Tuesday, 26 November 2013

लम्पट सर्वहारा - गिरिजेश



प्रश्न : 'लम्पट सर्वहारा' क्या है ?
उत्तर : मैंने जितना मार्क्सवाद को पढ़ा और समझा है, उसके अनुसार किसी व्यक्ति में सर्वहारा वर्ग की पृष्ठभूमि होना एक चीज़ है और सर्वहारा वर्ग की चेतना होना दूसरी चीज़. दोनों ही चीज़ें एक ही व्यक्ति में हों - यह भी ज़रूरी नहीं है. 

सर्वहारा की वर्गीय चेतना से लैस व्यक्ति किसी भी वर्गीय पृष्ठभूमि का हो सकता है, वह अपने को डी-क्लास करके सर्वहारा वर्ग के संघर्ष का वर्गचेतन योद्धा बन सकता है. उसका मोर्चा कोई भी हो, उसकी उपयोगिता आन्दोलन के लिये महत्वपूर्ण होती है और उसका योगदान उसके लिये सम्मानप्रद होता है. इसके अगणित उदहारण राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन में बिखरे पड़े हैं. 

वहीं सर्वहारा वर्ग में जन्म लेने वाले भी असंख्य लोग ऐसे हैं, जिनको किसी भी तरह से जल्दी से जल्दी ख़ुद अपने और अपने परिजनों के लिये सारी सुविधाएँ जुटा लेने की हाही मची रहती है. उनमें से कुछ पेशेवर अपराधियों के गिरोह में भर्ती होना चाहते हैं, कुछ तरह-तरह की झप्सटई करके अमीर बनने की कोशिश करते हैं, कुछ रंग-बिरंगी पार्टियों के नेताओं के छोटे-बड़े चमचे और थाने-कचहरी के दलाल बन जाते हैं, तो कुछ घूसखोर अधिकारी बनने के लिये रात-दिन एक किये रहते हैं. वे ख़ुद को बेचने के चक्कर में मौका ताड़ते रहते हैं. अपने लक्ष्य और दृष्टिकोण में वे पूरी तरह से पूँजीवादी होते हैं. और तय है कि उनकी प्रतिभा और क्षमता को प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न रूप में खरीदने वाला वर्ग केवल सम्पत्ति ही नहीं, कुछ अक्ल भी रखता ही है. 

इनमें से कुछ तत्व क्रान्तिकारी आन्दोलन की कतारों में भी घुस जाते हैं. महान लेनिन द्वारा ऐसे तत्व ही क्रान्तिकारी आन्दोलन के 'भीतरघातिये' और 'उकसावेबाज़' कहे गये हैं. इनको ही 'लुम्पेन प्रोलेतारिया' कहा जाता है. ये क्रान्तिकारी होने का सफल अभिनय तो करते रहते हैं, परन्तु ये किसी भी तरह से प्रतिबद्ध क्रान्तिकारी नहीं होते. मूलतः ये केवल अवसरवादी होते हैं. मजदूर वर्ग के आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इनकी कोई भूमिका नहीं होती. इसके उलटे ये मजदूर वर्ग के आन्दोलन के भीतर तरह-तरह से तोड़फोड़ करके शोषक वर्गों के निहित हितों को मूर्तमान करने में लगे रहते हैं. 

लम्पट सर्वहारा तत्व बार-बार तरह-तरह से षड्यन्त्र करते रहते हैं और आन्दोलन को नुकसान पहुँचाते रहते हैं. अपने सर्वहारा परिवार में जन्म लेने की वर्गीय पृष्ठभूमि के बावज़ूद अपने स्वार्थी चरित्र के चलते ये सत्ता और व्यवस्था पर काबिज़ जनशत्रुओं के जी-हुज़ूरिये और वेतनभोगी चाकर होते हैं. ये उन तक आन्दोलन से सम्बन्धित महत्वपूर्ण और गोपनीय सूचनाएँ सही समय पर पहुँचाते रहते हैं. ये आन्दोलन के नेताओं को गिरफ्तार करवाने में या उनकी ह्त्या करने में सक्रिय भूमिका अदा करते हैं. ये आन्दोलन को विपथगामी करने में भी आगे बढ़ कर अपनी सक्रियता प्रदर्शित करते हैं. दुश्मन से मिल सकने वाले पुरस्कार का लालच ही इनसे कुल्हाड़ी के पीछे लगी डेढ़ हाथ की लकड़ी की भूमिका अदा करवाता है और ये समूचा जंगल धराशायी करने वाले गद्दार बन जाते हैं.

शोषण पर टिकी जनविरोधी व्यवस्था को बनाये रखने में अपनी सहायक भूमिका के चलते ये व्यवस्था के कार्य-पालिका, विधायिका, न्याय-पालिका और मीडिया के साथ पाँचवे खम्भे के रूप में काम करते हैं और इनको 'पंचमांगी' कहते हैं. ये आस्तीन के साँप केवल "घीसू-माधो" की तरह अमानुषीकरण के शिकार नहीं होते. इनके 'व्यक्तित्व का विखण्डन' नहीं हुआ रहता. ये सचेत गद्दार होते हैं. इनको अपने किये पर कोई अफ़सोस नहीं होता. उलटे अपनी मोटी खाल के चलते ये पूरी तरह से बेहयाई पर अमादा होते हैं. 

