कृश्न चंदर के गधे की नयी आत्मकथा (पत्र शैली में)
मित्रो, पहचाना मुझे? अरे, मैं वही कृश्नचंदर वाला गधा हूँ। आदमी जैसा तो पहले से ही बोलता था। आपको शायद पता ही होगा, कुछ दिनों तक तो मैं पागलपन जैसी अवस्था में भी रहा। फिर ठीक होकर इधर-उधर भटक ही रहा था कि एक भलेमानस कम्युनिस्ट से टकरा गया। फिर मार्क्सवादियों की संगत में मैं मार्क्सवादी बन गया। एक कम्युनिस्ट ग्रुप में भी शामिल हो गया। सिद्धान्तकार बनना चाहता था, पर वे लोग मुझसे सिर्फ मोटे काम ही करवाते थे। दूसरे, वहाँ कोई गधी भी नहीं थी, और मेरी उमर भी बीती जा रही थी। दुखी-कुण्ठित मैं यहाँ-वहाँ दुलत्ती झाड़ता रहता था, कभी सामान टूटते तो कभी किसी को चोट लगती। फिर मेरे कम्युनिस्ट साथियों ने मुझे यह कहकर भगा दिया कि तुम रहोगे गधे ही, कम्युनिस्ट कभी नहीं बन पाओगे। अब मैं क्या करता? न पूरा कम्युनिस्ट रह गया था, न ही पूरा गधा। हृदय में प्रतिशोध की आग जल रही थी। तय किया कि इतने गधे कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट गधे तैयार करूँगा कि कम्युनिस्टों को छट्टी का दूध याद दिला दूँगा। उनके सारे कामों का गुड़-गोबर कर दूँगा।
तबसे 'गर्दभ क्रान्तिसेवी व्यक्तित्व निर्माण गुरुकुल' नामका एक संस्थान चलाता हूँ। मुझे पुराने रूप में बहुत लोग जानते हैं इसलिए इन दिनों शेर का मुखौटा पहनकर संतों की तरह नैतिक सदाचार के उपदेश देता रहता हूँ। मजे की बात यह है कि मेरे इस प्रोजेक्ट में मदद करने के लिए बहुत सारे ऐसे नामधारी कम्युनिस्ट आ गये जो फितरतन लोमड़ हैं। बुद्धिजीवी हैं, अफसर-पत्रकार-प्रोफेसर-एन.जी.ओ. वाले हैं, आन्दोलन से मेरी ही तरह भगाये गये या भागे हुए हैं और वास्तव में जनता के बीच काम करने वाले कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से वैसे ही खार खाये हुए हैं जैसे कि मैं। यूँ तो गधों और लोमड़ों की दोस्ती सामान्यत: नहीं होती, पर 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त' की नीति के हिसाब से हमलोगों के बीच रणनीतिक संयुक्त मोर्चा बन गया है। धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति करने वाले कुछ जंगली कुत्ते भी मेरा साथ दे रहे हैं। मैं उनसे बार-बार पर्दे के पीछे रहने के लिए कहता हूँ, पर वे तो मुझसे भी बड़े गधे हैं, कई बार खुले में आकर मेरे पक्ष में बोलने लगते हैं और मेरा खेल बिगड़ जाता है। बहरहाल, बहुत सारे भोले-भाले हिरनों, बकरियोंऔर पागुर करते बैलों को तो मैंने कनविंस कर ही लिया है कि मैं एक समर्पित, सच्चा संतनुमा कम्युनिस्ट हूँ। यूँ भारतीय बड़े संस्कारी जीव होते हैं, कम्युनिस्ट को भी संत के चोले में देखना चाहते हैं।
आगे मैं सोच रहा हूँ कि सच्या सौदा, निर्मल बाबा और रामदेव के 'भारत स्वाभिमान' को कम्युनिस्ट शब्दावली के फेंटकर एक सम्मोहनकारी प्रभाव वाला मिश्रण तैयार करूँ यह आइडिया कैसा है? -- मित्रगण मुझे राय दें। मिलकर या ई-मेल द्वारा या फेसबुक पर मेरे मैसेज बॉक्स में जाकर, खुले तौर पर नहीं। अपनी रणनीति गुप्त रखनी होगी, क्योंकि सच्चे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी अब पहले की तरह चुप नहीं हैं, अब वे हमारी पोल-पट्टी खोलने पर आमादा हैं। मित्रगण परामर्श अवश्य दें। हमारी एकता ज़रूरी है। एकता में ही शक्ति है।
साभार, आपका,
सन्त चण्ट नैतिकानंद
(उर्फ कृश्नचंदर का वही पुराना गधा)
कुलाधिपति,
गर्दभ क्रान्तिसेवी व्यक्तित्व निर्माण गुरुकुल
Girijesh Tiwari - इस पोस्ट पर इन कमेंट्स के बाद मैंने Satya Narayan जी को अनफ्रेंड कर दिया.
