Saturday, 25 August 2012

कार्ल मार्क्स ने कहा था - 'कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र' का संक्षेप



साथियो, आज मार्क्सवाद की असफलता और शोषण की अमरता के बारे में आम आदमी को दिग्भ्रमित करने के लिये विश्व-पूँजी का प्रचार-तन्त्र घिनौने कुत्सा-प्रचार का अन्धड़ उड़ा रहा है। मगर सूर्य के प्रखर प्रकाश को अन्धड़ से छिपा सकना नामुमकिन है। ऐसे में हर क्रान्तिकारी का फ़र्ज़ है कि अपनी युगपरिवर्तनकारी विरासत को उजागर करे। इसी मंशा से कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा जनवरी 1848 में लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र’ के ये संक्षिप्त अंश प्रस्तुत हैं।

पूँजीपति और सर्वहाराः- अभी तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है। आधुनिक पूँजीवादी समाज सामन्ती समाज के ध्वन्स से पैदा हुआ है। आज समूचा समाज दो विशाल शत्रु-शिविरों, दो विरोधी वर्गों - पूँजीपति और सर्वहारा में बँटता जा रहा है। पूँजीपति वर्ग समाज के उत्पादन-साधनों और श्रम का मालिक है और सर्वहारा के पास उत्पादन का अपना कोई साधन नहीं होता। वह ज़िन्दा भर रहने के लिये अपनी श्रमशक्ति बेचने को विवश होता है। (वह आज का मज़दूर वर्ग है।)

आधुनिक उद्योग और विश्व-बाजार की स्थापना के बाद चुनाव आधारित राज्य में पूँजीपति वर्ग ने पूर्ण राजनीतिक प्रभुत्व जीत लिया है। आधुनिक राज्य का कार्यकारी मण्डल (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) पूरे पूँजीपति वर्ग के सामूहिक हितों का प्रबन्ध करने वाली कमेटी है। पूँजीपति वर्ग ने सभी सामन्ती, पितृसत्तात्मक और भावनात्मक सम्बन्धों का अन्त कर दिया है। उसने आदमी को अपने से ‘बड़ों’ के साथ बाँध रखने वाले सम्बन्धों को निर्ममता से तोड़ डाला है और नंगे स्वार्थ के ‘नकद पैसे-कौड़ी’ के हृदयशून्य व्यवहार के अलावा कोई सम्बन्ध बाकी न रहने दिया है। धार्मिक श्रद्धा, आनन्द, वीरता, उत्साह, कूपमण्डूकता, भावुकता सबको आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब में बदल डाला है, आदमी की आज़ादी की जगह संवेदनाहीन विनिमय मूल्य और मुक्त व्यापार की स्थापना की है। उसने आदर पाने वाले पेशों का प्रभामण्डल छीन लिया है। डाक्टर, वकील, कवि, वैज्ञानिक, पण्डे-पुजारी सभी को अपना मज़दूर बना लिया है। पारिवारिक सम्बन्धों पर से भावुकता का पर्दा उतार फेंका है और उनको केवल द्रव्य के सम्बन्धों में बदल डाला है। जो कुछ भी पवित्र था, उसे पूँजीपति वर्ग ने भ्रष्ट कर डाला है। संक्षेप में, उसने नंगे, निर्लज्ज, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की (वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था की) स्थापना की है।

पूँजीपति वर्ग ने देहातों को शहरों के, कृषक राष्ट्रों को पूँजीवादी राष्ट्रों के, पूरब को पश्चिम के अधीन कर दिया है, आबादी और उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण किया है और सम्पत्ति को चन्द लोगों के हाथों में संकेन्द्रित कर दिया है। राजनीतिक केन्द्रीकरण इसका अवश्यम्भावी परिणाम था। एक सरकार, एक संविधान, एक कानून, एक राष्ट्रीय वर्ग हित, एक सीमा और एक कर-प्रणाली वाले एक राष्ट्र का जन्म हुआ है।

