Monday, 11 November 2013

एक और बहु चर्चित मोदियापा : हिन्दुत्व की कट्टरता के सच का मौकापरस्त चेहरा!


यह मूर्ख अगर केवल बार-बार उलटा-पलटा बड़बड़ कर रहा है, तो लोगों के बीच इतना हड़कम्प मचवा रहा है. जब वह हुकूमत करने तक जा पहुँचेगा, तो तथ्यों और लोगों का जो हाल करेगा उसकी कल्पना कर लीजिए.
कथा श्री फेंकू "चाय वाला":
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"देश इतिहास की तो छोड़िये फेंकू महराज अपने इतिहास को ही बदलकर दिखाना चाहते है ! खासतौर पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर उन्होंने जो ज्ञान दुनिया के सामने रखा है वही वह दुनिया को दिखाना और बताना चाहते हैं ! क्योंकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे वास्तविकता को वह लोगो के सामने आने ही नहीं देना चाहते हैं! श्यामा प्रसाद मुखर्जी १९०१ में पैदा हुए और जून १९५३ में उनका देहांत हुआ!
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का इतिहास सत्ता के करीब रहने का इतिहास है ! वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से बंगाल विधान परिषद् में चुने गए परन्तु जब कांग्रेस ने विधान परिषद के बहिष्कार का फैसला किया तो उन्होंने विधान परिषद् की बजाय कांग्रेस से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा ! १९४१ में उन्होंने सत्ता में रहने के लिए मुस्लिम लीग से गठजोड़ किया और फैजुल हक़ के नेतृत्व वाली सरकार में वित्तमंत्री बने ! हिन्दू महासभा ने केवल बंगाल में ही नहीं १९४१ में सिंध प्रान्त और उत्तर पश्चिमी सीमांत इलाक़े में भी मुस्लिम लीग के गठजोड़ करके सरकार बनायी !
१९४२ में जब देश आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गांधी के आह्वान पर भारत छोडो आंदोलन में शामिल था तो श्यामा प्रसाद बंगाल के वित्तमंत्री थे ! और देश आज़ाद होने पर नेहरू की अंतरिम सरकार में वह उद्योग और आपूर्ति मंत्री भी रहे !
बहरहाल फेंकू को दोष न दीजिये अपने नेता का ऐसा इतिहास फेंकू छुपाना छह रहे है तो इसमें बुराई क्या है !"
Samar Dhaliwal की वाल से By Mahesh Rathi
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अब नरेंद्र मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लंदन में मारा! 
नवभारतटाइम्स.कॉम | Nov 11, 2013
नई दिल्ली : नरेंद्र मोदी भले ही यूपीए सरकार पर गांधी परिवार के लिए देश का इतिहास-भूगोल बदलने के आरोप लगा रहे हों, लेकिन वह खुद आए दिन इतिहास के तथ्यों को लेकर गलतियां कर रहे हैं। और तो और, उन्होंने अपनी पार्टी के संस्थापक तक का इतिहास बदल दिया। गुजरात के खेड़ा में एक अस्पताल के उद्घाटन के वक्त उन्होंने रविवार को स्वतंत्रता सेनानी श्याम जी कृष्ण वर्मा का जिक्र करते हुए कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत 1930 में लंदन में हुई थी और 73 साल बाद वह उनकी अस्थियां कच्छ में उनके गांव लेकर आए। हालांकि, भाषण खत्म करते ही उन्हें जब उन्हें गलती के बारे में बताया गया तो उन्होंने दोबारा माइक पर आकर इसे सुधारा।

तथ्य यह है कि स्वतंत्रता सेनानी श्याम जी कृष्ण वर्मा की मौत लंदन में हुई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत कश्मीर में हुई थी, वह भी आजादी के बाद। श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन्हीं की 'मूल' पार्टी जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे। भूल से उन्होंने श्याम जी कृष्ण वर्मा की जगह श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ले लिया। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ही उनकी अस्थियां साल 2003 में जीनिवा से स्वदेश लाए थे।

कच्छ में मोदी ने कांग्रेस के हमले का जवाब देते हुए कहा, 'देश के इतिहास के साथ कौन खिलवाड़ कर रहा है? श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक क्रांतिकारी थे। उनकी मौत 1930 में लंदन में हो गई थी। उनकी आखिरी इच्छा थी कि देश की आजादी के बाद उनकी अस्थियां भारत लाई जाएं। कांग्रेस को 2003 तक यह बात याद नहीं आई। आप ही बताइए, उनकी अस्थियां भारत कौन लेकर आया?' मोदी ने ये बातें अपनी पीठ थपथपाने के लिए कहीं, लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया।
दरअसल, मोदी यह बात श्यामजी कृष्ण वर्मा के बारे में कह रहे थे, लेकिन वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ले बैठे। ध्यान रहे कि 23 जून 1953 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत कश्मीर में हुई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जनसंघ के संस्थापक थे। यही जनसंघ 1980 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के रूप में फिर से गठित हुई थी। मोदी की इस गलती पर एक बार फिर उनके विरोधी उनका मजाक उड़ा रहे हैं। उनके इतिहास के ज्ञान पर सवाल उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा छाया हुआ है।
गौरतलब है कि मोदी पर कई बार इतिहास की गलत व्याख्या और गलत आंकडे़ पेश करने के आरोप लग चुके हैं। पटना की हुंकार रैली में भी मोदी ने ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी देते वक्त कई गलतियां की थीं। मोदी की इन्हीं गलतियों को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन पर निशाना साधा था।

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मोदी झूठों का बड़ा सरताज निकला... - नीरेंद्र नागर 
नीतीश कुमार ने आज राजगीर में मोदी की पोल खोल दी। उन्होंने ताना कसा कि पीएम बनने का सपना देखनेवाले को यह तक नहीं पता कि तक्षशिला बिहार में नहीं, पाकिस्तान में है। चंद्रगुप्त मौर्य को भी मोदी ने हाल की पटना रैली में गुप्त वंश का बता दिया था। शायद वह चंत्रगुप्त मोर्य और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य में कन्फूजिया गए थे। चाहे जो हो, इससे पता चलता है कि हमारे नरेंद्र भाई मोदी का इतिहास ज्ञान बहुत ही कम है।

मोदी पहले भी इस तरह फेंकते आए हैं और उनके समर्थक जो खुद भी बहुत ज्ञानी नहीं हैं, उनका कहा हर शब्द सच मान लेते हैं। मैंने 16 जुलाई को मोदी के फेंकू चरित्र पर एक पोस्ट लिखी थी। आप भी पढ़िए कि मोदी किस तरह झूठ पर झूठ फेंकते आए हैं।

पिछले हफ्ते मोदी के पिल्ले वाले बयान पर लिखने के बाद सोचा था कि अभी कुछ दिनों तक उन पर कुछ नहीं लिखूंगा। लेकिन मोदी जी हैं कि आराम करने ही नहीं देते। कुछ न कुछ ऐसा बोल या कर जाते हैं कि लिखे बिना रहा ही नहीं जाता। अब कोई सरासर झूठ बोले, बार-बार बोले और पतली गली से निकल जाए तो चुप तो नहीं रहा जा सकता।

अभी दो दिन पहले पुणे में नरेंद्र मोदी ने दो-तीन बातें ऐसी कहीं जिससे यह लगता है कि या तो मोदी का गणित बहुत ही कमज़ोर है या फिर वह भंग खाकर भाषण देते हैं। उन्होंने कहा कि 1835 में बंगाल में 100 % साक्षरता थी। अब कोई मोदी से कहे कि जब आज भी वहां 100 प्रतिशत साक्षरता नहीं है तो उस समय कैसे रही होगी। भइया, उस समय तो लड़कियों को पढ़ने की ही आजादी नहीं थी। मोदी एक और बात बोल गए कि चीन शिक्षा पर अपने जीडीपी का 20% खर्च करता है जबकि भारत में यह आंकड़ा 4 प्रतिशत है। लेकिन चीनी समाचार एजेंसी शिनवा खुद कहती है कि यह आंकड़ा 3.93 प्रतिशत है। 
(पढ़ें यह खबर।

Larger proportion of China's GDP spent on education
English.news.cn 2013-1-4 BEIJING, Jan. 4 (Xinhua) -- Nationwide education expenditure amounted to 3.93 percent of China's 2011 GDP, up 0.28 percentage points from 2010, a Ministry of Education statement said Friday.


The 2011 GDP in China was 47.3 trillion yuan (7.52 trillion U.S. dollars), the ministry said.


According to the ministry, in 2011, central and local governments at all levels budgeted 1.68 trillion yuan in education, up 24.57 percent from 2010.
As much as 326.9 billion yuan was from central finance, 28.31 percent higher than in 2010. http://news.xinhuanet.com/english/china/2013-01/04/c_132080607.htm)
अब कहां 3.93 प्रतिशत और कहां 20 प्रतिशत। लगता यह है कि किसी ने मोदी जी को बताया होगा कि चीन ने अपने शिक्षा खर्च में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है तो मोदी समझे कि उसका खर्च 20 प्रतिशत है। सुब्रमण्यम स्वामी राहुल गांधी को बुद्धू कहते हैं लेकिन मैथ के मामले में हमारे मोदी जी भी कम बुद्धू नहीं है। और यह बुद्धूराम फेंकता भी बहुत है। ट्विटर पर एक चुटकुला चलता है कि यदि मोदी अपने बारे में कोई डेटा दें तो उसको आधे से डिवाइड कर दें, वही होगी सच्ची संख्या।

मोदी यह भी कहते पाए जाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की एसआईटी ने उनको गुजरात दंगों के मामले में क्लीन चिट दे दी है। यह भी अर्धसत्य है। एसआईटी ने तो कहा है कि मोदी के रोल के बारे में और जांच की जरूरत है। एसआईटी ने बल्कि मोदी के सांप्रदायिक और पक्षपाती व्यवहार की बखिया उधेड़ दी है। ज्यादा जानने के लिए पढ़ें यह खबर।

PRESS STATEMENT
No Clean Chit For Mr Modi
Contrary to the desperate attempt made by the Gujarat Chief Minister, the fact is that the Supreme Court has never given Mr Modi a clean chit on the issue of 2002 pogrom
SAHMAT, CITIZENS FOR JUSTICE AND PEACE
In an interview to the foreign news agency Reuters that was published on July 12 2013, Narendra Modi, Gujarat Chief Minister has made a desperate attempt to create an impression that Supreme Court has given him a clean chit through the SIT which was appointed by it to investigate the criminal complaint of Zakia Jafri and Citizens for Justice & Peace (CJP) on 27.4.2009. 

A section of the media, without verifying the facts has allowed this impression to gain credibility. 

The facts in relation to Supreme Court and SIT are as follows:

The SIT was appointed by the Supreme Court on 26.3.2008 on a petition by Teesta Setalvad, D.N.Pathak, Cedric Prakash and Others, first to look into the nine cases recommended by the National Human Rights Commission (NHRC) to be investigated by the CBI. 

The same SIT was a year later also asked to look into the criminal complaint against Narendra Modi and 61 others filed first before the Gujarat Police on 8.6.2006.

The SIT submitted its report on the Zakia Jafri and CJP Complaint to the Supreme Court on 12.5.2010 itself recommending that Further Investigation was required. 

In the interim, the SC had also to drop two officers from the SIT, Shivandand Jha (because he was an accused in the Zakia Jafri complaint) and Geeta Johri who had been found, in the Sohrabuddin case to have serious strictures passed against her by the Supreme Court itself. (April 6 2010)

The following features of the SIT report need special mention:
It found the speeches of N Modi objectionable and that Modi had a communal mindset, travelling 300 kilometres to Godhra but not visiting any relief camps that housed the internally displaced Muslims, victims of reprisal killings post Godhra until 6.3.2002.
It found it questionable that bodies of the unfortunate Godhra victims were handed over to a non-government person, Jiadeep Patel of the Vishwa Hindu Parishad (VHP) who is currently facing trial in the Naroda Gaam massacre case;
It found that Saneev Bhatt an officer of the State Intelligence, Gujarat had opined that he attended the controversial meeting at the chief minister's residence indicating that illegal and objectionable instructions were given.
It accepted that Police Officers like RB Sreekumar, Rahul Sharma, Himanshu Bhatt and Samiullah Ansari who had performed their tasks legally had been penalised and persecuted by the Modi regime and those who had buckled under the illegal and unconstitutional instructions had been favoured consistently;
It however still concluded that there is no prosecutable evidence against the chief minister

The SC was not satisfied with this conclusion and directed that the Amicus Curiae Mr Raju Ramachandran, who had already been appointed to assist the Supreme Court in this critical case, visit Gujarat, independently assess the evidence garnered and meet with witnesses directly, bypassing SIT.

Amicus Curiae Raju Ramachandran submitted an Interim report (January 2011) and Final report (July 2011).

The Supreme Court gave the SIT an opportunity to further investigate in light of the Amicus Curiae's contrary findings and thereafter file a Final Report before a Magistrate on 12.9.2011. In the same order the SC gave the petitioners the inalienable right to file a Protest petition and access all documents related to the SIT
After its further investigation the SIT, ignoring the contents of the Amicus Curiae report, filed a final closure report on 8.2.2012 without issuing any notice to the complainant Zakia Jafri and CJP as is required under Section 173(2)(ii) of the CRPC. Worse, it fought a hard as nails battle to deny access to any of the documents related to the investigation to the petitioners.

It took a whole year, from 8.2.2012 to 7.2.2013 for the complainant to access all the documents related to the Investigation including the SIT Reports filed before the Supreme Court. The complainant Zakia Jafri assisted by the CJP filed the Protest Petition on 15.4.2013.

The petitioners Mrs. Zakia Jaffri and CJP are now arguing in support of the Protest Petition being allowed, showing through an arduous and rigorous process, how the SIT ignored its own evidence. Arguments that began on June 25 are still going on. 

It is clear from the above that the SC has never given Mr Modi a clean chit on the issue of 2002 pogrom. These facts could have been earlier verified by Reuters as well as the collusive media. We hope that the media will present the facts truthfully in relation to the ‘so-called’ clear chit to Mr Modi

SAHMAT
CITIZENS FOR JUSTICE AND PEACE


मुझे पता है, मोदी के भक्त नहीं मानेंगे भले ही झूठों के इस सरताज के कितने ही झूठ पकड़ में आ जाएं वैसे ही जैसे ओसामा बिन लादेन के मुरीद नहीं मानेंगे कि लादेन ने कोई अपराध किया था। (नीचे इन भक्तों के कॉमेंट पढ़ लें) अब इन भोला भंडारियों को उम्मीद है कि मोदी पीएम बन जाएंगे तो करप्शन खत्म हो जाएगा। करप्शन खत्म करना तो हम भी चाहते हैं लेकिन हमें मोदी पर भरोसा नहीं है। क्यों भरोसा नहीं है? इसलिए कि मोदी 11 साल से गुजरात में हैं, क्या वहां से करप्शन खत्म हो गया है? क्या वहां पुलिस हफ्ता नहीं लेती? क्या वहां सरकारी दफ्तरों में बिना पैसे लिए-दिए सारे काम हो जाते हैं?