“जब वामपन्थी पार्टियाँ मशहूर हो जाती हैं और ख़ास कर जब सत्ता में स्थान बना लेती हैं, तब उन्हें भी, मजदूर और किसान आन्दोलन की तरह, सबसे बड़ा खतरा इन्ही लुम्पेन सर्वहारा से होता हैं. और वामपन्थी पार्टियों का ख़ात्मा ये ही करते हैं. सी.पी.आई. और सी.पी.एम. को इन्हीं से बचना चाहिए था. सोवियत यूनियन को भी इन्हीं ने ख़त्म कर डाला. असली वामपन्थी पीछे छूटते गये और अवसरवादी वामपन्थियों ने कहीं ज़्यादा ज़ोर से वामपन्थी नारे लगा कर आगे आते चले गये. सर्वहारा को वह वर्ग मान कर लिखा गया है, जिसके पास उत्पादन के साधन न हों. सत्तर साल की अवधि में सोवियत-संघ में सभी इसी कटेगरी में आ गये थे. उन मौकापरस्तों को बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ होते देखा है. जो दिल से वामपन्थी नहीं थे, पर इतनी ज़ोर से वामपन्थी नारे लगाते थे कि कई वामपन्थी फ़ीके नज़र आते थे और धीरे-धीरे नेपथ्य में विलीन हो जाते थे. वही हाल यहाँ भी हुआ.” – Reena Satin

केवल क्रान्तिकारी नेतृत्व की सक्रिय और सतर्क निगरानी ही ऐसे तत्वों की 'पर्जिंग' कर सकती है. 
(सौजन्य - साथी Tiwari Keshav )

Sunday, 24 November 2013

IS "EVERY THING FAIR IN LOVE AND WAR" ?


dear friend,
one of my nearest and dearest friends gave the statement -
"every thing is fair in love and war."
i don't agree with the thought of every thing being fair.
either in love or in war how can every thing be fair?
what ever is fair is fair always,
and what ever is foul is always bound to be foul.
in love we love the fair aspects of the personality,
whom we love.
and in war even we condemn the foul deeds
done by either our friends or our enemies.
the inhuman ideas and acts can never be glorified.
a cheat is always a cheat.
a fraud is always a fraud.
and even any lie can never be the truth.
we can appreciate
only the fair, human and just stands and deeds
of both our friends and enemies.
mercy is always respected
and cruelty is always hated.
to forget and forgive is more valuable than any revenge.
to adjust, avoid and tolerate is necessary
for co existence.
to expect from others
is only an indication of
our own performance of the same level.
and destruction is never valuable than creation.
only creation is always valuable than destruction.
what is your opinion ?
with love - your's girijesh

एक नयी शुरुवात : मित्र के आरोप का सार-संकलन - गिरिजेश

"तोड़ो बंधन, तोड़ो....
ये अन्याय के बन्धन...."
प्रिय मित्र, मेरा अनुरोध है कि आप भी मुक्त मन से एक बार फिर से मेरा मूल्यांकन कर लें. कहीं ऐसा न हो कि आपको भी मेरे बारे में बाद में अफ़सोस हो कि आपने मेरे जैसे ग़लत इन्सान को अपने इतना क़रीब आने दिया और मेरे बारे में पूरा सच न जानने के कारण तब तक भ्रम में रहे.

अब मेरे पास अपने लिये ये विशेषण भी हैं - 
"सबसे बड़ा अवसरवादी, जातिवादी, बहुत बड़ा दोगला " 

हर कमज़ोर इन्सान बहुत जल्दी पूर्वाग्रहग्रस्त हो जाता है और फिर तर्क देने के बजाय केवल गालियाँ देने के स्तर पर उतर आता है. कमज़ोर इन्सान गालियाँ देते समय यह भी भूल जाता है कि सामने वाले ने उसके लिये कब-कब, कैसे-कैसे और क्या-क्या किया, कितने मौकों पर उसके बारे में बहुत कुछ जानते हुए भी उसके अत्याचार के हद से बढ़ जाने पर भी सब कुछ सहन करते हुए उसके साथ अपने सम्बन्ध का निर्वाह करता गया. उसके अन्दर सच कहने का साहस नहीं होता. मगर सच तो सच है. वह तो अन्ततोगत्वा पूरी तरह से हर पर्दा फाड़ कर सामने आता ही है. और फिर इस तरह उसके 'सच' के पूरी तरह केवल 'गालियों' के रूप में सामने आते ही उसकी अभिनय भरी, लम्बी और नकली कहानी ख़त्म हो जाती है. 

मजबूत इन्सान तर्क और तथ्यों के सहारे धीरज से अपनी बात कहता है और फिर पूरा समय ले कर सार-संकलन कर लेता है. फिर भी हर इन्सान के लिये स्पेस बचा कर रखता है. वह हर-हमेशा एक नयी शुरुवात करने के लिये तैयार रहता है.

आज फिर ऐसी ही एक 'कहानी' पर कम से कम तब तक के लिये पूर्ण-विराम लग गया, जब तक सामने वाले को अपनी गलती का एहसास हो जाये और फिर से वहीँ से वह बात शुरू करने के लिये तैयार हो, जहाँ आ कर टूटी है और पूरी ईमानदारी से अपने पूर्वाग्रहयुक्त वक्तव्य के लिये स्पष्ट शब्दों में माफ़ी माँग कर अपनी पहल ले....