Bhuvan Joshi - i think the post is targeted against Sh. Girijesh Tiwariji, even if there is ideological or working style difference. such personal attacks should be avoided rather concentration should be on aim. there were very few whole life revolutionaries, besides no splinter at present is in a position to claim correctness of it's ideas which has resulted in furtherence of movement. there should be struggle of ideas even if person/fraction is considered philistine. exposer should be the main aim. with a person/group where diffrence of ideas appear struggle- unity- struggle is the only way. wastage of resources on personal attack is not going to be useful for the cause. its a freindly advice
Girijesh Tiwari - आभार व्यक्त करता हूँ सही सलाह देने के लिये साथी Bhuvan Joshi के प्रति और एक बार पुनः आभार व्यक्त करता हूँ मुझे पुनः इतने सम्मान के साथ याद करने के लिये साथी Satya Narayan के भी प्रति.
Satya Narayan Girijesh Tiwari - हम आपको कैसे भूलें जब आप खुद बार बार याद करते रहते हो।
Girijesh Tiwari - धन्यवाद Satya Narayan जी, अब वह बिन्दु आ चुका कि आप मुझे केवल एक बार और याद करें, और फिर वह अन्तिम बार हो जाये. उसके बाद आपके छुटभैये हमलावर साथियों की तरह आपको भी मुझे ब्लॉक कर देना पड़ेगा. बस एक बार और ... फिर मुझे कोई अफ़सोस नहीं रहेगा आपको आखिरी मौका न देने का..
Satya Narayan - Girijesh Tiwari जी तो ऐसा कीजिये। आप भी एक और पोस्ट डाल दीजिये (हमारे खिलाफ) हमें याद करते हुए, फिर हम भी डाल देंगे।
यह कमेन्ट उसके बाद आयी.
Amar Nadeem - पोलेमिकल बहस और आलोचना-प्रत्यालोचना चले तो अच्छा लगता है और सत्य के संधान में मदद मिलती है . पर इस तरह की तस्वीरें और कटाक्ष देख कर तो बस अफ़सोस ही किया जा सकता है . जनचेतना की टीम विचारधारा के क्षेत्र में शानदार काम करती आ रही है एक लम्बे समय से. यही नहीं वे लोग मेहनतकशों के वर्गीय संघर्षों में भी भागीदारी करते रहे हैं. मार्क्स और मार्क्सवादी चिंतकों का उनका गहन अध्ययन काबिले तारीफ़ ही नहीं है मुझ जैसे न जाने कितनों की समझ में भी इजाफा करता है. इस कमजोरी से अगर वे उबर जायें तो उनका कद और भी बढ़ जाएगा , ऐसा मुझे लगता है .
Salman Arshad - kuch behoodgiyan yesi hoti hain ki khamooshi unka jwab hota hai
Amarnath Madhur - सत नारायण की नयी कथा है.बेचारे सच्चे कामरेड क्रान्ति के लिए कितना श्रम कर रहें हैं, ढूंढ ढूंढ कर शत्रु को चिन्हित किया जा रहा है उस पर पत्थर मारे जा रहे हैं मगर क्रान्ति है कि हो ही नहीं रही है . पता नहीं ये पत्थर निशाने पर लगते भी हैं या नहीं .लेकिन देखने वालो को तो मजा आ ही रहा है .ये भी कोई कम बड़ा क्रांतिकारी काम नहीं है .लगे रहे साथियो .