मैं गुजराती हूं लेकिन गुजरात में नहीं रहता। इस बारे में हमारे गुजराती पाठक ही बता सकते हैं। या फिर आप इस साइट - http://www.ipaidabribe.com/ पर जा सकते हैं जिसमें हमारे-आपके जैसे लोगों ने बताया है कि उन्होंने कहां, कितनी रिश्वत दी। इसमें गुजरात का भी नाम है। जिन पाठकों की सच्चाई जानने की इच्छा हो, वे यहां क्लिक करें।

5 Modi lies that must be nailed…. - Prashant Panday 11 March 2013, 

Speaking to US NRIs yesterday, Modi claimed that the growth rate in India had “lost momentum” in the last 6-7 years. Well, Modi is used to dishing out mis-truths and blatant lies; so this was just one more in a series. India’s growth in the last 6-7 years has been exemplary by any standard, with GDP growth hitting 9.2% just last year.

Let me group all of Modi’s lies into 5 distinct categories:

1) Comparing Gujarat with India: Even a 5th standard student knows what averages are. India’s GDP growth represents the average of all states – dynamic ones like Gujarat, Maharashtra, AP, Haryana and TN as well as poor performing ones like Rajasthan, UP, MP, Karnataka, and (in the past), Bihar and Orissa. Quite obviously Gujarat growth rate will be higher than India’s. When Modi uses this to show that he would make a better PM than Manmohan Singh, it’s plain chicanery. What he should do is compare Gujarat – a powerhouse since decades – with other powerhouse states. But he’s smart. He won’t do that!

2) Gujarat growth barely comparable with other big states: The top 5 states in terms of state GDP are Maharashtra, UP, AP, TN and Gujarat in that order. Modi will be embarrassed to note that the pecking order of these states has remained largely intact over the last 6-7 years (since 2004-5) – in spite of Modi’s “dynamic” rule. The only exception is that WB used to be 5th back then, and is now just behind Gujarat. Let’s look at how much each state economy has expanded over this period and I am using data from Wikipedia here (which in turn quotes the Ministry of statistics and Program Implementation Govt. Of India). Between 2004-5 and 2010-11, the Maharashtra GDP has expanded 2.49 times in nominal terms, Gujarat’s by 2.52 times, Tamil Nadu’s by 2.50 times, UP’s by 2.28 times, AP’s by 2.62 times and West Bengal’s by 2.27 times. So Gujarat has kept pace with the big states; nothing more, nothing less. Compared to the noise that Modi makes, the actual numbers are nothing to write home!

3) Takes undue credit: Gujaratis are genetic coded to demand that any CM of the state has to be business minded. Remember Gujarat is a state in which college graduates take up jobs only when they cannot start their own business. And even when they do jobs, almost all of them do something “on the side”. It may be playing the stock market, or doing a small side business in the wife’s name. Growth in Gujarat pre-dates Modi. This is proven by the growth rates recorded during the tenures of the previous CMs. For the purpose of this analysis, I have used Net State Domestic Product at factor cost at constant prices in Rupees as the measure of economic growth. The data taken is from the RBI’s “Handbook of Statistics of Indian Economy” readily available on the internet. Under Modi (between 2002-3 to 2009-10), the average growth rate in Gujarat in nominal terms has been 16.25% per annum. In the Keshubhai Patel era (1998-99 to 2001-02), Gujarat grew at only 7.5% per annum. BJP messed up during Keshubhai’s time and that’s one reason he was replaced. Take the period before Keshubhai Patel. There was a period of rapid changes in CMs in Gujarat between 94-95 and 98-99; the BJP, Congress and the Rashtriya Janata Party ruled the state and achieved between 14% and 31% growth rates. The previous strongman of Gujarat used to be Chimanbhai Patel who ruled as CM from 1990-91 to 1993-94. The growth rate during his period was 16.75%. Err…..higher than what Modi achieved. Prior to Chimanbhai Patel was the rule of the Congress for 10 years from 1980-81 to 1989-90. During this period of time, Madhvsinh Solanki and Amarsingh Chaudhary were the Congress CMs in the state. The growth rate during these ten years was 14.8% - a shade lower than Modi’s achievements. Remember back then, India wasn’t quite the dynamic growth engine it is today. Modi can surely take credit for sustaining Gujarat’s growth; but he cannot claim to be the diva of India’s growth miracle!

4) Vibrant Gujarat: The biggest lie that Modi dishes out is Vibrant Gujarat. Modi talks of “lacs of crores” of investments “promised” to the state. But promises have not translated into actual investments. A recent report shows that not even 20% of that investment has actually materialized over the last 4 years. The Tatas, the Ambanis, all claim to love Modi and Gujarat and they heap praise on him. They realize Modi loves such public encomium and these business leaders are smart enough to give him that. But they also love Prithviraj Chavan and Maharashtra, Bhupinder Singh Hooda and Haryana, Jayalalitha/Karunanidhi and TN and whoever it is in AP. Businessmen want pragmatic governance and all these states offer that. The only difference is that these states are quiet performers, while Modi croons from the roof top.

5) Hides all non-GDP data: And the last lie of course is that by talking only about GDP growth, Modi diverts attention from everything else. Be it is hiscommunal record (he hasn’t apologized for the post-Godhra riots, or for the fake encounter killings), or his state’s data on Human Development Indices (The HDI for Gujarat, in 2008, was 0.527 and it ranked 10thamong major states), or social indicators (In Gujarat, the Life Expectance at Birth during 2002-06 was 64.1 years and it ranked ninth among major Indian states. In the areas of Mean Years of Schooling and School Life Expectancy, during 2004-05, it ranked seventh and ninth, respectively. Kerala ranked first in all three indicators. Even Maharashtra, Himachal Pradesh, Punjab, Haryana, Tamil Nadu and Karnataka performed much better than Gujarat (source: Gujarat: Myth and reality: Dr Bhalchandra Mungekar Jun 12, 2012, TOI online edition), Gujarat is a laggard. This is what prompted Chidambaram to state in his budget speech that this is not the growth model that the UPA wants to practice.

The real truth is that the Gujarat economic story has to be narrated correctly. The public has to know the real truth. Even if it takes a hundred such posts. Of course Gujarat is a developed state; just as developed as Maharashtra, AP, Haryana and TN. That’s why people come back impressed from Ahmedabad. But is Modi being truthful by claiming credit for all this? No way. In fact, he is lying through his teeth. And its time the lies are exposed….


तो एक आदमी जो बात-बात पर झूठ बोलता है, बड़ी-बड़ी डींगें हांकता है कि मैंने यह कर दिया, मैंने वह कर दिया जैसा आज तक किसी ने नहीं किया था, तो ऐसे फेंकू का कोई क्या करे? भई, जहां तक विकास का मामला है तो मैं बाकी राज्यों का तो नहीं कह सकता, लेकिन दिल्ली के बारे में जरूर बोल सकता हूं। 26 सालों से मैं दिल्ली-एनसीआर में रह रहा हूं। पहले जहां मुझे पांडव नगर से आईटीओ (6 किलोमीटर) की दूरी तय करने में कम से कम आधा घंटा लग जाता था, आज नोएडा से आईटीओ (20 किमी) की दूरी 35 से 40 मिनट में पूरी हो जाती है। फ्लाइओवर, मेट्रो रेलसेवा, सीएनजी चालित बस सर्विस, इन सबने सफर बहुत ही आसान बना दिया है। कभी आप दिल्ली और एनसीआर वालों से पूछें तो पता चलेगा कि इन बदलावों से उनकी ज़िंदगी पहले के मुकाबले कितनी आसान हो गई है। लेकिन हम नहीं कहते कि शीला दीक्षित नहीं होतीं तो दिल्ली का विकास नहीं होता। क्योंकि विकास का काम यहां शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री बनने से पहले से हो रहा था। भई, हर सरकार का काम है विकास करना। (विकास होता है तो उसमें उन्हें कट भी मिलता है)। गुजरात में भी मोदी से पहले विकास हुआ था और मोदी के बाद भी होगा। खुद आडवाणी ने शिवराज सिंह चौहान की तारीफ करते हुए यह कहा था कि गुजरात तो मोदी से पहले भी विकसित था। 

लेकिन मोदी हैं कि अपनी लाइन को बड़ी दिखाने में ही लगे रहते हैं। इसके लिए वह क्या स्ट्रैटिजी अपनाते हैं, यह जानने के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया पर यह ब्लॉगपोस्ट पढ़ें जो बताता है कि किस तरह मोदी गुजरात की तुलना करते हुए हमेशा गरीब और कमज़ोर राज्यों का हवाला देते हैं ताकि उनका विकास बड़ा दिखे। वे महाराष्ट्र और तमिलनाडु से तुलना नहीं करते जिनका प्रदर्शन गुजरात जितना या उससे बेहतर है। ऊपर मैंने लिखा था कि मैथ के मामले में मोदी बुद्धू लगते हैं। लेकिन अब कहना पड़ेगा कि अपनी कमज़ोरी छुपाने और लोगों के झांसा देने में बंदा डबलस्मार्ट है। फेंकू के अलावा इनको झांसे का राजा भी कहा जा सकता है।

मोदी - पिल्लों से प्यार पर सॉरी कहने से इनकार -   Saturday July 13, 2013

गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के पीएम-इन-वेटिंग नरेंद्र मोदी कल पहली बार कुछ ऐसा बोल गए जिसपर पार्टी को सफाई देते नहीं बन रहा। मोदी से पूछा गया था कि क्या उन्हें गुजरात दंगों में मरनेवालों पर अफसोस है? मोदी ने इसका सीधा जवाब नहीं देते हुए एक उदाहरण दिया कि अगर कोई कार चला रहा हो या चला न रहा हो, पीछे ही बैठा हो और कोई पिल्ला यदि कार के नीचे आ जाए तो बुरा तो लगता ही है।


इस बयान का क्या मतलब है - इसके बारे में दो बिल्कुल विपरीत विचार हैं। मोदीविरोधी कहते हैं कि मोदी दंगों में मरनेवालों की तुलना पहिए के नीचे आनेवाले पिल्ले से कर रहे हैं यानी उनके लिए दंगों में हुई मौतें और किसी कुत्ते की मौत में कोई फर्क नहीं है। बल्कि मोदी ने मुसलमानों और कुत्तों को एक ही पलड़े में रख दिया है, यानी उनके लिए मुसलमानों की औकात कुत्तों जितनी ही है।

मोदीभक्तों का कहना है कि इससे मोदी ने माना है कि हां, वह दुखी हैं। बीजेपी के एक प्रवक्ता के मुताबिक इस बयान से तो मोदी की करुणा का पता चलता है कि वह सड़क पर किसी कुत्ते की मौत से भी विगलित हो जाते हैं। फिर दंगों में हुई मौतों से तो उनका दुखी होना स्वतःसिद्ध है।

मोदी के इस बयान पर जब विवाद उठा तो मोदी ने  ट्विटर पर लिखा - In our culture, every form of life is valued and worshipped. (हमारी संस्कृति में जीवन के हर रूप की कद्र और पूजा की जाती है।) लेकिन इस स्पष्टीकरण से भी कुछ साफ नहीं हुआ। क्या वह यह कहना चाहते हैं कि हर जीवन कीमती है और हर मौत दुखद है? अगर हां तो हम फिर उसी बिंदु पर आते हैं कि दंगों में हुई मौत और सड़क पर कुचल कुत्ते की हुई मौत एक समान है।

मोदी और मोदीभक्त जो बात नहीं समझ रहे हैं, वह यह कि आप इंसान के जीवन और मृत्यु की तुलना किसी पशु के जीवन और मृत्यु से नहीं कर सकते। आगे एक उदाहरण पेश कर रहा हूं और यह उदाहरण जानबूझकर बीजेपी के एक बड़े नेता का ले रहा हूं ताकि पाठक मुद्दे की गहराई को समझ सकें - कल बीजेपी के पूज्य अटल बिहारी वाजपेयी (ईश्वर उनको लंबी उम्र दे) भगवान राम को प्यारे हो जाएं  और मोदी से कोई सवाल पूछे कि वाजपेयी जी के जाने पर आपको दुख है, तो मोदी क्या कहेंगे? यही कि आपके परिवार में बरसों से एक कुत्ता रह रहा हो, उसने आपके घर की रखवाली की हो और एक दिन अचानक आप देखें कि वह अब नहीं रहा तो आपको दुख तो होगा ही। क्या कहेंगे ऐसा ही कुछ? और कहेंगे तो क्या मोदीभक्त उसको भी डिफेंड करेंगे जैसे कि आज कर रहे हैं?

पिल्ले वाली बहस से एक मुद्दा जो छूट रहा है, वह यह कि इस उदाहरण से वह यह भी कहते दिख रहे हैं कि दंगे तो एक दुर्घटना थे और इसमें उनका और उनकी पार्टी का कोई हाथ नहीं है। यानी पिल्ला मरा तो अपनी गलती से, ड्राइवर की गलती से नहीं। ड्राइवर तो गाड़ी चलाएगा ही। गलती तो पिल्ले की है जो सड़क पर सो रहा था या दौड़ रहा था। यदि दंगों के संदर्भ में इस बयान को देखें तो अर्थ यह निकलता है कि गुजरात दंगों में मुसलमान मरे तो अपनी गलती से क्योंकि उन्होंने गोधरा में एक ट्रेन जलाई थी और इसका रिऐक्शन तो होना ही था।

संक्षेप में इस इंटरव्यू से यही संदेश निकलता है कि मोदी अपनी जगह से टस से मस नहीं होनेवाले। एक सीधा-सा सवाल था - क्या गुजरात दंगों में हुई मौत से उनको अफसोस है? पिल्ला वाला उदाहरण दिए बगैर क्या वह 'हां' नहीं कह सकते थे? क्या वह ऐसा नहीं कह सकते थे कि इन दंगों में निर्दोष हिंदू और मुसलमान दोनों मरे थे और मुझे इन दंगों में मरे एक-एक व्यक्ति के लिए अफसोस है? लेकिन नहीं। वह ऐसा नहीं कहेंगे क्योंकि मुसलमानों की मौत का अफसोस करते ही वह उन संकीर्ण हिंदू वोटरों का सपोर्ट खो बैठेंगे जिनके लिए मुसलमानों की औकात खटमलों और मच्छरों से ज्यादा नहीं है। और पिल्लों से प्यार करनेवाले मोदी को 'कुत्ते और रोटी' की वह कहानी अच्छी तरह याद होगी जिसका संदेश है - आधी छोड़ पूरी को धावे, पूरी मिले न आधी पावे। वह पानी में नज़र आ रही अपनी ही परछाई के मुंह की रोटी पाने के लिए अपनी मौजूदा रोटी क्यों गंवाएंगे?

