
सुरभित थे रंग-बिरंगे फूल,
उड़ती-इठलाती थीं तितलियाँ,
मौत के ठण्डे क्रूर पंजों में आज
जकड़े जा चुके हैं सारे कोमल फूल,
सूख चुकी हैं सारी पंखड़ियाँ,
झेल नहीं पा रहीं
पछुंवा हवा के झकोरों को !
इधर से उधर उड़ा ले जा रही है हवा,
सूखी पंखड़ियों को
बिखेर रही है टूटे सपनों की तरह....
कौन-सा मौसम है यह ?
सावन, वसन्त या कि पतझड़ !
जो भी हो इतना बीमार क्यों है भाई !

चिन्गारी जगाने के लिये टकरा रहा हूँ मैं
कठोर शिलाखण्डों को तड़ातड़ लगातार,
निकलेगी ही चिन्गारी,
बनेगा ही दिया,
जलेगी ही ज्योति एक दिन !
तब तक मैं नहीं रहा अगर
तो भी क्या हुआ, तुम तो रहोगे ही,
तुम भी करते जाना कोशिश मेरी ही तरह,
भर देना स्नेह से दिये को,
जला लेना अपना नन्हा-सा दिया,
बचाते रहना लौ को अन्धड़ से !

जलता रहेगा दिया, पसरता रहेगा उजाला,
तार-तार हो जायेगा अँधेरे का दौर,
फिर तो मयस्सर होगी ही रोशनी
मुझको, तुमको, हम सबको
आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों,
लड़ते जाना है, बढ़ते जाना है ऐसे ही बरसों,
आज उनका है, सही है,
कल तो हमारा ही होगा.

Thursday, 29 May 2014

ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो... - बशीर बद्र



प्रिय मित्र, आज सुबह से यह ग़ज़ल याद आती रही और इसके साथ ही साथ 
ज़िन्दगी के सारे पिछले पन्ने फड़फड़ा कर एक के बाद एक दिमाग में कौंधते चले गये.

वे तमाम लोग जिनके साथ और जिनके लिये जीने का अवसर मिलता गया. 
वे तमाम लोग जिनके ऊपर भरोसा करके एक के बाद एक मनसूबे बनाये. 
वे तमाम लोग जिनके कन्धे से कन्धा मिला कर अलग-अलग मोर्चों पर जूझने का मौका मिला. वे तमाम लोग जिन्होंने मुझे बेइनतेहा प्यार दिया. 
वे तमाम लोग जिनकी मदद से मेरा हर सपना साकार होता गया. 
वे तमाम लोग जो ज़िम्मेदार हैं उन सारी उपलब्धियों के लिये, जो मुझे मयस्सर होती गयीं. 
वे तमाम लोग जो अलग-अलग मोड़ों पर अलग-अलग वजहों से दूर होते चले गये. 
वे सारे के सारे लोग बेतहाशा याद आते रहे और मन उनकी यादों की नमी में भींगता रहा.

अब मेरे पास महज़ उन सबकी खट्टी-मीठी यादें हैं.
यादें जो रह-रह कर दिल-ओ-दिमाग को मथती रहती हैं.
यादें जो अभी भी मुझे लड़ने के लिये ललकारती रहती हैं.
यादें जो मुझे कभी भी अकेलेपन का शिकार नहीं होने देतीं.
यादें जो जागते-सोते हर-हमेशा मेरे इर्द-गिर्द अपना सपनीला घेरा बुनती रहती हैं.
यादें जिनके होने से ही ज़िन्दगी में अभी भी रौनक है.
यादें जिनकी रोशनी में मुझे आगे का सफ़र तय करना है.
यादें जिनके दम पर हर अगले आने वाले युवा को जोड़ना है, सिखाना है.
यादें जो मेरे हर अगले फैसले के लिये मजबूत ज़मीन मुहैया कर रही हैं.

मैं अपने सारे दोस्तों की सारी यादों के सम्मान में अपना हठी सिर झुकाता हूँ.
उनके साथ और अब उनसे दूर जीने के दौरान हुई अपनी हर चूक के एहसास से शर्मिन्दा हूँ.
मैं कोशिश करना चाहूँगा कि अगले रिश्तों में उस तरह की कोई चूक न होने पाये.
मैं कामना कर रहा हूँ कि अब से ज़िन्दगी उनके इर्द-गिर्द ही ताना-बाना बुने, 
जो दुबारा दूर जाने का दर्द न दें.

अब उन मुट्ठी भर बच गये रिश्तों के भरोसे ही बाकी बची ज़िन्दगी जीने की इच्छा है, 
जिनके कन्धे पर हर खुशी और हर दर्द में सिर रख कर रो सकूँ. 
जिनकी छाँव में खुशी के साथ बाकी बची ज़िन्दगी जी सकूँ.
और जिनकी गोद में सिर रख कर सुकून के साथ मर पाना मुमकिन हो सके.

बाकी तो अपनी-अपनी राह के राही हैं. 
वे तमाम लोग महज आज भर साथ हैं, कल निश्चय है कि नहीं रहेंगे.
उन सब के साथ मर्यादापूर्ण दूरी बनाकर चलते रहना है.
ऐसा करने से उनकी वजह से कम तकलीफ़ होगी.
और हो सकता है कि कम उम्मीद पालने से कुछ न कुछ सुकून भी मिल सके.
इसीलिये आज यह ग़ज़ल याद आती रही है.
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (26.5.14. 9.30 p.m.)

"यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो 
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो 

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से 
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो 

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा 
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो 

मुझे इश्तहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ 
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो 

कभी हुस्न-ए-पर्दानशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में 
जो मैं बन-सँवर के कहीं चलूँ, मेरे साथ तुम भी चला करो 

ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है 
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो 

नहीं बे-हिजाब वो चाँद-सा कि नज़र का कोई असर नहीं 
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो"

"गर्व से कहो - हम मनुष्य हैं..."


प्रिय मित्र, जन्म से हम सभी मनुष्य हैं. मनुष्य होना केवल जीव-विज्ञान का मामला नहीं है. यह हमें उच्चतर स्तर का संस्कार, चिन्तन और आचरण भी प्रदान करता है. मनुष्यता हमें प्रकृति के सबसे विकसित प्राणी के रूप में सबसे विकसित मस्तिष्क भी देती है. मनुष्यता हमें 'वसुधैव कुटुम्बकम' की चेतना की ज़मीन प्रदान करती हैं. मनुष्यता हमें एक दूसरे से प्यार करना और एक दूसरे की सहायता करना सिखाती है. मनुष्य के लिये समाज से परे अस्तित्व असम्भव है. हमें अकेले न तो तृप्ति प्राप्त हो सकती है और न ही मुक्ति. 

अपने श्रम से हमें उपलब्धियाँ मिलती हैं. जन-सेवा से हमें यश मिलता है. अपनी उपलब्धियों की सार्थकता और अपनी सेवा में विनम्रता और निःस्वार्थ भावना पर ही हमें वास्तविक प्रसन्नता होती है. परन्तु विडम्बना है कि अभी हमारा समाज विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों में विभाजित है. यह विभाजन काल-प्रवाह में अनेक टक्करों के परिणाम स्वरूप अपने वर्तमान रूप तक विकसित हुआ है. जब कि रंग-भेद, जाति-भेद, धर्म-भेद, क्षेत्र-भेद और सम्प्रदाय-भेद ने मनुष्य को मनुष्य से प्यार करना नहीं सिखाया है. इन सब ने मनुष्य को केवल अपने समूह से - अपनी धारा से भिन्न होने पर एक दूसरे से नफ़रत करना सिखाया है. 

किसी का भी किसी परिवार में जन्म होना केवल एक संयोग है. हर परिवार किसी न किसी धर्म को मानता है. ऐसे में केवल जन्म होना गर्व का आधार बन ही नहीं सकता. हम में से जो भी यह सोचते हैं कि वे श्रेष्ठ हैं और दूसरे लोग नीच हैं और अपने इस श्रेष्ठता के भ्रम के आधार पर स्वयं को गौरवशाली मानते हैं. वे वास्तव में अभी भी विचारों के स्तर तक विकसित नहीं हो सके हैं. उनमें से एक नारा लगाता है - "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं..." और दूसरा उसके जवाब में नारा लगाता है - "गर्व से कहो हम मुसलमान हैं..." किसी के हिन्दू या मुसलमान परिवार में जन्म होने मात्र से किसी के लिये गर्व का आधार कैसे बन सकता है? 

हम अपने धर्म या सम्प्रदाय को दूसरे धर्म या सम्प्रदाय से श्रेष्ठ मान कर दम्भग्रस्त हो जाते हैं. यह श्रेष्ठताबोध हमारे चिन्तन के फलक को संकीर्ण करता है. दूसरों को हेय दृष्टि से देखना और उनका छिद्रान्वेषण करना हमारी आत्मतुष्टि का आधार बनाता है. साम्प्रदायिकता की घृणा की भाव-भूमि यही है. अपने हिन्दू या मुसलमान होने पर अगर आपको गर्व है, तो अभी आप मनुष्य ही नहीं बन सके. केवल हिन्दू या मुसलमान ही रह गये. 

मिस्टर हिन्दू, क्या आपने अपनी नफ़रत में अपने अगल-बगल के परिवारों में जन्म लेने वाले दूसरे धर्मों और सम्प्रदायों के लोगों को बार-बार अपनी शत्रुता का शिकार नहीं बनाया है ? क्या आपने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने ही धर्म की अन्य जातियों के लोगों को और अन्य सम्प्रदायों के अनुयायियों को भावावेश में आकर न केवल उत्पीड़ित और अपमानित किया है, अपितु उनकी निर्ममता के साथ हत्या भी नहीं की है ? और मिस्टर मुसलमान, आपके शिया-सुन्नी के दंगों से कौन अपरिचित है ? क्या इस्लामिक आतंकवाद, शरीयत की बर्बरता और वहाबी कट्टरता की जड़ता ने दुनिया में जगह-जगह बार-बार शान्ति भंग नहीं की है ? 

दंगे होते हैं - यह सत्य है. मगर दंगे क्यों होते हैं - यह विचारणीय है. हिन्दू को मुसलमान के खिलाफ़ भड़काने और मुसलमान को हिन्दू के विरुद्ध नफ़रत से भरने और उन्मादग्रस्त करने वाले दोनों धर्मों के स्वघोषित ठेकेदारों के खुले खेल से अब कोई भी अपरिचित नहीं है. सत्ता के पायदान चढ़ने में यह नफ़रत और इनकी उपज दंगे सीढ़ियों की तरह काम दे रहे हैं. भगवा गिरोह की सरकार बन जाने के बाद यह नफ़रत और उन्माद तनिक भी कम नहीं हुआ है बल्कि और बढ़ा ही है. 

हमारे देश में इस चुनाव के बाद एक कठिन दौर सामने आ चुका है. मजबूत विपक्ष के बिना लँगड़े लोकतन्त्र की अपनी सीमाएँ स्पष्ट हैं. इस दौर की अपनी विशिष्ट चुनौतियाँ हैं. यह दौर हम सब से एकजुटता की माँग करता है. आपसी मतभेदों को दरकिनार करके हम सबको एक साथ मिल बैठ कर सोचना चाहिए. हम सब को परस्पर एक दूसरे को नफ़रत की जगह मुहब्बत बाँटना चाहिए. 