Abhishek Pandit - koun hai ye satya narayan ji or inko aapse kya dikkat hai sir?
Girijesh Tiwari - satyanarayan ji ko 'satya' sahan nahi ho paya. alochna se uphas tak kee yatra ke baad ab sthiti 'tanavpoorn lekin niyantran me' hai.
Abhishek Pandit - ye hai koun or aapko lekr inki samsya kya hai?
Girijesh Tiwari - ye bechare hain. jo nahi jaante ki kya kar rahe hain ! inko mujhse koi pareshani nahi hai. jo lekh aap oopar dekh rahe hain. usme inkee mitra ne mere ateet aur vartmaan ka vihangavalokan kiya hai. vah ateet jo inke mukhiya maanneey comrade shashi prakash ji hi jaan sakte the. yah doosari peedhee hai. inkee suni sunaayee baaton ke sahare likhe gaye is vyangy-lekh ka main bhi mazaa le rahaa hoon. aap bhi is kalam kee dhaar dekhiye aur gadgatit hoiye. ham log to aisee upaadhiyon ke liye hee bane hain.
Abhishek Pandit - hahahaahah
Mahender Singh - abhi naya naya mulla hai, so namaj bhi roj padh raha hai, free ka mazdoor bhala kitne din chare par tika rahega ?
Satya Narayan - Mahender Singh जो भी हो, कम से आपकी तरह मैक्सिम जैसी अश्लील पत्रिकाओं के व्यापारी तो नहीं बनेंगे।
Mahender Singh - इसको एक साधारण सी बात समझ नही आ रही कि क्यूँ इतने सारे लोग जो कभी इनके नेता के नेतृत्व मे 10, 20 30 साल से काम कर चुके है अब इनके आलोचक हो गये हैं, या तो ये सारे लोग मूर्ख और अवसरवादी है या इनकी भाषा मे प्रतिकरांतिकारी हैं, या फिर इनका नेता ही ऐसा था, दोनो मे से एक ही बात हो सकती है
Satya Narayan -·महेन्द्र सिंह जी एक सीधी सी बात तो समझ में आ रही है कि जितने लोग “आलोचक” हो गये वो अब क्या कर रहे हैं। वो समझ में आते ही ये भी समझ में आ गया कि कौन क्या है।
Mahender Singh - अभी धैर्य से 10-15 साल तक सेवा कर लो फिर किसी नतीजे पर पहुचना
Satya Narayan - अगर ऐसी नौबत आयेगी भी तो फिर नतीजे पर पहूँचकर भी उस नतीजे तक तो नहीं ही पहूँचेंगे जिस तक आप और आपकी मण्डली पहूँच गयी है।
Mahender Singh - चलो यार लगे रहो पर मानसिक संतुलन बनाए रखना, हमने बिगड़ते हुए भी देखा है
Satya Narayan -·आपके जितना नहीं बिगड़ेगा।
Jp Narela - डा गिरिजेश तिवारी ,आपके वय्क्तित्त्व के विकाश और ल्युच्योसी के व्यक्तित्व के विकाश में क्या फर्क है ?
Girijesh Tiwari - j.p.प्यारे, इस मुद्दे पर तो हम पहले भी बात कर चुके हैं. ल्यू शाओ ची का मामला पार्टी में कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व विकास का था और मेरा मामला आज़मगढ़ में युवाओं को तैयार करना है.
Jp Narela - कन्स्पत्त एक ही है
डा. मेरे सवाल का सही उत्तर दे , आप समझ रहे है . मई क्या जानना चाहता हु
Girijesh Tiwari - नहीं है. उसे अवसरवाद करना था और मुझे थोड़ा कम क्षमता के लोगों को उत्साहित करना है. यहाँ के माहौल में तीन साल काम करने के बाद भी पढ़ाई के लिये गम्भीर युवाओं की संख्या कट्टे वालों से बहुत ही कम है.