यानी पीएम की कुर्सी पाने के चक्कर में मोदी भला गुजरात के सीएम की कुर्सी को दांव पर क्यों लगाएंगे?
(लेखक को जानें : नीरेंद्र नागर नवभारतटाइम्स.कॉम के सीनियर एडिटर हैं। इससे पहले वह नवभारत टाइम्स दिल्ली में न्यूज़ एडिटर और आज तक टीवी चैनल में सीनियर प्रड्यूसर रह चुके हैं। 29 साल से पत्रकारिता के पेशे से जुड़े नीरेंद्र लेखन को इसका ज़रूरी हिस्सा मानते हैं। वह देश और समाज और समूह की तानाशाही के खिलाफ हैं और मानते हैं कि हर व्यक्ति वह सबकुछ करने के लिए स्वतंत्र है जिससे किसी और का कोई नुकसान नहीं होता और समाज का सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए राजनीतिक मुद्दा हो या इंसानी रिश्तों का तानाबाना, उनके लेखों ने अक्सर उन लोगों को बौखलाया है जिन्होंने खुद ही समाज की ठेकेदारी ले रखी है और दुनिया को अपनी सनक के मुताबिक चलाना चाहते हैं। 'एकला चलो' में भी आप ऐसे ही लेख पाएंगे।)

देश के हर मुसलमान तक पहुँचना चाहिए यह ‘सच’ - Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines




मुसलमानों को इस वक्त क्या चाहिए? किसी विवादित ज़मीन पर बनी मस्जिद जिसमें बमुश्किल 200 नमाज़ी नमाज़ पढ़ पाएं? विधानसभा या संसद में किए गए झूठे वादे या फिर देश के संसाधनों और योजनाओं में अपना हक़?
इस सवाल के जबाव तक पहुँचने में आपकी मदद करने के लिए बस हम कुछ आँकड़े आपके सामने पेश करना चाहते हैं. यकीन जानिए यह आँकड़े पढ़कर आपके सामने नीतीश की टोपी उतर जाएगी, मुलायम आपको कठोर नज़र आएंगे, आज़म खाँ का असली चेहरा सामने आ जाएगा और मुस्लिम परस्त दिखने वाले बाकी सरकारों और नेताओं की बेशर्म हक़ीकत आपके सामने नंगी हो जाएगी.
Indian MuslimsBeyondHeadlines को केन्द्र सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय से सूचना के अधिकार के ज़रिए मिले अहम दस्तावेज़ अल्पसंख्यक़ों के कल्याण के लिए शुरू की गई स्कीमों की हकीक़त बयाँ कर रहे हैं. आप जानेंगे कि कैसे अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमानों के कल्याण का दावा करने वाली यह योजनाएं काग़जों में ही दम तोड़ रही हैं. (या नेता इनका गला घोंट रहे हैं.)
बजट सौ करोड़ का पर रिलीज़ हुआ एक लाख और खर्च शुन्य

मुसलमानों के शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक उत्थान के लिए सरकार की कई संस्थाएं व स्कीमें चल रही हैं. उन्हीं संस्थाओं में एक नाम मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन का भी है. अख़बारों के बिके हुए पन्ने इस संस्था की तारीफ़ से भरे मिल जाएंगे, लेकिन हकीक़त यह है कि साल 2012-13 में इस संस्था के लिए 100 करोड़ का बजट पास किया गया, लेकिन रिलीज़ हुए सिर्फ एक लाख रुपये. हद तो यह है कि यह एक लाख रुपये भी खर्च नहीं किए गए. यदि खर्च होते तो किसी ज़रूरतमंद मुसलमान का भला हो जाता, जो शायद न सरकार चाहती है और न ही खोखले दावे करने वाले नेता.
अल्पसंख्यक महिला नेतृ्त्व विकास स्कीम भी महज़ एक दिखावा

अल्पसंख्यक महिलाओं में लीडरशीप डेवलपमेंट को लेकर सरकार द्वारा अल्पसंख्यक महिला नेतृ्त्व विकास स्कीम (Scheme for Leadership Development of Minority Women) शुरू की गई. इस स्कीम के लिए साल 2012-13 में 15 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन जारी किए गए सिर्फ 12.80 करोड़ रूपये और इसमें से भी सिर्फ 10.45 करोड़ ही खर्च किया जा सका.
जबकि इससे पहले के वर्षों में साल 2011-12 में 15 करोड़ का बजट रखा गया और रिलीज सिर्फ 4 लाख ही किया गया. उसी तरह साल 2010-11 में भी 15 करोड़ का बजट रखा गया जबकि रिलीज 5 करोड़ किया गया. यही नहीं, साल 2009-10 में यह बजट 8 करोड़ का था और 8 करोड़ रूपये रिलीज़ भी किया गया. पर जब खर्च की बात आती है तो शुन्य बटा सन्नाटा… सारा धन रखा का रखा ही रह गया. यही हाल साल 2010-11 और साल 2011-12 का भी रहा. यदि यह पैसा खर्च किया जाता तो सकता है कि मुसलमानों में कुछ महिलाओं कौम की रहनुमाई की अहम जिम्मेदारी संभालने के लायक हो जाती. लेकिन शायद हमारे नेता और सरकारे ऐसा नहीं चाहती. उनके लिए तो मस्जिदों की दीवारें और इफ़्तार पार्टियाँ ही अहम हैं.
फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई

यही हाल Grant-in-aid to State Channelising Agencies (SCA) engaged for implementation in NMDFC Programme का भी है. इस कार्य के लिए भी साल 2012-13 में 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 66 लाख रूपये ही किया जा सका. गनीमत होती कि इसमें से कुछ पैसा जरूरतमंदों पर खर्च कर दिया जाता. लेकिन पूरी बेशर्मी और बेहाई के साथ संबंधित विभाग इस पैसे को दबाए रहा और एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई. (यहाँ, यह सवाल करना ही बेमानी है कि जब कोई पैसा ही खर्च नहीं किया गया तो संबंधित विभाग के अधिकारियों ने काम क्या किया, शायद वे नेताओं के लिए वसूली का टारगेट पूरा कर रहे हों.)
रक़म सरकारी खजाने में पड़ी रही

राज्यों के वक्फ़ बोर्डों को मज़बूत (Strengthening of the state Wakf Board) करने के लिए साल 2012-13 में 5 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 10 लाख रूपये ही हुआ. क्या आपको यह बताने की ज़रूरत है कि इस फंड में से एक भी रूपया खर्च नहीं किया गया? और अगर आपको पता चल भी जाए कि इस फंड में से भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया तो आप क्या करेंगे? शायद कुछ भी नहीं, क्योंकि हो सकता है आपके लिए भी एक मस्जिद (जो जहाँ, है वहाँ होनी ही नहीं चाहिए थी) की दीवार ही ज्यादा अहम है!
यही नहीं, साल 2010-11 में भी इस मद में 7 करोड़ रूपये का बजट रखा गया लेकिन रिलीज़ हुआ सिर्फ 10 लाख रूपये और यह रक़म भी सरकारी खजाने में पड़ी रही, 2012-13 की तरह ही इस साल भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया जा सका. (या जानबूझकर नहीं किया गया)
कौम परस्ती सिर्फ मज़हबी मसाइल को हवा देने तक ही सीमित हैं

सिविल सेवा परिक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की मदद के लिए भी सरकार ने बजट निर्धारित किया गया है. (Support for students clearing Prelims conducted by UPSC, SSC, State Public Services Commission etc) के लिए भी साल 2012-13 में 4 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन इसके नाम पर महज़ 2 लाख रूपये रिलीज़ किए गए. और यह दो लाख रूपये भी खर्च नहीं किया जा सका. यदि यह चार करोड़ रुपये खर्च हो जाते तो हो सकता है कि कुछ अल्पसंख्यक छात्र सिविल सेवा परीक्षा पास कर पाते. लेकिन मुस्लिम परस्त होने का दावा करने वाले नेताओं को शायद यह पसंद नहीं है. तब ही तो मुस्लिम कल्याण के उनके नारे सभास्थलों में हवा हो जाते हैं और मुसलमानों के हाथ आती ही सिर्फ मायूसी और बेबसी. अब आज़म खाँ, शफीकुर्रहमान बर्क या असदउद्दीन ओवैसी किसी नेता से इस बारे में सवाल मत कर लेना. वरना उनकी आँखे लाल हो जाएंगी और वे वही आडंबर करने लगेंगे जो संसद में करते हैं. इनके लिए वंदे मातरम का गाया जाना या न गाया जाना तो मु्द्दा है लेकिन मुस्लिम छात्रों के लिए फंड रिलीज न होने शायद कभी मु्द्दा न हो. इनकी कौम परस्ती सिर्फ मज़हबी मसाइल को हवा देने तक ही सीमित हैं.
बजट ही गोल कर दिया गया

कौशल विकास पहल (Skill Development Initiatives) के नाम पर साल 2012-13 में 20 करोड़ रूपये का बजट रखा गया जबकि इसके नाम पर रिलीज हुआ सिर्फ 5 लाख रूपये और इसमें से भी एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया.
छोटे अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में गिरावट रोकने के लिए योजना (Scheme for containing population decline of small minorities) का भी यही हाल है. साल 2012-13 में केन्द्र सरकार के इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ 1 लाख रूपये. इसी तरह साल 2010-11 में भी इस स्कीम के लिए 2 करोड़ का बजट रखा गया, लेकिन रिलीज किया गया सिर्फ 1 लाख रूपये. और दिलचस्प यह है कि दोनों ही बार एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया. जबकि बाकी के सालों में इसके नाम का बजट ही गोल कर दिया गया.
स्कीम ही गायब हो गई

भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए प्रोमोशनल क्रियाओं (Promotional Activities for Linguistic Minorities) के नाम पर साल 2010-11 में 1 करोड़ रूपये का बजट रखा गया. लेकिन महज़ 5 लाख रूपये रिलीज किया जा सका और बाकी अन्य योजनाओं की तरह ही इस योजना के तहत भी एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया. और इस साल के बाद से इस योजना का बजट ही गोल कर दिया गया या यूं कहिए कि स्कीम ही गायब हो गई.
विदेशों में अध्ययन के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी (Interest Subsidy on Educational Loans for Overseas Studies) के लिए साल 2012-13 में 2 करोड़ का बजट पास किया गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ दो लाख रूपये. इसी तरह साल 2010-11 में भी में 2 करोड़ का बजट पास किया गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ दो लाख रूपये. इन दोनों वर्षों में खर्च के साथ साथ बाकी के सालों में बजट ही गोल कर दिया गया.
राज्य वक्फ बोर्डों के अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण सिर्फ कागज़ों पर

राज्य वक्फ बोर्डों के अभिलेखों के कंप्यूटरीकरण (Computerization of records of State Wakf Boards) के लिए साल 2012-13 में 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 1.65 करोड़ रूपये. और इस पैसे को भी देश के तमाम राज्य खर्च नहीं कर सके. देश के तमाम राज्यों में इस मद में मात्र 89 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके. साल 2011-12 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. इस साल भी 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया. लेकिन रिलीज सिर्फ 2 करोड़ रूपये ही हो सका. और इस 2 करोड़ रूपये को भी देश के तमाम राज्य खर्च नहीं कर सके. सिर्फ 62 लाख रूपये ही देश के तमाम राज्य मिल कर खर्च कर पाएं. साल 2010-11 की कहानी तो और भी हैरान कर देने वाली है. इस साल 13 करोड़ रूपये का बजट रखा गया था. लेकिन रिलीज सिर्फ 6 करोड़ रूपये ही हो सका. और इस 6 करोड़ रूपये में से सिर्फ 3.63 करोड़ रूपये ही देश के तमाम राज्य मिल कर खर्च कर पाएं.
नेताओं से सवाल मत पूछना, उनका गला सूख जाएगा

व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों स्नातक और स्नातकोत्तर कोर्सेज के लिए योग्यता सह साधन छात्रवृत्ति योजना (Merit-cum-Means Scholarship for professional and technical courses of under graduate and post graduate) के लिए साल 2012-13 में 220 करोड़ का बजट रखा गया, पर रिलीज़ 184.07 करोड़ ही हुआ. और खर्च 181.21 करोड़ रूपये ही किए गए. बाकी के सालों में स्थिति थोड़ी बेहतर रही. लेकिन साल 2008-09 में इस स्कॉलरशिप के लिए 124.90 करोड़ का बजट रखा गया था, लेकिन रिलीज़ सिर्फ 64.94 करोड़ ही किया गया. शायद ऐसा कोई ही छात्र हो जिसने इस योजना के तहत फार्म न भरा हो और न जाने कितने फॉर्मों को फंड न होने का हवाला देकर रद्द कर दिया गया हो. अब सवाल यह उठता है कि जब पूरा फंड रिलीज ही नहीं किया गया और जो रिलीज हुआ भी वह खर्च ही नहीं किया गया तो फिर फॉर्म रद्द कैसे हो गए? अल्पसंख्यकों की रहनुमाई करने वाले नेताओं से यदि यह सवाल पूछ लिया जाए तो उनका गला सूख जाएगा और अगर बेशर्मी से हलक़ से दो चार शब्द बाहर निकले भी तो एक और नया झूठ ही सामने आएगा. क्योंकि इस मामले में सच्चाई इन रहनुमाओं की खोखली नेतागिरी से भी ज्यादा बेशर्म है.
किसी रहनुमा से इस बजट के बारे में सवाल मत करना

चयनित अल्पसंख्यक बहुल जिलों में अल्पसंख्यकों के लिए बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम (Multi Sectoral Development Programme for Minorities in selected of Minority Concentrated Districts) योजना के लिए साल 2008-09 में 539.80 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 279.89 करोड़ रूपये. जबकि साल 2012-13 में इस स्कीम के लिए 999 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 649 करोड़ रूपये. अब आप किसी रहनुमा से इस बजट के बारे में सवाल मत कर लीजिएगा. यदि सवाल कर लिया तो हो सकता है किसी मस्जिद की टूटी दीवार की ईंट उठाकर ही वे आपके सिर पर मार दें.
नेताओं के फूहड़ भाषणों पर ताली कौन बजाएगा?

पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति (Post Matric Scholarship) योजना के लिए साल 2008-09 में 99.90 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 69.93 करोड़ रूपये. जबकि साल 2012-13 में इस स्कीम के लिए 500 करोड़ का बजट रखा गया लेकिन रिलीज हुआ सिर्फ 340.75 करोड़ रूपये और खर्च 326.55 करोड़ रूपये ही किया जा सका. यदि यह पूरा पैसा रिलीज़ हो जाता तो शायद गरीबों के बच्चे दसवीं के बाद कॉलेज के मुंह देख पाते. लेकिन यदि गरीब अल्पसंख्यकों के बच्चे पढ़ गए तो फिर इन नेताओं के फूहड़ भाषणों पर ताली कौन बजाएगा?
इन तमाम स्कीमों पर एक पैसा खर्च नहीं किया गया 

पिछड़े शहरों के रूप में पहचाने गए 251 में से 100 अल्पसंख्यक बहुल कस्बों/शहरों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई योजना (Scheme for promotion of education in 100 minority concentrate towns/cities out of 251 such town/cities identified as backward) का हाल तो और भी बुरा है. इस स्कीम के लिए केन्द्र सरकार ने 50 करोड़ का बजट रखा लेकिन रिलीज सिर्फ 4 लाख रूपये ही किया गया लेकिन उदासीनता की हद यह रही कि इसमें से एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया.
यही हाल एमसीबी/एमसीडी के अंतर्गत न आने वाले गांवों के लिए ग्राम विकास कार्यक्रम (Village Development Programme for Villages not covered by MCB/MCDs) का भी है. इस स्कीम के लिए भी केन्द्र सरकार ने 50 करोड़ का बजट रखा लेकिन रिलीज सिर्फ 4 लाख रूपये ही किए गए. और इन चार लाख में से एक फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की गई.
एमसीडी में जिला स्तरीय संस्थाओं को समर्थन (Support to district level institutions in MCDs) के लिए भी साल 2012-13 में केन्द्र सरकार ने 25 करोड़ का बजट रखा लेकिन इसमें भी सिर्फ चार लाख ही रुपये रिलीज किए गए जिसमें से एक पैसा भी खर्च नहीं किया गया. यानि इस योजना का लाभ एक भी व्यक्ति को नहीं पहुँचा.
नौवीं कक्षा की लड़कियों के लिए फ्री साइकिल योजना (scheme of Free Cycles to girl students of class IX) का हाल भी ऐसा ही है. इस स्कीम के लिए साल 2012-13 में केन्द्र सरकार ने सिर्फ 5 करोड़ का बजट रखा गया जिसमें से मात्र चार लाख रुपये रिलीज किए गए और खर्च एक पैसा भी नहीं किया गया.
सच जो हर हिंदुस्तानी अल्पसंख्यक को जानना चाहिए वह यह है कि अल्पसंख्यकों के शैक्षिक, सामाजिक व आर्थिक उत्थान एवं कल्याण के लिए शुरु की गई तमाम सरकारी योजनाओं ने कागजों पर ही दम तोड़ दिया. और हमारे नेताओं ने इनकी फातेहा तक नहीं पढ़ी.
पहले तो बजट ही ऊँट के मुँह में जीरे के समान रखा गया. लेकिन यह जीरा भी ऊँट के मुँह में नहीं गया. इससे भी कड़वा सच यह है कि जो पैसा खर्च हुआ उसका भी बड़ा हिस्सा नेताओं और अफ़सरों की जेब में चला गया.
यदि अब तक बयाँ की गई हकीक़त से आपके गले का पानी सूख गया है तो अब आपके दिल पर पत्थर पड़ने वाले हैं. क्योंकि सबसे शर्मनाक हक़ीकत यह है कि सरकार और नेताओं के पोस्टरों पर जारी किए गए फंड से ज्यादा पैसा खर्च कर दिया गया. लेकिन देश का कोई अखबार या टीवी चैनल आपको यह नहीं बताएगा क्योंकि सरकार की इन लोक लुभावन (लेकिन ज़मीनी स्तर पर शून्य) योजनाओं के विज्ञापन और उनमें चमकने वाले नेताओं के चेहरे इनके ज़रिये ही आप तक पहुँचे. जब टीवी चैनलों और अखबारों को विज्ञापनों के ज़रिए अपना हिस्सा मिल ही गया तो वे असली हक़दारों तक पैसे की पहुँचने या न पहुँचने की चिंता क्यों करें? शायद ही किसी भी टीवी या अखबार का कोई तेज़ तर्रार रिपोर्टर इन आँकड़ों से उपजे सवालों को नेताजी के मुँह पर दागने की हिम्मत न जुटा पाए, क्योंकि उसके चैनल/अख़बार को तो अपना हिस्सा मिल ही गया है.
प्रचार-प्रसार पर पूरा ध्यान

आपको यह जानना चाहिए कि साल 2008-09 में Research/Studies, Monitoring & Evaluation of Development Schemes for Minorities including Publicity के लिए 5 करोड़ रूपये का बजट रखा गया था. लेकिन रिलीज 8.95 करोड़ रूपये किया गया और खर्च भी 7.97 करोड़ रूपये रहा. साल 2009-10 में बजट को बढ़ाकर 13 करोड़ रूपये कर दिया गया. 13 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 11.97 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2010-11 में बजट को और बढ़ाकर 22 करोड़ रूपये कर दिया गया. 22 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 19.63 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2011-12 में यह बजट बढ़कर 36 करोड़ हो गया. 36 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 24.48 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. साल 2012-13 में बजट को और बढ़ाकर 40 करोड़ रूपये कर दिया गया. 33.30 करोड़ रूपये रिलीज भी हुआ और इसमें से 33.29 करोड़ रूपये खर्च भी किया गया. अब सवाल यह उठता है कि जब मूल योजनाओं का पैसा ही रिलीज नहीं किया गया तो उनके अध्ययन पर यह पैसा कैसे खर्च कर दिया गया. हम कोशिश करेंगे की इसकी पूरी सच्चाई भी आप तक पहुँचे.
यदि आप पिछले 15 दिन से अख़बार पढ़ रहे हैं या किसी भी रूप में ख़बरें देख रहे हैं तो आपको लगेगा कि मुसलमानों के लिए सबसे अहम मसला एक मस्जिद की दीवार है. कम से कम यूपी सरकार को तो यही लगता है. लेकिन आपको यह सवाल भी खुद से करना होगा कि देश के तमाम बड़े अख़बारों में एक मस्जिद की दीवार का गिरना और उसके लिए एक आईएएस अधिकारी का तबादला किया जाना तो खबर बन जाता है लेकिन मुसलमानों के हक़ में पड़ रहा हजारों करोड़ का यह डाका खबर नहीं बन पाता? आखिर क्यों? यदि आपकी समझ इस बुनियादी लेकिन अहम सवाल का जबाव तलाश पा गए तो समझ लीजिए बेदारी की राह में पहला कदम आपने आगे बढ़ा दिया है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेशर्मी से कहते हैं कि सांप्रदायिक सौहार्द न बिगड़े इसके लिए उन्होंने अफ़सर का तबादला कर दिया, और वे आगे भी ऐसा ही करते रहेंगे. क्या अखिलेश यादव इस सवाल का जबाव देने की हिम्मत भी जुटा पाएंगे कि मुसलमानों को उनका जायज़ हक़ न देने वाले अफ़सरों के ख़िलाफ़ आज तक उन्होंने क्या कार्रवाई की है? अखिलेश की तो छोड़िये मुसलमानों के सरपरस्त बनने का दावा करने वाले आज़म खाँ भी इस सवाल के जबाव में सिर्फ अपने ख़ाली गिरेबां में ही झाँक सकते हैं. वे अपनी आलोचना में पोस्ट की गई टिप्पणी पर तो किसी आम नागरिक को हवालात की हवा खिला सकते हैं लेकिन मुसलमानों का हक़ डकारने वाले अफ़सरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में उनकी भी घिग्घी बंध जाएगी.
अब सवाल यही उठता है कि जब नेता खामोश हैं, अफ़सर हक़ पर डाका डाल रहे हैं. मुसलमान हुक्मरानों ने बेशर्मी अख़्तियार कर ली है तो फिर हम क्या करें? इसका सीधा सा जबाव यह है कि अब हमें मुश्किल सवाल पूछने की शुरूआत करनी होगी. और ज़रूरी नहीं है कि यह सवाल नेताओं के मुँह पर ही पूछा जाए. आप यह लेख शेयर करके भी ऐसा कर सकते हैं.
यदि आपने यह लेख यहाँ तक पढ़ लिया है तो इस सच्चाई को बाकी देशवासियों तक भी पहुँचाइये ताकि खोखली सरकार, खोखले नेताओं और खोखले मुसलिम हुक्मरानों की सियाह हक़ीकत लोगों के सामने आ जाए और वे असली और अहम सवालों के बारे में सोचना शुरू करें.
(यह आँकड़े पूरे देश के हैं. समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव और आज़म खाँ के नाम का इस्तेमाल मुसलमानों के नाम पर हो रही राजनीतिक को रेखांकित करने के लिए किया गया है. मुसलमानों की बदहाली के लिए बाकी नेता भी इतने ही जिम्मेदार हैं जितना के इस स्टोरी में उल्लेखित किए गए राजनेता.)

Friday, 8 November 2013

अतिवादी वहाबी, इस्लामी जगत में मतभेद का स्रोत - ईरान हिन्दी रेडियो से


आजकल इस्लामी जगत को अत्यंत कठिन समय का सामना है। एक ओर उत्तरी अफ़्रीक़ा व मध्यपूर्व के अत्याचारग्रस्त क्षेत्र में इस्लामी जागरूकता की लहर ने वर्चस्ववादी एवं साम्राज्यवादी शक्तियों के अवैध हितों को ख़तरे में डाल दिया है और दूसरी ओर मुसलमानों के विभिन्न मतों व पंथों के बीच फूट डालने और मतभेद उत्पन्न करने के लिए पश्चिम की वर्चस्ववादी सरकारों एवं क्षेत्र के रुढ़ीवादी अधिकारियों के समर्थन से सलफ़ियों व तकफ़ीरियों की ओर से कुप्रयास किए जा रहे हैं। इस समय सीरिया, मुसलमानों के बीच पाए जाने वाले मतभेदों को भड़काने के मंच में परिवर्तित हो गया है। पश्चिमी सरकारें और उनके क्षेत्रीय घटक सीरिया में संकट उत्पन्न करने के पहले से निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में विफलता के बाद इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि तकफ़ीरी व सलफ़ी गुटों की सहायता से सीरिया में एक संपूर्ण युद्ध आरंभ कर दें। इस समय क्षेत्र में जिसे शीया-सुन्नी विवाद कहा जा रहा है वस्तुतः वह शीया व सुन्नी समुदायों के बीच विवाद नहीं है क्योंकि इन दोनों समुदायों के लोग काफ़ी समय से शांतिपूर्ण ढंग से एक दूसरे के साथ रहते आए हैं और उन्होंने कभी भी एक दूसरे का जनसंहार नहीं किया है। अलबत्ता दोनों पंथों के बीच मतभेद सदा ही रहे हैं किंतु ये धर्मगुरुओं के बीच और शांतिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किए जाते रहे हैं।
वास्तविक समस्या वहाबियत तथा अन्य मुसलमानों को काफ़िर समझने के विचार का प्रसार है कि जो न केवल शीया मुसलमानों बल्कि बहुत से सुन्नी पंथों को भी काफ़िर समझता है और उनका ख़ून बहाए जाने को वैध मानता है। तकफ़ीरियों का व्यवहार इस प्रकार का है कि वह सुन्नी समुदाय के दरिद्र वर्ग में सांप्रदायिकता व धर्मांधता बढ़ा देता है और मध्यमार्गी सुन्नी धर्मगुरुओं के लिए सक्रियता की संभावना नहीं छोड़ता। अमरीका और क्षेत्र के रुढ़िवादी शासकों को ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी द्वारा सच्चे इसलाम के पुनर्जागरण का सामना करना पड़ा। यह वह इस्लाम है जो देशी तानाशाही और विदेशी साम्राज्य से संघर्ष और स्वाधीनता की प्राप्ति का निमंत्रण देता है। इस्लामी क्रांति केवल एक शीया क्रांति नहीं है बल्कि यह केवल मुसलमानों ही के लिए नहीं अपितु समस्त मानवता के लिए स्वतंत्रता व न्याय का संदेश है। जब ईरान की इस्लामी क्रांति सफल हुई तो पूरे क्षेत्र में मानो भूकंप आ गया और सभी इस्लामी आंदोलन इस क्रांति से प्रभावित हो गए। इस बात ने पश्चिमी देशों को आतंकित कर दिया और उसी समय अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने यह बात कही थी कि यदि क्षेत्र का एक देश इस्लामी क्रांति के कारण हाथ से निकल जाता है तो फिर यह क्रांति अन्य देशों तक भी पहुंच जाएगी।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अमरीका, ज़ायोनी शासन और पश्चिमी सरकारों ने इस क्रांति से मुक़ाबले और इसे ईरान के भीतर ही सीमित रखने के मार्गों के बारे में सोचना आरंभ किया। उन्होंने विभिन्न प्रकार के राजनैतिक व आर्थिक दबावों और सद्दाम को ईरान पर सैनिक आक्रमण के लिए भड़काने के साथ ही इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए इमाम ख़ुमैनी के स्वतंत्रता प्रेमी विचारों से वैचारिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष का भी प्रयास आरंभ किया। इसके लिए अतिग्रहित फ़िलिस्तीन के हैफ़ा एवं तेल अवीव के साथ ही अमरीका व कई यूरोपीय देशों के विश्व विद्यालयों में ईरान की इस्लामी क्रांति के वैचारिक आयामों की पहचान के लिए पूर्वी मामलों के विशेषज्ञों को आमंत्रित करके सम्मेलन व गोष्ठियां आयोजित की गईं। इन सम्मेलनों व गोष्ठियों का लक्ष्य इस महान क्रांति की मुख्य बातों को पहचानना था। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि ईरान की इस्लामी क्रांति की जड़ें, शिया एवं करबलाई विचारों से जुड़ी हुई हैं। इसी के साथ उन्हें यह भी पता चला कि वहाबियत नाम का एक पंथ है जो शिया मुसलमानों को काफ़िर मानता है। दूसरे शब्दों में अमरीका, यूरोप व इस्राईल में होने वाले इन सभी सम्मेलनों व गोष्ठियों का निष्कर्ष यह था कि जिस पंथ ने ईरान में, अत्याचार के विरुद्ध इस प्रकार की क्रांति की है उसका वहाबियत नामक एक शत्रु है और इस क्रांति का मुक़ाबला करने के लिए, ईरान को वहाबियत के घेरे में घेरना होगा। यह ऐसी स्थिति में था कि जब ईरान में कभी भी शीया और सुन्नी की कोई बात ही नहीं थी बल्कि एक ऐसी क्रांति की बात थी जिसने क्षेत्र के समीकरणों में मूल परिवर्तन कर दिया था। शाह की सरकार जो अमरीका की पिट्ठू और अतिग्रहणकारी इस्राईली शासन की समर्थक थी, अचानक ही उसका स्थान एक ऐसी सरकार ने ले लिया जो अत्याचारग्रस्तों विशेष कर फ़िलिस्तीनी जनता की समर्थक थी और पश्चिम के अनुसार इस सरकार को रोका जाना चाहिए था। यही कारण था कि ईरान से मुक़ाबला करने के लिए अमरीका के समर्थक विभिन्न देशों से शिया विरोधी प्रचार आरंभ हो गया।