इस मोड़ पर पहुँच कर अब तक छटपटाता रहने वाला मेरा मन एक बार संतुष्ट है.
बहुत दिनों से जारी एक और त्रासदी का अन्त हो गया. 
बहुत दिनों से अन्दर बैठी एक और तथाकथित 'अपनेपन' की मारक पीड़ा से आज मुक्ति मिली. 
इस मुक्ति के लिये भी उस 'मित्र' का ही आभार व्यक्त करना चाहता हूँ...
आपसे अब तक मिले आपके स्नेह और सम्मान के लिये आपके प्रति आभारी हूँ. 
आपका गिरिजेश

आरोप एक मित्र का - गिरिजेश

प्रिय मित्र,
मैत्री किसी के समर्थकों और विरोधियों की गिनती करके नहीं की जाती.
उसके अपने सद्गुणों के चलते हो जाया करती है.
अपने सभी मित्रों से मुझे आजीवन हर सम्भव सहायता मिलती रही है.
मैं अपनी ज़िन्दगी में आज तक जो कुछ भी कर सका, उसके लिये मैं अपने सभी मित्रों की सकारात्मक भूमिका के लिये उनका आभारी हूँ.
मेरे लिये जितना सम्भव था, मैं जहाँ तक कर सका, मैंने भी मैत्री-निर्वाह में अपनी सीमित शक्ति भर यथा-सम्भव अपने कर्तव्य का निर्वाह किया ही है.
मेरा एक मित्र अपने विरोधियों के षड्यन्त्र के घेरे में फँस गया. मैंने अपने मित्र की विपत्ति में उसका पक्ष लिया.
उसने कभी मेरे साथ सम्मानजनक व्यवहार किया था, मेरी मुहिम में मेरा साथ देने का आश्वासन भी दिया था.
मगर ज़िन्दगी की मार के चलते वह विपत्ति का शिकार हो गया.
किसी का भी मूल्यांकन वस्तुगत तथ्यों के सहारे तर्कपूर्वक किया जाना चाहिए.
तभी सटीक सार-संकलन सम्भव है.
अन्यथा आत्मगत होने और पूर्वाग्रहग्रस्त होकर चूक करने की पूरी सम्भावना बनी रहती है.
अभी कुहासा छंटा भी नहीं कि जिसके चलते उससे परिचय हुआ था, उस मित्र का आज यह सन्देश मिला -

"अफ़सोस है मुझे आप पर समझ में नहीं आ रहा हंसू या रोई अपने आप पर सच कहूँ तो दुनिया में आपसे बड़ा अवसर वादी नहीं देखा मैंने...."

इसके पहले भी मेरे सामने हिम्मत से सच बोलने के बजाय पीठ पीछे आरोप लगाने, आक्षेप करने वाले और उपहास करने वाले अनेक मित्रों ने मुझे ज़िन्दगी में पर्याप्त यन्त्रणा दी है.
बिना स्पष्ट शब्दों में अपने आरोप के बारे में तर्क दिये या बिना तथ्य बताये केवल मुझ पर तड़ाक से तरह-तरह के आरोप लगा देने की आतुरता के चलते बार-बार अनेक मित्रों को मैंने ज़िन्दगी में अपने साथ इस तरह का अन्याय करते और फिर पीछे छूटते पाया है.
ऐसे कुछ मित्रों का आहत मन से पूरी तरह चुप लगा जाना और बिलकुल ही न बोलना तो मेरे लिये भीषण रूप से त्रासद है ही.
मगर संध्या-भाषा में बोलना तो और भी त्रासद है.
क्या इस तरह के आरोप लगाने वालों को खुल कर अपने हिस्से का सच नहीं बोलना चाहिए.
उनके साथ बिताये गये सुखद समय को भी याद करने पर और भी पीड़ा होती है.
ऐसी हालत में मुझे यह गीत याद आ रहा है.
क्या ऐसी वेदना से आपका भी साबका पड़ा है !
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश
https://www.youtube.com/watch?v=ql_EnCTgjdU

मार्क्स की दृष्टि, गाँधी की क्षमता, अम्बेदकर का स्वाभिमान – गिरिजेश



क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास का सवाल : 
प्रिय मित्र, महात्मा गाँधी का स्वयं को पीड़ा देकर आत्म-शुद्धि करने, बार-बार अनशन करने और शत्रु का हृदय-परिवर्तन करने का प्रयास करने का सिद्धान्त न तो उनके जीवन-काल में सफल हो सका और न ही अन्ना-आन्दोलन में अन्ना और उनके अनुयायियों द्वारा किये जाने वाले आमरण अनशन के रूप में राज-सत्ता के चरित्र पर कोई सकारात्मक प्रभाव डाल सका. गाँधी जी का भी उपनिवेशवादी सत्ता ने भरपूर सम्मान किया. परन्तु अन्ततोगत्वा हर बार लागू वही हुआ, जो अंग्रेज़ चाहते थे. वह कभी भी नहीं लागू हो सका, जो गाँधी जी अपनी विनम्रता और ईमानदारी के साथ चाहते रहे. अन्ना का भी देश की वर्तमान सत्ता ने ख़ूब सम्मान किया. मगर जब लागू करने का वक्त आया, तो वही लागू किया, जो अन्ना-आन्दोलन के हर तरह के हर बार के अनुरोध के विरुद्ध था और सत्ता और टीम-अन्ना के बीच के समझौते में नहीं था, बल्कि धूर्त सत्ताधारियों के निहित स्वार्थों के हित में था. 