हम सबको यह कामना करनी चाहिए कि अब कोई और इस अन्धी नफ़रत का शिकार न हो. हमें प्रयास करना चाहिए कि अब कहीं और कोई दंगा न हो. हमें अपने आस-पास प्रेम और भाईचारा की सहज भावना को बनाये रखने के लिये सचेत प्रयास करना चाहिए ताकि अब और किसी की बेटी के साथ दुराचार न हो. हमें सतर्क रहना चाहिए कि अब कोई और अफ़वाह न फैला सके. हमें अपने दोस्तों के कन्धे से कन्धा मिला कर एक स्वर में आवाज़ बुलन्द करनी चाहिए ताकि अब कहीं कोई और घर और फसल न जलायी जा सके. यही हमारे मनुष्य होने की शर्त है.

ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (25.5.14. 10.45p.m.)

{ विशेष टिप्पणी :- इस लेख में प्रस्तुत विचारों को मूलतः मेरे सम्मानित मित्र प्रतिबद्ध गाँधीवादी सरल शैली में लेखन-विधा के विशेषज्ञ और इस विधा में मेरे मार्गदर्शक श्रीHimanshu Kumar जी द्वारा 'व्यक्तित्व विकास परियोजना' के सदस्यों को फोन से अपने सम्बोधन में व्यक्त किया गया था. उनके वक्तव्य का लिंक है :

Saturday, 24 May 2014

सीमा-रेखा का प्रतिबन्ध और बन्धन का बोध !

एक कविता से असहमति :

सीमा-रेखा का प्रतिबन्ध और बन्धन का बोध !
DrSony Pandey – ...सीमा रेखा...
"मैँने बनायी है सीमा रेखा/ रिश्तोँ मेँ/ सम्बन्धोँ मेँ/ मित्रता मेँ/ और चाहती हूँ/ करना पूरी निष्ठा से/ अनुपालन अपनी सीमाओँ का/ ये बन्धन नहीँ/ एक अनुशासित रेखा है/ जो मुझे निरन्तर/ रोकती है अतिक्रमण से।“ - सोनी

मित्र, मैं असहमत हूँ इस बिन्दु पर...
मेरी समझ है कि फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो द्वारा यह सच ही कहा गया है –
“इन्सान स्वतन्त्र जन्म लेता है, परन्तु आजीवन बन्धनों में बंधा रहता है.”

मानव-समाज के विकास की कथा बन्धनों से मुक्ति की कामना को रूपायित करने की लालसा के चलते विफल-सफल विद्रोह की कथा है. इन्सान के सामाजिक प्राणी होने के नाते धरती के प्रत्येक देश में आदिम कबीलाई मातृप्रधान समाज-व्यवस्था से लेकर आज की पुरुष-प्रधान पूँजीवादी समाज-व्यवस्था तक समाज के विकास की प्रत्येक मन्जिल पर शासक वर्गों के निहित वर्गीय स्वार्थों के अनुरूप ही उस व्यवस्था विशेष को चलाते रहने के लिये नियम-क़ानून और मान्यताएँ बनती-बिगड़ती रही हैं. और फिर समाज-व्यवस्था के विकास के अगले चरण के साथ ही नयी-नयी मान्यताएँ बनती और स्थापित होती रही हैं. पुरानी मान्यता और नयी मान्यता के बीच भी पुरानी व्यवस्था और नयी व्यवस्था की ही भाँति आमरण संघर्ष भी जारी रहते रहे हैं. मार्क्स के दर्शन ‘द्वंद्ववाद’ का ‘निषेध के निषेध का नियम’ इसको भी सूत्रबद्ध करता है. इस नियम के अनुसार किसी भी वस्तु के एक गुण का उद्भव होने पर उस वस्तु के पिछले गुण का लोप हो जाता है.

चूँकि इन्सान की सभी मान्यताएँ उस सामजिक व्यवस्था की अधिरचना का अंग होती हैं, जिसमें वह पैदा होता है और जीवन बिताता है. अतएव प्रत्येक व्यवस्था में जी रहा प्रत्येक इन्सान अधिकतर दूसरों द्वारा - सत्ता, समाज और परिजनों द्वारा आरोपित सीमाओं के अदृश्य बन्धनों में जकड़ा रहता है और उनसे शासित होता रहता है. ‘मान्यताओं’ की इन सीमाओं को ही गरिमा-मण्डित करने के लिये ‘मर्यादाओं’ का नाम दिया जाता है. इन बन्धनों को ही राहुल बाबा “दिमागी गुलामी’’ कहते हैं. इनको जैसे का तैसा मान लेना ‘अन्धविश्वास’ कहलाता है. स्वयं विचार किये बिना इनके अनुकरण को ही ‘अन्धानुकरण’ कहते हैं. ये मान्यताएँ इन्सान के व्यक्तित्व के विकास को अगली मन्जिल तक पहुँचने में अवरोध साबित होती रही हैं.

इन बन्धनों के साथ ही इन्सान द्वारा स्वयं ही ख़ुद पर आरोपित सीमा-रेखाएं भी देखते-देखते स्वयमेव ही उसके अपने व्यक्तित्व के बन्धन बन जाती हैं. किसी भी साधक को अपनी सारी सीमाओं को तोड़ देने के बाद ही पूर्ण सिद्धि का चरम उत्कर्ष उपलब्ध हो पाता है. हर ‘हद से गुज़र जाने’ के बाद ही हमें हमारी साधना के चरम पर पहुँच जाने की सुखद अनुभूति हो पाती है. हमारे विचारशील पूर्वजों द्वारा “‘स्व’ के विरुद्ध संघर्ष” में इसी कथ्य को सूत्रबद्ध किया गया है.

'सीमा-रेखा का अतिक्रमण' इन सभी जड़ हो चुकी प्रतिकूल मान्यताओं के उल्लंघन का ही नाम है. प्रत्येक पुरानी पीढ़ी जीवन की प्रत्येक अग्र-गति से हर-हमेशा भयभीत रहती रही है. वह नयी पीढ़ी पर बलात् थोपे रखने के लिये अपने मूल्यों और मान्यताओं की सीमा-रेखाओं के रूप में अपनी जड़ता को ही आभा-मण्डित करती है. वह नयी पीढ़ी के प्रतिवाद, प्रतिरोध और विद्रोह को नियन्त्रित करने की मंशा मात्र से ही परिचालित होती है. समाज की प्रत्येक प्रगति और इन्सान के प्रत्येक विकास के विरुद्ध ‘अनुशासन’ का नाम दे कर अगली पीढ़ी को भयाक्रान्त करने के लिये ही हमारी पिछली पीढ़ी ने हम पर और उसकी पिछली पीढ़ी ने उस पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाये हैं. ऐसे सभी प्रतिबन्धों को ही ‘वर्जना’ का नाम दिया गया है. इस तरह 'अनुशासन और वर्जना' के रूप में प्रत्येक पिछली पीढ़ी ने समाज पर अपनी मान्यताओं को ही आरोपित किया है और करती चली आयी हैं. वर्जनाओं से मुक्ति परम्पराओं के विरुद्ध विद्रोह के बिना असम्भव है. मान्यताओं के बन्धन को अक्सर अतार्किक होने पर भी हम ‘लोक-भय’ के चलते अपनी चेतना के विरुद्ध चुपचाप मन मार कर ढोते रहते हैं.

सीमाओं के अतिक्रमण को सदैव ही लोक-निन्दा के ज़रिये अवरुद्ध किया गया है. परन्तु लोक-मत सदा ही तर्क-परक और अनुकरणीय ही हो - ऐसा आवश्यक नहीं. ऐसा भी देखने में आया है कि कई बार लोक-चेतना भी ठहराव का शिकार हो जाती है और लोकमान्यताएं रूढ़ हो जाती हैं. इस ठहराव को तोड़ कर लोक-चेतना की गति को और त्वरण तभी मिल पाता है, जब विद्रोही तब तक की समस्त जनविरोधी परम्पराओं और उनके द्वारा निर्मित तथाकथित वर्जनाओं के जाल को तोड़ कर नये मूल्यों और मान्यताओं की नयी लकीर खींचते हैं.

प्रत्येक विद्रोह की सफलता के बाद ही एक नूतन संस्कृति का उद्भव होता है. उस संस्कृति के चिन्तन के रूप में अब लोक के सम्मुख नये मूल्य और नयी मान्यताएँ होती हैं, जो पहले से अधिक तर्कसम्मत, जनपक्षधर और हितकर होती हैं. मनुष्यता ने आदिविद्रोही स्पार्टकस से आज तक अगणित विद्रोहों के बाद ही अपने वर्तमान विकसित स्वरूप तक पहुँच सकने की उपलब्धि हासिल की है. अभी भी जन-जीवन में अनेक ऐसे द्वंद्व हैं, जिनको यथावत स्वीकारने से नयी पीढ़ी इन्कार कर रही है.

जीवन और विज्ञान दोनों ही जनविरोधी मान्यताओं से मुक्ति के लिये सतत संघर्ष करते रहे हैं. कोई समय था, जब मनुस्मृति के नियमों को पूरी कठोरता से लागू किया जाता था. तब “न नारी स्वातन्त्र्यमर्हति” की परिस्थिति थी. आज नारी-मुक्ति-आन्दोलन उसे पूरी तरह से नकार चुका है. परन्तु समाज इस बिन्दु पर अभी भी संघर्षरत है. कन्या-भ्रूण-हत्या और ‘खाप-संस्कृति’ इसी के प्रमाण हैं. परन्तु निकट भविष्य में ही वह समय भी आने जा रहा है, जब प्रत्येक अन्य प्रतिगामी मूल्य की तरह नारी-मुक्ति के प्रशस्त पथ के ये अवरोध भी काल-कवलित हो जायेंगे. तब ये भी छुआछूत, बाल-विवाह, सती-प्रथा और पर्दा-प्रथा की तरह ही केवल बच्चों को सुनायी जाने वाली कहानियों के विषय बन कर रह जायेंगे.

अनुशासन भी शासन ही है - आत्मारोपित शासन. शासन चाहे जिस भी रूप में हो, सहजता का विरोधी होता ही है. सहजता ही सुखकर होती है. सहजता ही हितकर होती है. मानव जाति की विकास-यात्रा का चरम लक्ष्य सहज और समतामूलक समाज-व्यवस्था की स्थापना है. विश्व-क्रान्ति के पुरोधा आचार्य महान माओ का यह कथन भी विचारणीय है –
“TO REBEL IS RIGHT”.

इसी सन्दर्भ में मेरी कविता के निम्न अंश प्रस्तुत हैं -

“जब तक व्यक्ति स्वतन्त्र नहीं होगा चिन्तन के भ्रम से;
नहीं गुलामी की बेड़ी को काटेगा निज श्रम से।

तब तक नारे बड़बोलेपन का आभास भरेंगे;
कोरे आदर्शों का तो सब ही उपहास करेंगे।

आगे बढ़ कर बलिदानों के जो आदर्श दिखाते;
जो समूह को साथ उड़ाते, चमत्कार कर जाते।

अँखुआयी कोंपल के कोमल पत्तों जैसे लाल;
नन्हे हाथ सदा ही काटे हैं शोषण के जाल ।“ - गिरिजेश (24.5.14.)