इन प्रचारों के दो आयाम थे। प्रथम, ऐतिहासिक मतभेदों और फ़ार्स की खाड़ी को अरब खाड़ी का जाली नाम दे कर उत्पन्न किए जाने वाले विवादों को हवा देना और दूसरे शिया और सुन्नी मुसलमानों के धार्मिक मतभेदों को भड़काना। इन देशों ने अपने संचार माध्यमों और क्षेत्रीय नीतियों में ईरान और शियत से भय उत्पन्न करने या दूसरे शब्दों में ईरानोफ़ोबिया व शियाफ़ोबिया पर बल दिया। उनका कहना है कि ईरानी, शिया और फ़ार्स हैं तथा उनका अरब जगत व सुन्नियों से कोई संबंध नहीं है। इन झूठे प्रचारों के अनुसार ईरान चाहता है कि इस्लाम धर्म के नाम पर सुन्नी मुसलमानों को शिया बना दे। यह ऐसी स्थिति में है कि इस्लामी क्रांति एक सांस्कृतिक क्रांति है और इसका संदेश, अत्याचार से संघर्ष, न्याय प्रेम और एकता के संबंध में क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की शिक्षाओं पर आधारित था। इस्लामी क्रांति को निर्यात करने का आशय, इस संदेश को पूरे संसार के मुसलमानों तथा न्याय प्रेमियों तक पहुंचाना था। इस्लामी क्रांति के नेताओं ने कभी भी शिया पंथ को फैलाने का प्रयास नहीं किया बल्कि वे सदैव ही मुसलमानों के बीच एकता व संवाद का निमंत्रण देते रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभिक वर्षों से ही तेहरान में शिया व सुन्नी धर्म गुरुओं की सम्मिलिति से सम्मेलन आयोजित होते हैं किंतु अमरीका व उसके क्षेत्रीय घटकों ने सदैव इस बात का प्रयास किया है कि इस्लामी क्रांति के तथ्यों और इस क्रांति के संदेश को उलट-पलट कर प्रस्तुत करें तथा इस्लामी क्रांति को एक शिया क्रांति व सुन्नी मुसलमानों के लिए ख़तरा दर्शाएं।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वैचारिक आधारों से संघर्ष की अमरीका व उसके घटकों की इस नीति के परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान में और फिर मध्य एशियाई देशों में वहाबी मदरसों की बाढ़ सी आ गई और वहाबी विचारों का पितामह इब्ने तैमिया के तकफ़ीरी विचारों के साथ दसियों हज़ार छात्रों का प्रशिक्षण किया गया। ये छात्र सबसे अधिक एक पाठ पढ़ते थे और वह यह था कि शिया को मारने से स्वर्ग प्राप्त होता है। यह योजना अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ज़ेबिग्नियू ब्रिजेन्स्की ने प्रस्तुत की थी और अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान उन्होंने इस योजना के क्रियान्वयन पर दृष्टि भी रखी थी। तालेबान गुट ने इस चरमपंथी विचार धारा के साथ और अमरीका, ब्रिटेन तथा पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसियों की सहायता से नब्बे के दशक के मध्य में अफ़ग़ानिस्तान के नब्बे प्रतिशत से अधिक भाग पर नियंत्रण कर लिया और अफ़ग़ान संघर्षकर्ताओं को काबुल से निकाल बाहर किया।

अगस्त वर्ष 2006 में दक्षिणी लेबनान में इस्लामी प्रतिरोध संगठन की विजय के बाद अमरीका व उसके क्षेत्रीय घटकों ने व्यापक स्तर पर सलफ़ी व तकफ़ीरी विचारों का प्रचार आरंभ कर दिया। अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन पर लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन की आश्चर्यजनक विजय ने अमरीका, इस्राईल और अत्याचारी अरब रजवाड़ों को अत्यधिक भयभीत कर दिया था विशेष कर इस लिए कि हिज़्बुल्लाह के पीले झंडे और उसके नेता सैयद हसन नसरुल्लाह के चित्र सभी अरब देशों की राजधानियों और प्रमुख नगरों में दिखाई देने लगे थे। इस विजय ने क्षेत्र में हिज़्बुल्लाह की लोकप्रियता इतनी बढ़ा दी कि ट्यूनीशिया के प्रमुख सुन्नी नेता शैख़ राशिद अलग़नूशी ने सैयद हसन नसरुल्लाह से टेलीफ़ोन पर वार्ता करते हुए कहा कि आप मेरे नेता व इमाम हैं। अमरीका की तत्कालीन विदेशमंत्री कोन्डोलीज़ा राइस ने अक्तूबर वर्ष 2006 में क़ाहेरा की यात्रा की और मिस्र के विदेशमंत्री से भेंट करने के बजाए चार अरब देशों के उच्च सुरक्षा अधिकारियों से भेंट का आग्रह किया। मिस्र, जार्डन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के गुप्तचर व सुरक्षा विभाग के उच्चाधिकारी, वहाबियत के प्रसार, शिया व सुन्नी मतभेदों को भड़काने और हिज़्बुल्लाह के प्रभाव को रोकने के लिए एकत्रित हुए। उनकी इस बैठक में यह निर्णय किया गया कि अरब जगत में इस लहर को रोकने के लिए शिया और सुन्नी विवाद को भड़काया जाना चाहिए। उसी समय इस्राईल की तत्कालीन विदेशमंत्री ज़िपी ल्यूनी ने कहा था कि हमारे समक्ष केवल एक मार्ग है और वह यह है कि क्षेत्र में शिया व सुन्नी मतभेदों को भड़का दें। उसके बाद ज़ायोनी शासन के अधिकारियों विशेष कर गुप्तचर संस्था मोसाद के प्रमुख मेयर डागान ने बारंबार घोषणा की कि इस्राईल की सुरक्षा का एकमात्र मार्ग, शिया व सुन्नी मुसलमानों के आपसी मतभेदों को बढ़ाना और अरब जगत में सांप्रदायिक झड़पें आरंभ कराना है।

सीरिया में संकट उत्पन्न करना और इस देश की सरकार को गिराने का प्रयास भी वस्तुतः शिया व सुन्नी मुसलमानों को एक दूसरे के सामने ला खड़ा करने के कुप्रयासों का ही क्रम है। वहाबियों की दृष्टि में हर वह सुन्नी जो सलफ़ी एवं तकफ़ीरी विचारों का विरोधी हो, उसका ख़ून बहाना भी वैध है। अलबत्ता इन सभी षड्यंत्रों क पीछे अमरीका व उसके घटकों की गुप्तचर सेवाएं काम कर रही हैं जो मुसलमानों के बीच फूट डालने का काम करवा रही हैं। इराक़ में जो लोग शिया मुसलमानों की मस्जिद में विस्फोट करते हैं वे वही लोग हैं जो सुन्नियों की मस्जिदों में भी धमाके करते हैं क्योंकि कभी भी कोई सुन्नी उन लोगों का जनसंहार नहीं कर सकता जो मस्जिद में नमाज़ अदा कर रहे हों। जो व्यक्ति दोनों पंथों की मस्जिद में विस्फोट करता है वह एक एजेंट होता है जो दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देता है। इसी आधार पर धार्मिक व जातीय आधारों पर क्षेत्रों के बंटवारे की बात कही जा रही है। पश्चिमी देश इस षड्यंत्र के माध्यम से मुसलमानों को एक लम्बे समय तक के लिए धार्मिक एवं जातीय विवादों में ग्रस्त करना, मध्यपूर्व के रणनैतिक क्षेत्र में अपने अवैध हितों को पूरा करना और ज़ायोनी शासन की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाना चाहते हैं।

सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं! - मज़दूर बिगुल



सावधान! फ़ासीवादी शक्तियाँ अपने ख़तरनाक खेल में लगी हैं!

इनका निशाना है जनता की एकता!

इनके नापाक इरादों को नाकाम करना ही होगा!

धर्म के नाम आम लोगों को बाँटकर और लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगी ताक़तें अभी भी मुज़फ़्फ़रनगर में साम्प्रदायिक आग ठण्डी नहीं होने दे रही हैं। दशहरे के दिन भी इन्होंने माहौल बिगाड़ने की पूरी कोशिश की। अभी त्योहारों का समय चल रहा है, इसलिए कोई बड़ी बात नहीं होगी कि ये मानवद्वेषी लोग फिर से किसी किस्म का साम्प्रदायिक फ़साद खड़ा कर दें। लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे इस साल की पहली साम्प्रदायिक घटना नहीं है। इस साल अगस्त महीने तक पूरे देश में साम्प्रदायिक हिंसा की 479 घटनाएँ हो चुकी हैं जिनमें 93 तो उत्तर प्रदेश में हुई हैं। 2012 का साल भी ऐसा ही गुज़रा था, तब साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या 640 रही थी।

भारत में साम्प्रदायिकता का खेल सभी राजनीतिक पार्टियाँ खेलती हैं, मगर यहाँ फ़ासीवादी राजनीति का केन्द्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही है जो साम्प्रदायिक दंगे-फसादों को बाकायदा रणनीति बनाकर प्रायोजित करता है। अक्सर बुद्धिजीवियों, जनवादी राजनीतिक कार्यकर्ताओं सहित तमाम लोगों को यह भ्रम रहता है कि भारत में फ़ासीवाद का मतलब सत्ता में, खासकर केन्द्र में भाजपा की सरकार होने या ना होने से है। “लाल” झण्डे वाली संसदीय वाम पार्टियों ने इस धारणा को ओर बल दिया है जो अक्सर साम्प्रदायिक ताक़तों को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर कांग्रेस के आंगन में झाड़ू-पोंछा करती रहती हैं लेकिन वास्तव में हक़ीक़त ऐसी बिलकुल भी नहीं है। भाजपा भारतीय फ़ासीवादी धारा का सिर्फ एक राजनीतिक संगठन है जिसका इस्तेमाल संघ संसदीय स्पेस को ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए करता है। संघ के 30 से ज़्यादा और संगठन भी हैं। इसलिए अगर भाजपा सत्ता में नहीं हो तो इसका मतलब यह नहीं है कि फ़ासीवाद का ख़तरा टला हुआ है और फ़ासीवाद का मुकाबला करने का मतलब महज भाजपा को केन्द्र में सरकार बनाने से रोकना है। इसके उलट ऐसे समय में फ़ासीवाद अपना काम चुप-चाप लेकिन उतने ही सघन और पूरी ताक़त से कर रहा होता है जितना वह सत्ता में रहने के दौरान करता है। संघ की सरगर्मियों और पिछले एक दशक के दौरान, जब इसकी संसदीय ‘शाखा’ यानी भाजपा केन्द्रीय सत्ता से बाहर है, इसके कारनामों को देखकर इस बात का अन्दाज़ा भली-भाँति हो जाता है।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर दें कि संघी साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद को बेनकाब करने और उसका विरोध करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि हम दूसरे धर्मों की साम्प्रदायिक धाराओं और फ़ासीवादी रंगतों को किसी भी तरह की छूट दे रहे हैं, या किसी को उनकी निन्दा और विरोध नहीं करना चाहिए। मुस्लिम कट्टरपन्थी सहित हर तरह के साम्प्रदायिक संगठनों और फ़ासीवादी रंगतों को भी आवाम के सामने और ख़ास तौर पर उन धर्मों, इलाकों के लोगों के बीच बेनक़ाब करना उतना ही ज़रूरी है। पर हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत में सरेआम फ़ासीवादी सत्ता कायम करना, दूसरे धर्मों, जाति या इलाका आधारित अल्पसंख्यक लोगों को दबाने, क़त्लेआम करने और बड़े पूँजीपतियों के लिए संकट के दौर में डण्डे का राज क़ायम करने, हर तरह के जन विरोध को कुचलने का सामर्थ्य और सम्भावना सिर्फ संघी फ़ासीवाद में ही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग भी “कठिन समय” में अपना दारोमदार संघी फ़ासीवाद के ऊपर ही डालेगा। भारतीय पूँजीपतियों जैसे टाटा, अम्बानी आदि द्वारा गुजरात के “विकास पुरुष” नरेंद्र मोदी की समय-समय पर की जा रही खुले दिल से तारीफ़ और भाजपा द्वारा मोदी को 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाना आने वाले कल की झलक पेश कर रहा है। अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवाद की भोंपू ‘टाइम’ पत्रिका तो बहुत पहले ही अपने पहले पन्ने पर मोदी की फोटो लगाकर उनके द्वारा गुजरात के “विकास” के कसीदे पढ़ चुकी है और उन्हें भारत के भविष्य के नेता के रूप में पेश कर चुकी है। दूसरी तरफ, अल्पसंख्यक साम्प्रदायिक धाराओं या फ़ासीवादी रंगतों में ऐसी सम्भावना या सामर्थ्य बिलकुल भी नहीं है, लेकिन चूँकि ये धाराएं और रंगतें जनवादी ताक़तों के फ़ासीवादी विरोधी कैम्‍प की एकता को तोड़ने, बिखेरने और संघी फ़ासीवाद के प्रचार के लिए मसाला उपलब्ध करवाने के सिवा और कुछ नहीं करतीं, इसलिए इनका पर्दाफाश भी उतना ही ज़रूरी है। पर यह याद रखना चाहिए कि इनमें से ज़्यादातर ताक़तें अपनी खुराक संघी-मार्का हिन्दू फ़ासीवाद के विरोध में और अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना से ही प्राप्त करती हैं।

2014 के चुनाव आ रहे हैं, और संघ के फ़ासीवादी गिरोह धर्म के नाम पर जनता का ध्रुवीकरण करने के लिए पूरे ज़ोर-शोर से लगे हुए हैं। दंगे-फसाद कराने के अलावा संघ के फ़ासीवादी गिरोह और भी बहुत कुछ करते हैं जिन पर अक्सर ही आम लोगों की नज़र नहीं पड़ती। इन सब के बारे में चर्चा करने से पहले हम संघी संगठनों (जिनको ‘संघ परिवार’ कहा जाता है) के कारनामों पर एक नज़र डाल लें जिनमें मुसलमानों और ईसाईयों के विरुद्ध हिंसा शामिल हैं ।


