Monday, 24 March 2014

PRIYANKA SHRIVASTAVA TALKS WITH THE MEMBERS OF PERSONALITY PROJECT ON 24...




प्रिय मित्र, प्रियंका श्रीवास्तव Priyanka Srivastava आज़मगढ़ की रहने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं|
उन्होंने दिल्ली में ‘अभिप्राय’ नामक संस्था का सूत्रपात किया है|
‘अभिप्राय’ का लिंक यह है : https://www.facebook.com/AbhipraayFoundation
यह संस्था ज़रूरतमन्द और मेधावी छात्रों के लिये सक्रिय और सहायक है|
उनकी आरम्भिक शिक्षा आज़मगढ़ के राजकीय कन्या इन्टर कॉलेज में हुई|
अपनी मेधा और लगन के दम पर उन्होंने अनेक पुरस्कार जीते|
उनसे सम्पर्क के लिये इस लिंक पर जा सकते हैं - https://www.facebook.com/priyanka.srivastava.52493
उनका यह सम्बोधन आपको प्रेरित करेगा कि कोई भी लक्ष्य असम्भव नहीं है|
किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये केवल दृढ़ निश्चय, सतत श्रम और आत्ममूल्यांकन की आवश्यकता होती है|
इस व्याख्यान को ध्यान से सुनिए और लागू करने का प्रयास कीजिए| 
वैज्ञानिक तरीके से अपनी तैयारी करने पर आप अधिक आत्मविश्वास के साथ तयारी करेंगे और बेहतर परिणाम भी प्राप्त कर सकेंगे|
आशा है कि युवा मित्रों को अपनी क्षमता का विकास करने में इस व्याख्यान से सहायता मिल सकेगी|
प्रियंका श्रीवास्तव का यह व्याख्यान इस श्रृंखला का तीसवाँ व्याख्यान है|
यह प्रयास युवा-शक्ति की सेवा में विनम्रतापूर्वक समर्पित है|
कृपया इस प्रयास की सार्थकता के बारे में अपनी टिप्पड़ी द्वारा मेरी सहायता करें|
ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश 
इसका लिंक है — https://www.youtube.com/watch?v=7wxrYcrmWn4&list=UUd-sCEa4CJ9DIQ1d8Yc-ryw

Monday, 10 March 2014

—: ‘मन मेरा, तुम मेरे अपने और जगतगति’ : —


आज सुबह से निपट अकेला पड़ा हुआ हूँ, 
सबसे कट कर, सब से हट कर, 
इस दुनिया से दूर खड़ा हूँ, 
खुद में डूबा सोच रहा हूँ....
सोच रहा हूँ मेरा यह जीवन भी क्या है !
यह जैसा है क्यों वैसा है !
पूरा जीवन भीड़-भाड़ से अलग-थलग है.
ख़ुद में डूबा, ख़ुद से जूझा;
ख़ुद से जीता, ख़ुद से हारा.
ऐसा क्यों है !

जीवन का जो सुन्दरतम था, पूर्वराग था !
रंच-मात्र अनुराग मिला, वह भी दुष्कर था !
अब अतीत का गीत गूँजता रहता मन में !
वह विराग भी नहीं बन सका,
मन से वह भी नहीं छन सका !
हर पल मन को मथता रहता,
मैं थक जाता, वह वैसे ही चलता रहता...
सोते-जगते, बीच सभी के और अकेले रहने पर भी 
हरदम मेरा पीछा करता,
कभी नहीं वह मुझे अकेला छोड़ सका है.
टूट रहा मैं, पर भ्रम मेरा नहीं अभी तक टूट सका है.

जीवन में जो गौरवमय था, आज कहाँ है !
जीवन में जो कुछ प्रेरक था, कहाँ खो गया !
जीवन में जो भी सुख देता, दूर क्यों गया !
रोज़ सुबह से शाम, शाम से सुबह और फिर शाम हो रही.
मगर कहाँ खो गयी ख़ुशी ! मैं क्यों उदास हूँ !

जिसको सबसे बढ़ कर चाहा, जिसको सबसे बढ़ कर माना,
जिसको सबसे अधिक प्यार मैं था कर पाया,
आज भला वह साथ क्यों नहीं !
उसका मेरे साथ न होना, उसका मेरे पास न होना,
उसका मुझसे यूँ कट जाना, इतनी दूर चले जाना... 
कितना त्रासद है !

रोज़ सोचता, रोज़ चाहता, रोज़ कामना करता रहता...
काश कि उसकी प्यारी बोली एक बार फिर से सुन पाऊँ !
काश कि उसको देख सकूँ मैं !

काश कि घन्टी बजे फोन की और दौड़ कर उसे उठाऊँ !
उससे अपनी छोटी-मोटी सभी समस्याएँ साझा कर,
मन को कुछ हल्का कर पाऊँ !
और ठहाके लगा-लगा कर असली-नकली उसे हँसाऊँ !
आँख बन्द कर उसकी बातें लागू करना मेरी आदत में शुमार है.
इस आदत को कैसे बदलूँ !

बार-बार मन ज़ोर-ज़ोर से मेरा करता
कॉल करूँ मैं ही अब फिर से,
माफ़ी माँगू उस गलती की, जिसको अब तक समझ न पाया...
मगर कहीं तो हुई रही होगी ज़रूर ही, 
जिससे उसको पीड़ा इतनी पहुँच गयी है !

सुनूँ शिकायत उसके मन की, उसको अपनी बात बताऊँ....
अपने आँसू से धो डालूँ सब शिकायतें...
निर्मल मन से एक बार फिर उसे निहारूँ...
उसे मनाऊँ ! फिर से अपनी गोदी में लेकर दुलराऊँ !

मगर हमेशा डर जाता हूँ...
कहीं दुबारा मेरी कोशिश उसको फिर से खल जाये तो...
छला गया है जो कोमल मन, फिर वैसे ही छल जाये तो...
उसको स्वाभिमान है प्यारा, मुझको प्यारी उसकी खुशियाँ,
उसको मेरी अनगढ़ कोशिश आहत फिर से कर जाये तो... !
अगर कहीं ऐसा होता है, तो क्या होगा !
मन पागल है, मन बच्चा है, मन को मैं कैसे समझाऊँ !

जीवन आगे बढ़ आया है, पीछे छूट गया मन मेरा;
जीवन की आपा-धापी में फेंचकुर फेंक रहा तन मेरा...
अटक रहा हूँ, भटक रहा हूँ, मैं ख़ुद ही को पटक रहा हूँ !

फिर भी कैसे आगे बढ़ना, कैसे इस बाधा से लड़ना,
कैसे अगला कदम बढ़ाना, किसके दम पर फिर से गढ़ना.
मानवता की पूरे मन से कैसे फिर से सेवा करना...
किससे पूछूँ, कौन बताये, कौन मुझे क्यों राह दिखाये !
कौन कहे अब मुझको अपना, कौन मुझे गलती बतलाये !
कौन पकड़ कर मेरी अंगुली जीवन-पथ पर मुझे चलाये !

फिर मैं कैसे दौड़ किसी को गले लगाऊँ !
किसको फिर से सब कुछ अपना देकर तृप्ति और सुख पाऊँ !
जीवन है संघर्ष - सही है, पर मन से तो हार चुका हूँ,
नहीं समझ में मुझे आ रहा कैसे यह रण अब लड़ना है !
समझ नहीं पा रहा कि आगे क्या करना है !

मेरा मन तुमको पुकारता है हरदम ही,
हरदम याद तुम्हीं को करता... 
पल-छिन छिन-पल एक यही अब काम बचा है...
तुमसे दूर नहीं जा पाता, तुमको भूल नहीं यह पाता...
नहीं और कुछ भी पगला मन सोच पा रहा....
नहीं और कुछ भी करने को यह कहता है...
माफ़ी माँग रहा मैं तुमसे, एक बार तो माफ़ी दे दो...
गलती-सही भूल जाओ अब, मुझको मेरा सम्बल दे दो...

मुझको फिर से तुम्हीं बचाओ, आओ, एक बार आ जाओ !
जब ख़ुद मैं ही नहीं रहूँगा, जब सब कुछ ही मिट जायेगा;
तब तक बहुत देर होगी ही, तुम भी तब क्या कर पाओगे...

— गिरिजेश (9.3.14. 8p.m.)

Saturday, 8 March 2014

कॉमरेड स्टालिन के सवाल पर :


कॉमरेड स्टालिन के बारे में मेरा स्टैंड एक दम दो-टूक है. मैं समझता हूँ कि यह स्टालिन ही थे, जिनके दम बूते पर लेनिन और क्रुप्स्काया विदेश में बैठ कर सोवियत क्रांति के पहले लिख सके थे. यह स्टालिन ही थे, जिनके नेतृत्व में सोवियत क्रान्ति शानदार तरीके से परवान चढी और उस की धार बनी रही. यह स्टालिन ही थे, जिन्होंने लेनिन के जीवन में उनके कन्धे से कन्धा मिला कर और उनके अवसान के बाद भी प्रतिक्रान्ति के हमलों से क्रान्ति की वैचारिक और ज़मीनी हिफाज़त की. यह स्टालिन ही थे, जिन्होंने हिटलर को परास्त करके अपने ही बंकर में आत्महत्या करने तक पहुँचाने वाली सोवियत फौजों का ज़बरदस्त और शानदार नेतृत्व किया. ये सभी उनके पॉजिटिव थे. 

आप उनकी जगह ख़ुद को खड़ा कर के देखिये तो समझ में आयेगा कि उन परिस्थितियों में उनके सारे ही निर्णय सही थे. स्वायत्तता तक राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के और भाषा के सवाल पर उनकी ही प्रस्थापनाओं को लेनिन ने भी स्वीकार किया था. मेरी दृष्टि में केवल एक असफलता उनकी रही और वह उनकी जगह किसी से भी होती, माओ से भी हुई ही. वह थी उनके बाद ख्रुश्चोव का उत्कर्ष और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना, जो किसी भी तरीके से रोके नहीं रुकी. आज मार्क्सवाद के सामने और विश्व-क्रान्ति के सामने माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति के सूत्र को समाजवादी जनतन्त्र में और भी प्रभावशाली तरीके से लागू करने का प्रश्न युगजन्य दायित्व है. 

मैं तो यह मानता हूँ कि पूरी मानवता के इतिहास में तीन सबसे अधिक सख्त इन्सान उभरे. स्पार्टकस, रोबेस्पियरे और स्टालिन. और मैं घोषित तौर पर स्टालिन को विश्व-क्रान्ति के चौथे सबसे बड़े नेता के रूप में स्वीकारता हूँ. विश्व-स्तरीय किसी भी व्यक्तित्व का मूल्यांकन सभी लोग करते ही हैं. परन्तु किसी के भी बारे में कोई भी कुछ भी कहे, उसके पहले ख़ुद को उसकी जगह खड़ा करके देख लेना चाहिए कि अगर वह उन परिस्थितियों के बीच रहता, तो क्या निर्णय लेता. 

और तब कम से कम मैं मानता हूँ कि स्टालिन के पास सख्त होने के अलावा कोई और विकल्प नहीं हो सकता था. मैं विनम्रता को मनुष्य के सबसे अच्छे गुणों में से मानता हूँ. परन्तु दृढ़ता के साथ जुड़ी विनम्रता को ही. और स्टालिन दृढ़ता के साथ निर्णय ले सकने वाले क्रान्तिकारी नेता थे. वह वर्गयुद्ध लड़ रहे थे. उनके कन्धों पर धरती के एकमात्र सर्वहारा सत्ता के अस्तित्व को बचाने का और आगे विकसित करने का दायित्व था. और युद्ध की अपनी शर्तें होती हैं. उनको वह सब कुछ करना ही पडा, जो उन्होंने किया. प्रतिक्रान्तिकारी प्रतिपक्ष भी लगातार उनके लिये फूल नहीं बरसा रहा था, न तो उनके जीवित रहते और न ही उनके निधन के बाद. मेरी समझ है कि अगर स्टालिन और माओ को गलत कहा जायेगा, तो ख्रुश्चोव और देंग सियाओ पिंग को सही कहना होगा. और यह मूलभूत गलती मार्क्सवाद से ही विचलन हो जायेगी.