टिप्पणी :
DrSony Pandey प्रथम तो आभार . एक छोटी सी कविता की इतनी लम्बी और स्तरीय समीक्षात्मक विरोध के लिऐ ।

आगे . मैँ एक बार्डर लाईन की समर्थक हूँ , दो शब्दोँ मेँ अपनी बात समाप्त करुँगीँ . प्रकृति भी अपने द्वारा निर्धारित नियमोँ का अनुपालन चाहती है . अतिक्रमण होते विनाश . अतः मानव सभ्यता के सुचारु संचालन के लिऐ सीमा रेखा आवश्यक है ।

Upadhyaya Pratibha आत्मानुशासन मानव जीवन का सहज हिस्सा है, वह व्यक्तित्व विकास में सहायक है.
मनुष्य ही नहीं , प्रकृति तक अनुशासित है
आत्मानुशासन का अभाव उच्श्रृंखलता है.

Vishnu Tiwari bahut behatar .

Awadhesh Dubey मान्यताओं’ की इन सीमाओं को ही गरिमा-मण्डित करने के लिये ‘मर्यादाओं’ का नाम दिया जाता है. इन

Awadhesh Dubey अँखुआयी कोंपल के कोमल पत्तों जैसे लाल;
नन्हे हाथ सदा ही काटे हैं शोषण के जाल ।“

Tiwari Keshav agree comrade

Shail Tyagi Bezaar swatantra aur uchchhrinkhalta kee vibhajak rekha ati sookshma hai. Inka nirpeksh nirdhaaran kadachit asambhav hai

Shamim Shaikh bahut achchi bat kahi aapne,

नवमीत सहमत

DrSony Pandey कामरेड ! सूरज को कभी पश्चिम से उगते देखा है .?

Ashutosh Singh Kaushik जिस तरह से किसी भी देश के पुरे संविधान को बदलकर नया संविधान नहीं बनाया जा सकता है ! हाँ यदि कुछ नियम या क़ानून असामयिक और निरर्थक हो गए है तो उसमे बदलाव जरुरी होता है !!उसी तरह हमारे बुजुर्गों और पूर्वजों ने स्थिति और परिस्थिति के अनुसार जो नियम बनाये थे उन्ही का अनुकरण हमलोग आज तक कर रहे हैं ! हाँ स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इसमें भी कुछ नियम हटाये या जोड़े जा सकते हैं ! पर उसे पूरी तरह से अव्यवहारिक कहना अतार्किक और अवैज्ञानिक है !! 5000 सालों से हम उसका अनुकरण करके आज भी समाज में व्यवस्था कायम रखने में सफल हुए हैं !! यह अचानक गलत हो गया ऐसा कहना अनुचित भी है !

Girijesh Tiwari नहीं, सूरज का उगना ही हमारा भ्रम है. दर असल उगना और डूबना दोनों ही धरती और चन्द्रमा का होता है और यह उनकी गति के कारण होता है. हम धरती के सापेक्ष सूरज को उगते डूबते देखते हैं और मानते भी हैं.

Ashutosh Singh Kaushik क्षमा चाहता हूँ गिरिजेश जी ,इसी उदहारण को किसी बच्चे या फिर अनपढ़ व्यक्ति को समझा कर देखिये !! समाज किसी विषेस व्यक्ति के लिए नहीं है ! समाज तो हर तरह के लोगों का है...जितना सरल भाषा में बताएँगे/समझायेंगे उतना ज्यादा सरल होगा !! और इसे जितना पेचीदा बनायेगें उतना पेचीदा बनता जाएगा !!

DrSony Pandey कामरेड भ्रम ही सही . उसके उदय और अस्त के नियम चक्र पर जीवन आगे बढता है .ठीक उसी प्रकार जैसे स्वस्थ रहने के लिऐ एक अनुशासित जीवन शैली आवश्यक है उसी प्रकार सम्बन्धोँ मेँ भी दायरा आवश्यक है

Girijesh Tiwari मित्र Ashutosh Singh Kaushik जी, सहमत हूँ.

Girijesh Tiwari मित्र DrSony Pandey जी, मैं इस रूप में आपकी बात का समर्थन कर रहा हूँ.

Tiwari Keshav aap sahi kah rahe hain. com jo pratikriyayen mai padh raha hoon. usme aap k kahe se taul raha hoon. yahi suruwati jabab aayenge. is se hi niklna nikalna hoga com..

Girijesh Tiwari मित्र Tiwari Keshav जी, मैं आपकी बात समझ रहा हूँ. जीवन का दर्शन अलग स्तर की चीज़ है. और ख़ुद जीवन अलग. मैंने इस कविता के बहाने मानव सभ्यता और संस्कृति के विविध मूल्यों मान्यताओं के वैज्ञानिक पक्ष का विश्लेषण करने की कोशिश की है.

DrSony Pandey कामरेड बस इतना ही मेरा कहना बा कि आपके कहे का मैँ शतप्रतिशत समर्थन करती हूँ . प्राचीन जड मान्यताओँ को ध्वस्त करना हमारा सबसे बडा दायित्व है और हम उसका प्रबल विरोध करते रहेँगे ।

 
Prabhunath Singh Mayank "सा विद्या या विमुक्तये"
जो समग्र जीवन में प्रत्येक स्तर पर प्रत्येक काल-खण्ड में बन्धनों से मुक्ति के लिये प्रयोजन-माध्यम बनती है, उसे ही वास्तविक विद्या कहा जाता है. वह संज्ञान के स्तर पर चेतना की सत्य एवं न्याय सम्बलित पराकाष्ठावस्था है, जहाँ जड़ता, अन्धविश्वास, रूढ़ियों और निर्जीव परम्पराओं के लिये स्थान ही नहीं है. समग्र सृष्टि में प्रकृति और पुरुष के बीच सम्बन्धों का गुरुत्वाकर्षण सहज रूप से नियोजित है. देश-काल-परिस्थिति के अनुसार प्रकृति नित्य नूतन सृष्टि का विस्तार करती है. किन्तु महाचिति उसके प्रत्येक क्रियाकलाप में निर्माण का सहज आधार बनती है.

यह सहजात प्रवृत्ति ही जीवों के आनन्द, शान्ति, समरसता, बन्धुता और निर्लिप्त कर्म को अग्रसर करती है. जो फूल आज अपने सौरभ, सौन्दर्य और आकर्षण का इन्द्रजाल बिखेरता है, वह बासी होकर धूल में मिल जाता है. इतिहास में नित्य नूतनता का आकर्षण वैश्विक समाज के लिये क्रान्तिकारी भूमिकाएँ निभाने में अनुप्रेरक बनता है. जो अन्धानुवर्ती हैं, वे बजबजाते नाबदान के अदृश्य कीड़ों की भाँति अन्धकार में अज्ञात रूप से विलीन हो जाते हैं. जिन शक्तिमानों ने क्रान्ति की बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति दी, वे ही इतिहास-पुरुष बन कर आने वाली पीढ़ियों के लिये दृष्टान्त बनते हैं. वेद, पुराण, महाकाव्य, उपनिषद और इतिहास के पन्नों में अंकित ऊर्जावान व्यक्तित्व कालजयी प्रमाण बन चुके हैं.
‘क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः’.
रमणीयता अथवा सुन्दरता क्षण-क्षण में उत्पन्न होने वाली नवता में ही निहित रहती है. जीवन की इतिहास-धारा नवीनता के अमृत में घुल कर सभ्यताओं के सन्दर्भ रचती हुई अनन्तता की ओर निरन्तर सरित है.

उक्त विचार-बिन्दु को कविता में ढालते हुए मैंने कहा था –

“बह रहे ब्रह्माण्ड की बीहड़ तरलता
कठिन घटकों के स्थगन-सी
पृथक पर समवाय कणचयधार क्रीडा-भ्रान्ति-सी रूपान्तरित होती,
काल का मुचकुन्द जिसमें नींद बन कर
देखता सपना त्वरणवह
प्रलय-सर्जन का
कि सपने के फलक पर
भास्वरित अणु-सूर्य की
घटना-विघटना
थिरकना-बजना
दिशा-गति समर-तन्त्रों का
सभी कुछ देखता है.
देखता है -
एक स्वप्निल सत्य
पीता ऊर्जा के स्रोत
गत्वर चेत क्षीरायण
सर्जना-सम्वाह
संज्ञा-जनक शिल्पी
चला कर भ्रमि अग्निवेधी
या कि चुम्बन-सूत्र
नृत्य-विह्वल निम्बुला की झलमलाती लट्टुओं की ज्वाल-माला
गूँथता है.
देखता है –
जिजीविषु को रास करते
तनावों के वृत्त में नित न्यूक्लियस-सा.”

"विजय या वीरगति" - फिदेल और चे


मेरे प्यारे बेटे,
बबर शेर का बेटा शेर होता है.

मेरे बेटे,
तुम्हें पता है कि हम आज कंक्रीट के जंगल में रहने को विवश हैं.
इस जंगल में श्रम और पूँजी के बीच मरणान्तक युद्ध अनवरत जारी है.
इस जंगल की लड़ाई में मानवता के धूर्त दुश्मन हर तरह का दाँव-पेच कर रहे हैं.
ये रक्तपिपासु भेड़ियों के रूप में जगह-जगह बार-बार सामने आ रहे हैं.
मानवता के ये दुश्मन तरह-तरह के वेश बदलने में माहिर हैं.
ये नानारूपधर हैं.

ये भेड़िये आदमखोर हैं.
इनके मुँह इन्सान का खून लग चुका है.
मेहनतकश आम अवाम पर इन का चौतरफा हमला जारी है.
जन-जीवन इन मुट्ठी भर लालची अमानुषों के चलते त्रस्त और अस्त-व्यस्त है.
इनके दारुण अत्याचार की कल्पना मात्र से ही लोग भयाक्रान्त हैं.
अधिकतर छोटे-बड़े लोगों का मनोबल पस्त हो रहा है.
फिर भी धरती के हर कोने पर किसी न किसी रूप में लगातार टक्कर जारी है.

मेरे बेटे,
मुझे तुमसे उम्मीद है कि तुम किसी भी कीमत पर बिकोगे नहीं.
किसी भी हालत में पीठ नहीं दिखाओगे.
किसी भी मोर्चे पर पीछे क़दम नहीं हटाओगे.
कंक्रीट के जंगल की आर-पार की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर टक्कर लोगे.
ये लालची भेड़िये अपनी जीभ लपलपा रहे हैं.
तुम इन को एक-एक मोर्चे पर एक-एक मरहले पर परास्त करोगे.

हमारे पास महाबली भीम का रोमांचकारी चरित्र है.
कीचक ने द्रौपदी का अपमान किया था.
भीम ने कीचक को उसके घर में पटक-पटक कर मार डाला था.
दुशासन ने द्रौपदी का अपमान किया था.
भीम ने दुशासन को पटक कर उसकी छाती फाड़ दी थी.
और कुरुक्षेत्र की युद्ध-भूमि में सिंहनाद किया था.
और उसके गरम लहू से गर्वीली द्रौपदी के खुले केशों को धोया था.
इस तरह उन्होंने द्रौपदी के अपमान का प्रतिशोध लिया था.

मेरे बेटे,
मुझे भी तुम पर गर्व है.
आज मानवता द्रौपदी से अधिक अपमानित हो रही है.
तुम भी इन अत्याचारी जन-शत्रुओं को परास्त कर के भू-लुंठित करोगे.
और फिर भीम की तरह
इनकी छाती फाड़ कर अपने लिये गरम और ताज़ा गोश्त निकालोगे.
और फिर भर पेट खा कर मस्ती से अंगड़ाई लोगे
और एक बार पूरे ज़ोर से दहाड़ोगे.
और तब तुम्हारी दहाड़ से जंगल का कोना-कोना गूँजेगा.
उस दहाड़ को सुनकर हर छोटा-बड़ा समझ जायेगा कि दुश्मन हार चुका.
वह मटियामेट हो चुका.
अब सबका जीवन बेहतर होगा और सबका सम्मान सुरक्षित होगा.