अपने माल के लिये लगातार फैलते बाज़ार की ज़रूरत के कारण पूँजीपति वर्ग दुनिया के कोने-कोने की ख़ाक छानता है। वह हर जगह घुसने, सम्पर्क साधने, पैर जमाने को बाध्य है। विश्व-बाज़ार को लाभ के लिये इस्तेमाल कर पूँजीपति वर्ग ने हर देश के उत्पादन और खपत को सार्वभौमिक रूप दे दिया है। उद्योग के राष्ट्रीय आधार को खिसका दिया है। सभी राष्ट्रीय उद्योग नित्य प्रति नष्ट किये जा रहे हैं। नये उद्योग उत्पादन के लिये सिर्फ़ अपने देश का कच्चा माल नहीं बल्कि दूर देशों से लाया कच्चा माल इस्तेमाल करते हैं और उनके उत्पादन की खपत सिर्फ उसी देश में नहीं बल्कि पृथ्वी के कोने-कोने में होती है। स्थानीयता के पुराने (सामन्ती) अलगाव और आत्मनिर्भरता का स्थान चैतरफा सम्पर्क और सार्वभौमिक आपसी निर्भरता ने ले लिया है। (वैश्विक गाँव)

पूँजीपति वर्ग ने अपना ख़ात्मा कर देने वाले हथियारों को तो गढ़ा ही है, इन हथियारों का इस्तेमाल करने वाले आदमियों - आज के मज़दूरों - सर्वहारा वर्ग को भी पैदा किया है। पूँजीपति वर्ग की पूँजी के विकास (के अनुपात में ही सर्वहारा वर्ग का विकास होता) है। श्रमजीवियों का यह वर्ग तभी तक ज़िन्दा रह सकता है, जब तक उसको काम मिलता जाये और काम तभी तक मिल पाता है, जब तक उसका श्रम पूँजी में वृद्धि करता है। मज़दूर अपने को अलग-अलग बेचने को लाचार हैं। वे दूसरे व्यापारिक मालों की तरह खुद भी माल हैं और इसीलिए वे होड़ के हर उतार-चढ़ाव और बाज़ार की हर तेज़ी-मन्दी के शिकार होते रहते हैं।

सर्वहारा के काम का वैयक्तिक चरित्र मशीनों के बड़े पैमाने के इस्तेमाल और श्रम-विभाजन के कारण नष्ट हो गया है। इसलिए नीरस काम उसके लिये रोचक नहीं रहा। मज़दूर मशीन का पुछल्ला बन चुका है और उससे सबसे आसानी से मिली सरल योग्यता की माँग की जाती है। मज़दूर के उत्पादन पर ख़र्च केवल उसे ज़िन्दा रखने और बच्चे (अगली पीढ़ी के मज़दूर) पालने के लिये निहायत ज़रूरी निर्वाह के साधनों की न्यूनतम मात्रा तक सिमट गया है। हर माल की तरह श्रम का दाम भी उसके उत्पादन में लगे ख़र्च के बराबर ही होता है। काम की एकरसता, आकर्षणहीनता, उबाऊपन और अरोचकता बढ़ने के अनुपात में मज़दूरी घटती है। यही नहीं, जितना मशीनीकरण और श्रम-विभाजन बढ़ता है, उतना ही श्रम पर बोझ भी बढ़ता जाता है। इसके लिये काम के घण्टे बढ़ाने, मशीन की रफ़्तार बढ़ाने या उसी समय में और अधिक काम लेने के तरीके आज़माये जाते हैं।कारखाने में झुण्ड के झुण्ड मज़दूर सैनिकों की तरह संगठित किये जाते हैं। वे समूचे पूँजीपति वर्ग और पूँजीवादी राज्य के गुलाम तो हैं ही, हर दिन, हर घण्टे मशीन के, सुपरवाइज़र के और कारखानेदार पूँजीपति के गुलाम हैं। पूँजीपति वर्ग की यह तानाशाही जितना खुलकर घोषणा करती है कि मुनाफ़ा ही उसका लक्ष्य है, उतनी ही वह तुच्छ, घिनौनी, ओछी और कड़वी लगती है। कारखानेदार तो मज़दूर का शोषण करता ही है; मज़दूरी पाते ही मकान मालिक, दूकानदार, सूदखोर आदि पूँजीपति वर्ग के दूसरे हिस्से भी फौरन उस पर टूट पड़ते हैं।