― : कहानी ‘एकडग्गा’ पहलवान की :―


प्रिय मित्र, कभी किसी से सुनी यह कहानी मुझे अतिशय प्रिय है. यह तो याद नहीं आ रहा कि किससे सुनी थी. मगर कहानी में दम है इसीलिये यह मुझे इतनी प्रिय है. मैंने इसे इतने लोगों को इतने मौकों पर इतनी बार सुनाया है कि अब यह मुझे अपनी ही कहानी लगने लगी है. तो लीजिए, आप भी आज यह कहानी सुनिए और बताइए कि क्या आपको भी यह अपनी ही कहानी नहीं लग रही है ! 
ढेर सारे प्यार के साथ ― आपका गिरिजेश 

कहानी है पहलवान की. तो कहानी में एक गाँव है. गाँव के बगल में एक नदी भी है. नदी के रास्ते में हनुमान जी का एक छोटा-सा मन्दिर है. मन्दिर के चारों ओर पक्का चबूतरा है. अगल-बगल तरह-तरह के कई फलदार छायादार पेड़ हैं. पेड़ों की घनी छाँव में एक बड़ा-सा अखाड़ा है. अखाड़े के एक ओर एक इनार है. इनार के चारों ओर जगत है. जगत पर हाथ-गोड़ धो कर ही मन्दिर और अखाड़े में जाने का चलन है. 

अखाड़े के एक उस्ताद हैं. उस्ताद के ढेरों शागिर्द हैं. गाँव के सारे ही किशोर और तरुण सुबह-शाम अखाड़े पर जुटते हैं. सब के सब रंग-बिरंगी लँगोट बाँधे हैं. उनमें से कुछ कसरत करते हैं, तो कुछ अखाड़े की माटी तैयार करने में लग जाते हैं. एक तरफ़ मुगदरों की जोड़ियाँ भाँजने वाले हैं, तो दूसरी ओर गदाएँ नचाने वाले. कोई बैठक लगा रहा है, तो कोई सपाट खींचने में लगा है. सभी के सुते हुए शरीर सुबह की रोशनी में चमक रहे हैं. एक-एक पेशी अलग-अलग ऐंठी हुई थल-थल कर रही है. किसी के भी शरीर पर कहीं भी चर्बी का कोई नाम-ओ-निशान नहीं है.

उस्ताद की अब उमर हो चली है. उनकी तलवार-कट मूछों के बाल तक सफ़ेद हो चुके हैं. मगर शरीर है कि ज़िन्दगी भर की कसरत से अभी भी कसा हुआ है. उनके नाम की पूरे इलाके में धूम है. जो शोहरत उनके अखाड़े की है, वह अरियात-करियात में और किसी अखाड़े को कभी भी मयस्सर नहीं हो सकी. दूर-दूर से पहलवान उनका नाम सुन कर उनको देखने और उनसे भेंट-घाँट करने आते रहते हैं. कहीं भी कोई दंगल होता है, तो उस्ताद ही उसकी सदारत करते हैं. कभी कहीं किसी दंगल में अगर किसी की हार-जीत के फैसले पर मौके पर हाज़िर लोगों के बीच कोई कहा-सुनी हो जाती है, तो उस हालत में उस्ताद का ही फैसला दोनों गोल के सभी लोगों को मन्जूर हो जाता है. 

कमर में केवल एक गमछा लपेटे उस्ताद आराम से पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठ कर चारों ओर देखते रहते हैं. उनकी नज़रें सभी पट्ठों की हरकतों पर बारीकी से घूमती रहती हैं. बीच-बीच में वह अलग-अलग लोगों को शाबासी भी देते रहते हैं और हिदायत भी. दो पट्ठे उस्ताद की मालिश करने में मशगूल हैं. उस्ताद की शागिर्दी के लिये सारे ही इलाके के जवान लालायित रहते हैं. उस्ताद अपने सभी पट्ठों को बड़े ही प्यार से तरह-तरह के दाँव-पेंच सिखा कर तैयार करते हैं. मजाल क्या है कि उनके किसी पट्ठे की पीठ पर कहीं कोई पहलवान धूर लगा दे. दूर-दूर के दंगल उस्ताद के शागिर्दों ने ही जीते हैं. तभी तो उस्ताद की इतनी इज्ज़त है. 

अब अखाड़े की माटी तैयार हो गयी है. उस्ताद चबूतरे से उतर कर मन्दिर में जाते हैं. हनुमान जी के सामने लटके घन्टे को बजा कर अखाड़े की ओर चल देते हैं. उस्ताद के पीछे सभी शागिर्द भी अखाड़े में उतरते हैं. अखाड़े में उतरने के पहले माटी को सिर से लगाने की परम्परा है. इस परम्परा का सभी पूरी निष्ठा के साथ पालन करते हैं. और फिर दो-दो की जोड़ में कुश्ती शुरू हो जाती है. उस्ताद हर जोड़ी को ललकारते और सिखाते हैं. पटकने वाले पट्ठे की पीठ ठोंकते हैं, तो पटकाने वाले को उस दाँव की काट सिखाते हैं. कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों का जोश देखते ही बनता है. हो भी क्यों नहीं ! इसी रोज़-रोज़ के अभ्यास से ही तो वे जगह-जगह दंगल मारते रहते हैं. कसरत और कुश्ती रोज़-रोज़ की है, तभी जा कर उनको एक दिन कहीं किसी दंगल में उतरने का मौका मिल पाता है. 

बगल के गाँव के अखाड़े पर ऐसा ही एक दंगल बदा गया है. दूर-दूर के पहलवानों को न्यौता भेजा गया है. उस्ताद के पास भी बुलावा आया है. सारे ही पट्ठे दंगल में उतरने का मन बना कर उस्ताद के आस-पास खड़े हैं. बारी-बारी से उस्ताद एक-एक का नाम बोलते जा रहे हैं. जिसका नाम लिया जाता है, वह उस्ताद के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लेता है. दंगल में लड़ने के लिये चुने गये पहलवान एक ओर खड़े होते जा रहे हैं. बाकी बचे पट्ठों में बहुत आतुरता है कि अब उसी का नाम पुकारा जायेगा. इतने सारे लोगों के बीच से चुना जाना भी कम मुश्किल नहीं है. कई नाम छाँट लेने के बाद उस्ताद अब लगभग संतुष्ट हो चले हैं. और बाकी के बचे हुए शागिर्दों का रोआँ गिरने लगा है. उनका मन हार मान कर उतरने लगा है. 

उनके ही बीच एक ओर एक खम्भे से टिक कर सिर झुकाये चुपचाप एकडग्गा भी खड़ा है. एकडग्गा की ओर देख कर उस्ताद के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट तैर जाती है. वह अपने सारे ही पट्ठों पर एक बार फिर से अपनी निगाह फेरते हैं और दुबारा धीरे-से मुस्कुराते हैं. और फिर अचानक उनके मुँह से जो नाम निकलता है, वह एकडग्गा का है. एकडग्गा का नाम सुन कर सारे ही पट्ठे अचकचा जाते हैं. उनको उस्ताद के इस फैसले पर बहुत अचरज है. एकडग्गा भी अपना नाम सुनता है. मगर वह वहीं पर सिर झुकाये वैसे ही चुपचाप खड़ा रह जाता है. 

उस्ताद दुबारा बड़े ही प्यार से उसे अपने पास बुलाते हैं : “एकडग्गा, यहाँ आओ बेटे !” अब जाकर एकडग्गा हिलता है. धीरे-धीरे डग भरता एकडग्गा अपने उस्ताद के सामने आ कर खड़ा हो जाता है. उसके चेहरे की सारी पेशियाँ क्षोभ से फड़क रही हैं. किसी तरह उसके मुँह से आवाज़ निकलती है : “उस्ताद, माफ़ कीजिए मुझे...! आज मैं आपकी शान में गुस्ताख़ी करने जा रहा हूँ.... अभी तक कभी भी मैंने आपकी हुकुम-उदूली नहीं किया है... मगर अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा...” उस्ताद मुस्कुरा कर पूछते हैं : “क्या कहना चाहते हो, एकडग्गा ! कहो बेटा, खुल कर अपनी बात कहो.” गुस्से से थरथराता एकडग्गा किसी तरह इतना बोल पाता है : “उस्ताद, क्यों आप अपने से ही अपनी इज्ज़त को मिट्टी में मिलाना चाहते हैं ! मैं दंगल में जा कर भी क्या कर पाऊँगा ! अगर मैं पटका गया, तो मेरा तो केवल लँगोट रखवा लिया जायेगा, मगर आपकी तो इज्ज़त चली जायेगी !” 

उस्ताद अब गम्भीर हो चले. उन्होंने एक बार फिर से चारों ओर खड़े अपने सभी शागिर्दों को देखा. सभी चुप हैं. सन्नाटा साँय-साँय कर रहा है. उस्ताद ने एकडग्गा से पूछा : “क्या तुमको मेरे ऊपर भरोसा नहीं है ?” एकडग्गा रुहाँसा हो चला है. उसने जबान खोली : “उस्ताद, आप सबके उस्ताद हैं. मेरे भी हैं. मुझे आपके ऊपर पूरा भरोसा है. मगर...” और फिर एकडग्गा ठमक गया. उसकी आँखों से आँसू बह चले. उस्ताद ने दुबारा उसे बोलने के लिये कहा. रोते हुए एकडग्गा ने अपनी बात आगे बढ़ाई : “सबको तो आपने तरह-तरह के दाँव और उनकी काट सिखाई है. मगर मुझे तो जब से आपने गण्डा बाँध कर अपना शागिर्द बनाया, तब से आज तक केवल एक ही दाँव सिखाते चले गये. दूसरा कोई भी दाँव मुझे सिखाया ही नहीं. मैं अपने एक दाँव के सहारे भला दंगल में क्या कर पाऊँगा ?”

उस्ताद ने एकडग्गा की हिम्मत बढ़ाई. उन्होंने कहा : “एकडग्गा, मेरा हुकुम है बेटा ! तुमको दंगल में लड़ना ही है. और तुम मेरे ऊपर पूरा भरोसा रखो. मैं अभी से देख रहा हूँ कि तुम दंगल जीत रहे हो..!” मन मार कर एकडग्गा ने उस्ताद का हुकुम सिर-माथे लिया. उनका पैर छुआ और चुने गये लोगों के बीच वह भी जा कर खड़ा हो गया.

आज दंगल में बड़ी भीड़ उमड़ी है. खूब कसी-कसा है. पूरे इलाके के सारे ही बड़े-बड़े पहलवान वहाँ पहुँचे हैं. दर्शकों में गाँव-गाँव के हर उमर के लोग हैं. एक ओर ऊँचा-सा मंच बना है. मंच पर दूसरे अखाड़ों के उस्तादों के बीच एकडग्गा के उस्ताद भी बड़ा-सा साफ़ा बाँधे, बुर्राक सफ़ेद मलमल का कुरता पहने अपनी धोती का खूँट पकड़े बैठे हैं. वह भी औरों की तरह ही बीच-बीच में अपनी मूछें ऐंठ रहे हैं. अब दंगल शुरू हुआ. जिस पहलवान का नाम पुकारा जाता है, वह अपने उस्ताद के पैर छूकर अखाड़े में उतरता है. उसका हाथ उठा कर उसे अखाड़े में चारों ओर घुमाया जा रहा है. अपने को उसकी जोड़ का समझने वाला पहलवान उछल कर खड़ा हो जा रहा है और वह भी अपने उस्ताद का पैर छू कर अखाड़े में उतर जाता है. 