संघी फ़ासीवाद की करतूतों पर एक नज़र - 

अपने जन्म से लेकर ही, संघ की तरफ से फैलाया गया साम्प्रदायिक ज़हर कितना ख़तरनाक और व्यापक रूप धारण कर चुका है, इसका पता गुजरात और महाराष्ट्र में हुई साम्प्रदायिक घटनाओं और दंगों से चलता है। हालांकि काँग्रेस (जिसकी 1984 के सिख विरोधी दंगों में भूमिका जगजाहिर है) और महाराष्ट्र में शिवसेना और एन.सी.पी. आदि भी साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने में शामिल रही हैं लेकिन फ़ासीवादी कार्यक्रम संघ के पास ही है, यह इसकी बाकायदा रणनीति है। अकेले महाराष्ट्र में 1998-2008 के 11 साल के दौरान 1123 साम्प्रदायिक झड़पें या दंगे हुए, जिनमें तकरीबन 200 लोगों की जान गयी। अलग-अलग साल के हिसाब से देखा जाए तो यह पूरे देश में होने वाली इस तरह की घटनाओं का 10.23 प्रतिशत है। यह संख्या गुजरात से भी ज़्यादा है जहाँ 2002 के दंगों में 2000 से ज़्यादा लोग मारे गये। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में देश के बाकी सभी शहरों से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे या झड़पें हुई हैं। जलगाँव, धूले, ठाणे, परभणी, नांदेड़, शोलापुर आदि शायद ही कोई शहर हो इस प्रांत में जहाँ साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए। हाल यह हो चुका है कि महाराष्ट्र में अब औसतन हर बीस दिन में साम्प्रदायिक दंगों जैसी घटना होती है।

गुजरात में इसी दौरान 823 साम्प्रदायिक दंगों की घटनाएँ हुई जिनमें 1114 मौतें (सरकारी सूचनाओं पर आधारित) हुई हैं। अन्य रिपोर्टों के अनुसार अकेले 2002 के गुजरात दंगों में ही 2000 मौतों का अनुमान है। उत्तर प्रदेश भी पीछे नहीं है, यहाँ पर भी 2001-11 के अन्तराल में 1112 साम्प्रदायिक झड़पें या दंगे हुए जिनमें 284 मौतें हुई। इसके बाद नम्बर आता है मध्य-प्रदेश का जहाँ 2000-08 के बीच 801 साम्प्रदायिक वारदातें हुई और 115 मौतें। अगर 2005-09 का अन्तराल लें तो यह प्रदेश दूसरे स्थान पर आता है जब यहाँ 648 घटनाएं हुईं। एक बात और, अक्सर दंगों को हिन्दू-मुस्लिम दंगे या साम्प्रदायिक झड़पों का नाम दिया जाता है लेकिन मरने वालों की बड़ी संख्या मुसलमानों की रहती है। गुजरात दंगों में मरने वालों में भी, सरकारी सूचनाओं के अनुसार, 75 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम थे, जबकि गैर-सरकारी सूचनाओं के अनुसार यह आँकड़ा 90 प्रतिशत से ज्यादा का है। तथ्य बताते हैं कि आम तौर पर ये हिन्दू-मुस्लिम दंगे या झड़पें उकसाई जाती हैं या फिर मुसलमानों पर योजनाबद्ध हमले और कत्लेआम होते हैं।

इसके अलावा उड़ीसा में 2007-08 में ईसाई विरोधी दंगे हुए जिनमें संघ परिवार के संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने मुख्य भूमिका निभाई। सबसे भयंकर दंगे कन्धमाल जिले में हुए। यहाँ 210 गांवों के 4600 घर जला दिए गए, 40 मौतें हुई, 18000 लोग जख्मी हुए, 50,000 को अपनी जगह से उजड़ना पड़ा और 252 चर्च तथा 13 शिक्षा संस्‍थान आग के सुपुर्द कर दिए गए। पता नहीं कितने बलात्कार हुए और बहुत से यतीमखाने जलाने की घटनाएं हुईं। उल्लेखनीय है कि इन दंगों के समय भाजपा, बीजू जनता दल के साथ राज्य की गठजोड़ सरकार का हिस्सा थी। भाजपा का एक विधायक इन दंगों को भड़काने में शामिल था। शर्मनाक बात यह है कि मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भाजपा और संघ के दूसरे फ़ासीवादी संगठनों की इन दंगों में भूमिका पर आलोचना का एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला। जब चुनाव नजदीक आए तो पटनायक ने भाजपा से समझौता तोड़ कर दंगों के कारण ‘प्रदेश की हुई राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी’ और ‘संघ की घटिया भूमिका’ का राग अलापना शुरू कर दिया।

इसी तरह कर्नाटक में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की वारदातें लगातार हो रही हैं जिसके पीछे संघ और इससे जुड़े संगठनों का ही हाथ है। इस प्रदेश ने 2009 में मैसूर में मुस्लिम विरोधी वारदातें, और 2008 में मंगलोर, उडपी, शिमोगा आदि शहरों में चर्च और पादरियों पर लगातार हुए हमले देखे हैं। इस प्रदेश में भी संघ पिछले चालीस साल से सक्रिय है, बेशक इसका परिणाम अभी मुंबई 1992 या गुजरात 2002 जैसा दिखाई नहीं दिया पर इसकी पूरी संभावना है। इसके लिए पूरी कोशिश संघ और इससे जुड़े फ़ासीवादी गिरोह लगातार कर रहे हैं। ऐसी ही कोशिश ‘श्रीराम सेने’ नाम के हिन्दू फ़ासीवादी गिरोह ने 1 जनवरी, 2012 को सिंधागी नाम के कस्बे में की। श्रीराम सेने के कारकुनों ने तहसीलदार दफ़्तर पर आधी रात को पाकिस्तान का झंडा लगा दिया और इसका इल्‍जाम स्थानीय मुसलमान आबादी के सिर मढ़ दिया और इलाके में मुसलमान विरोधी प्रचार शुरू कर माहौल को साम्प्रदायिक बनाने की कोशिशें की। छह दिन बाद जब इस गिरोह के छह लोग दबोचे गए तो सभी हिन्दू फ़ासीवादी संगठनों ने उनके बचाव के लिए चीखना शुरू कर दिया। यह भी सामने आया कि इन्हीं छह लोगों ने घटना के अगले दिन ‘दोषियों को पकड़ने’ में देरी के विरोध में रोष प्रदर्शन आयोजित किये थे।

संघ का प्रसार उसके परंपरागत खेमों से बाहर होने के संकेत भी आने शुरू हो गए हैं। राजस्थान में संघ ने पैर पसारे हैं। उदयपुर तथा जोधपुर के नजदीक एक गांव बालेसिर में साम्प्रदायिक वारदातें हो चुकी हैं। सन 2011 में भरतपुर जिले में हुए गोपालगंज हत्याकांड ने संघ के द्वारा इस राज्य में बुने जाल को सामने ला दिया है। पहले तो प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने इस घटना पर पर्दा डालने की कोशिश की, मगर बाद में जब जांच रिपोर्टों ने इस हत्याकांड में संघ से जुड़े स्थानीय गुर्जर भूमिपतियों की भूमिका, सरकारी मशीनरी तथा पुलिस के साथ इसके संबंधों को नंगा किया तो दिखावे के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले शुरू कर दिए गए। गोपालगंज में एक कब्रिस्तान की जमीन का विवाद है जिसके बारे में कई बार अदालती फैसला मुस्लिम समुदाय के हक में हो चुका है मगर गुर्जर भूमिपति इस फैसले को मानने से इनकार करते हैं। 14 सितंबर 2011 को जब इस संबंध में दोनों पक्षों में बातचीत हो रही थी तो संघ, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर भूमिपतियों के गुंडों ने मुस्लिम मुहल्लों में छीना-झपटी, और आगजनी शुरू कर दी। दोपहर के समय जब इलाके के लोग मस्जिद में नमाज के लिए इकठ्ठे हुए तो उन लोगों ने पुलिस के साथ मिलकर मस्जिद से बाहर निकलने वाले रास्तों पर पुलिस के वाहन खड़े कर हमला बोल दिया। लाठियों और गोलीयों से हुए इस हमले में 20 लोग मारे गए। गोलियों के निशान मिटाने के लिए मरे हुए लोगों की टांगें और बाजू काट दिए गए और लाशों के साथ कुछ लोगों को जिंदा जला दिया गया। उत्तराखंड में भी तराई का इलाका जो बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने के बाद भी शांत रहा था, अब साम्प्रदायिक दंगों की लपेट में आ चुका है। 2011 में शहीद अशफाकउल्ला का बुत तोड़ने पर रुद्रपुर शहर में दंगे भड़क उठे।

दंगों के लिए माहौल बनाना और फिर उसको अंजाम देना, सिर्फ यही नहीं है जो संघी फ़ासीवाद करता है। दुनिया भर के हर फ़ासीवादी की तरह, यह भी अपने खिलाफ बोलने वाले कलाकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों के ऊपर हमले, धमकियाँ और यहाँ तक की कत्ल की वारदातों को भी अंजाम देता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुंडों द्वारा प्रो. सभरवाल का कत्ल, नामी चित्रकार एम. एफ. हुसैन पर लगातार हमले, कश्मीर मसले पर होने वाले सेमिनारों आदि में लगातार गुंडागर्दी और इस मसले पर संघ के विरूद्ध बोलने वालों पर हमले जिनमें पिछले साल वकील शांति भूषण पर हुआ हमला, इसके कुछ उदाहरण हैं। शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण और भारत के इतिहास और संस्कृति की ‘संघी कहानी’ के खिलाफ जाने वाली किताबों को पाठ्यक्रम से बाहर करवाना, जलाना जैसी घटनाएँ अक्सर होती रहती हैं। रोहिंटन मिस्त्री के नावेल को मुंबई युनीवर्सिटी के पाठ्यक्रम से और रामानुजन के रामायण के बारे में लिखे लेख को दिल्ली युनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से हटाने का मसला इसका उदाहरण है। 1970 के दशक में भी इसी तरह संघी दबाव के कारण जनता पार्टी सरकार ने इतिहासकार रामशरण शर्मा की किताब “एंशिएंट इंडिया” को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया था।

इसके अलावा पिछले दशक में संघ की आतंकवादी हरकतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। महात्मा गाँधी के क़त्ल को छोड़ कर आजादी के बाद संघ ने इस क्षेत्र में ज्यादा कुछ नहीं किया था। पर बीते कुछ सालों में कई ‘रहस्यमयी’ धमाकों के पेंच जब खुलने लगे तो संघ का आतंकवादी नेटवर्क और हथियारबंद संगठनों का तानाबाना सामने आया। 2003 और 2004 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके के तीन शहरों जालना, पूर्णा और परभणी में मस्जिदों में बम धमाके हुए और परभणी की एक मस्जिद के बाहर मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने नमाज के लिए आए लोगों पर अंधाधुन्ध गोलीबारी की।

परभणी में हुई इस वारदात के बाद तो पूरे मराठवाड़ा में हिंसा फैल गयी थी। ये धमाके ‘रहस्यमयी’ बने रहे। फिर 2006 में मराठवाड़ा इलाके के एक और शहर नांदेड़ के एक घर में धमाका हुआ और अगले साल इसी शहर की एक बेकरी में धमाका हुआ। इसके बाद 18 फरवरी, 2007 को समझौता एक्सप्रेस बम धमाका हुआ जिसमें 68 लोगों की मौत हो गयी और 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में मस्जिद के आगे धमाका हुआ। जब नांदेड़ धमाके की तफ़्तीश हुई तो पता चला कि धमाके वाला घर संघ से जुड़े एक व्यक्ति का है और मारे गए दोनों लोग बजरंग दल के कार्यकर्ता थे। जख्मी हुए चार व्यक्ति भी संघ के ही सदस्य थे। बेकरी धमाके में मारे गए दो आदमी भी बजरंग दल के सदस्य निकले। असल में इन दोनों जगहों पर संघी टोले बम बना रहे थे जिनका प्रयोग नांदेड़ शहर में मुसलमानों पर हमले के लिए और दंगा भड़काने के लिए होना था। इसी टोली ने जालना, पूर्णा और परभणी में बम धमाके किये थे। इसी तरह जब पोल खुलनी शुरू हुई तो मालेगांव धमाके और समझौता एक्सप्रेस में धमाकों के पीछे भी संघी फ़ासीवाद का हाथ सामने आया। संत असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और फौज के लेफ़्टीनेंट कर्नल पुरोहित तक इसके तार जा जुड़े। सब कुछ सामने आने पर संघ, इसके अन्य फ़ासीवादी गिरोहों और इसके संसदीय मुखौटे भाजपा ने खूब हल्ला मचाया, इससे मुकरने की कोशिश भी की और पकड़े गए संघी कारकुनों को बेकसूर एवं देशभक्त बताना शुरू कर दिया।

आम लोगों के खिलाफ फ़ासीवादी जंग जारी रहती है, 
बस तरीके बदलते हैं - 

भाजपा और संघ के तीन मुख्य मुद्दे हैं – राममंदिर, संविधान की धारा 370 को खत्म करना और देश में एक जैसा नागरिक कोड लागू करना। 2004 के लोकसभा चुनावों में ये तीनों मुद्दे फुस्स होने के कारण संघ ने इनको कुछ समय के लिए पीछे धकेला और लामबंदी के दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक रंगत वाले तौर तरीके आजमाने शुरू किए। इनमें पहला काम जो संघ कर रहा है वह है गौ रक्षा के लिए कानून बनाने की मुहिम चलाना और इस मसले पर हिन्दू और मुसलमानों तथा अन्य धर्मों को मानने वालों के बीच ध्रुवीकरण को तीखा करना। दूसरा क्षेत्र जहाँ संघ पूरे जोर से काम कर रहा है वह है शिक्षा को साम्प्रदायिक रंग देना। जिन प्रदेशों में भाजपा की सरकारें हैं वहाँ तो ये काम सरकारें कर ही रही हैं। तीसरा काम लोगों के ज्वलंत मुद्दों को ढाल बनाकर अपना आधार बनाना और भ्रष्टाचार विरोधी ‘अन्ना मुहिम’ को समर्थन देना। आडवाणी की भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘रथ यात्रा’ इसी योजना का हिस्सा थी।