स्पष्ट है कि गाँधीवाद के जनदिशा में किये जाने वाले तरह-तरह के प्रयोग आज़ादी की लड़ाई में भी और अन्ना-आन्दोलन में भी जन-जागरण के लिये तो उपयोगी हैं. वे विराट जन-आन्दोलन खड़ा करने में तो समर्थ हैं. परन्तु वे जन के हित में खड़ा हो चुके जनान्दोलन के परिणाम के तौर पर अन्तिम सकारात्मक और सफल निर्णय करने-कराने में हर-हमेशा विफल और असमर्थ रहे हैं. ऐसे में राष्ट्र-हित के प्रति प्रतिबद्ध युवाओं के मन में गाँधी और अन्ना दोनों के प्रति सम्मान तो भरपूर रहा है. किन्तु उनका गाँधी और अन्ना के पथ से मोह-भंग होना भी पूरी तरह से स्वाभाविक रहा. और वह मोह-भंग बार-बार हुआ भी. ख़ुद अरविन्द केजरीवाल को अन्ना का केवल जन-आन्दोलन का गाँधीवादी पथ छोड़ कर ‘आम आदमी पार्टी’ बनाने और चुनाव लड़ने का निर्णय लेना पड़ा. और विवशता में स्वयं अन्ना को भी आज तक उनके विरुद्ध बार-बार अलग-अलग मुद्दों पर अपना वक्तव्य देते जाना पड़ रहा है. 

ऐसे में दिख रहा है कि वर्तमान जनविरोधी ‘वैश्विक गाँव’ में पूँजीवादी व्यवस्थाजनित हमारी सभी तरह की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-मानसिक समस्याओं का समाधान करने में केवल मार्क्स के वर्गीय सामाजिक विश्लेषण पर आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सिद्धान्त ही कारगर होने जा रहा है. क्योंकि हमारा समाज बना तो है परस्पर विरोधी हितों वाले विभिन्न वर्गों से ही. और वर्गीय समाज में हर वर्ग के सदस्य का अपने-अपने वर्गीय हित के अनुरूप ही चिन्तन और आचरण सम्भव है. और उसके अनुरूप ही उनके परस्पर स्वार्थों के टकराने पर होने वाले हर स्तर के संघर्ष में दोनों पक्षों द्वारा अपने कदम उठाने की अपेक्षा की जा सकती है. अभी तक का क्रन्तिकारी आन्दोलन मूलतः केवल सशस्त्र संग्राम का ही हिमायती रहा है. और कम से कम भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के पिछले चार दशकों की विफलता इस सार-संकलन के लिये पर्याप्त और साक्षी है कि केवल सशस्त्र संग्राम की कार्य-दिशा अभी तक सफल नहीं हो सकी है. और न ही निकट भविष्य में उसके सफल होने के कोई आसार ही दिख पा रहे हैं. क्योंकि वह अब तक भी आक्रामक नहीं, केवल आत्मरक्षात्मक युद्ध लड़ने के लिये बाध्य है. और महान माओ ने विश्व-क्रान्ति के योद्धाओं को सिखाया था कि केवल आक्रमण ही सबसे अच्छा सुरक्षात्मक कदम होता है. महान लेनिन ने क्रान्तिकारी आन्दोलन के उग्रवादी अतिवामपन्थी विचलन को “बचकाना मर्ज़” कहा था.

लेनिन ने इसके साथ ही पूँजीवादी संसद को “सूवर-बाड़ा” कहा था. क्रान्तिकारी आन्दोलन के चुनाववादी विचलन को उन्होंने दक्षिणपन्थी भटकाव बताया था. अरविन्द केजरीवाल जिस संसदीय सुधारवाद के पथ पर बढ़ने जा रहे हैं. उस पर चलने वाली इस देश की सी.पी.आई. और सी.पी.एम. जैसी संसदीय मार्क्सवादी पार्टियों के अनुभव हमें दशकों से साफ-साफ़ दिखा चुके हैं कि क्रान्ति का पथ छोड़ कर केवल चुनाव के चक्कर में लग जाने पर उनके भी नेताओं के साथ ही कार्यकर्ताओं के भी वैचारिक और सांगठनिक स्तर को अधोगति का शिकार होना पड़ा है. इस तरह पूँजीवादी जनतन्त्र में केवल संसद के गलियारों की परिक्रमा करने से भी बुनियादी सामाजिक परिवर्तन असम्भव है. क्योंकि लूट पर टिकी इस व्यवस्था में निहित स्वार्थों वाले वर्ग अपने पाले में आने वाले क्रान्तिकारी दलों को भी अपने जैसा ही बना डालते हैं. वे उनसे बार-बार तरह-तरह के समझौता और समर्पण करवाते रहते हैं. और वे लगातार ख़ुद भी इस भ्रम में रहते हैं और अपने ईमानदार कार्यकर्ताओं को भी इसी भ्रम में जिलाने का प्रयास करते रहते हैं कि वे जन के हित मंे सत्ता और व्यवस्था के सामने एक के बाद एक लगातार अपने ये समर्पणकारी कदम उठाते जा रहे हैं. ऐसे में संसदीय विचलन के रास्ते पर भी चल कर पूरी मेहनत और ईमानदारी से प्रयास करने से भी फैसलाकून क्रान्तिकारी समाधान की कल्पना भी आज तक हर तरह से केवल मृग-मरीचिका की मार्मिक त्रासदी ही सिद्ध हो चुकी है. जन-समस्याओं के समाधान की उससे भी तनिक भी उम्मीद पालना हमारा भोलापन ही कहा जायेगा.