Jp Narela - लोगों को शिक्षित करना एक बात ! सामूहिकता की एस्प्रिट है इसमें 1 वय्क्तिताव के विकाश में व्यक्तिगत एस्प्रिट है 1 इसमें मुख्यत यही गड़बड़ी है !
Girijesh Tiwari - सही है. व्यक्तित्व और सामूहिकता के अधीन होना दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं और दोनों को एक ही व्यक्ति में विकसित भी किया जा सकता है. इसके भी नमूने गढ़े हैं.
Jp Narela - कैसे जरा बताओ तो मेरी जानकारी में भी इजाफा हो जायेगा
Girijesh Tiwari - 61-प्वाइंट्स में से ये पॉइंट्स इस विषय पर हैं :
58- व्यक्तिवाद को सामूहिकता के अधीन करने का सचेत अभियान चलाते रहना
59- सामूहिक कीर्ति का विस्तार करके देश-काल की सीमाओं को ध्वस्त कर देना और वर्तमान एवं भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना देना
60- शोषक प्रवृत्ति से स्वयं को तथा अपने मित्रों को सतत बचाना
61- शोषण-मुक्त समाज-व्यवस्था की स्थापना के महासमर में अपनी भूमिका चुनना तथा आमरण उसका निर्वाह करना.
Jp Narela - फिर व्यक्तित्व का विकास शीर्षक पर पुर्विचार करो
Girijesh Tiwari - शीर्षक और नाम बड़ा-बड़ा रखने की परम्परा रही है, मेरे दोस्त ! इसी लिये थोड़ा अनगढ़ सा नाम रख कर इसे परियोजना कहा. अगर इसे आल इण्डिया संगठन भी कहता, तो लोग वैसा ही मान लेते. मगर छोटी औकात, छोटा प्रयोग, विफल हो सकने की पूरी गारण्टी ! इसलिये अपनी औकात भर ही बोलने के चक्कर में रहता हूँ.
Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, आप फिर बोल पड़े. सम्मानित इन्सान ऐसे तो नहीं करते.
Satya Narayan - जो मार्क्सवाद के नाम पर गड़बड़ फैला रहे हैं उनका भण्डाफोड़ करना तो सबसे सम्मानित काम है।
Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, क्या अब मुझसे ख़ुद को ब्लॉक ही करवा देना चाहते हैं ! ऐसा मत कीजिए... कोचिंग हो या टोचिंग आप जो भी चाहें, मज़ाक उड़ा सकते हैं... मज़ाक का मैं बुरा नहीं मानता... और पूर्वाग्रहग्रस्त लोगों से सन्तुलित वक्तव्य की उम्मीद भी नहीं कर सकता..
तुलसी बाबा लिख गये हैं :
"बातुल भूत बिबस मतवारे, ते नहिं बोलें बचन सम्हारे" !
Satya Narayan - मैने तो आपके ही शब्दों से आपकी परियोजना का नाम दुरूस्त किया है। क्या व्यावसायिक संस्थानों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्थानों को कोचिंग सेण्टर नहीं कहते हैं। अब आप इतना तिलमिला रहे हैं और ब्लॉक करने की धमकी दे रहे हैं, उससे बेहतर होता कि आप अपनी इस “क्रान्तिकारी परियोजना” को डिफेण्ड करते।
Girijesh Tiwari - Satya Narayan जी, अब से बहुत पहले ही मैं आपको गंभीरता से लेना बन्द कर चुका हूँ. पहले ही चरण में आपने मुझे अपना पूरा परिचय दे दिया था. अब आपकी आज़ादी का सम्मान करना और आपको बडबडाने के लिये छोड़ देना ही उचित है. मेघी मारने से हाथ गन्दा होता है - ऐसा लोग कहते हैं. और आप इसी कोटि के जीव प्रतीत हो रहे हैं. सो खूब मन भर टर्र-टर्र कीजिए. मौसम भी बरसात का है. आनन्द ही होगा मित्रों को ...