अखाड़े की माटी सिर से लगा कर सलामी देने के बाद दोनों पहलवान एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं और फिर झटके से पीछे हट कर पैंतरा बदलने लगते हैं. देखते-देखते ही दोनों के पंजे आपस में गुँथ जाते हैं. दोनों ही कसमसा कर आपस में जूझने लगते हैं. एक दाँव लगाता है, तो दूसरा उसकी काट करता है. काट करते ही दोनों फिर छटक कर अलग हो जाते हैं. दोनों के ही शरीर आगे की ओर आधा झुके हैं. हाथ आगे की ओर लपकने को तैयार हिल रहे हैं. पैर अखाड़े के बीचोबीच धीरे-धीरे गोले में घूमते जा रहे हैं, आँखों में आँखें डाले दोनों ही एक दूसरे को तौल रहे हैं. और तभी अचानक कोई एक झपट्टा मारता है. और यह देखिए, सामने वाले को ले पटकता है. मगर अगला भी कम चुस्त नहीं है. गिरता भी है तो पीठ ऊपर ही है. जमीन से मानो वह चिपक ही गया है. अब चित्त कर देने के लिये जोर लगाना जारी है. मगर तभी गिरा हुआ पहलवान नीचे से झटका मारते हुए अपने ऊपर वाले को हवा में उछालता है और फिर उसके जमीन पर गिरते ही फैसला उसे पटकने वाले की जीत का हो जाता है. चारों ओर तालियों की गड़गड़ाहट गूँज जाती है. जीतने वाले को लोग अपने कन्धों पर उठा लेते हैं. वह एक बार फिर विजय-गर्व के साथ अपने उस्ताद के पास जाता है और उस्ताद उठ कर उसकी पीठ और सिर पर अपना हाथ फेरते हैं.

इस तरह एक के बाद एक जोड़ जीतते-हारते लड़ते जा रहे हैं. तभी अचानक एकडग्गा का नाम पुकारा जाता है. एकडग्गा भी उस्ताद से आशीर्वाद लेकर अखाड़े में पहुँचता है. उसके भी बाँह पकड़ कर अखाड़े में घुमाया जाता है. उसकी भी जोड़ लगती है. और एकडग्गा अपने सामने वाले से हाथ मिलाता है. हाथ छुड़ा कर दोनों ही पैंतरा बदलते हैं. माहौल में अबकी बार बेतहाशा उत्तेजना फ़ैल गयी है. दोनों गोल के लोगों को अपने पहलवान की जीत का भरोसा है. सभी अपने-अपने पहलवान का नाम ले-ले कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगते हैं. मगर अचानक... सब के देखते-देखते... अरे यह क्या ! पहली ही पकड़ में जैसे ही एकडग्गा अपना दाँव मारता है, सामने वाला एकडग्गा के कन्धे से होता हुआ हवा में उछल कर तड़ाक से जमीन पर आ गिरता है. उसका कोई बस चल ही नहीं पाता और एकडग्गा को विजयी घोषित कर दिया जाता है.

विजयी एकडग्गा को अभी भी अपनी विजय पर विश्वास नहीं होता. वह अचरज से भरा उस्ताद के पास पहुँचता है. पैर छूता है और उसके मुँह से सवाल निकलता है : “उस्ताद, आपने दंगल से पहले ही कैसे देख लिया था कि मैं दंगल जीत रहा हूँ...!” उस्ताद उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं. उनका जवाब है : “एकडग्गा, मैंने तुमको जो दाँव सिखाया है, उसकी केवल एक ही काट है. और वह यह है कि सामने वाला तुम्हारी दाहिनी बाँह पकड़ कर तुमको अपनी पीठ पर तान ले. मगर तुम्हारे पास तो दाहिनी बाँह है ही नहीं. तुम तो जनम से ही केवल बायीं बाँह वाले हो. इसीलिये तुम्हारा नाम ‘एकडग्गा’ है. और इसीलिये तुमको कोई भी पहलवान किसी तरह से पटक ही नहीं सकता. बेटा, तुम अपने एक ही दाँव के सहारे अजेय हो... और फिर मेरा आशीर्वाद भी तो तुम्हारे साथ है...”

और इस तरह से 'अजेय एकडग्गा पहलवान' की यह कहानी पूरी होती है.....

हम क्रान्तिकारी भी एकडग्गा पहलवान की तरह ‘केवल बायीं बाँह’ लेकर पैदा हुए हैं. हमारे पास भी अपने उस्ताद का सिखाया हुआ ‘एक ही दाँव’ है. दुश्मन हमको अपने अखाड़े में उतारने और अपने दाँव में फँसाने के लिये ललचाता रहता है. वह हमें हमारी दाहिनी बाँह के सहारे पटकने के चक्कर में रहता है. मगर हम दुश्मन को अपने अखाड़े में घेरते हैं. जब तक हम अपने उस्ताद से सीखे ‘बायीं बाँह वाले दाँव’ से लड़ते हैं, 'अजेय' रहते हैं. मगर जैसे ही हम दुश्मन की देखा-देखी ‘दाहिनी बाँह’ के मोह के चक्कर में फँसते हैं, वैसे ही दुश्मन हमें चित्त कर देता है. क्योंकि दुश्मन के अखाड़े का नाम ‘संसद’ है और हमारे अखाड़े का नाम है ‘जन-क्रान्ति’ !

Sunday, 2 March 2014

Kavita Krishnapallavi - कृश्‍न चंदर के गधे की नयी आत्‍मकथा

कृश्‍न चंदर के गधे की नयी आत्‍मकथा (पत्र शैली में)
मित्रो, पहचाना मुझे? अरे, मैं वही कृश्‍नचंदर वाला गधा हूँ। आदमी जैसा तो पहले से ही बोलता था। आपको शायद पता ही होगा, कुछ दिनों तक तो मैं पागलपन जैसी अवस्‍था में भी रहा। फिर ठीक होकर इधर-उधर भटक ही रहा था कि एक भलेमानस कम्‍युनिस्‍ट से टकरा गया। फिर मार्क्‍सवादियों की संगत में मैं मार्क्‍सवादी बन गया। एक कम्‍युनिस्‍ट ग्रुप में भी शामिल हो गया। सिद्धान्‍तकार बनना चाहता था, पर वे लोग मुझसे सिर्फ मोटे काम ही करवाते थे। दूसरे, वहाँ कोई गधी भी नहीं थी, और मेरी उमर भी बीती जा रही थी। दुखी-कुण्ठित मैं यहाँ-वहाँ दुलत्‍ती झाड़ता रहता था, कभी सामान टूटते तो कभी किसी को चोट लगती। फिर मेरे कम्‍युनिस्‍ट साथियों ने मुझे यह कहकर भगा दिया कि तुम रहोगे गधे ही, कम्‍युनिस्‍ट कभी नहीं बन पाओगे। अब मैं क्‍या करता? न पूरा कम्‍युनिस्‍ट रह गया था, न ही पूरा गधा। हृदय में प्रतिशोध की आग जल रही थी। तय किया कि इतने गधे कम्‍युनिस्‍ट और कम्‍युनिस्‍ट गधे तैयार करूँगा कि कम्‍युनिस्‍टों को छट्टी का दूध याद दिला दूँगा। उनके सारे कामों का गुड़-गोबर कर दूँगा।

तबसे 'गर्दभ क्रान्तिसेवी व्‍यक्तित्‍व निर्माण गुरुकुल' नामका एक संस्‍थान चलाता हूँ। मुझे पुराने रूप में बहुत लोग जानते हैं इसलिए इन दिनों शेर का मुखौटा पहनकर संतों की तरह नैतिक सदाचार के उपदेश देता रहता हूँ। मजे की बात यह है कि मेरे इस प्रोजेक्‍ट में मदद करने के लिए बहुत सारे ऐसे नामधारी कम्‍युनिस्‍ट आ गये जो फितरतन लोमड़ हैं। बुद्धिजीवी हैं, अफसर-पत्रकार-प्रोफेसर-एन.जी.ओ. वाले हैं, आन्‍दोलन से मेरी ही तरह भगाये गये या भागे हुए हैं और वास्‍तव में जनता के बीच काम करने वाले कम्‍युनिस्‍ट क्रान्तिकारियों से वैसे ही खार खाये हुए हैं जैसे कि मैं। यूँ तो गधों और लोमड़ों की दोस्‍ती सामान्‍यत: नहीं होती, पर 'दुश्‍मन का दुश्‍मन दोस्‍त' की नीति के हिसाब से हमलोगों के बीच रणनीतिक संयुक्‍त मोर्चा बन गया है। धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति करने वाले कुछ जंगली कुत्‍ते भी मेरा साथ दे रहे हैं। मैं उनसे बार-बार पर्दे के पीछे रहने के लिए कहता हूँ, पर वे तो मुझसे भी बड़े गधे हैं, कई बार खुले में आकर मेरे पक्ष में बोलने लगते हैं और मेरा खेल बिगड़ जाता है। बहरहाल, बहुत सारे भोले-भाले हिरनों, ब‍करियोंऔर पागुर करते बैलों को तो मैंने कनविंस कर ही लिया है कि मैं एक समर्पित, सच्‍चा संतनुमा कम्‍युनिस्‍ट हूँ। यूँ भारतीय बड़े संस्‍कारी जीव होते हैं, कम्‍युनिस्‍ट को भी संत के चोले में देखना चाहते हैं।

आगे मैं सोच रहा हूँ कि सच्‍या सौदा, निर्मल बाबा और रामदेव के 'भारत स्‍वाभिमान' को कम्‍युनिस्‍ट शब्‍दावली के फेंटकर एक सम्‍मोहनकारी प्रभाव वाला मिश्रण तैयार करूँ यह आइडिया कैसा है? -- मित्रगण मुझे राय दें। मिलकर या ई-मेल द्वारा या फेसबुक पर मेरे मैसेज बॉक्‍स में जाकर, खुले तौर पर नहीं। अपनी रणनीति गुप्‍त रखनी होगी, क्‍योंकि सच्‍चे कम्‍युनिस्‍ट क्रान्तिकारी भी अब पहले की तरह चुप नहीं हैं, अब वे हमारी पोल-पट्टी खोलने पर आमादा हैं। मित्रगण परामर्श अवश्‍य दें। हमारी एकता ज़रूरी है। एकता में ही शक्ति है। 
साभार, आपका,
सन्‍त चण्‍ट नैतिकानंद
(उर्फ कृश्‍नचंदर का वही पुराना गधा)
कुलाधिपति, 
गर्दभ क्रान्तिसेवी व्‍यक्तित्‍व निर्माण गुरुकुल


http://nightraagas.blogspot.in/2014/03/blog-post_20.html

Girijesh Tiwari - इस पोस्ट पर इन कमेंट्स के बाद मैंने Satya Narayan जी को अनफ्रेंड कर दिया.
Bhuvan Joshi - i think the post is targeted against Sh. Girijesh Tiwariji, even if there is ideological or working style difference. such personal attacks should be avoided rather concentration should be on aim. there were very few whole life revolutionaries, besides no splinter at present is in a position to claim correctness of it's ideas which has resulted in furtherence of movement. there should be struggle of ideas even if person/fraction is considered philistine. exposer should be the main aim. with a person/group where diffrence of ideas appear struggle- unity- struggle is the only way. wastage of resources on personal attack is not going to be useful for the cause. its a freindly advice

Girijesh Tiwari - आभार व्यक्त करता हूँ सही सलाह देने के लिये साथी Bhuvan Joshi के प्रति और एक बार पुनः आभार व्यक्त करता हूँ मुझे पुनः इतने सम्मान के साथ याद करने के लिये साथी Satya Narayan के भी प्रति.

Satya Narayan Girijesh Tiwari - हम आपको कैसे भूलें जब आप खुद बार बार याद करते रहते हो।

Girijesh Tiwari - धन्यवाद Satya Narayan जी, अब वह बिन्दु आ चुका कि आप मुझे केवल एक बार और याद करें, और फिर वह अन्तिम बार हो जाये. उसके बाद आपके छुटभैये हमलावर साथियों की तरह आपको भी मुझे ब्लॉक कर देना पड़ेगा. बस एक बार और ... फिर मुझे कोई अफ़सोस नहीं रहेगा आपको आखिरी मौका न देने का..

Satya Narayan - Girijesh Tiwari जी तो ऐसा कीजिये। आप भी एक और पोस्‍ट डाल दीजिये (हमारे खिलाफ) हमें याद करते हुए, फिर हम भी डाल देंगे।

यह कमेन्ट उसके बाद आयी.
Amar Nadeem - पोलेमिकल बहस और आलोचना-प्रत्यालोचना चले तो अच्छा लगता है और सत्य के संधान में मदद मिलती है . पर इस तरह की तस्वीरें और कटाक्ष देख कर तो बस अफ़सोस ही किया जा सकता है . जनचेतना की टीम विचारधारा के क्षेत्र में शानदार काम करती आ रही है एक लम्बे समय से. यही नहीं वे लोग मेहनतकशों के वर्गीय संघर्षों में भी भागीदारी करते रहे हैं. मार्क्स और मार्क्सवादी चिंतकों का उनका गहन अध्ययन काबिले तारीफ़ ही नहीं है मुझ जैसे न जाने कितनों की समझ में भी इजाफा करता है. इस कमजोरी से अगर वे उबर जायें तो उनका कद और भी बढ़ जाएगा , ऐसा मुझे लगता है .

Salman Arshad - kuch behoodgiyan yesi hoti hain ki khamooshi unka jwab hota hai

Amarnath Madhur - सत नारायण की नयी कथा है.बेचारे सच्चे कामरेड क्रान्ति के लिए कितना श्रम कर रहें हैं, ढूंढ ढूंढ कर शत्रु को चिन्हित किया जा रहा है उस पर पत्थर मारे जा रहे हैं मगर क्रान्ति है कि हो ही नहीं रही है . पता नहीं ये पत्थर निशाने पर लगते भी हैं या नहीं .लेकिन देखने वालो को तो मजा आ ही रहा है .ये भी कोई कम बड़ा क्रांतिकारी काम नहीं है .लगे रहे साथियो .

Abhishek Pandit - koun hai ye satya narayan ji or inko aapse kya dikkat hai sir?

Girijesh Tiwari - satyanarayan ji ko 'satya' sahan nahi ho paya. alochna se uphas tak kee yatra ke baad ab sthiti 'tanavpoorn lekin niyantran me' hai. 

Abhishek Pandit - ye hai koun or aapko lekr inki samsya kya hai?

Girijesh Tiwari - ye bechare hain. jo nahi jaante ki kya kar rahe hain ! inko mujhse koi pareshani nahi hai. jo lekh aap oopar dekh rahe hain. usme inkee mitra ne mere ateet aur vartmaan ka vihangavalokan kiya hai. vah ateet jo inke mukhiya maanneey comrade shashi prakash ji hi jaan sakte the. yah doosari peedhee hai. inkee suni sunaayee baaton ke sahare likhe gaye is vyangy-lekh ka main bhi mazaa le rahaa hoon. aap bhi is kalam kee dhaar dekhiye aur gadgatit hoiye. ham log to aisee upaadhiyon ke liye hee bane hain.

Abhishek Pandit - hahahaahah

Mahender Singh - abhi naya naya mulla hai, so namaj bhi roj padh raha hai, free ka mazdoor bhala kitne din chare par tika rahega ?

Satya Narayan - Mahender Singh जो भी हो, कम से आपकी तरह मैक्सिम जैसी अश्‍लील पत्रिकाओं के व्‍यापारी तो नहीं बनेंगे।

Mahender Singh - इसको एक साधारण सी बात समझ नही आ रही कि क्यूँ इतने सारे लोग जो कभी इनके नेता के नेतृत्व मे 10, 20 30 साल से काम कर चुके है अब इनके आलोचक हो गये हैं, या तो ये सारे लोग मूर्ख और अवसरवादी है या इनकी भाषा मे प्रतिकरांतिकारी हैं, या फिर इनका नेता ही ऐसा था, दोनो मे से एक ही बात हो सकती है

Satya Narayan -·महेन्‍द्र सिंह जी एक सीधी सी बात तो समझ में आ रही है कि जितने लोग “आलोचक” हो गये वो अब क्‍या कर रहे हैं। वो समझ में आते ही ये भी समझ में आ गया कि कौन क्‍या है।

Mahender Singh - अभी धैर्य से 10-15 साल तक सेवा कर लो फिर किसी नतीजे पर पहुचना

Satya Narayan - अगर ऐसी नौबत आयेगी भी तो फिर नतीजे पर पहूँचकर भी उस नतीजे तक तो नहीं ही पहूँचेंगे जिस तक आप और आपकी मण्‍डली पहूँच गयी है।

Mahender Singh - चलो यार लगे रहो पर मानसिक संतुलन बनाए रखना, हमने बिगड़ते हुए भी देखा है

Satya Narayan -·आपके जितना नहीं बिगड़ेगा।


Jp Narela - डा गिरिजेश तिवारी ,आपके वय्क्तित्त्व के विकाश और ल्युच्योसी के व्यक्तित्व के विकाश में क्या फर्क है ?

Girijesh Tiwari - j.p.प्यारे, इस मुद्दे पर तो हम पहले भी बात कर चुके हैं. ल्यू शाओ ची का मामला पार्टी में कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व विकास का था और मेरा मामला आज़मगढ़ में युवाओं को तैयार करना है.
Jp Narela - कन्स्पत्त एक ही है
डा. मेरे सवाल का सही उत्तर दे , आप समझ रहे है . मई क्या जानना चाहता हु
Girijesh Tiwari - नहीं है. उसे अवसरवाद करना था और मुझे थोड़ा कम क्षमता के लोगों को उत्साहित करना है. यहाँ के माहौल में तीन साल काम करने के बाद भी पढ़ाई के लिये गम्भीर युवाओं की संख्या कट्टे वालों से बहुत ही कम है. 
Jp Narela - लोगों को शिक्षित करना एक बात ! सामूहिकता की एस्प्रिट है इसमें 1 वय्क्तिताव के विकाश में व्यक्तिगत एस्प्रिट है 1 इसमें मुख्यत यही गड़बड़ी है !
Girijesh Tiwari - सही है. व्यक्तित्व और सामूहिकता के अधीन होना दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं और दोनों को एक ही व्यक्ति में विकसित भी किया जा सकता है. इसके भी नमूने गढ़े हैं.
Jp Narela - कैसे जरा बताओ तो मेरी जानकारी में भी इजाफा हो जायेगा
Girijesh Tiwari - 61-प्वाइंट्स में से ये पॉइंट्स इस विषय पर हैं :
58- व्यक्तिवाद को सामूहिकता के अधीन करने का सचेत अभियान चलाते रहना 
59- सामूहिक कीर्ति का विस्तार करके देश-काल की सीमाओं को ध्वस्त कर देना और वर्तमान एवं भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना देना
60- शोषक प्रवृत्ति से स्वयं को तथा अपने मित्रों को सतत बचाना
61- शोषण-मुक्त समाज-व्यवस्था की स्थापना के महासमर में अपनी भूमिका चुनना तथा आमरण उसका निर्वाह करना.
Jp Narela - फिर व्यक्तित्व का विकास शीर्षक पर पुर्विचार करो

Girijesh Tiwari - शीर्षक और नाम बड़ा-बड़ा रखने की परम्परा रही है, मेरे दोस्त ! इसी लिये थोड़ा अनगढ़ सा नाम रख कर इसे परियोजना कहा. अगर इसे आल इण्डिया संगठन भी कहता, तो लोग वैसा ही मान लेते. मगर छोटी औकात, छोटा प्रयोग, विफल हो सकने की पूरी गारण्टी ! इसलिये अपनी औकात भर ही बोलने के चक्कर में रहता हूँ.

Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, आप फिर बोल पड़े. सम्मानित इन्सान ऐसे तो नहीं करते. 

Satya Narayan - जो मार्क्‍सवाद के नाम पर गड़बड़ फैला रहे हैं उनका भण्‍डाफोड़ करना तो सबसे सम्‍मानित काम है।

Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, क्या अब मुझसे ख़ुद को ब्लॉक ही करवा देना चाहते हैं ! ऐसा मत कीजिए... कोचिंग हो या टोचिंग आप जो भी चाहें, मज़ाक उड़ा सकते हैं... मज़ाक का मैं बुरा नहीं मानता... और पूर्वाग्रहग्रस्त लोगों से सन्तुलित वक्तव्य की उम्मीद भी नहीं कर सकता.. 
तुलसी बाबा लिख गये हैं :
"बातुल भूत बिबस मतवारे, ते नहिं बोलें बचन सम्हारे" !

Satya Narayan - मैने तो आपके ही शब्‍दों से आपकी परियोजना का नाम दुरूस्‍त किया है। क्‍या व्‍यावसायिक संस्‍थानों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्‍थानों को कोचिंग सेण्‍टर नहीं कहते हैं। अब आप इतना तिलमिला रहे हैं और ब्‍लॉक करने की धमकी दे रहे हैं, उससे बेहतर होता कि आप अपनी इस “क्रान्तिकारी परियोजना” को डिफेण्‍ड करते।

Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, अब से बहुत पहले ही मैं आपको गंभीरता से लेना बन्द कर चुका हूँ. पहले ही चरण में आपने मुझे अपना पूरा परिचय दे दिया था. अब आपकी आज़ादी का सम्मान करना और आपको बडबडाने के लिये छोड़ देना ही उचित है. मेघी मारने से हाथ गन्दा होता है - ऐसा लोग कहते हैं. और आप इसी कोटि के जीव प्रतीत हो रहे हैं. सो खूब मन भर टर्र-टर्र कीजिए. मौसम भी बरसात का है. आनन्द ही होगा मित्रों को ...

Satya Narayan - Jp Narela जी को भी उनकी बातों का जवाब मिल गया होगा। ये व्‍यक्तित्‍व विकास परियोजना एक विशुद्ध कोचिंग सेंटर है। इनकी इस परियोजना के 61 पॉइंटस हैं उनमें से एक पॉइंट तो बड़ा धांसु है 
24- परीक्षा में टॉप करने-कराने के लिए घनघोर मेहनत करना
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कविता कृष्णपल्लवी के लेख पर मेरी टिप्पणी. टैग करने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी.
https://www.facebook.com/notes/kavita-krishnapallavi/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%82/665998956788982

मित्र Om Dwivedi, आपके द्वारा प्रेषित यह लेख पढ़ा. लेख पर मेरी कुछ सहमति और अनेक असहमतियाँ हैं. व्यक्ति को वर्गीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए. परन्तु उसकी उपलब्धियों को भी सम्मान देना चाहिए. जिन साहित्यकारों के नाम इस लेख में आये हैं, वे लब्ध-प्रतिष्ठ कलमकार हैं. पुरस्कार मिलना, उसे देना और लेना सबकुछ केवल गणित ही नहीं होता. कुछ सकारात्मक होने पर ही किसी रचनाकार को सम्मान और पुरस्कार मिलता है.

और हर जगह केवल बहिष्कार करने से ही आपकी शुचिता और पवित्रता की रक्षा सम्भव हो जाती है - ऐसा मानना बचकाना और हास्यास्पद है. बहिष्कार करके और शिरकत करके दोनों तरीकों से विरोध किया जाता है और किया जाना चाहिए. और हर जगह केवल विरोध - विरोध के लिए विरोध भी व्यर्थ का प्रलाप बन जाता है.

अगर आपकी कलम में ताक़त है, तो आपको भी जन-सम्मान से लेकर तरह-तरह के पुरस्कार मिलेंगे. अगर नहीं है, तो गर्भिणी का अभिनय करके आप को शिशु की किलकारी मयस्सर नहीं होनी. क्या लेखिका को कोई सम्मान या पुरस्कार मिला है ! क्या इनकी लिखी कोई प्रकाशित पुस्तक भी उपलब्ध है ! क्या सारे नाम यूँ ही बड़े हो जाते हैं ! उनकी साधना का कोई मतलब ही नहीं है ! क्या जो मार्क्सवादी नहीं है वह साहित्यकार केवल जनविरोधी ही है ! क्या इनको भी कभी किसी से सम्मान या पुरस्कार लेने का अवसर मिला !