इन दोनों विचारधाराओं के अलावा डॉ. अम्बेदकर का दलितवादी चिन्तन भी भारतीय समाज में सक्रिय एक महत्वपूर्ण धारा है, जिसने हमारे समाज के सबसे निचले और सबसे पिछड़े वर्गों के सबसे ग़रीब लोगों के स्वाभिमान के जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. जब हमारे देश का कम्युनिस्ट आन्दोलन केवल चुनाव लड़ने और जीतने के दक्षिणपन्थी भटकाव के चक्कर में फँस कर अपनी सांगठनिक गतिविधियों को धीमा करने लगा, अपने अध्ययन-चक्रों को कम और ख़त्म करने लगा, तो वह अपने साथ जुड़े समाज के ग़रीब-गुरबा लोगों को वैचारिक स्तर पर बौद्धिक ख़ुराक देने में और आन्दोलनात्मक स्तर पर दलित बस्तियों में लोगों को जन-समस्याओं के समाधान के लिये सशक्त तरीके से जूझने के लिये सक्रिय बनाये रखने में पिछड़ने लगा. ऐसे में कम्युनिस्टों से धीरे-धीरे नाउम्मीद हो चुके उन सब लोगों को दलितवादी चिन्तन से भारी सहारा मिला. और फिर दलित बस्तियों से मजदूर-किसानों के लाल झण्डे उतरने लगे और उनकी जगह मायावती की बहुजन पार्टी के नीले झण्डों ने ले लिया. 

ख़ुद अम्बेदकर ने अपने जीवन में मूलतः केवल परम्परागत सामन्ती उत्पीड़न के विरुद्ध दलित स्वाभिमान को जगाने की कामना से अपने समूचे लेखन और सारे आन्दोलन - दोनों ही के स्तर पर पहल लिया था. उनका पूँजीवाद के वर्गीय शोषण का सक्रियता के साथ विरोध करने वाला रूप कभी भी उभर कर सामने नहीं आ सका. इसके विपरीत उन्होंने ‘पूना-पैक्ट’ में गाँधी के सामने आत्म-समर्पण किया और आज़ादी मिलने पर नेहरू के साथ सत्ता में भागीदारी किया. उन्होंने हमारे ‘धनतन्त्र का संविधान’ बनाने में अपनी सक्षम भूमिका का सचेत तौर पर निर्वाह किया. और इसका परिणाम हुआ कि उनका नाम लेकर मायावती जातिवाद की चुनावी शतरंज की बिसात पर सफल हो गयी और अन्ततोगत्वा विराट दलित वोट-बैंक के सहारे अपनी सरकार बनाने तक जा पहुँची और ‘ग़रीब की अमीर बेटी’ बन सकी. मगर ग़रीब आदमी की ग़रीबी की विभीषिका अभी भी वैसी की वैसी ही न केवल बनी हुई है, बल्कि और भी बढ़ती चली जा रही है. वह तो अम्बेदकर के भी रास्ते पर चलने से भी आज तक रंचमात्र भी दूर नहीं हो सकी. हाँ, पूँजी के शातिर खेल के चलते और भी अधिक सूक्ष्म और त्रासद होती चली जा रही है. 

इसके प्रभाव का विस्तार हुआ नवदलितवाद में. नवदलितवादी विचारकों ने श्रम और पूँजी के मूलभूत अन्तर्विरोध के बजाय ब्राह्मणवाद और दलितवाद के बीच के अन्तर्विरोध को भारतीय समाज का सबसे महत्वपूर्ण अन्तर्विरोध बताया. उन्होंने दलितों की समस्याओं के समाधान के लिये उनको वर्तमान वैश्विक सत्य की विभीषिका का साक्षात्कार कराने और उनको साम्राज्यवादी-पूँजीवादी शोषण के विरुद्ध क्रान्तिकारी जन-संघर्षों के लिये तैयार करने की जगह की जगह ढह रही सामन्तवादी परम्पराओं के उत्पीड़न के विरुद्ध ही सचेत करते जाने का काम अभी भी अपना प्रमुख कार्य-भार बना रखा है. वे वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के घेरे के अन्दर ही सत्ता-प्रतिष्ठान में अपने लिये थोडा-सा और बेहतर स्थान बना लेने के लिये स्वयं भी प्रयासरत रहे हैं और इतने भर के लिये ही अपने अनुगामियों को भी प्रेरित करते रहते हैं. हाँ, ब्राह्मणवाद के विरुद्ध अपनी तीख़ी नफ़रत के साथ ही प्रकारान्तर से वे क्रान्तिकारी विचारधारा पर भी पूरी धार के साथ हमलावर हैं. दलित कार्यकर्ताओं की एक कतार ने मार्क्स और अम्बेदकर के बीच से रास्ता निकालने के प्रयास में ‘जय भीम कामरेड’ का नारा दिया है. समन्वय के इस प्रयास को क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी पर्याप्त सम्मान प्राप्त है और ग़रीब दलितों के बीच भी उनका अपना व्यापक प्रभाव है.