पूँजीवाद ने सामन्त वर्ग को बर्बाद कर डाला है। सर्वहारा और पूँजीपति वर्ग के बीच झूलने वाला निम्न पूँजीपति वर्ग - छोटे भूस्वामी किसान, छोटे कारोबारी, कारीगर, दूकानदार, किरायाजीवी, वेतनभोगी - होड़ की चक्की में पिसकर टूट-टूट कर लगातार सर्वहारा वर्ग में शामिल होता जाता है। बड़े पूँजीपतियों के बड़े पैमाने के आधुनिक उद्योग की होड़ में उसकी छोटी पूँजी पूरी नहीं पड़ती और डूब जाती है। इस प्रकार आबादी के सभी वर्गों से सर्वहारा की सेना भर्ती होती है। सर्वहारा वर्ग विकास की विभिन्न मंज़िलों से गुज़रता है। जन्मकाल से ही पूँजीपति वर्ग से उसका संघर्ष शुरू हो जाता है। शुरू में मज़दूर अकेले-दुकेले लड़ते हैं, फिर एक कारखाने के मज़दूर मिलकर लड़ते हैं। फिर एक इलाके के मज़दूर उस पूँजीपति से, जो सीधे शोषण करता है, एक साथ मोर्चा लेते हैं। पूँजीपति वर्ग अपने राजनीतिक लाभ के लिये पूरे सर्वहारा वर्ग को गतिशील करता है और इस अवस्था में सर्वहारा वर्ग अपने शत्रुओं के शत्रुओं अर्थात् सामन्तवाद के अवशेषों (भूस्वामियों व निम्न पूँजीपतियों) से लड़ता है। इस प्रकार इतिहास की सारी गतिविधि के सूत्र पूँजीपति वर्ग के हाथ में केन्द्रित रहते हैं और हर हासिल जीत पूँजीपति वर्ग की जीत होती है।

उत्पादन, विनिमय और स्वामित्व के पूँजीवादी सम्बन्धों वाला आधुनिक पूँजीवादी समाज अपनी विराट शक्तियों को काबू में रख पाने में असमर्थ है। व्यापार के संकट (आर्थिक मन्दी) का निश्चित समय के बाद फिर-फिर उभरना पूँजीवादी समाज के अस्तित्व की हर बार कड़ी परीक्षा लेता है। इन संकटों में अति उत्पादन की महामारी फैल जाती है। मौजूदा पैदावार और उत्पादक शक्तियों का एक बड़ा संचित भाग समय-समय पर नष्ट कर दिया जाता है। नये बाज़ारों पर कब्ज़ा कर और पुराने बाज़ारों का और भी मुकम्मल तौर पर इस्तेमाल करके पूँजीवाद और भी बड़े विनाशकारी संकटों के लिये पथ प्रशस्त करता है क्योंकि इन संकटों को रोकने के साधनों को घटा कर ही वह खुद को उबारता है। मौजूदा समाज की जकड़ी हुई उत्पादक शक्तियाँ स्वामित्व की पूँजीवादी अवस्था से सशक्त हो जाती हैं। तब वे पूरे पूँजीवादी समाज में अव्यवस्था पैदा कर देती हैं और व्यक्तिगत स्वामित्व की बेड़ियों को तोड़ देती हैं।

उद्योग के विकास के साथ सर्वहारा वर्ग की संख्या, संकेन्द्रण, ताकत और इस ताकत का एहसास बढ़ता जाता है। मशीनें जैसे-जैसे श्रम के अन्तर को मिटाती जाती हैं और हर जगह मज़दूरी को न्यूनतम स्तर पर ले आती हैं, उसी अनुपात में सर्वहारा वर्ग की पाँतों की हालतें और हित एक जैसे होते जाते हैं। पूँजी की होड़ और आर्थिक मन्दी के कारण मज़दूरी और भी अस्थिर हो जाती है। लगातार तेजी से बढ़ता मशीनों का सुधार भी उनकी जीविका को अनिश्चित बनाता जाता है। मज़दूरों और पूँजीपतियों की अलग-अलग टक्करें वर्गीय रूप लेती जाती हैं। मज़दूर अपने संगठन - टेªड यूनियन बनाने लगते हैं। जहाँ-तहाँ उनकी लड़ाइयाँ विद्रोहों का रूप धारण करती हैं। जब-तब मज़दूरों की जीत भी होती है लेकिन केवल वक़्ती तौर पर। उनकी लड़ाइयों का असली फल निरन्तर बढ़ती मज़दूर-एकता में है। विकसित संचार-साधन अलग-अलग जगहों के मज़दूरों को एक दूसरे के सम्पर्क में ला देते हैं और एकता में मदद करते हैं। अगणित स्थानीय संघर्षों को केन्द्रीकृत कर एक राष्ट्रीय वर्ग संघर्ष का रूप दे दिया जाता है। प्रत्येक वर्ग-संघर्ष एक राजनीतिक संघर्ष होता है। सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक पार्टी के गठन का हर प्रयास पहले की तुलना में अधिक मज़बूत, दृढ़ और शक्तिशाली होता है।