मेरे बेटे,
हम अपने प्यारे देश और हम सब की साझी दुनिया की
हर गली-हर चौराहे पर, हर शहर-हर गाँव में, हर घर-हर चौखट पर,
एक-एक कदम पर
समूची मानवता की मुक्ति के लिये
इन खूँख्वार भेड़ियों से जूझेंगे.

हम सब धरती के सबसे बड़े क्रान्तिकारी छापामार शहीद चे
और अब तक जीवित विजेता फिदेल के
"विजय या वीरगति" के नारे के साथ खड़े हैं.
हम मारने-मरने तक लड़ेंगे.
FIGHT TILL DEATH !
इन्कलाब ज़िन्दाबाद !
पूँजीवाद मुर्दाबाद !!

ढेर सारे प्यार के साथ - तुम्हारा गिरिजेश

वाम-पन्थ क्या है ?


प्रश्न : वाम-पन्थ क्या है ? कहीं यह अभिजात्य का फ़ैशन तो नहीं है ?
उत्तर : वाम पन्थ वह है, जो सत्य और न्याय के लिये, शोषित-पीड़ित मानवता की सेवा के लिये और समाज के विकास को स्वस्थ दिशा देने के लिये तन-मन-जीवन सब कुछ अर्पण करने की ज़िद देता है और विनम्रता सिखाता है. यही हमें पूर्ण मनुष्य बनाने का प्रयास करता है. हमारी पृष्ठभूमि से आयी वैयक्तिक मानवीय कमज़ोरियों को आलोचना और आत्मालोचना के ज़रिये दूर करता है. हमको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करता है और अन्धविश्वासों से मुक्त करता है. जो हमें ख़ुद अपना और अन्य लोगों का सम्मान मन से करना सिखाता है. जो हर अमानवीय चिन्तन, वक्तव्य और आचरण का विरोध करने की बेबाकी पैदा करता है. और दक्षिण पन्थ ठीक इसका विपरीत होता है.

हमारा समाज वर्गीय है. वर्गीय समाज में अलग-अलग वर्गों से आये हुए और अलग-अलग वर्गों के रूप में जीवन जीते हुए अलग-अलग व्यक्तित्वों को अलग-अलग रूप है. सीढीदार समाज की हर सीढ़ी पर जीने वालों में दिखावा और ढोंग बहुत गहरे तक पैठा हुआ है. कई बार हम ऊपर से मुखौटा लगा लेते हैं और जो हैं उससे भिन्न स्वयं को प्रस्तुत करने का दुष्कर प्रयास करते हैं. वाम-पन्थ की प्रगतिशीलता का भी ऐसे ही आवरण के रूप में दुरूपयोग होता रहा है. जैसे साधु वेश और भगवा चोले का परम्परावादियों द्वारा हुआ है. तुलसी ने लिखा है :
"उभरें अन्त न होई निबाहू, कालनेमि जिमि रावन, राहू."
इस रूप में मनुष्य के सहज और स्वस्थ विकास और विनम्रता की श्रमसाध्य साधना करने के लिये प्रेरित करने वाले इस वैज्ञानिक दर्शन को स्वस्थ रूप में प्रस्तुत करने की जगह धूर्तों के कुत्सित अभिनय ने अपमानजनक और घृणित रूप में व्यक्त करके इसके प्रति लोगों के मध्य बुरी छवि बना दी है.
याद आ रही हैं कवि शमशेर बहादुर सिंह की यह कालजयी पंक्ति :
"वाम वाम वाम दिशा, समय साम्यवादी..."
it is said - "LEFT IS ALWAYS RIGHT, THAT IS WHY I AM A LEFTIST !"
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यहाँ तीन स्थापित स्रोतों से इस विषय में जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ.

1. वामपन्थ आन्दोलन से भारत में दो विचारधाराओं के फलस्वरूप विकास हुआ था। 'दक्षिण' और 'वाम' शब्द का प्रथम प्रयोग फ़्राँसीसी क्रान्ति के समय हुआ। राजा के अनुयायी दक्षिणपंथी एवं उनके विरोधी वामपंथी कहे गये। कालांतर में आगे चलकर वामपन्थ को ही 'समाजवाद' एवं 'साम्यवाद' कहा जाने लगा। भारत में यह विचारधारा प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919 ई.) के बाद ही मुख्य रूप से प्रचलन में आई थी। तत्कालीन औद्योगिकी नगर कलकत्ता, बम्बई, कानपुर, लाहौर एवं मद्रास में 'साम्यवाद' का प्रभाव अत्यधिक था। बंगाल में ‘नवयुग’ के सम्पादक मुजफ़्फ़र अहमद, बम्बई में सोशलिस्ट के सम्पादक एस.ए. डांगे, मद्रास के सिंगारवेलु चेट्टिचार एवं लाहौर में ‘इनक्लाब’ के सम्पादक ग़ुलाम हुसैन आदि ने साम्यवादी विचारधारा को भारत में अपना पूर्ण समर्थन देते हुए उसके प्रसार में योगदान किया। भारत में इस आन्दोलन का दो विचारधाराओं-साम्यवाद और कांग्रेस समाजवादी दल के रूप में विकास हुआ। साम्यवाद को रूस के साम्यवादी संगठन ‘कमिन्टर्न’ का समर्थन प्राप्त था, जबकि 'कांग्रेस सोशलिस्ट दल' को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि, यह कांग्रेस का 'वामपंथी दल' था।
(http://hi.bharatdiscovery.org/india/वामपन्थ_आन्दोलन)
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2. In left-right politics, left-wing politics are political positions or activities that accept or support social equality, often in opposition to social hierarchy and social inequality. It typically involves a concern for those in society who are perceived as disadvantaged relative to others and an assumption that there are unjustified inequalities that need to be reduced or abolished.

The political terms Left and Right were coined during the French Revolution (1789–1799), referring to the seating arrangement in the Estates General: those who sat on the left generally opposed the monarchy and supported the revolution, including the creation of a republic and secularization, while those on the right were supportive of the traditional institutions of the Old Regime. Use of the term "Left" became more prominent after the restoration of the French monarchy in 1815 when it was applied to the "Independents".

The term was later applied to a number of movements, especially republicanism during the French Revolution, socialism, communism, and anarchism. Beginning in the last half of the Twentieth Century, the phrase left-wing has been used to describe an ever widening family of movements, including the civil rights movement, anti-war movements, and environmental movements, and finally being extended to entire parties, including the Democratic Party in the United States and the Labour Party in the United Kingdom. In two party systems, the terms "left" and "right" are now sometimes used as labels for the two parties, with one party designated as the "left" and the other "right", even when neither party is "left-wing" in the original sense of being opposed to the ruling class.

History :
Aristocratic heads on pikes - a poster from the French Revolution.
In politics, the term left wing derives from the French Revolution, as radical Montagnard and Jacobin deputies from the Third Estate generally sat to the left of the president's chair in parliament, a habit which began in the Estates General of 1789. Throughout the 19th century in France, the main line dividing left and right was between supporters of the French Republic and those of the Monarchy. The June Days Uprising during the Second Republic was an attempt by the left to assert itself after the 1848 Revolution, but only a small portion of the population supported this.

In the mid-19th century, nationalism, socialism, democracy, and anti-clericalism became features of the French Left. After Napoleon III's 1851 coup and the subsequent establishment of the Second Empire, Marxism began to rival radical republicanism and utopian socialism as a force within left-wing politics. The influential Communist Manifesto by Karl Marx and Friedrich Engels, published in 1848, asserted that all human history is the history of class struggle. They predicted that a proletarian revolution would eventually overthrow bourgeois capitalism and create a classless, stateless, post-monetary society.

In the United States, many leftists, social liberals, progressives and trade unionists were influenced by the works of Thomas Paine, who introduced the concept of asset-based egalitarianism, which theorises that social equality is possible by a redistribution of resources.

The International Workingmen's Association (1864–76), sometimes called the First International, brought together delegates from many different countries, with many different views about how to reach a classless and stateless society. Following a split between supporters of Marx and Mikhail Bakunin, anarchists formed the International Workers' Association. The Second International (1888–1916) became divided over the issue of World War I. Those who opposed the war, such as Vladimir Lenin and Rosa Luxemburg, saw themselves as further to the left.

In the United States after Reconstruction, the phrase "the Left" was used to describe those who supported trade unions, the civil rights movement and the anti-war movement. More recently in the United States, left-wing and right-wing have often been used as synonyms for Democratic and Republican, or as synonyms for liberalism and conservatism respectively.
Positions :
The following positions are typically associated with left-wing politics.

Economics :
Leftist economic beliefs range from Keynesian economics and the welfare state through industrial democracy and the social market to nationalization of the economy and central planning, to the anarchist/ syndicalist advocacy of a council- and assembly-based self-managed anarchist communism. During the industrial revolution, left-wingers supported trade unions. In the early twentieth century, the Left were (with the notable exceptions of libertarians like the anarchists and revolutionary syndicalists) associated with policies advocating extensive government intervention in the economy. Leftists continue to criticize what they perceive as the exploitative nature of globalization, the race to the bottom and unjust lay-offs. In the last quarter of the Twentieth Century the belief that government (ruling in accordance with the interests of the people) ought to be directly involved in the day to day workings of an economy declined in popularity amongst the center left, especially social-democrats who became influenced by 'third way' ideology.

Other leftists believe in Marxian economics, which are based on the economic theories of Karl Marx. Some distinguish Marx's economic theories from his political philosophy, arguing that Marx's approach to understanding the economy is independent of his advocacy of revolutionary socialism or his belief in the inevitability of proletarian revolution. Marxian economics does not exclusively rely upon Marx, it draws from a range of Marxist and non-Marxist sources. The dictatorship of the proletariat or workers' state are terms used by Marxists to describe what they see as a temporary state between the capitalist and communist society. Marx defined the proletariat as salaried workers, in contrast to the lumpen proletariat, who he defined as outcasts of society, such as beggars, tricksters, entertainers, buskers, criminals and prostitutes. The political relevance of farmers has divided the left. In Das Kapital, Marx scarcely mentioned the subject. Mao Zedong believed that it would be rural peasants not urban workers who would bring about proletariat revolution.

Left-libertarians, Libertarian socialists and anarchists believe in a decentralized economy run by trade unions, workers' councils, cooperatives, municipalities and communes, and oppose both government and private control of the economy, preferring local control, in which a nation of decentralized regions are united in a confederation.

According to Barry Clark:
Leftists... claim that human development flourishes when individuals engage in cooperative, mutually respectful relations that can thrive only when excessive differences in status, power, and wealth are eliminated. According to leftists, a society without substantial equality will distort the development of not only deprived persons, but also those whose privileges undermine their motivation and sense of social responsibility. This suppression of human development, together with the resentment and conflict engendered by sharp class distinctions, will ultimately reduce the efficiency of the economy.

The global justice movement, also known as the anti-globalization movement or alter-globalization movement, protests against corporate economic globalization, due to its alleged negative consequences for the poor, workers, the environment and small businesses.

The environment
Main article: Green politics
Both Karl Marx and the early socialist William Morris arguably had a concern for environmental matters. According to Marx, "Even an entire society, a nation, or all simultaneously existing societies taken together ... are not owners of the earth. They are simply its possessors, its beneficiaries, and have to bequeath it in an improved state to succeeding generations." Following the Russian Revolution, environmental scientists such as revolutionary Aleksandr Bogdanov and the Proletkul't organisation made efforts to incorporate environmentalism into Bolshevism, and "integrate production with natural laws and limits" in the first decade of Soviet rule, before Joseph Stalin attacked ecologists and the science of ecology, purged environmentalists and promoted the pseudo-science of Trofim Lysenko. Likewise, Mao Zedong rejected environmentalism and believed that, based on the laws of historical materialism, all of nature must be put into the service of revolution.

From the 1970s onwards, environmentalism became an increasing concern of the left, with social movements and some unions campaigning over environmental issues. For example, the left-wing Builders Labourers Federation in Australia, led by the communist Jack Mundy, united with environmentalists to place Green Bans on environmentally destructive development projects. Some segments of the socialist and Marxist left consciously merged environmentalism and anti-capitalism into an eco-socialist ideology. Barry Commoner articulated a left-wing response to The Limits to Growth model that predicted catastrophic resource depletion and spurred environmentalism, postulating that capitalist technologies were chiefly responsible for environmental degradation, as opposed to population pressures. Environmental degradation can be seen as a class or equity issue, as environmental destruction disproportionately affects poorer communities and countries.

Several left-wing or socialist groupings have an overt environmental concern, whereas several green parties contain a strong socialist presence. For example, the Green Party of England and Wales features an eco-socialist group, Green Left, that was founded in June 2005 and whose members held a number of influential positions within the party, including both the former Principal Speakers Siân Berry and Dr. Derek Wall, himself an eco-socialist and marxist academic. In Europe, some 'Green-Left' political parties combine traditional social-democratic values such as a desire for greater economic equality and workers rights with demands for environmental protection, such as the Nordic Green Left.

Well-known socialist Bolivian President Evo Morales has traced environmental degradation to consumerism. He has said "The Earth does not have enough for the North to live better and better, but it does have enough for all of us to live well." James Hansen, Noam Chomsky, Raj Patel, Naomi Klein, The Yes Men, and Dennis Kucinich have had similar views.
In the 21st Century, questions about the environment have become increasingly politicized, with the Left generally accepting the findings of environmental scientists about global warming, and many on the Right disputing or rejecting those findings. The left is however divided over how to effectively and equitably reduce carbon emissions- the center-left often advocates a reliance on market measures such as emissions trading or a carbon tax, whilst those further to the left tend to support direct government regulation and intervention either alongside or instead of market mechanisms.

Nationalism and anti-nationalism
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See also: Internationalism and Left-wing nationalism
The question of nationality and nationalism has been a central feature of political debates on the Left. During the French Revolution, nationalism was a policy of the Republican Left. The Republican Left advocated civic nationalism, and argued that the nation is a "daily plebiscite" formed by the subjective "will to live together." Related to "revanchism", the belligerent will to take revenge against Germany and retake control of Alsace-Lorraine, nationalism was sometimes opposed to imperialism. In the 1880s, there was a debate between those, such as Georges Clemenceau (Radical), Jean Jaurès (Socialist) and Maurice Barrès (nationalist), who argued that colonialism diverted France from the "blue line of the Vosges" (referring to Alsace-Lorraine), and the "colonial lobby", such as Jules Ferry (moderate republican), Léon Gambetta (republican) and Eugène Etienne, the president of the parliamentary colonial group. After the Dreyfus Affair however nationalism became increasingly associated with the far right.

The Marxist social class theory of proletarian internationalism asserts that members of the working class should act in solidarity with working people in other countries in pursuit of a common class interest, rather than focusing on their own countries. Proletarian internationalism is summed up in the slogan, "Workers of all countries, unite!", the last line of The Communist Manifesto. Union members had learned that more members meant more bargaining power. Taken to an international level, leftists argued that workers ought to act in solidarity to further increase the power of the working class.

Proletarian internationalism saw itself as a deterrent against war, because people with a common interest are less likely to take up arms against one another, instead focusing on fighting the ruling class. According to Marxist theory, the antonym of proletarian internationalism is bourgeois nationalism. Some Marxists, together with others on the left, view nationalism, racism (including anti-Semitism), and religion, as divide and conquer tactics used by the ruling classes to prevent the working class from uniting against them. Left-wing movements therefore have often taken up anti-imperialist positions. Anarchism has developed a critique of nationalism that focuses on nationalism's role in justifying and consolidating state power and domination. Through its unifying goal, nationalism strives for centralization, both in specific territories and in a ruling elite of individuals, while it prepares a population for capitalist exploitation. Within anarchism, this subject has been treated extensively by Rudolf Rocker in Nationalism and Culture and by the works of Fredy Perlman, such as Against His-Story, Against Leviathan and "The Continuing Appeal of Nationalism".

The failure of revolutions in Germany and Hungary ended Bolshevik hopes for an imminent world revolution and led to promotion of "Socialism in One Country" by Joseph Stalin. In the first edition of the book Osnovy Leninizma (Foundations of Leninism, 1924), Stalin argued that revolution in one country is insufficient. But by the end of that year, in the second edition of the book, he argued that the "proletariat can and must build the socialist society in one country". In April 1925 Nikolai Bukharin elaborated the issue in his brochure Can We Build Socialism in One Country in the Absence of the Victory of the West-European Proletariat? The position was adopted as State policy after Stalin's January 1926 article On the Issues of Leninism (К вопросам ленинизма). This idea was opposed by Leon Trotsky and his followers who declared the need for an international "permanent revolution". Various Fourth Internationalist groups around the world who describe themselves as Trotskyist see themselves as standing in this tradition, while Maoist China supported Socialism in One Country.

Some link left-wing nationalism to the pressure generated by economic integration with other countries encouraged by free-trade agreements. This view is sometimes used to justify hostility towards supranational organizations such as the European Union. Left-wing nationalism can also refer to any nationalism which emphasises a working-class populist agenda which seeks to overcome perceived exploitation or oppression by other nations. Many Third World anti-colonial movements adopted left-wing and socialist ideas.

Third-Worldism is a tendency within leftist thought that regards the division between First World developed countries and Third World developing countries as being of high political importance. This tendency supports national liberation movements against what it considers imperialism by capitalists. Third-Worldism is closely connected with African socialism, Latin American socialism, Maoism,[66][third-party source needed] Pan-Africanism and Pan-Arabism. Some left-wing groups in the developing world — such as the Zapatista Army of National Liberation in Mexico, the Abahlali baseMjondolo in South Africa and the Naxalites in India — argue that the First World Left takes a racist and paternalistic attitude towards liberation movements in the Third World.

Religion :
The original French left-wing was anti-clerical, opposing the influence of the Roman Catholic Church and supporting the separation of church and state. Karl Marx asserted that "Religion is the sigh of the oppressed creature, the heart of a heartless world, and the soul of soulless conditions. It is the opium of the people." In Soviet Russia the Bolsheviks originally embraced "an ideological creed which professed that all religion would atrophy" and "resolved to eradicate Christianity as such." In 1918 "ten Orthodox hierarchs were summarily shot" and "children were deprived of any religious education outside the home." Today in the Western world, those on the Left usually support secularization and the separation of church and state.

Religious beliefs, however, have also been associated with some left-wing movements, such as the American abolitionist movement and the anti-capital punishment movement. Early socialist thinkers such as Robert Owen, Charles Fourier, and the Comte de Saint-Simon based their theories of socialism upon Christian principles. From St. Augustine of Hippo's City of God through St. Thomas More's Utopia major Christian writers defended ideas that socialists found agreeable.[citation needed] Other common leftist concerns such as pacifism, social justice, racial equality, human rights, and the rejection of excessive wealth can be found in the Bible. In the late 19th century, the Social Gospel movement arose (particularly among some Anglicans, Lutherans, Methodists and Baptists in North America and Britain) which attempted to integrate progressive and socialist thought with Christianity in faith-based social activism, promoted by movements such as Christian Socialism. In the 20th century, the theology of liberation and Creation Spirituality was championed by such writers as Gustavo Gutierrez and Matthew Fox.

There are also left-wing movements such as Islamic socialism and Buddhist socialism. There have been alliances between the Left and anti-war Muslims, such as the Respect Party and the Stop the War Coalition in Britain. In France, the Left has been divided over moves to ban the hijab from schools, with some supporting a ban based on separation of church and state, and others opposing the ban based on personal freedom.

Social progressivism and counterculture :
Social progressivism is another common feature of the modern Left, particularly in the United States, where social progressives played an important role in the abolition of slavery, women's suffrage, civil rights, and multiculturalism. Progressives have both advocated prohibition legislation and worked towards its repeal. Current positions associated with social progressivism in the West include opposition to the death penalty and the War on Drugs, and support for legal recognition of same-sex marriage, cognitive liberty, distribution of contraceptives, public funding of embryonic stem-cell research, and the right of women to choose abortion. Public education was a subject of great interest to groundbreaking social progressives such as Lester Frank Ward and John Dewey who believed that a democratic system of government was impossible without a universal and comprehensive system of education.

Various counterculture movements in the 1960s and 1970s were associated with the "New Left". Unlike the earlier leftist focus on union activism, the "New Left" instead adopted a broader definition of political activism commonly called social activism. U.S. "New Left" is associated with the Hippie movement, college campus mass protest movements and a broadening of focus from protesting class-based oppression to include issues such as gender, race, and sexual orientation. The British "New Left" was an intellectually driven movement which attempted to correct the perceived errors of "Old Left".

The New Left opposed prevailing authority structures in society, which it termed "The Establishment", and became known as "anti-Establishment." The New Left did not seek to recruit industrial workers, but rather concentrated on a social activist approach to organization, convinced that they could be the source for a better kind of social revolution. This view has been criticised by some Marxists (especially Trotskyists) who characterized this approach as 'substitutionism'- or what they saw as the misguided and apparently non-Marxist belief that other groups in society could 'substitute' for the revolutionary agency of the working class.

Many early feminists and advocates of women's rights were considered left-wing by their contemporaries. Feminist pioneer Mary Wollstonecraft was influenced by the radical thinker Thomas Paine. Many notable leftists have been strong supporters of gender equality, such as: the Marxists Rosa Luxemburg, Clara Zetkin and Alexandra Kollontai, the anarchist Emma Goldman, and the socialists Helen Keller and Annie Besant. Marxists such as Clara Zetkin and Alexandra Kollontai however, though supporters of radical social equality for women, opposed feminism on the grounds that it was a bourgeois ideology. Marxists were responsible for organizing the first International Women's Day events.

In more recent times[clarify] the women's liberation movement is closely connected to the New Left and other new social movements that challenged the orthodoxies of the Old Left. Socialist feminism (e.g.Freedom Socialist Party, Radical Women) and Marxist feminism (e.g. Selma James) saw themselves as a part of the left that challenged what they perceive to be male-dominated and sexist structures within the left. Liberal feminism is closely connected with left-liberalism, and the left-wing of mainstream American politics. (e.g. the National Organization for Women).

Varieties :
The spectrum of left-wing politics ranges from centre-left to far left (or ultra-left). The term centre left describes a position within the political mainstream. The terms far left and ultra-left refer to positions that are more radical. The centre-left includes social democrats, social liberals, progressives and also some democratic socialists and greens (in particular the eco-socialists). Centre-left supporters accept market allocation of resources in a mixed economy with a significant public sector and a thriving private sector. Centre-left policies tend to favour limited state intervention in matters pertaining to the public interest.