भारतीय समाज में मूलभूत परिवर्तन की कामना से समाधानकारी प्रयास में सक्रिय इन तीनों धाराओं के इस विश्लेषण का सार-संकलन करने पर यह पूरी तौर से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन की नेतृत्वकारिणी टोली को मार्क्स की वर्गीय विश्लेषण की पद्धति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा गाँधी की जन-मन को छू सकने और विराट जन-उभार खड़ा कर सकने की क्षमता के साथ ही अम्बेदकर की ‘दलित जन के उत्थान की कामना’ को भी अपना हथियार बनाना होगा. तभी इस देश में जन-क्रान्ति की सफलता का सपना साकार हो सकेगा. न केवल भारतीय समाज के अन्दर परिवर्तन के लिये इन तीनों में से किसी को भी छोड़ कर किया जाने वाला कोई भी प्रयास विफल ही होता रहेगा, बल्कि इन तीनों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का कोई भी प्रयास क्रान्तिकारी जन-दिशा में आन्दोलन का नेतृत्व करने वालों के लिये आत्मघाती होगा. जनपक्षधर शक्तियों की व्यापकतम एकजुटता के लिये सकारात्मक प्रयास करने वाले सभी साथियों की भी यह ही सबसे महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है. 

"शक्ति के विद्युत्-कण जो व्यस्त, 
विकल बिखरे हैं हो निरुपाय;
समन्वय उनका करे समस्त, 
विजयिनी मानवता हो जाये|"
इन्कलाब ज़िन्दाबाद !

—: PRO-PEOPLE SOLIDARITY FORUM :—


[AGAINST EXPLOITATION, OPPRESSION AND COMMUNAL HATRED]
Dear friend, Parallel media is the only platform left to raise genuine issues and disseminate the real fact and honest information to the people and express ourselves as true representative of Indian populace in view of electronic and print media being sold out to obscene greed of power, post and property under pressure of anti-people system and being reduced to propaganda machinery of ruling classes. Friends on facebook have achieved unprecedented success in raising public issues and awareness and in making their voice of protest emphatically and unitedly these days. The unity you showed in busting the fraud of Nirmal Baba, protest again Delhi Rape case and Arrest of Kanwal Bharti and its impact on establishment has lead me and other friends to conclude that facebook can be used as tool of protest even more effectively. But Facebook has a short memory, what is so prominent in morning turns trifle passing through evening. At times, we miss important piece of poetry, essay or an article by friends. Very few articles come to our notice when shared by friends. Then it is possible only those articles to be liked, shared or commented upon.

I feel there is a solution for this problem, if we create a blog named pro-people solidarity forum against exploitation, oppression and communal hatred. There will be links of compositions, articles, national and international news of importance and its analysis with scope for elaborate discussion. Thus a reference place in internet will be there, where one can paste the link of his/her article with an introductory paragraph while writing on his/her own wall or blog.

In an era of information explosion, this medium can allow us to share more and more information keeping in view paucity of time. It is even easy and convenient to use the link there as reference in future.

The friends, who are supposed to lead this move, are responsible. They may decide on themselves. Decision will be taken on basis of consensus or majority as the ease may be. Instead of making a particular person admin, the password will be passed on to group of friends to make it as democratic as far as practicable. It is my opinion to keep the password accessible to maximum possible friends to insure democratic nature of the forum and thus its main purpose will be solved. I feel that some more responsible friends should be included in the team. Too big or too small a team may be problematic. A handful of person may control the decisions if too small a team is made. In a large team while decision-making, we may fight individualism due to which pro-people solidarity has been evasive for decades. This will ensure that no post will be discriminated against by someone due to prejudice or malice. Also, no unwanted element will be able to intoxicate the milieu in this space.

Today, when fascism is knocking at door again, this is the most important task ordained by history on us to get united against conspiracy of shrewd ruling classes and consolidate our efforts for resistance against this along with pro-people friends in this hard time. The collective effort to solve the intricacies of complex social fabric of present is the task ordained by history on us. This duty should be discharged in collective unison. If we succeed in solidarity endeavour, we can strengthen further the voice of resistance. Therefore, it is my humble request to participate actively in this collective initiative to run forum duly and impart it impetus in right direction which is formed for solidarity to combat exploitation, oppression and communal hatred. I have a solemn hope that despite our wide differences on many issues, we will able to be united at these three fronts. I even hope that after success at this stage, ensuing time will transform this into our revolutionary unity.

Please think and take initiative to own responsibility as a responsible member of this revolutionary team. You have to take this responsibility among other daily juggernaut because we cannot leave this would as a culprit of history being ridiculed in eye of coming generations. We expect getting emboldened by your active participation and leadership in this enterprise. 

Please consider the proposal and if you see some fault in it, point out along with your suggestions and rectifications. If you agree on these issues, please discuss about this endeavor with your friends and inform me about the friends whose consent is obtained so that they could be included in this endeavor. I don’t want that any friend or companion should feel dejected and left out after so much of waiting, labor and time devoted to it and whole experiment meets a fiasco before its inception being victim of politics of conceit. Take your time and name someone using your own discretion. So that it can be started with help of all the friends.

Some senior friends want participation of maximum number of friends on national level. For this, it should be translated into regional languages and should be shared. If you or your friend can translate into any language please take initiative for its translation. Such sharing will help in its publicity and dissemination.