Satya Narayan - Jp Narela जी को भी उनकी बातों का जवाब मिल गया होगा। ये व्यक्तित्व विकास परियोजना एक विशुद्ध कोचिंग सेंटर है। इनकी इस परियोजना के 61 पॉइंटस हैं उनमें से एक पॉइंट तो बड़ा धांसु है
24- परीक्षा में टॉप करने-कराने के लिए घनघोर मेहनत करना
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कविता कृष्णपल्लवी के लेख पर मेरी टिप्पणी. टैग करने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी.
https://www.facebook.com/notes/kavita-krishnapallavi/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%82/665998956788982
मित्र Om Dwivedi, आपके द्वारा प्रेषित यह लेख पढ़ा. लेख पर मेरी कुछ सहमति और अनेक असहमतियाँ हैं. व्यक्ति को वर्गीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए. परन्तु उसकी उपलब्धियों को भी सम्मान देना चाहिए. जिन साहित्यकारों के नाम इस लेख में आये हैं, वे लब्ध-प्रतिष्ठ कलमकार हैं. पुरस्कार मिलना, उसे देना और लेना सबकुछ केवल गणित ही नहीं होता. कुछ सकारात्मक होने पर ही किसी रचनाकार को सम्मान और पुरस्कार मिलता है.
और हर जगह केवल बहिष्कार करने से ही आपकी शुचिता और पवित्रता की रक्षा सम्भव हो जाती है - ऐसा मानना बचकाना और हास्यास्पद है. बहिष्कार करके और शिरकत करके दोनों तरीकों से विरोध किया जाता है और किया जाना चाहिए. और हर जगह केवल विरोध - विरोध के लिए विरोध भी व्यर्थ का प्रलाप बन जाता है.
अगर आपकी कलम में ताक़त है, तो आपको भी जन-सम्मान से लेकर तरह-तरह के पुरस्कार मिलेंगे. अगर नहीं है, तो गर्भिणी का अभिनय करके आप को शिशु की किलकारी मयस्सर नहीं होनी. क्या लेखिका को कोई सम्मान या पुरस्कार मिला है ! क्या इनकी लिखी कोई प्रकाशित पुस्तक भी उपलब्ध है ! क्या सारे नाम यूँ ही बड़े हो जाते हैं ! उनकी साधना का कोई मतलब ही नहीं है ! क्या जो मार्क्सवादी नहीं है वह साहित्यकार केवल जनविरोधी ही है ! क्या इनको भी कभी किसी से सम्मान या पुरस्कार लेने का अवसर मिला !
अगर उदय प्रकाश, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, आलोकधन्वा, राजेश जोशी, कौशल किशोर, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पाण्डेय, प्रणयकृष्ण, सुशीला पुरी - सभी के सभी अलाने-फलाने सब तरह से गलत ही हैं, तो सबको गलत ठहराने वाले आत्म-मुग्ध पाण्डित्य के एकोहम के भ्रम के शिकार हैं. दरअसल, आप एक मात्र नहीं हैं, आप अनेक में से केवल एक हैं. अन्यथा जो कुछ आप कहें और करें, वह सबकुछ सही है और जो दूसरे कोई भी कहें या करें, वह सबकुछ सीधे-सीधे खारिज़ कर देने की बीमारी क्या दम्भ के अलावा कुछ और दिखाती है !
प्रो. रणधीर सिंह के एक उद्धरण पर मेरे द्वारा पोस्टर बनाने पर यह फ़तवा देना कि प्रो. रणधीर सिंह गलत हैं, तो हास्यास्पद ही था. जब हम किसी की ओर एक अंगुली उठाते हैं, तो हमको अपनी ओर उठने वाली अपनी ही तीन अंगुलियाँ भी दिखनी चाहिए. अन्यथा कबीर याद आ जाते हैं -
''दोस पराया देखि के, चले हसन्त-हसन्त ;
आपन याद न आवई, जाको आदि- न अन्त. "
मेरी समझ है कि मुझे अपना निर्णय लेने की आज़ादी है, हर एक को अपना निर्णय लेने की आज़ादी है. मगर यह आज़ादी वहीं तक है, जहाँ दूसरे का सम्मान शुरू होता है.