अगर उदय प्रकाश, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, आलोकधन्‍वा, राजेश जोशी, कौशल किशोर, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पाण्‍डेय, प्रणयकृष्‍ण, सुशीला पुरी - सभी के सभी अलाने-फलाने सब तरह से गलत ही हैं, तो सबको गलत ठहराने वाले आत्म-मुग्ध पाण्डित्य के एकोहम के भ्रम के शिकार हैं. दरअसल, आप एक मात्र नहीं हैं, आप अनेक में से केवल एक हैं. अन्यथा जो कुछ आप कहें और करें, वह सबकुछ सही है और जो दूसरे कोई भी कहें या करें, वह सबकुछ सीधे-सीधे खारिज़ कर देने की बीमारी क्या दम्भ के अलावा कुछ और दिखाती है !

प्रो. रणधीर सिंह के एक उद्धरण पर मेरे द्वारा पोस्टर बनाने पर यह फ़तवा देना कि प्रो. रणधीर सिंह गलत हैं, तो हास्यास्पद ही था. जब हम किसी की ओर एक अंगुली उठाते हैं, तो हमको अपनी ओर उठने वाली अपनी ही तीन अंगुलियाँ भी दिखनी चाहिए. अन्यथा कबीर याद आ जाते हैं -
''दोस पराया देखि के, चले हसन्त-हसन्त ;
आपन याद न आवई, जाको आदि- न अन्त. "

मेरी समझ है कि मुझे अपना निर्णय लेने की आज़ादी है, हर एक को अपना निर्णय लेने की आज़ादी है. मगर यह आज़ादी वहीं तक है, जहाँ दूसरे का सम्मान शुरू होता है.

हर दूसरे के लिए अपमान-जनक टिप्पणी करके ख़ुद को क्रान्ति का केन्द्र मानना और कहना लोगों को केवल मुस्कुरा देने तक पहुँचा देता है. और लेखिका का यह भ्रम बार-बार दिखा है. मेरे बारे में तो इनकी और इनके सत्संगियों की यही राय है. और इनकी ही राय में कितनी अर्थवत्ता है - मैं उस तरह और उस स्तर की टिप्पणी को आलोचना नहीं भर्त्सना समझता हूँ. आलोचना का प्रस्थान-बिन्दु सकारात्मक होता है, और भर्त्सना या निन्दा का नकारात्मक.

लेखिका को भी आलोचना के बारे में अवश्य ही जानकारी होनी चाहिए. मगर इनकी कलम से केवल उपहास, निन्दा और भर्त्सना ही निकलती है. सबका पर्दाफाश करना ही इन लोगों का एक महत्वपूर्ण क्रन्तिकारी काम है. अपना पर्दा देखने की नज़र है ही नहीं. मैं यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं लिख रहा. मैंने इनकी विद्वत्ता और स्तरीय लेखन की प्रशंसा भी की है और उसे शेयर भी किया है. मगर मानवीय सद्गुण के साथ यह एक दुर्गुण है. मेरा अनुरोध है कि इसके बारे में लेखिका और उनके सभी मित्रों को गम्भीरता के साथ विचार करना चाहिए. इनकी मेरे विषय में जो राय है,वह मैं यहीं प्रस्तुत कर देता हूँ.

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और अब अमित पाठक की यह पोस्ट 26.3.15. इसी शृंखला की अगली कड़ी है.  

Amit Azamgarh with Awadhesh Yadav and 4 others -
https://www.facebook.com/amit.pathak.106/posts/822545047826833

"पिछले दिनों जो पोस्ट आपने मुझे टैग की थी उस पर मेरा जवाब कमेंट के रूप में जा नहीं पा रहा था. सो उसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.

_____A SELF-CRITICAL CONFESSION…_____
My dear friend, I am ashamed of making a worthless burden of my irrelevant whims and fancies a thankless liability for all my dears and nears. Each and every beginning with a big ZERO but a new zeal of all my attempts to serve the humanity and change the world turned out to be only one more bitter failure. All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.
I visualise the timidness of my own personal development as the principal cause of this only life-time achievement of series of failures. Neither I could rectify my own thought-process, nor overcome my own behavioural distortions throughout my life but only tried to preach others with a mouth too loud to tolerate.
I don't know any way out and I don't see any chance. But I wish to…
May I be helped !
Hopefully… your’s girijesh (9.3.15.)
https://www.facebook.com/photo.php…
वैसे इस तरह की आत्मालोचनाओं और आत्मस्वीकृतियों की बात आपके फेसबुक वाल पर कोई नयी चीज़ नहीं है और यह तो आप भी समझते हैं कि यह आपके लिए और दूसरों के लिए भी कोई महत्त्व नहीं रखती. वास्तव में अपनी असफलताओं को इस तरह के सतही विश्लेषण की पीछे छुपाने की कोशिश सच्चाई को और नग्नता से सामने ला पटकती है. अपनी व्यवहारिक गड़बड़ियों के पीछे सैद्धांतिक भटकाव के विश्लेषण से आँखे मूँद लेने की यह आदत समय समय पर इस तरह के अनर्गल प्रलापों के रूप में सामने आती रहती है. “मूंदहुँ आँख कतहूँ कछु नाहीं” की भाववादी प्रवृत्ति से चिपके रहने के बाद इस तरह का रोना-धोना आपको ही शोभा देता है.
आपके साथ पिछले मुलाकात के बाद मैंने खुद को एक लम्बा विश्राम लेकर सोचने का मौका दिया और इस दौरान कई बातें साफ़ हो गई. “मानवता की सेवा और दुनिया को बदल देने के लिए किये गए पहले प्रयोग (राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कॉलेज)” की असफलता को आपने किस रूप में सूत्रबद्ध किया और उनसे किन निष्कर्षों पर पँहुचे यह मैं नहीं कह सकता लेकिन दो धाराओं के बीच के संघर्ष में पराजित होने की बात कहकर आप इस पूरे प्रयोग की असफलता के विश्लेषण से बचते रहे हैं और अपने चारो ओर के उस भ्रम जाल को टूटने से बचाने की पूरी कोशिश करते रहे हैं जिनके बीच आप जी रहे हैं. वास्तव में आपके उस प्रयोग और आपके वर्तमान प्रयोग “व्यक्तित्त्व विकास परियोजना” की अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. वास्तव में यह क्रांति का ढोल पीटने वाले वाम और दक्षिणपंथी भटकावों, संशोधनवाद, से भी खतरनाक है. क्रांतिकारी संघर्षों से दूरी बनाते हुए क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व गढ़ने की यह दिशा ने व्यवस्था की सेवा करने वाले बेहतर व्यक्तित्त्व तैयार करने का कम, मुझे उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व होने का भ्रम नहीं है, लोगों के लिए कुछ कर देने का काम और उन्हें इसी व्यवस्था के भीतर झूठी उम्मीद का झुनझुना पकड़ा देने के काम को कोई क्रान्तिकारी काम नहीं कहा जा सकता. कम से कम मार्क्सवाद से तो इसका कोई लेना-देना नहीं है. उलटे यह किसी भी संभावना संपन्न व्यक्ति को मार्क्सवादी राजनीति से कोसों दूर ले जा कर खड़ा कर देती है और प्रायः उन्हें मानसिक अवसाद की तरफ धकेल देती है. व्यक्तित्त्व विकास परियोजना का काम का काम शुरू होने के कुछ ही समय पहले मैं आपसे जुड़ा था. इसकी पहली बैठक का ठीक ठीक समय बता पाने में मैं असमर्थ हूँ. आपके आलावा मेरे और कमोबेश मेरी ही उम्र के कुछ दूसरे नौजवानों के साथ व्यक्तित्त्व विकास परियोजना की शुरुआत हुई. अभी इसे एक संगठन भी नहीं कह सकते थे. हम नौजवानों में से कोई भी किसी विशेष राजनैतिक समझदारी से लैस नहीं था फिर भी हमने आपनी पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ इस काम को आगे बढ़ाया. क्योंकि एक सामान्य मध्यमवर्गीय चेतना के अनुसार यह एक ‘भला काम’ था जो क्रांतिकारी काम के छलावरण में लिपटा हुआ था. लेकिन आपने अपने इस “क्रांतिकारी प्रयोग” में जुटे किसी के भी राजनैतिक स्तरोन्नयन का काम नहीं किया. कुछ एक अध्ययन चक्रों को छोड़ दिया जाए तो उस दौर में हममें से अधिकतर ने अपनी समझदारी को उन्नत करने का प्रयास किताबी ज्ञान के जरिये ही किया. स्पष्ट था कि बिना किसी राजनैतिक चेतना के अलग अलग तरह के तत्वों को बांधे रखना सम्भव नहीं था. परिणामस्वरूप परियोजना के संचालन के लिए बनाई गई केन्द्रीय टीम के अलग अलग सदस्य समय पर अलग अलग समस्याओं से जूझते रहे और आपने अपनी स्थिति को सुरक्षित रखते हुए उनकी कम समझदारी का रोना रोते रहे. “पोलिटिक्स इन कमांड” का जाप करते हुए “मेन(men) इन कमांड” की घृणित कार्यप्रवृत्ति को व्यवहार में अपनाये रहना मुंह में राम बगल में छुरी जैसा ही था. “All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.” अपने प्यार का हवाला देकर लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की लिजलिजी प्रवृत्ति से आपके करीब आने वाले हर आदमी को जूझना पडा है. बी.एससी. की पढाई पूरी होने के बाद से ही मैं व्यक्तित्त्व विकास परियोजना के कामों में कोई प्रत्यक्ष भूमिका न निभाने के बावजूद मैं इससे पूरी तरह से अलगाव की स्थिति में भी नहीं था. मगर पिछली बातचीत ने मुझे अपनी स्थिति का एक बार फिर से समग्र मूल्यांकन करने पर विवश कर दिया.
पिछली मुलाकात के बाद जो सूत्र आपने दिया, वह तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद की पीठ में छुरा भोंकना ही था. वास्तव में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का सैद्धांतिक विकास बहुत सारी प्रवृत्तियों के साथ संघर्षों के दौरान ही हुआ है. क्रांतिकारी आन्दोलन के ठहराव या क्रांति पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होने के दौर में यह हमेशा होता रहा है कि क्रांतिकारी व्यवहार से कटे बुद्धिजीवी आन्दोलन के ठहराव का सम्यक और गहन विश्लेषण करने की बजाय मार्क्सवाद की उन शिक्षाओं पर ही हमला करने लगते हैं जिनके बगैर क्रांतिकारी आन्दोलन कभी खड़ा ही नहीं हो सकता. उदाहरण के लिये लेनिन के दौर में मेन्शेविक ऐसे ही निठल्ले बुद्धिजीवी थे जो लेनिन के पार्टी संबंधी सिद्धांतों को नकार कर दुअन्नी-चवन्नी छाप मेम्बरशिप वाली मॉस पार्टी की अवधारणा पेश कर रहे थे और यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि लेनिन के नेतृत्त्व में जब बोल्शेविक पार्टी क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर बढ़ रही थी तब इन मेंशेविकों ने सत्ता के एजेंटों की भूमिका निभाई. इसी तरह रूस और चीन में संशोधनवादी सत्ता के अस्तित्त्व में आने और खास तौर पर सोवियत संघ के विघटन के बाद पूरी दुनिया के निठल्ले बुद्धिजीवियों में लेनिन के पार्टी विषयक सैद्धान्तिक अवदानों को नकार देने का फैशन बहुत चलन में है. हास्यास्पद बात तो ये है कि किसी भी तरह के क्रांतिकारी प्रयोग खड़ा करने या किसी भी तरह की सैद्धान्तिक व्याख्या करने में अक्षम टुटपूंजिये भी अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व हीनता को छिपाने के लिये फर्जी सिद्धांतों की आड़ लेने से बाज नहीं आते. क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में बार बार ऐसे मौके आते हैं जब लोग अपनी व्यावहारिक गड़बड़ियों के पीछे के सैद्धांतिक भटकावों की तलाश करने के बजाय सिद्धांत पर ही सवाल खड़े करने लगते हैं और प्रायः यह सामने आता है कि ये प्रवृत्तियाँ आन्दोलन के इतिहास में कई बार दुहराई जा चुकी होती हैं और उस ऐतिहासिक कथन पर सीधे सीधे खरा उतरती हैं जिसके अनुसार इतिहास की घटनाएँ जब दुहराई जाती हैं तो पहले तो वह त्रासदी और उसके बाद कॉमेडी के रूप में ही दुहराई जाती हैं. मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर कीचड़ उछालने की यह प्रवृत्ति ऐसे लोगों को उसी सड़ांध मारते दलदल में पंहुचा देगी जिसे वे अपने खलिहरपन को दूर करने के लिए अपने चारों ओर तैयार करते है और जिससे वे लगातार कीचड़ बटोर बटोर कर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के ऊपर फेंकते रहे हैं
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Subhashini Tripathi and 2 others like this.
Anurag Pathak Apna new no de de
Girijesh Tiwari नमस्ते अमित, आपकी पोस्ट पढ़ी, बेहतर होता अगर हम आमने सामने बात करते. बात पोस्ट्स और कमेन्ट्स से कहीं अधिक है और कहीं अधिक महत्वपूर्ण भी हम दोनों के लिये ही.
Dhriti Pragya Singh अमित क्या यह उचित है कि हम बिना विचार विमर्श के अपने निजी विचार थोप दें किसी पर
अपनों का दुख सौ दुखों से भारी होता है बेटा
तुम एक बार बात तो करते
Bittu Singh Rathor bhaiya ji kaha par hai
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अमित पाठक की यह पोस्ट मेरे इस चित्र पर की गयी आत्मालोचना पर है.



Saturday, 1 March 2014

ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यशाला' (summer training workshop)



आवश्यक सूचना : निःशुल्क शिक्षण-प्रशिक्षण !

प्रिय मित्र, 'व्यक्तित्व विकास परियोजना' का तीसरा सत्र Amit Pathak और Arun Yadav के सतत श्रम के सहारे सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया. 
अब 'ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यशाला' (summer training workshop) शुरू हो रही है. इसका सत्र अब से जून के अन्त तक प्रतिदिन प्रातः 9 बजे से सायं 5 बजे तक चलेगा. 
इस कार्यशाला में उनको सुन्दर लिखना, शुद्ध पढ़ना, धारा-प्रवाह बोलना, चित्रकला, कविता-कहानी-निबन्ध लिखना, हिन्दी से अंग्रेज़ी में और अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करना, समय-प्रबन्धन, याद करने का वैज्ञानिक तरीका सिखाया जायेगा. 
साथ ही कम्प्यूटर-टाइपिंग भी सिखाई जायेगी.

अगर आपके सम्पर्क में कक्षा 8 की परीक्षा देने वाले या उसके ऊपर की कक्षाओं के छात्र-छात्राएँ हैं, तो उन तक यह सूचना पहुँचायें, ताकि वे इस सम्बन्ध में सम्पर्क कर सकें.

स्थान : कालीचौरा तिराहा, पश्चिम पटरी, ट्रांसफार्मर के पीछे, 
दिनेश राय एडवोकेट का मकान, आज़मगढ़ 
फोन : 9450735496, आभार-प्रकाश के साथ - आपका गिरिजेश


एक अनुरोध : निःशुल्क वर्कशॉप शुरू ! 9बजे से -5 बजे तक
प्रिय मित्र, 
मार्च का पहला दिन : 
आज 'व्यक्तित्व विकास परियोजना' की 'समर वर्कशॉप' आरम्भ हुई. 
अगर आपके सम्पर्क में आज़मगढ़ में कोई भी छात्र/छात्रा हों, तो उनको इस वर्कशॉप के बारे में बताइए और इसमें भाग लेने के लिये प्रेरित कीजिए.

आज पहले दिन कुल दस छात्र रहे. 
आठ नौ की परीक्षा देने वाले और दो ग्यारहवीं से बारह में जाने वाले. 
ऊपर वाले कमरे में फर्श पर मैट बिछाई गयी. 
हिन्दी से अंग्रेज़ी में मौखिक और लिखित अनुवाद पर काम हुआ. 
अन्तिम आधे घंटे में नीचे आ कर कम्प्यूटर पर 'number, gender, person, case' के बारे में लेक्चर और list of verbs की रिकार्डिंग सुनी गई. 
कल सुबह नौ बजे फिर मिलने के आश्वासन के साथ सारे छात्र प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर गये. 
कल से कक्षा ग्यारह की परीक्षा दे चुकी गवर्नमेन्ट गर्ल्स कॉलेज की छात्राएँ भी आने वाली हैं. 

जून अन्त तक प्रतिदिन पूरे जोश से सीखने-सिखाने का काम करते हुए इन चार महीनों के समय में हम इस टीम के अन्दर से प्रचण्ड आत्मविश्वास से लबरेज़ नये इन्सान गढ़ेंगे. 

न जाने कितने बुने थे सपने, जिन्हें दफ़न कर के मैं खड़ा हूँ;
न जाने कितने गढ़े थे अपने, जिन्हें विदा कर के मैं अड़ा हूँ:
मैं फिर परिन्दों के रू-ब-रू हूँ, नयी उड़ानें सिखा रहा हूँ;
मैं इस ज़माने को मोड़ दूँगा, नये तराने बना रहा हूँ. 

आभार-प्रकाश के साथ - आपका गिरिजेश
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एक अनुरोध : निःशुल्क वर्कशॉप जारी ! 9 बजे से - 5 बजे तक प्रतिदिन !
प्रिय मित्र, 
वर्कशॉप का दूसरा दिन : 
आज 'व्यक्तित्व विकास परियोजना' की 'समर वर्कशॉप' दूसरे दिन चली. 
अगर आपके सम्पर्क में आज़मगढ़ में कोई भी छात्र/छात्रा हों, तो उनको इस वर्कशॉप के बारे में बताइए और इसमें भाग लेने के लिये प्रेरित कीजिए.

आज कुल ग्यारह छात्र रहे. 
दस कक्षा नौ की परीक्षा देने वाले और एक इन्टर के बाद का प्रतियोगिता की तैयारी करने वाला. 
पहले 25 verbs याद करने को दिया गया और उसे एक दूसरे को स्पेलिंग सहित सुना कर पुष्ट कर लिया गया. 
हिन्दी से अंग्रेज़ी में मौखिक और लिखित अनुवाद पर काम हुआ. 
हिन्दी अक्षरों और मात्राओं के बारे में बताया गया.
उनको तीन मिनट तक बोलने को कहा गया.
घर से बोले गये विषय पर निबन्ध लिखने को, पाँच एक्सरसाइज ट्रांसलेशन करने को और 25 verbs याद करने को दिया गया.
अन्तिम आधे घंटे में नीचे आ कर कम्प्यूटर पर 'number, gender, person, case' के बारे में लेक्चर और list of verbs की रिकार्डिंग सुनी गई. 
कल सुबह नौ बजे फिर मिलने के आश्वासन के साथ सारे छात्र प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घर गये. 
आज कक्षा ग्यारह की परीक्षा दे चुकी गवर्नमेन्ट गर्ल्स कॉलेज की छात्राएँ नहीं आ सकीं. सम्भवतः उनके दिमाग में sunday study circle का मामला रहा हो, जो आगे बढ़े हुए लोगों के लिये ही चलायी जाती रही है.
कल से वे छात्राएँ भी आने लगेंगी. 

जून अन्त तक प्रतिदिन पूरे जोश से सीखने-सिखाने का काम करते हुए इन चार महीनों के समय में हम इस टीम के अन्दर से प्रचण्ड आत्मविश्वास से लबरेज़ नये इन्सान गढ़ेंगे. 

न जाने कितने बुने थे सपने, जिन्हें दफ़न कर के मैं खड़ा हूँ;
न जाने कितने गढ़े थे अपने, जिन्हें विदा कर के मैं अड़ा हूँ:
मैं फिर परिन्दों के रू-ब-रू हूँ, नयी उड़ानें सिखा रहा हूँ;
मैं इस ज़माने को मोड़ दूँगा, नये तराने बना रहा हूँ. 

आभार-प्रकाश के साथ - आपका गिरिजेश

स्थान : कालीचौरा तिराहा, पश्चिम पटरी, ट्रांसफार्मर के पीछे, दिनेश राय एडवोकेट का मकान, आज़मगढ़

'A COMMUNIST'


LAL SALAM COMRADE !

YES, I FEEL PROUD, 
WHEN SOME OF MY FRIENDS INTRODUCE ME TO THEIR FRIENDS 
AND TELL THEM - 
MEET MY BEST FRIEND 'COMRADE GIRIJESH'. 
BUT BE AWARE AND MAINTAIN DISTANCE.

YES, I AM PROUD TO BE CALLED 'A COMMUNIST'. 

BECAUSE.....
ONE EVENING NEAR A CAMP-FIRE
WHEN FIDEL ASKED - IS THERE ANY 'ECONOMIST' AMONG US ?
CHE RAISED HIS HAND.
AND SURPRISED FIDEL ASKED - ARE YOU AN ECONOMIST?
CHE REPLIED - I THOUGHT YOU ARE ASKING - IS THERE ANY 'COMMUNIST' AMONG US !
AND THUS CHE WAS APPOINTED THE GOVERNOR OF THE BANK OF CUBA.

THE MESSAGE OF THIS TALK IS -

A COMMUNIST 
MEANS 
THE PERSON PROVIDING SOLUTION OF ANY PROBLEM.

और 'जंग' जारी रहेगी...


आज विवेकानन्द का चित्र देखा. 
अपने बैच में 'राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कॉलेज' की 'सपाट प्रतियोगिता' में विवेकानन्द ने "नौ सौ पचपन" (955) सपाट खींच कर रिकॉर्ड बनाया था. 
विवेकानन्द जैसे युवक जहाँ भी रहेंगे, मुझे उनकी प्रतिभा और कृतित्व पर जीवन भर गर्व रहेगा.
तब वहाँ तरह-तरह की प्रतियोगिताएँ होती थीं.
तब छात्रों-छात्राओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस किया जाता था.
अब इस वर्ष छात्रों के विदाई-समारोह के नाम पर 'रामचरित मानस' के 'सुन्दर काण्ड' का पाठ किया गया.
जीवन का सत्य कल्पना से भी विचित्र होता है.
अगर 'आज' 'कल' जैसा नहीं है, तो 'कल' भी 'आज' जैसा ही निश्चित नहीं होगा.
मुझे 'कल' को 'आज' से बेहतर बनाने के लिये जूझने पर भरोसा है.
और अपनी कूबत भर इसी के लिये गिरता-पड़ता, ढहता-ढमिलाता, टूटता-दरकता, हारता-भागता, सोचता-विचारता जूझता चला जा रहा हूँ.
'कल' जो साथ थे, 'आज' दूर हैं.
'आज' जो साथ हैं, शायद उनमें से भी 'कल' कुछ दूर चले ही जायेंगे.
मगर 'कल' निश्चय ही कुछ और ही सही साथ तो होंगे ही.
और हमारी 'जंग' जारी रहेगी.