One step is taken already. Now this is embarked upon as a blog created by Ashok Kumar Pandey https://www.facebook.com/kalamghasit. Its link ishttp://ppsfin.blogspot.in/2013/09/blog-post_7.html. The co-ordination team members can post directly to the blog. Other friends are requested to send their posts to the blog through email at ppsfindia@gmail.com. This will be a bit inconvenient for you, but there is no way out, it seems to control unwanted posts. Link to email (ppsfindia@gmail.com) of this forum is given at right hand at blog icon for your convenience.

In coming days, we are going to have discussion of two days in a city or take further step in case of exigency. These meetings will make us come closer. Other friends active on facebook or outside facebook standing firmly on pro-people issues can also be invited. We shall try to inform you regarding our future plans and possible happenings, but you too are requested to click the link and visit the blog.
Till now, 340 friends have consented on the project and assured of their active participation.
I salute you with all my humility.
With thanks - Girijesh.

[Translated by Faqir Jay https://www.facebook.com/faqir.jay and edited.]

Monday, 11 November 2013

नेतृत्व का दायित्व और संघर्ष की विविधता का सवाल - गिरिजेश


प्रिय मित्र, परिवर्तनकामी चेतना के वाहकों की किसी भी छोटी या बड़ी टोली के नेतृत्वकारी व्यक्ति के संघर्ष की जटिलता के अनेक पक्ष होते ही हैं. उसको हर क़दम पर अपने निकटस्थ साथियों के साथ वैचारिक द्वंद्व में जूझते रहना होता है. इस द्वंद्व में लगातार उभरते रहने वाले उनके नये-नये तर्कों के टकराने पर अपनी सोच को सही साबित करने की चुनौती उसके सामने बार-बार आती रहती है क्योंकि सतत जारी जीवन और जगत के परिवर्तन की विविधता के चलते नये-नये तथ्यों का सतत उद्घाटन होता रहता है और नेतृत्व को इन नूतन तथ्यों के भी आलोक में पुराने तथ्यों के आधार पर गढ़े गये अपने सूत्रों की सत्यता और तथ्यपरकता को पुष्ट करते रहना होता है. 

उसके साथ मिल कर उसके अभियान का आरम्भ करने वाले महत्वपूर्ण साथियों में से जहाँ कुछ तो उसके साथ आगे बढ़ते हैं, कुछ यथास्थिति की जड़ता के शिकार हो जाते है, वहीं कुछ दूसरे अपने व्यक्तित्व की सीमाओं के चलते, अपनी व्यक्तिगत या सामाजिक महत्वाकांक्षाओं के चलते, अपनी व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्याओं के चलते या पथ की विकटता को समझ-बूझ कर पीछे भी हटते रहते हैं. आगे बढ़ने वाले साथियों का मार्गदर्शन करना और पीछे हटने वाले साथियों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास नेतृत्वकारी व्यक्ति का दोहरा दायित्व होता है. 

इस सब के बीच उसे पीछे छूटने वाले मित्रों के बिछड़ने की मार्मिक यन्त्रणा सहन करनी होती है और इतना ही नहीं, उनमें से कुछ मुखर मित्रों के मारक कटाक्षों का वार भी मुस्कुरा कर झेलना पड़ता है. साथ ही अलग-अलग अवस्थितियों पर खड़े होकर अपने अभियान की आलोचना करने वाले दूसरे लोगों का प्रतिवाद भी उसे करते ही रहना होता है. 

उसे लगातार तरह-तरह की क्षमता वाले और भी नये-नये साथियों की तलाश करते रहना होता है. ऐसे लगभग सभी नये साथी अभियान के आभा-मण्डल की दीप्ति से प्रभावित होने पर ही सम्पर्क में आ पाते हैं. उसे इन नये साथियों के साथ मैत्री भाव का विकास करने के मकसद से पहले तो अन्तरंग भावनात्मक सम्बन्ध बनाना होता है. उनके साथ परस्पर मजबूत भावनात्मक सम्बन्ध की आधार-शिला के अटल रूप से स्थापित हो जाने के पश्चात ही उस भावनात्मक सम्बन्ध को वैचारिक धरातल तक उन्नत किया जा सकता है. 

वैचारिक चेतना का सतत उत्कर्ष करते रहने के लिये सभी नये और पुराने साथियों के बीच बार-बार विभिन्न विषयों पर गम्भीर चर्चा-परिचर्चा के विस्तृत आयाम खोलते रहना होता है क्योंकि उनके ऊपर समाज में प्रचलित विविध परम्परागत विचारों का सशक्त असर पहले से मौज़ूद रहता है. यह काम सभी साथियों की मदद से कविताओं-गीतों, नाटकों-फिल्मों, लेखों-विश्लेषणों, सूचनाओं-समाचारों और अध्ययन-चक्रों की निरन्तरता बनाये रख कर और तरह-तरह की पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रेरक और वैचारिक सरल, सुबोध और शास्त्रीय पुस्तकों को पढ़ने के लिये प्रेरित कर के एवं उनकी स्वयं की अभिव्यक्ति की रचनात्मक क्षमता को और मुखरित करने का प्रयास करने पर ही मुमकिन हो पाता है.