हर दूसरे के लिए अपमान-जनक टिप्पणी करके ख़ुद को क्रान्ति का केन्द्र मानना और कहना लोगों को केवल मुस्कुरा देने तक पहुँचा देता है. और लेखिका का यह भ्रम बार-बार दिखा है. मेरे बारे में तो इनकी और इनके सत्संगियों की यही राय है. और इनकी ही राय में कितनी अर्थवत्ता है - मैं उस तरह और उस स्तर की टिप्पणी को आलोचना नहीं भर्त्सना समझता हूँ. आलोचना का प्रस्थान-बिन्दु सकारात्मक होता है, और भर्त्सना या निन्दा का नकारात्मक.
लेखिका को भी आलोचना के बारे में अवश्य ही जानकारी होनी चाहिए. मगर इनकी कलम से केवल उपहास, निन्दा और भर्त्सना ही निकलती है. सबका पर्दाफाश करना ही इन लोगों का एक महत्वपूर्ण क्रन्तिकारी काम है. अपना पर्दा देखने की नज़र है ही नहीं. मैं यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं लिख रहा. मैंने इनकी विद्वत्ता और स्तरीय लेखन की प्रशंसा भी की है और उसे शेयर भी किया है. मगर मानवीय सद्गुण के साथ यह एक दुर्गुण है. मेरा अनुरोध है कि इसके बारे में लेखिका और उनके सभी मित्रों को गम्भीरता के साथ विचार करना चाहिए. इनकी मेरे विषय में जो राय है,वह मैं यहीं प्रस्तुत कर देता हूँ.
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और अब अमित पाठक की यह पोस्ट 26.3.15. इसी शृंखला की अगली कड़ी है.
Amit Azamgarh with Awadhesh Yadav and 4 others -
https://www.facebook.com/amit.pathak.106/posts/822545047826833
"पिछले दिनों जो पोस्ट आपने मुझे टैग की थी उस पर मेरा जवाब कमेंट के रूप में जा नहीं पा रहा था. सो उसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
_____A SELF-CRITICAL CONFESSION…_____
My dear friend, I am ashamed of making a worthless burden of my irrelevant whims and fancies a thankless liability for all my dears and nears. Each and every beginning with a big ZERO but a new zeal of all my attempts to serve the humanity and change the world turned out to be only one more bitter failure. All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.
I visualise the timidness of my own personal development as the principal cause of this only life-time achievement of series of failures. Neither I could rectify my own thought-process, nor overcome my own behavioural distortions throughout my life but only tried to preach others with a mouth too loud to tolerate.
I don't know any way out and I don't see any chance. But I wish to…
May I be helped !
Hopefully… your’s girijesh (9.3.15.)
https://www.facebook.com/photo.php…
वैसे इस तरह की आत्मालोचनाओं और आत्मस्वीकृतियों की बात आपके फेसबुक वाल पर कोई नयी चीज़ नहीं है और यह तो आप भी समझते हैं कि यह आपके लिए और दूसरों के लिए भी कोई महत्त्व नहीं रखती. वास्तव में अपनी असफलताओं को इस तरह के सतही विश्लेषण की पीछे छुपाने की कोशिश सच्चाई को और नग्नता से सामने ला पटकती है. अपनी व्यवहारिक गड़बड़ियों के पीछे सैद्धांतिक भटकाव के विश्लेषण से आँखे मूँद लेने की यह आदत समय समय पर इस तरह के अनर्गल प्रलापों के रूप में सामने आती रहती है. “मूंदहुँ आँख कतहूँ कछु नाहीं” की भाववादी प्रवृत्ति से चिपके रहने के बाद इस तरह का रोना-धोना आपको ही शोभा देता है.