सामन्तवाद और विदेशी पूँजी के विरुद्ध संघर्ष में लगातार उलझा पूँजीपति वर्ग सर्वहारा से अपील करने, मदद माँगने और इस तरह उसे राजनीतिक अखाड़े में खींच लाने के लिये मजबूर होता है। वह खुद सर्वहारा को अपने राजनीतिक और सामान्य शिक्षण से लैस कर देता है अर्थात् उसके हाथ मे पूँजीपति वर्ग से लड़ने के लिये हथियार सौंप देता है। पूँजी के विकास के कारण कंगाल होने वाले शासक वर्गों के समूह भी सर्वहारा वर्ग को ज्ञान और प्रगति के नये तत्व प्रदान करते हैं। वर्ग संघर्ष निर्णायक मंज़िल में पहुँचने पर शासक वर्ग के विघटन की प्रक्रिया प्रचण्ड और प्रत्यक्ष हो जाती है। उसका एक हिस्सा टूटकर उस क्रान्तिकारी वर्ग के साथ, जिसके हाथ में भविष्य होता है, आ मिलता है। खासकर इतिहास की समग्र गति को सैद्धान्तिक रूप से समझने में सक्षम पूँजीवादी विचारकों का एक हिस्सा सर्वहारा वर्ग से आ मिलता है।

निम्न मध्यम वर्ग अपना अस्तित्व बचाने के लिये पूँजीपति वर्ग से लोहा लेता है। वह क्रान्तिकारी नहीं, रूढ़िवादी है। चूँकि वह इतिहास के चक्र को पीछे घुमाने की कोशिश करता है, इसलिए प्रतिगामी (प्रतिक्रियावादी) है और चूँकि उसे जल्दी ही सर्वहारा वर्ग में मिल जाना है इसलिए वह अपना (मालिकों वाला) दृष्टिकोण त्याग कर सर्वहारा वर्ग का दृष्टिकोण अपना लेने और क्रान्तिकारी बन जाने का प्रयास करता है।

लम्पट-सर्वहारा वर्ग समाज की तलछट में सड़ता निठल्ला समुदाय है। सर्वहारा क्रान्ति की आँधी में पड़कर यह भी आन्दोलन में खिंचा आ सकता है। मगर उसकी हालत प्रतिक्रियावादी षडयन्त्र के भाड़े के टट्टू, हड़ताल तोड़क गुण्डा गिरोह का काम करने के अधिक अनुकूल रहती है।

पूँजीपति वर्ग का मुकाबला करने खड़े सभी वर्गों में सर्वहारा ही असली क्रान्तिकारी वर्ग है। दूसरे वर्ग आधुनिक उद्योग के सामने ह्रासमान होते-होते अन्ततः लुप्त हो जाते हैं। सर्वहारा वर्ग पूँजीवाद की मौलिक और विशिष्ट उपज है। सर्वहारा के पास कोई सम्पत्ति नहीं है। पूँजी के आधुनिक जुए ने सब देशों में एक ही तरह से उसके राष्ट्रीय चरित्र के सभी चिहनों का अन्त कर डाला है। कानून, नैतिकता, धर्म - सब उसके लिये पूँजीवादी पूर्वाग्रह मात्र हैं, जिनकी आड़ में घातक पूँजीवादी स्वार्थ छिपे हैं।

सर्वहारा वर्ग कब्ज़ा जमाने की अब तक की सारी प्रणालियों का अन्त करके ही समाज की उत्पादक शक्तियों का स्वामी बन सकता है। उसके पास जोड़ने और बचाने के लिये अपना कुछ भी नहीं। उसका लक्ष्य निजी मालिकाने की प्रत्येक गारण्टी को नष्ट कर देना है क्योंकि किसी भी वर्ग का उत्पीड़न करने के लिये ज़रूरी है कि गुलाम वर्ग के रूप में ज़िन्दा रह सकने की सुविधाएं उसे दी जायें। लेकिन आधुनिक मज़दूर वर्ग की दशा उलटी है। उद्योग की उन्नति के साथ ऊपर उठने के बजाय वह अपने वर्गीय अस्तित्व की हालत के स्तर (गरीबी की रेखा) से नीचे ही गिरता जाता है। वह कंगाल होता जाता है और उसकी दरिद्रता आबादी और दौलत दोनों से अधिक तेज़ी से बढ़ती है। साफ है कि पूँजीपति वर्ग अब समाज का शासक बने रहने और अपना कानून थोपने लायक नहीं है क्योंकि वह अपने गुलाम की ज़िन्दगी की गिरावट को नहीं रोक सकता। वह अपने गुलाम को गुलामी की हालत में भी ज़िन्दा रहने की गारण्टी देने में असमर्थ है। समाज अब पूँजीपति वर्ग के मातहत नहीं रह सकता। उसका अस्तित्व अब समाज से मेल नहीं खाता।

अब तक के सभी ऐतिहासिक आन्दोलन अल्पमत के स्वार्थों के लिये हुए थे। मगर सर्वहारा आन्दोलन विशाल बहुमत का, विशाल बहुमत के हितों के लिये है। वर्तमान समाज का सबसे निचला स्तर सर्वहारा इस समाज को सभी ऊपरी शासक परतों को पलटे बिना हिल तक नहीं सकता, खुद को किसी तरह नहीं उठा सकता। हर देश के सर्वहारा को चूँकि पहले अपने ही देशी पूँजीपतियों से निपटना होगा। इसीलिए रूप की दृष्टि से, न कि अन्तर्वस्तु में सर्वहारा वर्ग का संघर्ष शुरू में राष्ट्रीय संघर्ष होता है। समाज में अप्रत्यक्ष रूप से जारी गृहयुद्ध जब प्रत्यक्ष क्रान्ति में भड़क उठता है तो पूँजीपति वर्ग को बल पूर्वक उलट कर सर्वहारा अपने प्रभुत्व का आधार बनाता है।

उद्योग की उन्नति, पूँजी का निर्माण और वृद्धि पूँजीपति वर्ग के अस्तित्व और प्रभुत्व की लाज़मी शर्तें हैं। और यह सब कुछ मज़दूर के श्रम पर ही खड़ा है। मज़दूरों का साथ उनमें क्रान्तिकारी एकता कायम करता है। सारी पैदावार हड़प जाने वाला पूँजीपति वर्ग अपनी कब्र खोदने वालों को खुद पैदा कर चुका है। उसका पतन और सर्वहारा वर्ग की विजय दोनों ही अनिवार्य हैं।

सर्वहारा और कम्युनिस्टः- सर्वहारा वर्ग के समग्र हितों से अलग कम्युनिस्टों का कोई हित नहीं है। वर्ग-संघर्ष की प्रत्येक मंज़िल में हर देश में हमेशा वे सम्पूर्ण आन्दोलन के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे मज़दूर पार्टियों के सबसे उन्नत, संकल्पबद्ध और दूसरों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाले हिस्से होते हैं। सर्वहारा के विशाल समुदाय की अपेक्षा आन्दोलन के आगे बढ़ने के रास्ते, उसके हालात और सामान्य नतीजों की स्पष्ट सैद्धान्तिक समझ वे रखते हैं। कम्युनिस्ट सब जगह मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ़ हर क्रान्तिकारी आन्दोलन का समर्थन करते हैं। वे सभी देशों में जनवादी पार्टियों के बीच एकता और समझौता (व्यापकतम संयुक्त मोर्चा) की कोशिश करते हैं। कम्युनिस्टों का तात्कालिक ध्येय सर्वहारा को एक वर्ग के रूप में संगठित करना, पूँजीवादी प्रभुत्व का तख़्ता उलटना और राजनीतिक सत्ता पर सर्वहारा वर्ग का अधिकार कायम करना है। निजी मालिकाना वर्ग-विरोध और मुट्ठी भर लोगों द्वारा बहुतों के शोषण पर टिका है। कम्युनिस्टों का लक्ष्य है निजी स्वामित्व का उन्मूलन।

अपनी कड़ी मेहनत से खुद कमायी गयी सम्पत्ति, जो प्राक्पूँजीवादी समाज में क्रियाशीलता और व्यक्ति की स्वतन्त्रता का आधार रही है, उसे तो पूँजी खुद लगातार नष्ट करती जा रही है। मज़दूर का श्रम मज़दूर के लिये कोई सम्पत्ति नहीं पैदा करता। वह पूँजी यानी ऐसी सम्पत्ति पैदा कारता है, जो मज़दूर के ही श्रम का शोषण करती है, जिसके बढ़ने की शर्त ही है कि वह नये शोषण के लिये और मज़दूर पैदा करती जाय। मालिकाने का वर्तमान निजी रूप श्रम और पूँजी के अन्तर्विरोध पर कायम है। पूँजी सामूहिक उपज है। वह व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक शक्ति है। समाज के सभी सदस्यों की संयुक्त कार्यवाही से ही उसे गतिशील रखा जा सकता है। अपने श्रम से मज़दूर के हाथ मज़दूरी के रूप में जो आता है, वह मुश्किल से ज़िन्दा रहने और बच्चे पालने भर को ही होता है। हम इस दयनीय रूप को ख़त्म कर देना चाहते हैं, जिसमें मज़दूर पूँजी बढ़ाने के लिये ही ज़िन्दा रहता है। पूँजीवादी समाज में जीवित श्रम संचित श्रम (पूँजी) को बढ़ाने का साधन मात्र है। कम्युनिस्ट समाज में संचित श्रम मज़दूर के अस्तित्व को व्यापक, सम्पन्न और उन्नत बनाने का साधन बनेगा। वर्तमान समाज में जो मेहनत करते हैं, वे कुछ नहीं प्राप्त करते और जो हथियाये बैठे हैं, वे काम ही नहीं करते। पूँजीवादी समाज में जीवित आदमी गुलाम है और उसका कोई व्यक्तित्व नहीं होता, जबकि निर्जीव पूँजी आज़ाद है और उसका व्यक्तित्व होता है। हम पूँजीवादी व्यक्तित्व, पूँजीवादी मालिकाना, पूँजीवादी आज़ादी को जड़मूल से ख़त्म कर देना चाहते हैं। पूँजीपति चरित्रहीन होता है। वह अपनी पत्नी को भी उत्पादन के औजार के सिवाय कुछ नहीं समझता। कम्युनिस्ट खुली और ढकी दोनों प्रकार की वेश्यावृत्ति का अन्त कर देना चाहते हैं। सर्वहारा वर्ग सशस्त्र क्रान्ति द्वारा जनवाद की लड़ाई जीतने के बाद शासक वर्ग के आसन पर बैठ कर पूँजीपति वर्ग से सारी पूँजी छीनने, उत्पादन के औजारों को राज्य के अर्थात् शासक वर्ग के रूप में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रित करने तथा सभी उत्पादक शक्तियों में यथा शीघ्र वृद्धि के लिये अपने राजनीतिक प्रभुत्व का इस्तेमाल करेगा। उसके उपाय ये होंगे-(1) ज़मीन के स्वामित्व का उन्मूलन (2) भारी आरोही आयकर। (3) विरासत का उन्मूलन। (4) वर्गशत्रुओं की सम्पत्ति की ज़ब्ती। (5) राष्ट्रीय बैंक द्वारा उधार। (6) संचार और यातायात के साधनों का राज्य के हाथ में केन्द्रीकरण। (7) राजकीय कारखानों और उत्पादन के औजारों का विस्तार। परती ज़मीनंे जोतना। (8) हर एक के लिए काम अनिवार्य। कृषि के लिए औद्योगिक सेनाएं कायम करना। (9) उद्योग एवं कृषि को मिलाकर देहात और शहर का अन्तर मिटाना। (10) सार्वजनिक स्कूलों में सभी बच्चों की मुफ़्त शिक्षा। बच्चों से काम लेना बन्द कर देना। शिक्षा और उत्पादन को मिलाना आदि।

विकास-क्रम में वर्ग-भेद मिट जाने के बाद राजनीतिक सत्ता यानी एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के उत्पीड़न की संगठित शक्ति का खात्मा हो जायेगा। जब शोषक पूँजीपति वर्ग ही नहीं रह जायेगा तो क्रान्ति द्वारा उसकी सत्ता पलटने वाला सर्वहारा एक वर्ग के रूप में अपने प्रभुत्व का अपने आप ख़ात्मा कर देगा। और तब वर्ग विरोधों से बिंधे समाज की जगह एक ऐसे संघ की स्थापना होगी जिसमें व्यष्टि (एक) की स्वतन्त्र प्रगति समष्टि (सब) की स्वतन्त्र प्रगति की शर्त होगी। कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं। वे खुले आम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य समूची वर्तमान व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध होंगे। कम्युनिस्ट क्रान्ति के भय से शासक वर्ग काँपते हैं, तो काँपते रहें। सर्वहारा के पास खोने के लिये अपनी बेड़ियों के सिवाय कुछ भी नहीं, जीतने के लिये सारी दुनिया है।

दुनिया के मज़दूरो, एक हो!

3 comments:

  1. maza nahi aaya ji.. communist me

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  2. वाह बहुत खूब, मेरा नाम मुकुन्द कुमार राघव है। मैं एक छात्र हूँ, मुझे ये विचारधारा सुन्दर लगी।

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