विनम्रता सामाजिक कार्यकर्ताओं का मूलभूत गुण होती है और दम्भ उनके विकास का सबसे बड़ा अवरोध. यह जनविरोधी व्यवस्था हर व्यक्ति के सामने हमेशा पहिचान का संकट पैदा करती रहती है. और अपनी पहिचान बनाने और उसे बचाये रखने के लिये हर व्यक्ति को हरदम ललचाती रहती है. जनपक्षधर चेतना के विस्तार के लिये थोडा-सा भी काम कर ले जाने में सफल होते ही किसी भी व्यक्ति का दम्भ उसे दबोच लेता है और फिर उसके तब तक के सभी सकारात्मक कामों पर ग्रहण लग जाता है. ऐसे में सतर्कतापूर्वक सभी कार्यकर्ताओं के मन में सतत सेवा-भाव को बनाये रखना नेतृत्व का सबसे ज़रूरी दायित्व है. इसमें चूक होते ही टोली के सदस्यों के मन में व्यक्तिवाद को पनपने से नहीं रोका जा सकता. और जैसे ही एक बार टोली के सदस्यों के बीच व्यक्तिवाद ने अपनी जड़ें टोली में जमायीं, तो उसे व्यर्थ के विवादों में फँस जाने से कोई नहीं रोक सकता. बार-बार लगातार और गम्भीर प्रयास करके व्यक्ति को समूह के अधीन बनाये रखने से ही व्यक्तिवादी अहम् से सफलतापूर्वक निबटा जा सकता है. फिर भी इसमें बार-बार मुँह की खानी पड़ती है और इससे होने वाली क्षति को भी झेलना ही पड़ता है.

उसे जहाँ एक ओर अपने और अपनी टोली के इर्द-गिर्द बीच-बीच में नकारात्मक ऊर्जा बिखेरने वाले लोगों की कुटिल टिप्पणियों से भी दो-दो हाथ करना होता है, वहीं दूसरी ओर समाज में से सकारात्मक ऊर्जा देने वाले अन्य समर्थ लोगों को लगातार तलाशते भी रहना होता है. साथ ही चुप लगा कर तमाशा देख रहे लोगों की भीड़ में से आगे बढ़े हुए तत्वों को अपने साथ गोलबन्द करने के लिये बार-बार प्रचारात्मक अभियान आयोजित करना भी उसका एक ज़रूरी कार्य-दायित्व होता है. 

परन्तु संघर्ष के सभी दूसरे रूपों में से आर्थिक मोर्चे का संघर्ष नेतृत्व के लिये सबसे विकट और दुरूह होता है. अपने अभियान के विविध पक्षों को पूरी आन-बान-शान के साथ चलाते रहने के लिये लगातार न्यूनतम आवश्यक अर्थव्यवस्था जुटाने के लिये प्रयत्न करते रहना भी उसके लिये अपरिहार्य दायित्व बना रहता है. उसके सामने जितने तरह के कार्य-दायित्व होते हैं, उनकी अपेक्षा उसकी टोली की अर्थ-व्यवस्था हमेशा ही कमतर और डगमग रहती है. ऐसे में हरदम उसे आर्थिक किल्लत के चलते पैदा होने वाली अस्थिरता की सम्भावना के भय का धैर्य से मुकाबला करना होता है. इस मामले में "मेहनत और किफ़ायत से अपने देश का निर्माण करो" का महान माओ का कथन उसके लिये मशाल की तरह मार्गदर्शक और मददगार होता है. उसे फिजूलखर्ची पर कठोर अंकुश लगाने के लिये भी सतर्क रहना होता है. और सही जगह पर सही मात्रा में खर्च करने के लिये भी मन बनाकर तैयार रहना होता है. नये-नये आर्थिक संसाधन जुटाते रहना उसके लिये सबसे टेढ़ी खीर होती है. 

और इस सबके बीच दूसरों का मनोबल बनाये रखने और बढ़ाते रहने की अनवरत जारी अपनी कोशिश के साथ ही उसे अपनी ख़ुद की हिम्मत को बनाये रखने के लिये लड़ना होता है. उसे लगातार अपनी और अपने साथियों की समय-सीमा, अपनी ख़ुद की और अपनी टोली की क्षमता की सीमा, उपलब्ध संसाधनों की सीमा और समाज के बौद्धिक स्तर की सीमा के चलते उभर आने वाली और अपने चारों ओर बार-बार काले बादलों के घटाटोप की तरह छा जाने वाली भीषण हताशा के अन्धकार से टकराते रहना होता है. उसे सफलता और विफलता की समान सम्भावनाओं के बीच के द्वंद्व की अपनी मानसिक बेचैनी से हरदम जूझते रहना होता है. उसे हर कदम पर ख़ुद अपने को अपनी ख़ुद की नज़रों में भी सही ठहराने के लिये आत्मसंघर्ष की तपिश झेलते रहना होता है. 

इस तरह परिवर्तनकामी चेतना के प्रत्येक वाहक के सामने रचना और संघर्ष का दोहरा दायित्व होता है. इसके किसी भी पक्ष की अवहेलना करना उसके लिये असम्भव होता है. क्योंकि कोई भी पक्ष कमज़ोर पड़ने पर वह आत्मघाती दुर्गति में फँस जा सकता है. और तब उसे उबारने वाला तो कोई नहीं होता. हाँ, प्रशंसा करने वाले, उपहास करने वाले और सान्त्वना देने वाले ज़रूर होते हैं - कभी दूर-दराज़, तो कभी आस-पास. 

मुझे आपकी कूबत पर पूरा भरोसा है. मेरी अपनी ढेरों सीमाएँ रही हैं. 
उम्मीद करता हूँ कि आप मेरा और अपना - दोनों का ही मनोबल बनाये रखेंगे. 
आज बस इतना ही.
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश