Wednesday, 19 December 2012

अपठित काव्यांश का सन्दर्भ, प्रसंग एवं व्याख्या




एक अपठित काव्यांश का सन्दर्भ, प्रसंग एवं व्याख्या देखिए।
‘‘राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताज़ों पर आसीन कलम,
जिसने तलवार शिवा को दी, रोशनी उधार दिवा को दी,
पतवार थमा दी लहरों को, खंजर की धार हवा को दी,
अग-जग के उसी विधाता ने कर दी मेरे आधीन कलम।

तुझ-सा लहरों में बह लेता, तो मैं भी सत्ता गह लेता,
ईमान बेचता चलता तो, मैं भी महलों में रह लेता,
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम,
मेरा धन है स्वाधीन कलम...........।’’ - गोपाल सिंह ‘नेपाली’


सन्दर्भः- यह काव्यांश प्रगतिवाद तथा प्रयोगवाद के बीच के काल-खण्ड में छन्दबद्ध परम्परा को नकारे बिना जन-जागरण के विद्रोही गीत रचने वाले हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर गोपाल सिंह ‘नेपाली’ द्वारा कलमबद्ध किया गया है।

प्रसंगः- प्रस्तुत दो खण्डों में व्यक्त किये गये विचार अभिव्यक्ति के उद्देश्य के आधार पर चार टुकड़ों में विभाजित किये जा सकते हैं। प्रथम पंक्ति एक टुकड़ा बनाती है, अगली तीन पंक्तियाँ दूसरा, दूसरे खण्ड की पहली दो पंक्तियाँ तीसरा और अन्तिम दो पंक्तियाँ चौथे टुकड़े का रूप धारण कर लेती हैं।

व्याख्याः- कवि ने सिंहासन शब्द में काव्य-चमत्कार उत्पन्न कर के राजा को अपनी प्रजा का भरण-पोषण करने वाले रक्षक की अपेक्षा वनराज सिंह की तरह दमन, उत्पीड़न तथा शोषण करने वाले राज-सिंह के रूप में चित्रित किया है। कवि के अनुसार राजा का आभा-मण्डल उसके रत्नमण्डित स्वर्णमुकुट में निहित है। परन्तु यह कलम है, जिसने मुकुट बदले, उछाले और उन्हें धूलि-धूसरित कर दिया। उदाहरण के लिये उर्दू के सशक्त गज़ल-गो फैज़ अहमद फैज़ की निम्न पंक्तियाँ समीचीन हैं -
‘‘ऐ ख़ाक-नशीनो, उठ बैठो, वह वक्त करीब आ पहुँचा है,
जब तख़्त गिराये जायेंगे, जब ताज़ उछाले जायेंगे।’’