1925 में अपनी स्थापना के बाद से ही, संघ ने ‘गौ रक्षा समितियों’ का एक व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, खास तौर पर उत्तर भारत में। इनका काम कहने को तो गौशाला चलाने का है पर अपने जन्‍म से ही ये समितियाँ दंगे भड़काने और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने में शामिल रही हैं। “गौ हिंदुओं के लिए पवित्र है”, “मुसलमान हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए गोमांस खाते हैं।” इस तरह की बेसिरपैर, बेबुनियाद बातों को दोहराना इन समितियों का मुख्य काम रहा है। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान के राज्य में इसको ही “पवित्र गौ” और भोपाल की मस्जिदें, ताज-उल मस्जिद और और जामा मस्जिद के बीच मुकाबला बनाकर पेश किया जाता रहा है। 1950 से ही गौ रक्षा का मुद्दा भाजपा के मुख्य एजेण्डे पर रहा है, तब इसका नाम जनसंघ था। बेशक भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने आजकल कट्टर हिन्दुवादी मुखौटे को उतारकर नरम हिन्दुवादी मुखौटा पहना हुआ है लेकिन प्रादेशिक स्तर पर हिन्दू फ़ासीवादी मुखौटा पूरी कुशलता के साथ अपना काम किये जा रहा है। इसको ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने गौ रक्षा के लिए कानून को और भी सख्त बनाने के लिए बिल पास किया जिसके तहत अब गौ हत्या पर सात साल की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। ना सिर्फ इतना ही, गोमांस खाना भी पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। गिरफ़्तारी के अधिकार हैड कांस्टेबल रैंक के पुलिस कर्मी को दे दिए गए हैं, यहाँ तक कि गोमांस खाने के शक के आधार पर ही किसी को भी गिरफ़्तार किया जा सकता है। इस कानून को पास करने से पहले विश्व हिन्दू परिषद ने पूरे मध्यप्रदेश में हस्ताक्षर अभियान चलाया। प्रदेश की शिवराज चौहान सरकार ने भारी धनराशि सरकारी तौर पर गोशालाओं को बनाने के लिए जारी की। याद रहे मध्यप्रदेश पूरी दुनिया में भयंकर गरीबी और भुखमरी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शुमार है। भाजपा सरकार वाले अन्य प्रदेशों जैसे गुजरात, कर्नाटक, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ में भी ऐसे ही कानून बनाए गए हैं।

शिक्षा का भगवाकरण भी उच्च स्तर पर जारी है । जब भी भाजपा सत्ता में आई, उन राज्यों में पाठ्य-पुस्तकों को बदलने का काम शुरू हो गया। केन्द्र में सरकार रहने के समय भी भाजपा के मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने प्राइमरी, सेकेंडरी और उच्च स्तर पर पाठ्यक्रम को ज्यादा भारतीय, ज्यादा कौमी और ज्यादा आध्यात्मिक बनाने की कोशिशें कीं लेकिन इसमें उनको सफलता नहीं मिली। लेकिन भाजपा की प्रादेशिक सरकारें इसमें कोई ढील नहीं दे रही हैं।

गुजरात में नौवीं कक्षा को पढ़ाया जाता है कि “देश के लिए सबसे बड़ी मुसीबत अल्पसंख्यक समुदाय है”। इसके बाद “अनुसूचित जातियाँ और कबीले, स्मगलिंग, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी” आते हैं। इस पाठ के अनुसार मुसलमान और पारसी विदेशी हैं। सेकेंडरी लेवल पर नरेंद्र मोदी की जीवनी पढ़ाने की सिफारिश की जाती है। मध्य प्रदेश और कर्नाटक की भाजपाई सरकारों ने स्कूलों में गीता की पढ़ाई अनिवार्य करने की कोशिश की, जो फिलहाल विरोध के कारण खटाई में पड़ गयी है। उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार ने नया क्षेत्र खोजा है – यहाँ पर आज-कल संस्कृत को उच्च महत्व देने का काम जारी है।

सरकारों का इस्तेमाल शिक्षा ढाँचें के भगवाकरण में करने के अलावा, शिक्षा क्षेत्र में संघ की एक बड़ी मशीनरी ‘विद्या भारती’ काम करती है। ‘विद्या भारती’ की स्थापना 1977 में की गयी। अब पूरे भारत में इसके 28000 स्कूल चलते हैं। इनमें 32,50,000 विद्यार्थी पढ़ते है। इन स्कूलों के लिए पाठ्य पुस्तकें ‘विद्या भारती संस्थान’ छपवाता है जिनको 1996 में ही राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद (एन.सी.ई.आर.टी.) ‘धार्मिक कट्टरपंथ और संकीर्णता’ को बढ़ावा देने वाली किताबें कह चुकी है। भारत के इतिहास के सबंध में तरह-तरह के मनगढ़ंत झूठ विद्यार्थियों को पढ़ाए जाते हैं जैसे – 1528-1914 ईस्वी के अंतराल में राम जन्मभूमि पर 77 हमले हुए और 3-5 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र स्थान की रक्षा के लिए जान दे दी। 2 नवंबर 1990 का दिन भारत के इतिहास का ‘काला दिन’ है क्योंकि उस दिन हिंदुओं को बाबरी मस्जिद तोड़ने से रोक दिया गया था, इत्यादि। इसके अलावा संघ अशिक्षा खत्म करने के नाम पर ‘एकल विद्यालय’ अर्थात एक अध्यापक वाले स्कूल चलाता है। यहाँ संघी फ़ासीवादी विचारधारा का प्रचार खुलेआम किया जाता है। संघ के इस शिक्षा ढाँचे को फंड दिलाने के लिए पश्चिमी देशों में संघ के संगठनों की शाखाएं हैं जो सीधे अपने नाम या ‘इंडिया डेवेलपमेंट एंड रिलीफ फंड’ जैसे ग्रुपों के नाम से लाखों डालर जुटाती हैं। मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़, और झारखण्ड आदि प्रदेशों में ‘एकल विद्यालयों’ को सरकार अनुदान देती है जबकि इसका नियंत्रण संघ के हाथों में है।

विश्व हिन्दू परिषद पूरे भारत में ‘शुद्धि मेले’ आयोजित करता है जहाँ लोगों को हिन्दू धर्म धारण करवाया जाता है या दूसरा धर्म धारण कर चुके लोगों को ‘वापस’ बुलाया जाता है। भाजपा सरकार वाले प्रदेशों में तरह-तरह के धार्मिक आज़ादी के कानून लाये जा रहे हैं जो भारत में नागरिकों के किसी भी धर्म को मानने और प्रचार करने के बुनियादी संवैधानिक हक के ही खिलाफ हैं। तरह-तरह के तरीकों से अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोगों को अलग-अलग इलाकों में रहने के लिए मजबूर किया जाता है । जैसे अहमदाबाद में मुसलमान शहर के कुछ खास इलाकों में केंद्रित हो गए जो नाजी जर्मनी में यहूदियों के इलाके ‘घेट्टो’ की याद ताजा कर देते हैं। दूसरी ओर, ‘सेवा भारती’ जैसे संघी संस्थान हैं जो ‘समाज कल्याण’ के मुखौटे तले फ़ासीवादी प्रचार को आगे बढ़ाते हैं। ऐसा ही ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ है जो आदिवासियों में ‘समाज कल्याण’ का काम करती है। कुल मिलाकर संघ के 30 से अधिक अलग-अलग संगठन हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तबकों और धर्मों के बीच काम करते हैं।

इसके अलावा संघ नागपुर में ‘भोंसला मिलेट्री स्कूल’ चलाता है जिसका कई बम धमाकों में नाम आ चुका है। 2012 के फरवरी महीने में संघ ने इस स्कूल के 75 साल पूरे होने पर जश्न मनाया जिसके मुख्य भाषण के दौरान संघ के मोहन भागवत ने ब्रिटिश राज्य को आज के भारत से अच्छा बताकर संघ की ब्रिटेन भक्ति का सबूत दिया और साथ ही कहा की ‘विद्यार्थियों’ को आम शिक्षा के साथ मिलेट्री ट्रेनिंग देना ज़रूरी है क्योंकि ‘देश को ख़तरा’ है। याद रहे कि इस स्कूल की स्थापना 1937 में संघ के सदस्य और हिन्दू महासभा के नेता डॉ. मुंजे ने की थी, इसकी नींव का पत्थर उस समय के बम्बई प्रदेश के अंग्रेज गवर्नर सिर रोजर लुमले ने रखा था। इस स्‍कूल को डॉ. मुंजे द्वारा ही स्थापित केन्द्रीय हिन्दू मिलेट्री शिक्षा कमेटी चलाती है। 65 एकड़ में फैले इस स्कूल के कैम्पस को ‘रामभूमि’ कहा जाता है और आम शिक्षा के साथ-साथ ‘पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट कोर्स’, मिलेट्री ड्रिल्स, गोली चलाने और हथियारों की शिक्षा दी जाती है। यहाँ तक कि तोपखाने चलाने का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस स्कूल के पढ़े हुए कई ‘विद्यार्थी’ भारतीय फौज के ऊंचे ओहदों पर पहुंचे हैं। 75 साला जश्न के मौके पर यह ऐलान किया गया कि मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखण्ड में ऐसे और स्कूल खोले जाएंगे।

नांदेड़ धमाकों की तफ़्तीश में सामने आया कि उस टोली का रिंग-लीडर हिमांशु पांसे और उसका साथी केशव वाघ इसी मिलेट्री स्कूल में 15 दिनों का कैम्प करके गए थे और पुणे में इन्होंने पाइप-बम बनाने का प्रशिक्षण लिया था। पुणे के एक सेवामुक्त नौसेना अफसर एस. आर. भाटे का नाम भी इसी जाँच के दौरान सामने आया जो कि 1996 से संघ के साथ जुडा हुआ है। उसने माना कि उसको एक स्थानीय बजरंग दल नेता ने अपने कारकुनों को ‘जिलेटीन स्टिक’ का प्रयोग सिखाने के लिए कहा था। इसके लिए पहले उसने एक स्थानीय कैंप लगाया। मालेगांव धमाके के तार भी इसी स्कूल से जुड़ते हैं। और ऐसा ही फ़ासीवादी संगठन ‘अभिनव भारत’ के मामले में सामने आया है। लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित के मालेगांव धमाकों के ‘मास्टरमाइंड’ होने के तथ्य सामने आने के अलावा यह भी राज खुला कि इस स्कूल के प्रिंसिपल कर्नल एस.एस. रायकर और एक क्लर्क भी इस मामले से और ‘अभिनव भारत’ के साथ जुड़े हुए हैं। अखबारों में इस बात का खुलासा होने के बाद इन्होंने बिना कोई कारण बताए इस्तीफा दे दिया। जब्त हुई ऑडियो टेपों में श्रीकांत पुरोहित यह कहता है – “स्कूलों के साथ संघ का नाम नहीं आना चाहिए और अलग से ‘बसटियन गार्ड’ के नाम से काम किया जाए।” सच के पूरी तरह सामने आ जाने के बावजूद न तो इन दक्षिणपंथी फ़ासीवादी संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है और न ही संघ के मिलेट्री स्कूल के खिलाफ, बेशक देश भर में जनहित में काम करने वाले कार्यकर्ता लगातार मिलेट्री प्रशिक्षण के इन स्कूलों को बंद करवाने के लिए आवाज उठा रहे हैं।

साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद महज वोट बटोरने वाली राजनीति नहीं, पूँजीवादी ढाँचे में इसकी भूमिका कहीं बड़ी और ख़तरनाक होती है

अक्सर साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद को इन अर्थों में लिया जाता है-

इस साल

दंगा बहुत बड़ा था

ख़ूब हुई खून की बारिश

अगले साल अच्छी होगी

फसल मतदान की—

यह बात अपने आप में सही है, मगर यहीं तक रुक जाना साम्प्रदायिकता और फ़ासीवाद की जोड़ी की भूमिका को बहुत छोटा कर देखना होगा। इसकी भूमिका पूँजीवादी ढांचे के अंदर कहीं बड़ी है। फ़ासीवाद पूँजीवादी ढांचे के अंदर ‘खूंटे से बंधे कुत्ते’ की तरह होता है जिसकी जंजीर पूँजीपति वर्ग के हाथों में रहती है। पूँजीवादी ढांचे के अंदर इसकी मौजूदगी लगातार बनी रहती है। जैसे ही पूँजीपति वर्ग के लिए सत्ता के दूसरे रूपों जैसे संसदीय जनवाद के द्वारा लोगों पर अपना नियंत्रण रखना और पूँजीवादी लूट को जारी रखना असंभव हो जाता है उसी समय फ़ासीवाद का क्रूर खंजर वक्त के अँधेरे कोनों से निकल के सामाजिक रंगमंच पर आ प्रकट होता है और अपने आकाओं, वित्तीय पूँजी की सेवा में मेहनतकश लोगों पर टूट पड़ता है।