In several countries, the terms far left and radical left have been associated with varieties of communism, autonomism and anarchism. They have been used to describe groups that advocate anti-capitalist, identity politics or eco-terrorism. In France, a distinction is made between the left (Socialist Party and Communist Party) and the far left (Trotskyists, Maoists and Anarchists). The US Department of Homeland Security defines left-wing extremism as groups who want "to bring about change through violent revolution rather than through established political processes."

In China, the term Chinese New Left denotes those who oppose the current economic reforms and favour the restoration of more socialist policies. In the Western world, the term New Left refers to cultural politics. In the United Kingdom in the 1980s, the term hard left was applied to supporters of Tony Benn, such as the Campaign Group and those involved in the London Labour Briefing newspaper, as well as Trotskyist groups such as the Militant tendency and Socialist Organiser. In the same period, the term soft left was applied to supporters of the British Labour Party who were perceived to be more moderate. Under the leadership of Tony Blair and Gordon Brown, the British Labour Party re-branded itself as New Labour in order to promote the notion that it was less left-wing than it had been in the past. One of the first actions however of the Labour Party leader who succeeded them, Ed Miliband, was the rejection of the "New Labour" label.

Left-wing post-modernism opposes attempts to supply universal explanatory theories, including Marxism, deriding them as grand narratives. It views culture as a contested space, and via deconstruction seeks to undermine all pretensions to absolute truth. Left-wing critics of post-modernism assert that cultural studies inflates the importance of culture by denying the existence of an independent reality.

In 1996, physicist Alan Sokal wrote a nonsensical article entitled "Transgressing the Boundaries: Toward a Transformative Hermeneutics of Quantum Gravity". The journal Social Text published the paper in its Spring/Summer 1996 issue, whereupon Sokal publicly revealed his hoax. While this action was interpreted as an attack upon leftism, Sokal, who was a committed supporter of the Sandinista movement in Nicaragua during the 1980s, intended it as a critique from within the Left. He said he was concerned about what he saw as the increasing prevalence on the left of "a particular kind of nonsense and sloppy thinking... that denies the existence of objective realities". He called into question the usefulness of such theories to the wider left movement, saying he "never understood how deconstruction was meant to help the working class."
(http://en.wikipedia.org/wiki/Left-wing_politics)
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3. DEFINING AND UNDERSTANDING THE LEFT
The origins of the modern left can be traced back to the famous passage in Rousseau’s Discourse on the Origin and Foundations of Inequality, in which he condemned the institution of private property:

“The first man, who after enclosing a piece of ground, took it into his head to say, ‘this is mine,’ and found people simple enough to believe him, was the real founder of civil society.”

Added Rousseau: “How many crimes, how many wars, how many murders, how many misfortunes and horrors, would that man have saved the human species, who pulling up the stakes or filling up the ditches should have cried to his fellows: Beware of listening to this impostor; you are lost, if you forget that the fruits of the earth belong equally to us all, and the earth itself to nobody!”

Around the 1830s, a faction of French liberals gravitated toward Romanticism and the philosophy of the late Rousseau, proclaiming that capitalism, private property, and the increasing complexity of modern society were agents of moral decay -- both for the individual and for society at large. This is essentially the worldview that has made its way, through history, into the collective mind of the modern left; it is a worldview calling for a revolution that not only will topple the existing capitalist order and punish its corrupt leaders, but that also will replace that order with a socialist regime where the utopian ideals of perfect justice and equality will reign. Such an ambition can be put into effect only by a totalitarian state with the authority to micromanage every facet of human life, precisely the end-point toward which the policies and crusades of the modern left are directed.

The contemporary left holds that non-socialist societies are composed largely of dominators and the dominated, oppressors and the oppressed. The alleged cause of this social arrangement is the economic system of free-market capitalism, which is viewed by the left as the root of all manner of social ills and vices -- racism, sexism, alienation, homophobia, imperialism. In the calculus of the left, capitalism is an agent of tyranny and exploitation that presses its boot upon the proverbial necks of a wide array of victim groups -- blacks and other minorities, women, homosexuals, immigrants, and the poor, to name but a few. That is why according to the left, the United States (historically the standard-bearer of all capitalist economies) can only do wrong.

To eliminate America’s inherent injustices, the left seeks to invert the power hierarchy, so that the groups now said to be oppressed become the privileged races and classes (and gender) of the new social order. The left’s quest to transform the “dominated” into dominators, and vice versa, draws its inspiration from the Communist Manifesto, which asserts that “[t]he history of all hitherto existing society is the history of class struggle.” The struggle identified by the Manifesto was that of the proletarians and their intellectual vanguard, who, armed with the radical utopian vision of socialism, were expected to launch a series of civil wars in their respective countries -- battles that would topple the “ruling classes” and the illegitimate societies they had established.

According to Marxist theory, these conflicts would rip each targeted society apart and create a new revolutionary world order from its ruins. In an effort to bring about this utopia, the contemporary left has formed a broad alliance, or united front, composed of radicals representing a host of demographic groups that are allegedly victimized by American capitalism and its related injustices. Each constituent of this alliance -- minorities, homosexuals, women, immigrants, the poor -- contributes its voice to a chorus that aims to discredit the United States specifically -- and Western culture generally -- as abusers of the vulnerable. Nor is the left’s list of victim groups limited only to human beings; in the worldview of leftwing environmentalists and animal rights activists, even certain species of shrubs, trees, insects, and rodents qualify as victims of capitalism's ravages.

The seeds of the contemporary anti-American left sprouted in the New Left’s rebellion against the classical liberalism of the post-World War II era. True to its tradition in the New Deal, that liberalism was strongly supportive of the civil-rights movement, the eradication of poverty, and other social causes based on an amelioration of inequality. And on the international front, this “centrist,” post-World War II liberalism stood firmly against communist totalitarianism. Indeed it was the “Cold War liberals,” rather than the conservative movement, that recognized the Soviet threat and engaged and fought the USSR through a policy of containment.

Then, in the 1960s, came the New Left, a movement that rejected classical centrist liberalism because of its gradualism in domestic policy and its anti-totalitarianism in foreign affairs. At its beginning, the New Left also rejected Stalinism (though it saw Stalinism as perilously close to being morally equivalent to the U.S.). But the New Left also romanticized the charismatic revolutionaries of the Third World as an alterative to the "red" on the one hand, and to the "red, white and blue" on the other. As a result, the New Left wound up romanticizing a whole new set of totalitarian heroes -- figures such as Mao Zedong, Ho Chi Minh, Fidel Castro, and Daniel Ortega.

Changed by the war in Vietnam from a movement theoretically hoping to make America better, into one that believed America was unredeemable, the New Left became a “revolutionary” movement in its approach to domestic policies and foreign affairs. Targeting “Cold War liberals,” it made them an endangered species and attacked the Democratic Party which had mirrored their beliefs and principles. By 1972, after the trauma of the 1968 Chicago convention, the New Left “progressives” had not only killed the post-war Democratic Party, but, through the nomination of George McGovern for President, seized and inhabited its corpse.

The New Left effectively exiled the leading figures of the old centrist liberalism, especially figures such as Hubert Humphrey and Henry “Scoop” Jackson. After accomplishing this parricide, the New Left not only controlled the Democratic Party but also appropriated the classification of "liberalism," thus accomplishing something that the Communist Party USA (CPUSA) had long tried to do when it called communism “liberals in a hurry.” The CPUSA had not succeeded in this because the true liberals had refused to allow such a definitional outrage. But because their credibility and self-confidence was so deeply shaken by their backing of the Vietnam War, these genuine liberals were unable to hold the line against attacks from the New Left “progressives,” and they lost not only their party but also the term which had defined their principles. Many of these centrist liberals wound up moving toward Reaganism and neo-conservatism when they saw what those who now called themselves “liberals” actually believed and wanted to accomplish through their control of the Democratic Party.

Calling themselves “liberals,” today’s leftists (descended from the New Left) claim the moral high ground as self-anointed exemplars of compassion and enlightenment -- counterweights to the supposedly “reactionary” conservatives they depict as heartless monsters. The modern left understands that in order to win the hearts and minds of Americans, it must present its totalitarian objective -- the uncompromising destruction of the status quo -- in the non-threatening lexicon of traditional Western values; that is, it must cite, as its animating purpose, the promotion of such lofty ideals as “human rights,” “civil rights,” “civil liberties,” and above all, “social justice,” or the “correction” of the free market’s inherent inequalities through political interventions of a Marxist nature. As the perennial Socialist presidential candidate Norman Thomas once said: “The American people will never knowingly adopt socialism. But under the name of ‘liberalism,’ they will adopt every fragment of the socialist program, until one day America will be a socialist nation, without knowing how it happened.”

Toward this deceitful end, the left co-opted, in the years following the Vietnam War, the name of “liberalism,” long honored in the West as the movement that had brought freedom, dignity, economic opportunity, and legal protections to millions of people who had been denied those advantages everywhere on the globe since the very dawn of history. Draping their programs and objectives in the rhetoric of classical "liberalism," leftists embarked on the revolutionary enterprise of redefining, subtly and incrementally, what most Americans understood liberal policies to be. Over the course of years and decades, the leaders of the left championed crusades and ideals that bore ever-decreasing resemblance to the liberal causes of a prior era, yet they invariably identified both themselves and their evolving causes as “liberal.” Most significantly, they were largely successful in getting the media and academic elites to parrot their redefinition of that designation at every stage along the way. Thus, programs that were in fact leftist and socialist were enacted by legislators and social reformers in the name of “liberalism,” whose reputation for noble intentions served not only to shield those programs from public criticism, but in fact to win wide public approval of them.

When the term “liberalism” (from the Latin word liberalis, meaning “pertaining to a free man”) first emerged in the early 1800s, its hallmarks were a belief in individual rights, the rule of law, limited government, private property, and laissez faire economics. These would remain the defining characteristics of liberalism throughout the liberal epoch (generally identified as the period of 1815-1914). But the contemporary version of liberalism is a parody of its predecessor. It is a stalwart champion of group rights and collective identity, rather than of individual rights and responsibilities (e.g., the racial preference policies known as affirmative action, and the left's devotion to identity politics generally); the circumvention of law rather than the rule of law (as exemplified by the flouting of immigration laws and nondiscrimination laws, and by a preference for judicial activism whereby judges co-opt the powers that rightfully belong to legislators); the expansion of government rather than its diminution (favoring ever-escalating taxes to fund a bloated welfare state and a government that oversees virtually every aspect of human life); and the redistribution of wealth (through punitive taxes and, again, a mushrooming welfare state) rather than its creation through free markets based on private property.

Another hallmark of classical liberalism was its spirit of toleration for divergent beliefs and ideas, and of respect for individual freedom of thought. Yet in modern leftism, we find precisely the opposite: intolerance of opposing viewpoints, and the promotion of group-think. The left interprets as treason any deviation from its own intellectual orthodoxy, if exhibited by a member of a so-called “victim” group who theoretically ought to occupy a place in the phalanx of revolutionary agitators. We see this phenomenon manifested with particular clarity by black leftists who excoriate black conservatives as “race traitors,” “house slaves,” “Oreos,” and “Uncle Toms.”

David Horowitz has made the following cogent observations about leftist intolerance:

"Since ideologies of the left derive from commitments to an imagined [utopian] future, to question them is to provoke a moral rather than an empirical response: Are you for or against the future equality of human beings? To demur from a commitment to the progressive viewpoint is thus not a failure to assess the relevant data, but an unwillingness to embrace the liberated future. It is to will the imperfections of the present order. In the current political cant of the left, it is to be 'racist, sexist, classist,' a defender of the oppressive status quo.