आदिकवि वाल्मीकि से प्रथम जन-कवि तुलसी तक ने कलम का ही कमाल किया और त्रेता के राम को आज तक जन-जन का महानायक बनाये हुए हैं। जहाँ कवयित्री सुभद्रा कुमारी चैहान की लेखनी हमें महारानी लक्ष्मी बाई की शौर्य-गाथा सुना कर रोमांचित कर देती है, वहीं चारण भूषण की कलम छत्रपति शिवाजी की वीरता के कारनामों को जन-जन तक सम्प्रेषित कर ले जाती है। युग-पुरुष चाणक्य चन्द्रगुप्त को सम्राट तो बनाते ही हैं, साथ ही ‘चाणक्य नीति’ तथा ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ की रचना करके मानवता के इतिहास में प्रेरणा के अमर स्रोत बन जाते हैं। फिरदौसी का ‘शाहनामा’ कुटिल बादशाह द्वारा कवि के अपमान के प्रतिशोध में लिखा गया विश्व-साहित्य का इतिहास-प्रसिद्ध अद्वितीय ग्रन्थ है।
जीवन और विज्ञान जब एक साथ मिलते हैं, तो जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आविर्भाव होता है। प्रस्तुत कविता की अगली तीन पंक्तियाँ अपनी व्याख्या हेतु हमसे इसी दृष्टिकोण की कसौटी पर कसे जाने की अपेक्षा करती हैं। छत्रपति शिवाजी की भवानी तलवार के विषय में जन-श्रुति है कि स्वयं माँ भवानी ने साक्षात् प्रकट होकर अपनी तलवार उनको प्रदान की थी। परन्तु जीवन का विज्ञान हमें बताता है कि अपने पिता से दूर अपनी माँ के साथ उपेक्षित जीवन जीने को बाध्य बालक जैसे-जैसे सचेत होता गया, वह अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न और अपमान का प्रतिशोध लेने के लिये अपने हमजोली मित्रों के समुदाय को एकजुट करके तलवार उठाने का संकल्प कर बैठा और अन्ततः मराठा साम्राज्य की नींव डालने में सफल हुआ। परम्परा सूर्य को जीवन का मूल स्रोत मानती है। विज्ञान सूर्य में अनवरत जारी संलयन की प्रक्रिया को सूर्य के प्रकाश का आधार कहता है। संलयन की प्रक्रिया में भागीदार परमाणु के प्रोटियम नामक खण्ड प्रकाश, ऊष्मा, ऊर्जा, जल-चक्र, ऋतु-चक्र, जीवन-चक्र - सभी के लिये ज़िम्मेदार हैं। नाविक को जब प्रगति करनी होती है, तो ‘क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया’ के नियम के अनुसार वह अपनी पतवार को अगाध जल-राशि में डुबाकर उससे जल के भीतर प्रतिगति उत्पन्न करता है। किसी कलमकार द्वारा यह कहा भी गया है -
‘‘नाविक की धैर्य-परीक्षा क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हों!’’
कवि खंजर की धार की बात करता है और धारदार हवा की बात भी करता है। दुश्मन के किले पर धावा बोलने को आतुर शस्त्र-सन्नद्ध घुड़़सवार सैनिकों के दल का नेतृत्व करने वाला सेनानायक तूफ़ानी पहाड़ी हवा के थपेड़ों के बीच फड़फड़ाते हुए अपने ध्वज को ले कर आगे-आगे चलने वाले पुरोधा सैनिक को कूच का संकेत करता है और तूफ़ान के सनसनाते थपेड़े भी घुड़सवारों के सधे हुए घोड़ों की टापों को पहाड़ी की चोटी पर निर्मित दुर्ग के परकोटे तक आ धमकने से नहीं रोक पाते। जीवन का यह उत्साह ही तो है कि मनुष्य ने प्रकृति की गति में हस्तक्षेप करके अपना विजय-अभियान अभी तक सतत जारी रखा है। इस छन्द की अन्तिम पंक्ति की व्याख्या में निम्न उद्धरण सहायक सिद्ध होंगे -
‘‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।’’
तथा
‘‘अस्मिन् काव्य-संसारे कविरेव स्वयं प्रजापतिः।’’
उक्त दोनों उद्धरणों की सहायता से हम इस पंक्ति में आये विधाता शब्द की व्याख्या कर सकते हैं। विद्यारम्भ भारतीय षोडश संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। इस संस्कार में गुरु अपने शिष्य के हाथों में अपनी विरासत के प्रतीक के तौर पर अपना कलम हस्तान्तरित कर उसकी बौद्धिक विकास-यात्रा को सुनिश्चित करने के लिये वचनबद्ध होता है। द्वितीय छन्द की प्रथम दो पंक्तियाँ कवि के प्रतिवाद को स्वर देती हैं। इनमें वह उन गर्हित साहित्यकारों को सम्बोधित कर रहा है, जिन्हें मुक्तिबोध ‘साहित्य के हम्माल’ की संज्ञा देते हैं, जो अपने आत्मा को कुचल कर सुविधाओं को जुटाने का जुगाड़ भिड़ाने की जुगत लगाने के लिये शासन की चाटुकारिता की सीढ़ियाँ चढ़ने के चक्कर में अपना कलम धन की देवी के पुजारियों के हाथों बेच बैठते हैं। ऐसे साहित्यकार वाग्मिता पर कलंक के अतिरिक्त और क्या हैं! कवि इनकी तुलना में स्वयं को अधिक सम्पन्न समझता है, क्योंकि उसकी लेखनी पराधीन नहीं है। यहाँ हमें बरबस तुलसी याद आते हैं -
‘‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।’’
कवि अपना पक्ष चुन चुका है और वह है जन का पक्ष। इस चयन पर उसे अफ़सोस नहीं, अपितु गर्व है क्योंकि जन-सामान्य की यन्त्रणा, व्यथा, पीड़ा तथा क्षोभजन्य आह को जल-तरंग की भाँति स्वरित करने वाली उसकी लेखनी साधारण स्याही से नहीं, बल्कि आँसुओं के लावण्य से परिचालित होती है। जन को जगाना उसका कार्य है, जन-गीत रचना उसकी फ़ितरत और विद्रोह तो उसका स्वभाव ही बन चुका है।


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