पूँजीवाद के विकास के साथ सामाजिक दौलत कुछ हाथों में केंद्रित होती जाती है और मजदूरों, किसानों और निम्न-मध्यवर्ग की बड़ी आबादी की हालत बद से बदतर होती चली जाती है। फिर जैसे ही पूँजीवाद के ‘बूम’ का समय (जो आजकल पूँजीवादी ढांचे के लिए बीती बात हो गयी है, अब तो मंदी से थोड़ी राहत को ‘अच्छा वक्त आ गया है’ कहकर बुर्जुआजी खुद को सान्त्वना दे लेती है) खत्म होता है, मजदूरों, किसानों और निम्न-मध्यवर्ग की हालत और तेजी से खराब होती है। परिणामस्वरूप एक तरफ जहाँ मजदूरों की बड़े पैमाने पर छंटनी होती है और उनमें बेरोजगारी तथा भुखमरी फैलती है, वहीं मध्यवर्ग को भी अपना अंत समय नजदीक दिखाई देने लगता है। उसके छोटे मोटे कारोबार बंद होने, नौकरी जाने और महंगाई के बढ़ने के कारण उसके लिए भयंकर तबाही आती है और यह वर्ग छटपटाता है। लोगों के भीतर सामाजिक ढांचे के खिलाफ गुस्सा, बेचैनी और बगावत की भावना फैलने लगती है। ऐसे समय में अगर लोगों को सही अगुवाई मिलती है तो क्रान्ति की संभावना भी पैदा होती है। यही वह समय होता है जब राज्य करने वाले वर्ग के लिए परम्परागत तरीकों से लोगों पर हुकूमत करना संभव नहीं रहता और उसके पास फ़ासीवाद के पैरों में गिरने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता क्योंकि जहाँ एक तरफ फ़ासीवाद वित्तीय पूँजी का पक्का सेवक होता है, वहीं उसका समाज के अलग-अलग तबकों में व्यापक आधार भी होता है, खास तौर पर मध्यवर्ग और किसानों में और कुछ हद तक मजदूरों में भी। फ़ासीवाद एक लहर की तरह आगे बढ़ता है। फ़ासीवाद पूँजीवादी लूट और इसकी मुनाफे की अंधी हवस से जन्मे हुए संकट के कारण पैदा हुई बेरोजगारी, और भुखमरी के लिए समाज के किसी एक तबके को, जो आम तौर पर नस्ली या धार्मिक अल्पसंख्यक होता है, को समस्याओं का असली कारण बनाकर पेश करता है, लोगों में इनके खिलाफ पूरी ताक़त से हमला करने के लिए प्रचार करता है और उदाहरण पेश करने के लिए कुछ वारदातों को अंजाम देता है। ये लोगों को संकट से राहत के लिए चमत्कारी तरीके सुझाता है जिसमें लोगों को बहुत कुछ करने की ज़रूरत नहीं होती और ऐसे ही तरीके मध्यवर्ग और किसानों को सब से ज्यादा भाते हैं। देश के पुराने समय की महानता का , खास धर्म, नस्ल या जाति के संसार के सर्वोत्तम मनुष्य होने का, पड़ोसी मुल्कों से देश की सुरक्षा को ख़तरे का, युद्ध का गुणगान, देश भक्ति का तीखा और लगातार तेज प्रचार फ़ासीवाद का मुख्य हथियार होता है। फ़ासीवाद के रावण की तरह दस सिर होते हैं और लोगों को अपने असली एजेंडे के बारे में कुछ भी समझ न आने देने के लिए हर मुंह से अलग-अलग राग अलापना उसका आम तरीका होता है। विरोधियों को अपने भाड़े के गुंडों द्वारा ठिकाने लगाना हर फ़ासीवादी पार्टी और उसके संगठनों के मुख्य लक्षणों में से एक है, अक्सर ऐसे हमले मध्यवर्गीय निराश, बेरोजगार नौजवानों को बहुत बहादुरी भरे कारनामे दिखाई देते हैं और वो फ़ासीवादी गुंडा गिरोहों के रंगरूट बनते हैं। फ़ासीवाद लगातार यह कूक-पुकार लगाता है ‘देखो काम तो हम करते हैं बाकी सब मीटिंगे करते हैं, बयान देते हैं और देश को, धर्म को नुकसान पहुँचाने की साजिशें करते हैं और दूसरे देशों के इशारों पर नाचते हैं’। फ़ासीवाद खुद को संकट से निजात दिलाने वाली एक ताक़त बनाकर पेश करता है और अपने हक में व्यापक जनमत बना लेता है जिसमें पूँजीपतियों के कब्जे वाला मीडिया, अखबार, टीवी, और अब इंटरनेट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे समय में अगर कोई लोकहित वाली राजनीतिक धारा मौजूद नहीं है, कमजोर है या भ्रष्ट होकर रास्ते से भटक चुकी है तो फासीवाद आसानी से लोगों को अपनी जकड में ले लेता है, और फिर शुरू होता है जुल्म और मौत का तांडव। सत्ता हासिल करने से पहले मुख्य निशाना अल्पसंख्यक समुदाय बनते हैं, और जैसे ही फ़ासीवादी सत्ता संभालते हैं अपने असली रूप में आ जाते हैं। अब इनके निशाने पर किसान और मध्यवर्ग समेत दबे-कुचले मेहनतकश तबके और पूँजीवादी लूट, दमन का विरोध करने वाली ट्रेड यूनियनें और राजनीतिक नेता, बुद्धिजीवी लेखक और कलाकार होते हैं। फ़ासीवाद वित्तीय पूँजी की सेवा करते हुए पूँजीवाद का विरोध करने वाली हर आवाज, हर साँस का गला दबाने के लिए गुंडा टोलियों, राज्य की फौज, पुलिस का इस्तेमाल करता है और देश का कोना-कोना इंसानी खून से रंग देता है। बेशक तब फ़ासीवाद का सामाजिक आधार बनने वाले मध्यवर्ग और दूसरे तबकों को असली खेल समझ में आता है लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी होती है, अब उनके पास खुद फ़ासीवादी कुत्तों की खुराक बनने या घरों में छुप कर पूजा-पाठ करने और दरवाज़े-खिड़कियों के सुराखों के बीच से गलियों में चलती कत्लो-गारत देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता।

फ़ासीवाद के उभार के ऐतिहासिक कारक - 

पूँजीवादी ढांचे का संकट फ़ासीवाद के उभार और उसके सत्ता में आने के लिए ज़रूरी शर्त तो है ही, पर कुछ ऐतिहासिक कारक हैं जो किसी खास देश में ऐसा होने में अहम भूमिका अदा करते हैं। पहला है, पूँजीवादी विकास और जमीन्दारी उन्मूलन किसी क्रान्ति का परिणाम न होकर एक ऊपर से थोपे गए क्रमबद्ध चरणों का परिणाम होता है जिसके कारण बुर्जुआजी द्वारा समाज के अंदर जनवादी मूल्य-मान्यताओं को फैलाते हुए सामन्ती मानसिकता और धर्म का दबदबा तोड़ने का जो ऐतिहासिक कार्य करना होता है वो नहीं हो पाता। इस कारण पूँजीवाद आपनी बीमारियाँ लेकर आता है। वही पुरानी सामन्ती बीमारियाँ समाज में बनी रहती हैं जिसके चलते फ़ासीवादी विचारों के तेजी से जड़ जमाने की जमीन तैयार होती है। दूसरा है, पूँजीवाद का तेज विकास जो समाज में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को बहुत तेज कर देता है, एक मध्यवर्ग जो किसी भी तरह की जनवादी चेतना से विहीन होता है, तेजी के साथ पैदा होता है और उसी तेजी के साथ बर्बाद होता है। किसानी में यही हाल होता है, छोटे और मध्यम किसान वर्ग किसी क्रान्ति के जरिए नहीं, बल्कि बुर्जुआजी के अपने हित में किये गए भूमि सुधारों के कारण कुछ जमीन के टुकड़े हासिल करते हैं पर पूँजीवाद का विकास उससे यह टुकड़ा छीन लेता है और उसको सड़क पर आने या मजदूरी करने के लिए मजबूर कर देता है। ऐसे में किसान अपने पुराने ‘सुनहरे युग’ कि कल्पना करता है, बेशक ऐसा युग कभी नहीं था। इतना ज़रूर था कि वो कभी सुखी, कभी दुखी रहकर अपने परिवार का पेट पाल लेता था। इसके साथ ऐसे देशों में सामन्ती भूमिपतियों या सामन्ती भूमिपतियों से पूँजीवादी भूमिपति बने बड़े जमींदारों का एक तबका समाज में मौजूद होता है जो हद दर्जे का पश्चगामी और जनवाद तथा क्रान्ति का विरोधी होता है। ये भूमिपति औद्योगिक तथा वित्तीय पूँजी के साथ अपने विरोधों के बावजूद फ़ासीवाद को वित्तीय मदद और गुंडों की टोलियाँ उपलब्ध करवाते हैं और बड़े पूँजीपति वर्ग के साथ ही फ़ासीवाद का जबरदस्त आधार बनते हैं।

तीसरा है, किसी भी क्रन्तिकारी ताक़त का मौजूद न होना या फिर कमजोर होना जो ऐसे समय में प्रचार-प्रोपेगंडा करते हुए संकट के असली कारणों और उसके निदान के बारे में लोगों के बीच जाती हैं, समाज के उन वर्गों को जो क्रान्ति की ताक़तें होती हैं लामबंद और संगठित करती हैं तथा ढुलमुल तबकों को प्रभावहीन करते हुए पूँजीवाद को पलटने के किये आगे बढ़ती हैं। चौथा है, संशोधनवादी पार्टियों की मेहनतकशों के साथ गद्दारी और लोगों को क्रान्ति के लिए तैयार करने की बजाय उनकी तनख्‍वाहों, उजरतों में चवन्नी-अट्ठन्नी की बढ़ोतरी करवाने की लड़ाई लड़ते रहना। इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के जिस देश में फ़ासीवाद का उभार हुआ है और ये सत्ता पर काबिज हुआ है वहाँ के संशोधनवादियों की ऐसी नीतियों का फासीवादियों ने फायदा उठाया और उनको आम लोगों से अलग कर दिया, यहाँ तक कि उनको लोगों की नज़रों में देश का दुश्मन साबित कर दिया। यही सब कुछ भारत में भी हो रहा है। भारत के भाकपा, माकपा और लिबरेशन ब्रांड के “कम्युनिस्ट” यही कुछ कर रहे हैं। लोगों में काम के नाम पर ये सरकारी कर्मचारियों के लिए तनख्वाह कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने, मजदूर इलाकों में फैक्ट्री मालिकों के लिए दलाली करने, हर साल-छमाही के बाद देश स्तरीय हड़ताल का ‘स्टेज-शो’ करने, साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर काँग्रेस तथा अन्य बुर्जुआ पार्टियों से मिलकर ‘साझा मोर्चा’ बनाने और कभी-कभी काँग्रेस से दूर होकर ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने का नाटक करने और बुर्जुआ राजनीति की तरह घटिया संसदीय जोड़-तोड़ करके वोटों का जुगाड-पानी करने के सिवा कुछ नहीं करते। आम लोगों को शिक्षित करने, राजनीतिक चेतना देने और इस काम के लिए प्रचार करने का काम न तो इन्होंने किया है और न ही भविष्य में इसकी कोई संभावना है क्योंकि अब ये क्रान्ति से उतना ही दूर हैं जितना गंदे पानी में उगी हुई ‘जलकुंभी’ से खुशबू।

हमें समझ लेना चाहिए कि फ़ासीवाद का मुकाबला इंडिया गेट पर या शहर के किसी खास चौक पर दो चार मोमबत्तियाँ जलाकर, “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” जैसे उपदेशों से, साल-दो साल बाद सेमिनार, गोष्ठी, मुशायरा करके, तनख्वाहों-उजरतों में बढ़ोतरी की लड़ाईयाँ लड़कर नहीं होगा और न ही फ़ासीवादी दानव ‘इसको गुस्सा न करें’, ‘इसको मत ही छेड़ो’ जैसी बिल्ली को देख कर कबूतर के आँख बंद कर लेने जैसी डरपोक किस्म की सुरक्षात्मक हरकतों से पीछे हटने वाला है क्योंकि फ़ासीवादी गुंडे जब दस्तक देंगे तो वह नहीं सुनने वाले कि ‘हम ने तो कभी आप के विरुद्ध कुछ नहीं कहा’, हाँ वो ऐसी कायरता पे हँसेगे ज़रूर। फ़ासीवाद के मुकाबले के लिए इसके उभार के कारणों को समझते हुए लोगों में लगातार, घना और तीखा प्रचार करना होगा। फ़ासीवादियों के इतिहास और वर्तमान से संबंधित हर झूठ को नंगा करना होगा और साथ ही पूँजीवाद के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ढांचे के तार-तार को उधेड़ कर लोगों के सामने इसे नंगा करना होगा। फ़ासीवाद के असल एजेंडे के बारे में लोगों का भ्रम तोड़ना होगा और उन्हें इसके बौद्धिक और सांस्कृतिक हमले का मुकाबला करने के लिए ज़रूरी ज्ञान और चेतना से लैस करना पड़ेगा। इस के लिए लगातार पर्चे, पैम्फ्लेट बाँटना, सेमिनार, गोष्ठियों, सभाओं का आयोजन करना, इतिहास और वर्तमान से संबंधित फ़ासीवादी झूठों को बेनकाब करते लेखों को लोगों की भाषा में उन तक पहुँचाना, नाटक, फिल्मों और गीत-संगीत के जरिए लोगों को फ़ासीवाद के कारनामों से रूबरू करवाना होगा। ऐसा समाज के हर तबके में जाकर करना होगा। लोगों की आर्थिक और राजनीतिक लड़ाई की अगुवाई और सुधार कामों से फ़ासीवादियों को बाहर करना होगा तथा लोगों को फ़ासीवाद के खिलाफ सड़कों पर होने वाली लड़ाई के लिए तैयार करना होगा। समाज के नौजवानों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों को इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को समझते हुए लोगों के बीच जाना, उन के साथ एक होने की हिम्मत करनी पड़ेगी। साथ ही यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि मजदूर वर्ग की शक्तिशाली एकता के बगैर फ़ासीवाद का प्रभावशाली तरीके से मुकाबला करना संभव नहीं है, इसलिए मजदूर वर्ग को सचेत करना तथा इसकी एकता कायम करना फ़ासीवाद के खिलाफ लड़ाई में फैसलाकुन भूमिका निभाएगा। अगर समाज को आगे ले जाने वाली ताक़तें सही समय तक अपनी ताक़त जुटा लेती हैं, सही रणनीति तैयार कर लेती हैं तो फ़ासीवाद के लिए आगे बढ़ना इतना आसान भी नहीं होगा और उसकी हार की संभावनाएं बढ़ जाएँगी, नहीं तो वही होगा जिसकी चेतावनी हिटलर के जमाने में जर्मनी के एक पादरी पास्टर निमोलर ने दी थी-

पहले वे यहूदियों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वे ट्रेडयूनियन वालों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था

फिर वे कम्युनिस्टों के लिए आए

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नही था

फिर वे मेरे लिए आए

और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए बोलता…….

वे फिर आ रहे हैं। फ़ासीवादी सक्रिय हैं।


* फ़ासीवाद- एक राजनीतिक रुझान जो पूँजीवाद के व्यापक संकट के समय में पूँजीवादी देशों में उभरा और जिसने साम्राज्यवादी बुर्जुआजी की सब से पिछलग्‍गू और हमलावर शक्तियों के हित प्रकट किये। सत्ता में आया फ़ासीवाद इन ताक़तों की एक खुल्लमखुल्ला आतंकी तानाशाही होता है। फ़ासीवाद की विशेषता हद दर्जे का अन्धराष्ट्रवाद, नस्लवाद और कम्युनिज्म विरोध होता है। जनवाद की तबाही, सामाजिक दंभ का विशाल पैमाने पर प्रदर्शन और नागरिकों के जनतांत्रिक तथा निजी जीवन पर अत्यंत सख्त नियंत्रण होता है। फ़ासीवाद की विदेश नीति प्रसार और हमलावर जंगों की नीति होती है। पहली फ़ासीवादी हुकूमत 1922 में इटली में आई थी। फ़ासीवादी 1933 में जर्मनी में और 1939 में स्पेन में सत्ता में आए। हमारे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस रुझान का प्रतिनिधित्व करता है।

http://www.mazdoorbigul.net/Fascist-forces-are-playing-dangerous-game