"That is why not only radicals, but even those who call themselves liberals, are instinctively intolerant towards the conservative opposition. For [leftists], the future is not a maze of human uncertainties and unintended consequences. It is a moral choice. To achieve the socially just future requires only that enough people decide to will it. Consequently, it is perfectly consistent for [leftists] to consider themselves morally and intellectually enlightened, while dismissing their opponents as immoral, ignorant, or (not infrequently) insane."

Conservative author and radio host Dennis Prager gives insight into the nature of leftism by contrasting its values to those of Americanism. He writes: "In a nutshell, [Americanism's values] are what I call the American Trinity: 'In God we trust,' 'Liberty' and 'E Pluribus Unum.' The left has successfully made war on all three -- substituting secularism for God and religion in as much of American life as possible; substituting equality (of result) for liberty; and multiculturalism is the opposite of 'E Pluribus Unum.'" Prager points out that multiculturalism emphasizes not the unity of Americans, but the divisions that exist between them in terms of race, gender, and class.

Prager adds that the Left sees the world "through the prism of race, gender and class rather than through the moral prism of right and wrong." "One of the more dangerous features of the Left," he elaborates, "has been its replacement of moral categories of right and wrong, and good and evil with three other categories: black and white (race), male and female (gender), and rich and poor (class)."

Contemporary “liberalism” is leftism in disguise. Thus the travesty of the “liberal” label being widely attached to individuals such as Michael Moore, George Soros, Noam Chomsky, Al Sharpton, and Jane Fonda — all of whom are opponents of the classical liberalism which defined America and the West for two centuries.
(http://www.discoverthenetworks.org/viewSubCategory.asp?id=1217)

अन्धानुकरण




अन्धानुकरण के नमूने क्या और भी हैं ?
अगर हों, तो कृपया मुझे भी बताइए.
Om Sudha - "कोई बहुत ही प्रगतिशील मुसलमान बताएगा कि इस भीषण गर्मी में बुरके (हिजाब) का क्या उपयोग है ????"

और वकील लोग अपने गरम देश में गर्मी में भी काली कोट पहिन कर और लोगों से अधिक गर्मी क्यों झेलते रहते हैं ?




बारिश के लिए कुत्ते और कुतिया की शादी
अन्ध-विश्वास मुर्दाबाद !
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज़िन्दाबाद !!
Afroz Alam - "कल अखबार मे पढा मघ्य प्रदेश के एक इलाके के लोगो ने बारिश कराने के लिए
कुत्ते और कुतिया की शादी कराई। पढ़ कर हसी के साथ साथ दुख भी हुआ. साईन्स के इस दौर मे साईन्स ने सब कुछ बता दिया फिर भी आम लोग अंघविश्वास मे जकड़े हुए है आम पढा लिखा हिन्दू जानता है कि सूर्य और चन्दर गर्हणा कैसे लगता है लेकिन वो भीराहू केतू को शान्त करने मे लगा रहता है।लानत भेजो ऐसे संघ विश्वासो पर विग्यान सीखो।"

"बारिश के लिए इंदौर में कराई कुत्ते-कुतिया की शादी
इंदौर : मॉनसून की आमद में देरी से बेहाल लोगों ने अजीबोगरीब टोटका आजमाते हुए कुत्ते और कुतिया की प्रतीकात्मक शादी करायी।

मूसाखेड़ी इलाके में कुत्ते और कुतिया की प्रतीकात्मक शादी कराने वाले लोगों के समूह के अगुवा रमेश सिंह तोमर ने संवाददाताओं से कहा, ‘बारिश नहीं होने से आम लोग बेहद परेशान हैं और महंगाई बढ़ने का खतरा भी गहराता जा रहा है। इसलिये हमें कुत्ते और कुतिया की शादी का टोटका आजमाना पड़ा।’ तोमर ने कहा, ‘हमारी मान्यता है कि इस टोटके से बारिश के देवता इंद्र प्रसन्न होंगे और बारिश का सिलसिला शुरू हो जायेगा।’ उन्होंने कहा कि कुत्ते और कुतिया की शादी में वे अधिकांश रस्में निभायी गयीं, जो इंसानों के वैदिक पद्धति से कराये जाने वाले विवाह में पूरी की जाती हैं।

तोमर ने बताया, ‘हमने एक स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल में कुत्ते को बैठाकर उसकी बारात निकाली। इसके बाद वैदिक पद्धति से कुत्ते और कुतिया की शादी करायी। इस दौरान कुत्ते और कुतिया के फेरे भी कराये गये।’ बारिश के अड़ियल बादलों को मनाने के लिये मध्यप्रदेश के अलग-अलग अंचलों में बछड़े-बछिया, गधा-गधी और मेंढक-मेंढकी के प्रतीकात्मक विवाह के दृश्य भी इन दिनों आम हैं। कुछ लोगों की मान्यता है कि इन टोटकों से घनघोर बारिश होती है।"

http://zeenews.india.com/hindi/news/state/dogs-marriage-indore-rain/226910
विडियो देखिए इस लिंक पर _
http://hindi.webdunia.com/news-regional/कुत्ता-कुतिया-का-ब्याह-देखें-वीडियो-1140702072_1.htm

रमजान मे शैतान कैद होता है या मुसलमान
मेरे दोस्त, मैं तो यूँ ही ग़रीबी में जीता हूँ. साधारण लोगों के स्तर से नीचे के स्तर का खाना मयस्सर होता है. अब अपने अनन्य मित्र डॉ. Afroz Alam की मैत्री के चक्कर में 'अफ्तारी' का शानदार नाश्ता भी मिलना मुश्किल ही दिखाई दे रहा है. मगर फिर भी मैं उनके विचारों से सहमत हूँ. चाहे नाश्ते की कुर्बानी ही क्यों न देनी पड़े. औरों के लिये चाहे जो हो, मेरे लिये तो सारे ही त्यौहार केवल और बेहतर भोजन पा सकने का दुर्लभ अवसर भर होते हैं.

Afroz Alam -
"रात को एक बजे उठ कर सेहरी बनाना,
फिर फजिर की नमाज पढना,
दिन भर रोजे रखना,
पानी नही पीना,
सिनेमा नही देखना,
संगीत नही सुनना,
सात बजे रोजा खोलना,
फिर साढे आठ बजे तरावीह पढना.
यार मै कनफियुज हूं - रमजान मे
शैतान कैद होता है या मुसलमान।"
मेराज अनवर भाई की वाल से।

______यक्ष-प्रश्न______


मेरे प्यारे युवा दोस्तो,
आज आप से एक बात कहने का मन कर रहा है....
अभी आपने उत्साह और उत्तेजना से लबरेज़ एक दौर देखा....

अभी आपने चुनाव 2014 की तरह-तरह की लहरों के ज्वार-भाटे को देखा...
अभी आप ख़ुद भी उन लहरों में पूरे जोश के साथ जिये हैं....
अभी आप ख़ुद भी हर एक भाटे के साथ डूबे हैं और हर एक ज्वार के साथ उतराये हैं....

वह एक तमाशे का दौर था...
अब वह दौर ख़त्म हो चुका है....
अब उस दौर के बाद का दौर है....

अब कृपया धीरज के साथ 16 मई की प्रतीक्षा कीजिए....
16 मई के बाद एक और दौर शुरू होगा....
मगर वह दौर भी महज़ एक दूसरे तमाशे का ही दौर होगा....
इस या उस तमाशे के हर एक दौर को देखते चलिए....

इस या उस किसी भी तमाशे से हमारी ज़िन्दगी बदलने वाली नहीं है....
इस या उस किसी भी बाज़ीगर में हमारी मुश्किलों का हल निकालने की कूबत है ही नहीं...
इस देश की मुश्किलों का हल खोजने के लिये आप को ख़ुद ही कुछ करना होगा...

इस देश में आप से अधिक ज़िम्मेदार कोई और नहीं है....
इस देश में आप से अधिक ईमानदार कोई और नहीं है....
इस देश की समस्याओं से आप से अधिक परेशान कोई और नहीं है...
इस देश को आपसे अधिक प्यार करने वाला कोई और नहीं है....
यह देश किसी और से अधिक ख़ुद आपका अपना है...
इस देश का भविष्य आप ही हैं.....

प्रश्न केवल एक है -
"कौन बचायेगा देश" ?
उत्तर भी केवल एक ही है -
"आप ! केवल आप !!"

मुझे केवल आप से ही उम्मीद है....
वही कीजिए जो आप को सही लगे...

हमेशा की तरह हमेशा ही
हर क़दम पर ताज़िन्दगी आपके साथ

ढेर सारे प्यार के साथ
- आपका गिरिजेश
(13.5.14)



एक सलाह और एक चुनौती :

दोनों मुफ्त में दे रहा हूँ. लेना चाहें, तो स्वागत है.
Angraj Tiwari - "aap to suruaat se pehle hi der gye abhi modi ji pm bnenge aur bhut jyada desh ka vikas krenge lekin wo to apko apni secular ankh se dikhega nhi aur aap ko kuch smjh bhi nhi aiga aap to kewal muslimo ko khus krne ke liye modi ki likhte rhi yega aa rha hai bharat mata ka sher aur desh ke gddaro ko sbak sikhaega jai modi ji"

माननीय श्री Angraj Tiwari जी,
अब भी आप संयत स्वर और मर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं.
अफ़सोस है आपके स्तर पर. "aap to suruaat se pehle hi der gye" और "aap ko kuch smjh bhi nhi aiga aap to kewal muslimo ko khus krne ke liye modi ki likhte rhi yega aa rha hai" इन विचारों से आप अपनी ही औकात नाप रहे हैं.
मैं कितना डरपोक हूँ और कितना मुसलमानों को खुश करता रहा हूँ.
मुझे अफ़सोस है कि मेरे ही आज़मगढ़ के निवासी होने के बाद भी आप ऐसे अधकचरे मूल्यांकन के साथ मेरी ही वाल पर अपनी कुत्सित मानसिकता व्यक्त कर रहे है.
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पक्षधर होने के चलते मैं tolerate करता रहता हूँ.
तो कृपया इस छूट का नाजायज लाभ अब तो मत लीजिए.
आपका मोदी जो कर लेगा या कर देगा, वह तो सामने ही आयेगा.
आँख और समझ दोनों ही केवल आप ही के पास है.
और सारा देश तो अन्धों और मूर्खों का ही है.
मेरा अनुरोध है कि अगर इन्ही भावनाओं को व्यक्त करते रहना है,
तो कृपया अब आपको मुझसे दूरी बना लेनी चाहिए
या फिर
मेरे आवास पर आ कर मेरी हिम्मत को आजमा लेना चाहिए.
फेसबुक पर मेरे डर जाने का फैसला कर पाना आप जैसे अन्धमोदीभक्तों के लिये नामुमकिन है. सलाह मुफ्त दे रहा हूँ.
चुनौती भी साथ में दे ही रहा हूँ.
स्वीकार करने का दम हो, तो स्वागत है.
आपका अभी भी मित्र - गिरिजेश

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"अगर ऐसा हो गया, तो....!"


आइए आपको एक चुटकुला सुनाऊँ.
चुटकुला अभी-अभी तैयार हुआ है.

रामदेव ने एक दवा बनायी है.
मेरे एक मित्र ने मुझे वह दवा ला कर दी.
वह दवा आँख के लिये है.
उसका नाम 'दृष्टि आई ड्रॉप' है.
उस दवा में प्याज और लहसुन का स्वरस है.
वह दवा प्याज की वजह से आँख में ख़ूब तेज़ लगती है.