'नास्तिक' शब्द की व्याख्या


प्रश्न : 'नास्तिक' शब्द की व्याख्या क्या हो सकती है ?
उत्तर : "नास्तिकता अथवा नास्तिकवाद या अनीश्वरवाद (en:Atheism) वह सिद्धांत जो जगत् की सृष्टि करने वाले, इसका संचालन और नियंत्रण करनेवाले किसी भी ईश्वर के अस्तित्व को सर्वमान्य प्रमाण के न होने के आधार पर स्वीकार नहीं करता । (नास्ति = न + अस्ति = नहीं है , अर्थात ईश्वर नहीं है।) नास्तिक लोग ईश्वर (भगवान) के अस्तित्व का स्पष्ट प्रमाण न होने कारण झूठ करार देते हैं । अधिकांश नास्तिक किसी भी देवी देवता, परालौकिक शक्ति, धर्म और आत्मा को नहीं मानते । हिन्दू दर्शन में नास्तिक शब्द उनके लिये भी प्रयुक्त होता है जो वेदों को मान्यता नहीं देते । नास्तिक मानने के स्थान पर जानने पर विश्वास करते हैं । वहीं आस्तिक किसी न किसी ईश्वर की धारणा को अपने धर्म, संप्रदाय, जाति, कुल या मत के अनुसार बिना किसी प्रमाणिकता के स्वीकार करता है । नास्तिकता इसे अंधविश्वास कहती है क्योंकि किसी भी दो धर्मों और मतों के ईश्वर की मान्यता एक नहीं होती है । 

नास्तिकता रूढ़िवादी धारणाओं के आधार नहीं बल्कि वास्तविकता और प्रमाण के आधार पर ही ईश्वर को स्वीकार करने का दर्शन है । नास्तिकता के लिए ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने के लिए अभी तक के सभी तर्क और प्रमाण अपर्याप्त है ।
दर्शन का अनीश्वरवाद के अनुसार जगत स्वयं संचालित और स्वयं शासित है। ईश्वरवादी ईश्वर के अस्तित्व के लिए जो प्रमाण देते हैं, अनीश्वरवादी उन सबकी आलोचना करके उनको काट देते हैं और संसारगत दोषों को बतलाकर निम्नलिखित प्रकार के तर्कों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि ऐसे संसार का रचनेवाला ईश्वर नहीं हो सकता।

ईश्वरवादी कहते है कि मनुष्य के मन में ईश्वरप्रत्यय जन्म से ही है और वह स्वयंसिद्ध एवं अनिवार्य है। यह ईश्वर के अस्तित्व का द्योतक है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि ईश्वरभावना सभी मनुष्यों में अनिवार्य रूप से नहीं पाई जाती और यदि पाई भी जाती हो तो केवल मन की भावना से बाहरी वस्तुओं का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता। मन की बहुत सी धारणाओं को विज्ञान ने असिद्ध प्रमाणित कर दिया है।

जगत में सभी वस्तुओं का कारण होता है। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। कारण दो प्रकार के होते हैं-एक उपादान, जिसके द्वारा कोई वस्तु बनती है, और दूसरा निमित्त, जो उसको बनाता है। ईश्वरवादी कहते हैं कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी एक कार्य (कृत घटना) है अतएव इसके भी उपादान और निमित्त कारण होने चाहिए। कुछ लोग ईश्वर को जगत का निमित्त कारण और कुछ लोग निमित्त और उपादान दोनों ही कारण मानते हैं। इस युक्ति के उत्तर में अनीश्वरवादी कहते हैं कि इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि घट, पट और घड़ी की भाँति समस्त जगत् भी किसी समय उत्पन्न और आरंभ हुआ था। इसका प्रवाह अनादि है, अत: इसके स्रष्टा और उपादान कारण को ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि जगत का स्रष्टा कोई ईश्वर मान लिया जाय जो अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा; यथा, उसका सृष्टि करने में क्या प्रयोजन था? भौतिक सृष्टि केवल मानसिक अथवा आध्यात्मिक सत्ता कैसे कर सकती है? यदि इसका उपादान कोई भौतिक पदार्थ मान भी लिया जाय तो वह उसका नियंत्रण कैसे कर सकता है? वह स्वयं भौतिक शरीर अथवा उपकरणों की सहायता से कार्य करता है अथवा बिना उसकी सहायता के? सृष्टि के हुए बिना वे उपकरण और वह भौतिक शरीर कहाँ से आए? ऐसी सृष्टि रचने से ईश्वर का, जिसको उसके भक्त सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और कल्याणकारी मानते हैं, क्या प्रयोजन है, जिसमें जीवन का अंत मरण में, सुख का अंत दु:ख में संयोग का वियोग में और उन्नति का अवनति में हो? इस दु:खमय सृष्टि को बनाकर, जहाँ जीव को खाकर जीव जीता है और जहाँ सब प्राणी एक दूसरे शत्रु हैं और आपस में सब प्राणियों में संघर्ष होता है, भला क्या लाभ हुआ है? इस जगत् की दुर्दशा का वर्णन योगवासिष्ठ के एक श्लोक में भली भाँति मिलता है, जिसका आशय निम्निलिखत है--
कौन सा ऐसा ज्ञान है जिसमें त्रुटियाँ न हों, कौन सी ऐसी दिशा है जहाँ दु:खों की अग्नि प्रज्वलित न हो, कौन सी ऐसी वस्तु उत्पन्न होती है जो नष्ट होनेवाली न हो, कौन सा ऐसा व्यवहार है जो छलकपट से रहित हो? ऐसे संसार का रचनेवाला सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी ईश्वर कैसे हो सकता है?

ईश्वरवादी एक युक्ति यह दिया करते हैं कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुओं के अंतर्गत, और समस्त सृष्टि में, नियम और उद्देश्यसार्थकता पाई जाती है। यह बात इसकी द्योतक है कि इसका संचालन करनेवाला कोई बुद्धिमान ईश्वर है इस युक्ति का अनीश्वरवाद इस प्रकार खंडन करता है कि संसार में बहुत सी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं जिनका कोई उद्देश्य, अथवा कल्याणकारी उद्देश्य नहीं जान पड़ता, यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, बाढ़, आग लग जाना, अकालमृत्यु, जरा, व्याधियाँ और बहुत से हिंसक और दुष्ट प्राणी। संसार में जितने नियम और ऐक्य दृष्टिगोचर होते हैं उतनी ही अनियमितता और विरोध भी दिखाई पड़ते हैं। इनका कारण ढूँढ़ना उतना ही आवश्यक है जितना नियमों और ऐक्य का। जैसे, समाज में सभी लोगों को राजा या राज्यप्रबंध एक दूसरे के प्रति व्यवहार में नियंत्रित रखता है, वैसे ही संसार के सभी प्राणियों के ऊपर शासन करनेवाले और उनको पाप और पुण्य के लिए यातना, दंड और पुरस्कार देनेवाले ईश्वर की आवश्यकता है। इसके उत्तर में अनीश्वरवादी यह कहता है कि संसार में प्राकृतिक नियमों के अतिरिक्त और कोई नियम नहीं दिखाई पड़ते। पाप और पुण्य का भेद मिथ्या है जो मनुष्य ने अपने मन से बना लिया है। यहाँ पर सब क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं और सब कामों का लेखा बराबर हो जाता है। इसके लिए किसी और नियामक तथा शासक की आवश्यकता नहीं है। यदि पाप और पुण्य के लिए दंड और पुरस्कार का प्रबंध होता तथा उनको रोकने और करानेवाला कोई ईश्वर होता; और पुण्यात्माओं की रक्षा हुआ करती तथा पापात्माओं को दंड मिला करता तो ईसामसीह और गांधी जैसे पुण्यात्माओं की नृशंस हत्या न हो पाती।

इस प्रकार अनीश्वरवाद ईश्वरवादी सूक्तियों का खंडन करता है और यहाँ तक कह देता है कि ऐसे संसार की सृष्टि करनेवाला यदि कोई माना जाय तो बुद्धिमान और कल्याणकारी ईश्वर को नहीं, दुष्ट और मूर्ख शैतान को ही मानना पड़ेगा।
पाश्चात्य दार्शनिकों में अनेक अनीश्वरवादी हो गए हैं, और हैं। भारत में जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य और पूर्वमीमांसा दर्शन अनीश्वरवादी दर्शन हैं। इन दर्शनों में दी गई युक्तियों का सुंदर संकलन हरिभद्र सूरि लिखित षड्दर्शन समुच्चय के ऊपर गुणरत्न के लिखे हुए भाष्य, कुमारिल भट्ट के श्लोकवार्तिक, और रामानुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र पर लिखे गए श्रीभाष्य में पाया जाता है।
धर्म मनुष्य को बाटँनेँ का काम करता है । अतः ईश्वर सिर्फ जनता का अफीम होता है।

भारतीय दर्शन में नास्तिक :

भारतीय दर्शन में नास्तिक शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
(1) जो लोग वेद को परम प्रमाण नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। इस परिभाषा के अनुसार बौद्ध, जैन, और लोकायत मतों के अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं और ये तीनों दर्शन नास्तिक दर्शन कहे जाते हैं।
(2) जो लोग परलोक और मृत्युपश्चात् जीवन में विश्वास नहीं करते; इस परिभाषा के अनुसार केवल चार्वाक दर्शन जिसे लोकायत दर्शन भी कहते हैं, भारत में नास्तिक दर्शन कहलाता है और उसके अनुयायी नास्तिक कहलाते हैं।
(3) जो लोग ईश्वर (खुदा, गॉड) के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते। ईश्वर में विश्वास न करनेवाले नास्तिक कई प्रकार के होते हैं। घोर नास्तिक वे हैं जो ईश्वर को किसी रूप में नहीं मानते। चार्वाक मतवाले भारत में और रैंक एथीस्ट लोग पाश्चात्य देशें में ईश्वर का अस्तित्व किसी रूप में स्वीकार नहीं करते; अर्धनास्ति उनका कह सकते हैं जो ईश्वर का सृष्टि, पालन और संहारकर्ता के रूप में नहीं मानते। इस परिभाषा के अनुसार भारत के बहुत से दर्शन नास्तिक की कोटि में आ जाते हैं। वास्तव में न्याय और वेदांत दर्शनों को छोड़कर भारत के अन्य दर्शन सांख्य, योग, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध और जैन नास्तिक दर्शन कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें ईश्वर को सर्जक, पालक और विनाशक नहीं माना गया है। ऐसे नास्तिकों को ही अनीश्वरवादी कहते हैं।

नास्तिकता में तर्क कौन सा ऐसा ज्ञान है जिसमें त्रुटियाँ न हों, कौन सी ऐसी दिशा है जहाँ दु:खों की अग्नि प्रज्वलित न हो, कौन सी ऐसी वस्तु उत्पन्न होती है जो नष्ट होनेवाली न हो, कौन सा ऐसा व्यवहार है जो छलकपट से रिहत हो? ऐसे संसार का रचनेवाला सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी ईश्वर कैसे हो सकता है? नास्तिकता के पक्ष में तर्क ईश्वर के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है । उसे देखा, सुना, महसूस किया नहीं जा सकता । प्रकृति के सारे नियम कानून विज्ञान से समझे जा सकते हैं । जगत और जीवन का उद्भव भी विज्ञान से समझा जा सकता है । धर्मग्रन्थों में बकवास लिखी गयी है । उनकी कहानियाँ परीकथाएँ लगती हैं, जिनका ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है । यिद ईश्वर है, तो इस दुनिया में इतना पाप, दुख और दर्द क्यों है ? धर्मग्रन्थों ने एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से पृथक कर दिया है।

आधुनिक काल में नास्तिक :

नास्तिक अर्थात् अनीश्वरवादी लोग सभी देशो और कालों में पाए जाते हैं। इस वैज्ञानिक और बौद्धिक युग में नास्तिकों की कमी नहीं है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ऐसे लोग आजकल बहुत कम मिलेंगे जो नास्तिक (अनीश्वरवादी) नहीं है। नास्तिकों का कहना यह है कि ईश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सर्जक मानने की आवश्यकता तो तभी होगी जब कि यह प्रमाणित हो जाए कि कभी सृष्टि की उत्पत्ति हुई होगी। यह जगत् सदा से चला आ रहा जान पड़ता है। इसके किसी समय में उत्पन्न होने का कोई प्रमाण ही नहीं है। उत्पन्न भी हुआ तो इसका क्या प्रमाण है कि इसकी विशेष व्यक्ति ने बनाया हो, अपने कारणों से स्वत: ही यह बन गया हो। इसका चालक और पालक मानने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जगत् में इतनी मारकाट, इतना नाश और ध्वंस तथा इतना दु:ख और अन्याय दिखाई पड़ता है कि इसका संचालक और पालक कोई समझदार और सर्वशक्तिमान् और अच्छा भगवान् नहीं माना जा सकता, संभवतः वो एक विक्षिप्त शक्तिधारक ही हो सकता है। संसार में सर्जन और संहार दोनों साथ साथ चल रहे हैं। इसलिए यह कहना व्यर्थ है, कि किसी दिन इसका पूरा संहार हो जाएगा और उसके करने के लिए ईश्वर को मानने की आवश्यकता है। नास्तिकों के विचार में आस्तिकों द्वारा दिए गए ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सभी प्रमाण प्रमाणाभास हैं ।"

'आप' सरकार के त्यागपत्र के बारे में :


प्रिय मित्र, कल रात अरविन्द केजरीवाल ने जनलोकपाल के नाम पर अपनी सरकार का त्यागपत्र दे दिया. आज अभी कई मित्रों की पोस्ट्स पढ़ने को मिलीं. उनके इस कदम की आप सभी की भर्त्सना उचित है. 

मगर एक बार रुक कर हमें यह सोचना चाहिए कि इस कदम के पीछे उनका क्या गणित है. मुझे याद है जब केजरीवाल ने पार्टी बनाने की घोषणा की थी, तो हम सब को अन्ना उनसे बेहतर दिखाई दे रहे थे. क्योंकि अन्ना सत्ता से दूर रह कर आन्दोलन के द्वारा सत्ता पर अंकुश लगाने के पक्ष में थे. वक्त ने अन्ना को वहाँ पहुँचा दिया, जहाँ उनके जाने की हमने कल्पना भी नहीं की थी. 

और उसी वक्त ने केजरीवाल की पार्टी को उस मरहले तक पहुँचाया कि हमारे अनेक वामपन्थी, समाजवादी और क्रान्तिकारी साथी उसमें जा चुके हैं. और अभी भी अनेक ऐसे लोग या तो ख़ुद वहाँ जाने के बारे में विचार करने या अपने मित्रों को वहाँ चले जाने की सलाह देने में लगे हैं.

हम सब को अच्छी तरह से पता है कि देश में पूँजीवादी जनतन्त्र है और केवल संसदीय पथ पर चल कर समाजवादी जनतन्त्र की मंजिल तक नहीं जाया जा सकता.

अरविन्द केजरीवाल को क्रान्ति के पैमाने पर तोलने की चूक करना वस्तुगत होना नहीं है. उनको और उनकी पार्टी को उनकी वर्गीय पृष्ठभूमि के धरातल पर ही तोलना उचित होगा. 

केजरीवाल को क्रान्ति नहीं करनी है. उनका सपना भ्रष्टाचार मुक्त पूँजीवादी व्यवस्था है. और उनको संसदीय पथ पर ही आगे बढ़ना है. पिछले चुनाव के परिणाम ने उनकी पहल की लोकप्रियता हम सब के सामने ला दी है. अगला चुनाव आसन्न है. केवल दिल्ली ही नहीं अपितु देश के अन्य भागों में भी उनकी पार्टी सक्रिय है. और उनकी नज़र अगले चुनाव पर लगी है.

पिछले चुनाव के परिणाम से उनके लोगों में आत्मविश्वास भी बढ़ा है और लोगों का उनकी पार्टी पर भरोसा भी. आज जन-सामान्य के बीच चर्चा उनके पक्ष में गरम है. निश्चय ही अगले चुनाव में कांग्रेस और मोदी गिरोह के बीच की टक्कर का परिणाम 'आप' के बीच में कूद पड़ने पर अब वह तो नहीं ही होगा, जिसकी कल्पना चुनावी गणित की भविष्यवाणी करने वाले इसके पहले तक किया करते थे. मोदी गिरोह को जो बढ़त मिलनी थी, वह भी प्रभावित होने जा रही है और कांग्रेस के पाले में गिरने वाले वोटों की गिनती भी प्रभावित होनी ही है. 

ऐसे में संसद में अरविन्द केजरीवाल का स्वर और भी प्रभावी होने जा रहा है. क्योंकि 'आप' को अगले चुनाव में निश्चय ही बेहतर नतीज़े दिख रहे हैं. और अगर दिल्ली विधान-सभा का दुबारा चुनाव हुआ, और वह अभी नहीं तो कभी तो होगा ही, तो 'आप' को पूर्ण बहुमत भी इस बार अवश्य ही मिलेगा. 

अब इस जनविरोधी पूँजीवादी व्यवस्था की सीमाओं में इससे अधिक सुधार के प्रयास कर पाना सम्भव है ही नहीं. इसे लोग भी जानते हैं और हम भी. परन्तु इसी 'लोकतन्त्र' में अभी भी देश की जनता की आस्था पूर्ववत बनी हुई है. लोग राहत देने के लिये अरविन्द केजरीवाल द्वारा किये गये इतने भी प्रयास से पुलकित हैं. उनको अरविन्द केजरीवाल की सीमाएँ नहीं दिख रही हैं. इसके उलट उनको अरविन्द केजरीवाल ही राहत दे सकने वाले 'देवदूत' प्रतीत हो रहे हैं. ऐसे में लोगों के बीच बन चुकी अपनी छवि का अधिकतम लाभ उनको और उनकी पार्टी को अवश्य ही मिलेगा. और तन्त्र अब और भी सुरक्षित और समर्थ होकर जन-सामान्य की 'बेहतर सेवा' कर सकेगा. यही अरविन्द केजरीवाल का भी सपना है और जन-सामान्य भी अभी यही सपना देख रहा है.

ऐसे में हमें अपनी आलोचना के शब्दों को लोगों के दिमाग तक पहुँचा सकने लायक और भी तर्कपरक और धारदार बनाना होगा. उनको यह समझाने का प्रयास करना होगा कि आकर्षक और सुन्दर लगने वाला जनलोकपाल और राहत देने वाले अरविन्द केजरीवाल भी इसी व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं. इसे बदलना नहीं. वे पूँजी की ऑक्टोपसी जकड़ से श्रमिक वर्ग को मुक्त करने में नितान्त असमर्थ हैं. मेरा तो यही आकलन है कि इतिहास के इस मोड़ पर भी एक बार फिर से इस देश का शोषक-शासक वर्ग अपनी डुगडुगी बजा कर जन-सामान्य को सम्मोहित कर ले जा रहा है. 

सोचना हमें ही है कि ऐसे में भी हम क्या केवल वर्तमान की त्रासदी में उलझे क्रान्तिकारी आन्दोलन की यथास्थिति की जड़ता को तोड़ने के लिये पहल ले सकेंगे या अभी भी इस विसंगति में अपनी पूर्ववत जड़ता और आत्म-मुग्धता के शिकार बने रहेंगे. हमें पता है कि श्रमिक वर्ग को पूरी मुक्ति केवल शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जन-क्रान्ति के माध्यम से ही मिलनी है. और हम सब को उसकी ही तैयारी के क्रम में सभी जनपक्षधर स्वरों के बीच 'शोषण-उत्पीड़न-साम्प्रदायिक नफ़रत के विरुद्ध क्रान्तिकारी एकजुटता' के लिये अपने प्रयास को अब तो और भी तेज कर ही देना है. 
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश

THE ALTERNATIVE OF THE MULTINATIONAL CAPITALIST SYSTEM :


The seeds of the only alternative of mass scale production by multinational private sector in even today's complex and complicated global village are hidden only in the experiments done by the communes of the socialist societies of our forefathers, who revolted against exploitation successfully. 

The motive behind the large scale production by capital is profit only. Capital is not interested at all in any healthy attempt to fulfil the basic needs of the people because in capitalist system the direct producers of the wealth are pauperized and the ownership of the whole wealth is concentrated in the hands of handful of capitalists. Only eightyfive families own half of the total wealth today. And they have their vested interest everywhere.

Only by decentralisation of production and providing the decetralised power of decision to different committees of the real representatives of the masses of people. These committees will co-ordinate with each other in all the fields of activities necessary for the society and form the frame of the state power of the socialist system. We will reorganise the system of society and production to cope with all the needs of the masses. 

And then there will neither be the super profite of the world capital, nor the anarchy of market in production and distribution. As both these factors are responsible for most of our social problems, many problems like poverty, enemployment, malneutrition, uneducation, corruption, price hike, elianation, black-marketing and killing work-load on the workers will be solved easily. 

It is not that easy today to explain this idea after fall of the socialist states because once again certainly we are bound to think deeply and chalk out creatively the strategy and tactics for progress in each and every field of life and regarding the inherent negative factors of the socialist system with the destructive external factors, which were responsible for its fall. 

And as we have learned the negative lessons of the destruction of socialist society of yesterday, we will have to rethink and reorganise the system of tomorrow in such a ballenced way that may be capable of making defeat of revolution impossible in the society after the revolutions have once again taken place in the human society after overthrowing the yock of wage slavery of the today's “FINANCIAL NEOCOLONIAL SYSTEM OF THE WORLD CAPITAL”.

Lastly I can say only one more thing that the revolutions of tomorrow are not going to be only a copy of the revolutions of previous generations. The world has changed much since then and the forms and contents of the social change are bound to be according the complexities of the world today. 

We have to develop so many models of mass-work in different areas of our vast country according to the specific conditions of that particular area to develop the scientific outlook of the masses, to provide jobs to hands and thoughts to brains on micro level. We have to improve our creative attempts for it to the highest possible pitch. We have to solve minor contradictions of the masses wisely and minutely without any antagonistic blood-shed. 

We have to prepare proper circumstances at macro level for the solidarity of all the pro-people forces. Once such solidarity is evolved, it will be visible to so many of our friends and comrades that the wind is going to blow from east now. Only after this development it will be possible and easier for us to plan further the frame of mass-movement to transform the form and content of the socio-politico-economic picture of our nation and the world.

AFTER READING 
The Status Update By Comrade Ashok Kumar Sharma -
"Many of our Facebook friends abuse corporate sector for most of the ills in our society. However, they do not give any alternative to this menace. Do they need nationalization of all sectors of economy or, family run businesses of yester-years? Can the economy manage without big businesses ? Who will run airlines, telecom companies, construction activities, mining, steel plants, textile mills, auto manufacturing plants, heavy engineering enterprises, and so on? Will you like to have only small scale or, cottage industry which can not compete with cheap Chinese & Vietnamese goods either in price or, quality? When the items reserved for small scale sector are also being imported, what is the future of Indian economy without economies of scale and huge R&D expenditure? Our manufacturing has died because of negative attitude towards manufacturing sector and we have lost millions of jobs to Bangladesh, China and Vietnam etc. Labour law reforms can not be undertaken because of this negative attitude. How will small scale pharmaceutical companies invest in R&D and develop new molecules? Should we remain dependent on MNCs and their patents and make drugs unavailable to over a billion people. Do our friends from NGO Sector and Leftist groups believe that politicians and bureaucrats running the state capitalism of Soviet type can perform better than the private sector? From where will they get capital if most such enterprises will run on state subsidies and with losses ? It is a fashion to criticize the Corporate Sector as well as big capital, but is there any alternative? Should India quit WTO and become cocooned like North Korea? Can our NGO friends and so-called revolutionaries give an alternative form of running the economy? Can we survive without exports? If we do not export, how will we import oil, gas and fertilizer ? If we do not allow access to our markets, who will allow us access to their markets? It seems that many comments are made either without the knowledge of basic economics or, because of frustration. We do need rapid economic growth. Only then we can provide social justice. Any growth alternatives ???"