अभी-अभी मैंने एक युवक से कहा -
"अगर आप की आँख में तकलीफ़ है,
तो रामदेव वाली दवा डाल देता हूँ."

उन्होंने तड़ से पलट कर जवाब दिया - "मैं वह दवा नहीं डालूँगा.
क्योंकि अगर वह दवा मैंने अपनी आँख में डाली
और मेरी आँख भी रामदेव की तरह हो गयी,
तो मैं क्या करूँगा !"

मैंने तुरन्त कहा - "यह तो वाकई ख़तरनाक मामला है.
बेहतर होगा कि आप वह दवा मत ही डालिए."

Thursday, 8 May 2014

History of Azamgarh :


Origin of Name of Azamgarh : 
The district is named after its headquarters town, Azamgarh, which was founded in 1665 by Azam, son of Vikramajit. Vikramajit a descendant of Gautam Rajputs of Mehnagar in pargana Nizamabad, like some of his predecessors, had embraced the faith of Islam. He had a Muhammadan wife who bore him two sons Azam and Azmat. While Azam gave his name to the town of Azamgarh, and the fort, Azmat constructed the fort and settled the bazar of Azmatgarh in pargana Sagri.

ANCIENT PERIOD
Azamgarh, one of the easternmost districts of the State, once formed a part of the ancient Kosala kingdom, except the north-eastern part of it which was included in the kingdom of Malla. Kosala figured prominently among the four powerful monarchies of northern India during the time of the Buddha when its

prosperity reached its zenith. The kingdom of Kosala was bounded on the east by the the Ganga and the kingdom of Magadha, on the north-east by the territories of Vriji-Lichchhavis and those of Mallas on the north by the territories of the Sakyas, on the west by Surasena and on the south and south-west by the kingdom of Vatsa with Kausambi as its capital. The district of Azamgarh possesses hardly any remains of much antiquarian value, and of the few that exist neither the origin nor the history are for the most part known. There are some deserted sites, forts and tanks to be seen in every tehsil of this district and they carry vague legends regarding their builders. The early history of the district can be traced only from the extant antiquities.

That the region including this district was inhabited in ancient times is testified by the presence of old indigenous people like Bhars or Rajbhars, Soeris and Cherus who possibly represent the descendants of the aborigines of this area. Vestiges of numerous embankmerts, tanks, caverns and stone forts are found in this district which still bear out their energy and skill. According to a local tradition, the country of the Bhars, which was included in the kingdom of Ayodhya in Rama's time, was occupied by Rajbhars and Asuras. The Bhars have left behind them large mud forts of which specimens may be seen at Harbanspur 

and Unchagaon near the town of Azamgarh. The largest of the forts in the district of Azamgarh is that of Ghosi which was built by Raja Ghosh but there is a legend that the fort was erected by Asuras or demons,

who are also stated to have constructed a tunnel between Narja Tal and the fort of Chaubhaipur and Vrindavan over a mile (1.6 km.) distant. None of the architectural remains of any importance are found here but the well preserved ruins of a large mud fort which was discovered in 1838 A.D. lend interest and antiquity to Ghosi.

According to H.Elliot, Soeris and Cherus belonged to one family. Probably the Bhars, Soeirs and Cherus together with other aboriginal tribes which have not been so successful in maintaining their identity were in remote period of antiquity were only one race. A Rajbhar chief named Asildeo is said to have lived at Dihaduar in pargana Mahul of tehsil Phulpur of the district ; and the old tanks and mounds at that place are said to be signs of his power; but the Bachgoti Rajputs of Arara in tappa Nandaon of tehsil Azamgarh claim him as their ancestor, repudiate him for the title of Rajbhar, and according to their opinion he was an officer of a local government.

Near the village of Araon Jahanianpur and Anwank in paragana Kauria there are the ruins of two large mud forts, the first is ascribed to Ayodhya Raj, Rajbhar and the second is pointed out to belong to raja Parikshit, it is suppose that Ayodya Raj resided in the kot of Araon-Jahanianpur, but like Asildeo he is claimed as an ancestor by the Palwar Rajputs; and a smiler claim is made in the case of one raja Garakdeo who lived in Sagari, a tahsil headquarters town, of the district of Azamgarh. According to another tradition , Parikhit, the elaest sun of Kuru, once occupied tract, now called Nizamabad and old kot (at Anwank) near which the battle was fought between him and the Muhammadans, it is supposed that the headquartes of the Bhars may have been in pargana Bhadaor, which is said to have been called Bharaon originally and were called after them ; and the Bhar power may have extended over the parts of Sikandarpur, both this pargana and Bhadaon having been formally pargaras of Azamgarh. The farmer inhabitants of Pawai of this district are said to have been Rajbhar or Bhars and to the Bhars is attributed a large mud fort, the remains of which still exist, tradition of the series to be found only in pargana Deogaon, in tehsil lalganj, to the north of the Gangi river; and those relating to Sengarias in the same paragana to the south of that stream. 

MEDIAEVAL PERIOD
The second battle Tarain in 1192 A.D. established the Islamic power in India, But the region including the district of Azamgarh does not appear to have gone under the immediate sovereignty of the Muslims. In 1193 A.D. after the death of Jayachandra the region from Varanasi to Gaya including the district of Azamgarh passed into the hands of the Muslims by Shihab-ud-din-Muhammad Ghuri . From the establishment of the Jaunpur kingdom to its extinction, most of the tract now included in this district fell under its rule; but no important place in this district of Azamgarh can be mentioned as having been the seat of administration for the surrounding parganas. 

Azamgarh the headquarters of this district derives its name for Azam Khan who founded it on the ruins of the village Ailwal and Phulwaria about 1665 A.D. Azamat Khan the brother of Azam Khan built a fort and settled a bajar of Azmatgarh in pargana Sagari about the same time as that of Azamgarh. At this time Azamgarh possesses only the ruins of the fort, constructed by Azmat. Adjoining Azmatgarh there is the great 'Salona' , Azamgarh Tal, which was named after Azam Khan.

Azam Khan was died in Kannauj in 1675 A.D. Azmat Khan after the attack of Chabile Ram, fled northwards followed by the interior forces. He attempted to cross the Ghaghra into Gorakhpur but the people on the other side opposed his landing and he was either shot in mid stream or was drowned in attempting to escape by swimming in 1688 A.D. During Azamt's lifetime his eldest son Ekram has taken part in the management of the state and after Azam's death he was perhaps left in possession together with Mohhabat, another son. The remaing two sons were taken away and for a time detained as hostes for their brothers 'Good Behaviour' . The successor of Ikram finally confirmed the title of his family to the Jamidari. Ikram left no heirs and was succeeded by Iradat, son of Mohhabat, But the real ruler all along had been Mohhabat and after Ikram's death he continued to rule in his son's name. 

MODERN PERIOD 
At the beginning of 18th century, the bulk of the area covered by the present district of Azamgarh was included in the sirkars of Jaunpur and Ghazipur in the subah of Allahabd and was held by the Mohhabat Khan, popularly known as the Raja of Azamgarh. In his time the prosperity of Azamgarh was at its zenith .

On September 18,1832 Azamgarh district was formed. The military garrison at Azamgarh in, May 1857 consisted of the 17th Native Infantry, some 500 strong. They were brigaded with the 19th and 34th Regiments at Lucknow. After the struggle of 1957-58 no major events except the Gaurakshini or the anti-cow slaughter movemnet of 1893 occured in the district till the close of the 19th century. 

The Khilafat movement started in 1920 by the Indian Muslims to bring pressure upon Britain to change its policy towards turkey, also spread in this district. In August 1920, Mahatma Gandhi launched his famous non-coopeartion movement, and the people of the district took part in it under the leadership of Suryanath Singh. In 1928 when the Simon Commission visited India, demonstrations against it wherealso organized in the district as elsewhere. Black flags were waved and banners with words "GO back Simon" were displayed.

Mahatma Gandhi visited Azamgarh on October 3, 1929, where he received a tumultuous ovation and addressed a meeting of about 75,000 persons at Srikrishna Pathsala High School. He was also presented with a purse of about Rs.5000/-. Mahatmagandhi spoke on the uplift of Harijans, prohibition and use of swadeshi (Indian made goods). Nextday he inaugurated the Khadi Vidyalya at Azmatgarh. The visit filled the people of the district with strong national feelings. 

January 26,1930 , was declared the Independence day by the Indian National Congress and thousands in Azamgarh, as everywhere else in India, repeated the solemn and inspiring pledge, "We believe that it is the inalienable right of the Indian people to have freedom ...........................We believe, therefore, that India must sever the British connection and attained Purana Swaraj (complete independence)". 

In March 1930 salt satyagrah was started by Mahatmagandhi and his arrest caused a great resentment among the people of the district. The students of the local Wesely High School observed strike and about 50 students of this school were expelled. Other Institutions also closed down and a huge procession were jointly taken out by the students and the people. The response of the people of the Azamgarh to the Civil Disobedience Movement was enthusiastic and wide spread. British goods were boycotted and bonfires were made for foreign clothes and western style clothes. On July 4 1930 Gandhi Day was observed in the district condemning Mahatma Gandhi's arrest by oraganising hartal (closure) and protest meetings.

In 1931, no-rent campaign was started in the district. The peasants of the tehsil of Sagari and Ghosi withheld payment of rent to government and distributed anti-government leaflats.

The news of arrest of Mahatama Gandhi and Ballabhbhai Patel on January 4,1932 reached Azamgarh the nest day. There was widespread resentment in Azamgarh where hartals were observed and processions taken out. The Government retaliated by imposing section 144 Cr. P.C., issuing the press ordinance, the prevention of Intimidation ordinance, and the unlawful Instigation Ordinance and declared the Congress unlawful.

When the Mahatam Gandhi launched the programme of individual satyagrah in 1940 the response of the people was once again enthusiastic and all Congress leaders of any consequence in the district were sent to jail.

Azamgarh was in the vanguard of the Quit India Movement. which was started on August 9, 1942. On that day, the district Congress office at Azamgarh, was seized; and several arrest were made, the principal one being that of Sita Ram Ashthana. All this naturally created excitement in the town. During the night between the 11th and 12th August, a twenty foot track of rail was removed from a point near Sarai Mir railway station.

The incidence of Tarwa thana (police out-post) had its own importance.On the 14th August a large procession proceeded towards the thana for hoisting the tri-colour flag. The processionists stopped in front of the Tarwa thana. Their leader went to the thanedar and advised him to surrender to the people. Hardly did he arrive at any decision when the people caught hold of the policemen and snached their guns. The thanedar had, therefore, no alternative but to surrender. The people assumed the control of thana but agreed to handover to him the personal pistol of the thanedar at his expressed request, because destruction of personal property was not their aim. In this way the thana came under the possession of the freedom fighters.More than 380 persons of the district were detained in connection with the Quit India Movement and 231 were convicted and awarded various terms of imprisonment. The collective fines imposed and released from the people of the district amounted to Rs.1,03,645.

At last, on August 15,1947 the country and with it the district shook of the foreign yoke and achieved the long awaited independence. The district celebrated the independence day in a befitting glee and there was rejoieing in every home. National flag was hosted on the Collectorate building, on almost all private and government buildings and even on residential houses and commercial establishment. Every year the day is celebrated with the same enthusiasm.

The nation always venerated those who had participated in the struggle. In 1973 on the occasion of celebration of silver jubilee year of Independence, 472 persons of the district who have taken part in India's freedom struggle or their dependence were favoured with tamra patras(copper plate). Placing on record the services rendered by them or their forbears.