आपके साथ पिछले मुलाकात के बाद मैंने खुद को एक लम्बा विश्राम लेकर सोचने का मौका दिया और इस दौरान कई बातें साफ़ हो गई. “मानवता की सेवा और दुनिया को बदल देने के लिए किये गए पहले प्रयोग (राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कॉलेज)” की असफलता को आपने किस रूप में सूत्रबद्ध किया और उनसे किन निष्कर्षों पर पँहुचे यह मैं नहीं कह सकता लेकिन दो धाराओं के बीच के संघर्ष में पराजित होने की बात कहकर आप इस पूरे प्रयोग की असफलता के विश्लेषण से बचते रहे हैं और अपने चारो ओर के उस भ्रम जाल को टूटने से बचाने की पूरी कोशिश करते रहे हैं जिनके बीच आप जी रहे हैं. वास्तव में आपके उस प्रयोग और आपके वर्तमान प्रयोग “व्यक्तित्त्व विकास परियोजना” की अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. वास्तव में यह क्रांति का ढोल पीटने वाले वाम और दक्षिणपंथी भटकावों, संशोधनवाद, से भी खतरनाक है. क्रांतिकारी संघर्षों से दूरी बनाते हुए क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व गढ़ने की यह दिशा ने व्यवस्था की सेवा करने वाले बेहतर व्यक्तित्त्व तैयार करने का कम, मुझे उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व होने का भ्रम नहीं है, लोगों के लिए कुछ कर देने का काम और उन्हें इसी व्यवस्था के भीतर झूठी उम्मीद का झुनझुना पकड़ा देने के काम को कोई क्रान्तिकारी काम नहीं कहा जा सकता. कम से कम मार्क्सवाद से तो इसका कोई लेना-देना नहीं है. उलटे यह किसी भी संभावना संपन्न व्यक्ति को मार्क्सवादी राजनीति से कोसों दूर ले जा कर खड़ा कर देती है और प्रायः उन्हें मानसिक अवसाद की तरफ धकेल देती है. व्यक्तित्त्व विकास परियोजना का काम का काम शुरू होने के कुछ ही समय पहले मैं आपसे जुड़ा था. इसकी पहली बैठक का ठीक ठीक समय बता पाने में मैं असमर्थ हूँ. आपके आलावा मेरे और कमोबेश मेरी ही उम्र के कुछ दूसरे नौजवानों के साथ व्यक्तित्त्व विकास परियोजना की शुरुआत हुई. अभी इसे एक संगठन भी नहीं कह सकते थे. हम नौजवानों में से कोई भी किसी विशेष राजनैतिक समझदारी से लैस नहीं था फिर भी हमने आपनी पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ इस काम को आगे बढ़ाया. क्योंकि एक सामान्य मध्यमवर्गीय चेतना के अनुसार यह एक ‘भला काम’ था जो क्रांतिकारी काम के छलावरण में लिपटा हुआ था. लेकिन आपने अपने इस “क्रांतिकारी प्रयोग” में जुटे किसी के भी राजनैतिक स्तरोन्नयन का काम नहीं किया. कुछ एक अध्ययन चक्रों को छोड़ दिया जाए तो उस दौर में हममें से अधिकतर ने अपनी समझदारी को उन्नत करने का प्रयास किताबी ज्ञान के जरिये ही किया. स्पष्ट था कि बिना किसी राजनैतिक चेतना के अलग अलग तरह के तत्वों को बांधे रखना सम्भव नहीं था. परिणामस्वरूप परियोजना के संचालन के लिए बनाई गई केन्द्रीय टीम के अलग अलग सदस्य समय पर अलग अलग समस्याओं से जूझते रहे और आपने अपनी स्थिति को सुरक्षित रखते हुए उनकी कम समझदारी का रोना रोते रहे. “पोलिटिक्स इन कमांड” का जाप करते हुए “मेन(men) इन कमांड” की घृणित कार्यप्रवृत्ति को व्यवहार में अपनाये रहना मुंह में राम बगल में छुरी जैसा ही था. “All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.” अपने प्यार का हवाला देकर लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की लिजलिजी प्रवृत्ति से आपके करीब आने वाले हर आदमी को जूझना पडा है. बी.एससी. की पढाई पूरी होने के बाद से ही मैं व्यक्तित्त्व विकास परियोजना के कामों में कोई प्रत्यक्ष भूमिका न निभाने के बावजूद मैं इससे पूरी तरह से अलगाव की स्थिति में भी नहीं था. मगर पिछली बातचीत ने मुझे अपनी स्थिति का एक बार फिर से समग्र मूल्यांकन करने पर विवश कर दिया.
पिछली मुलाकात के बाद जो सूत्र आपने दिया, वह तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद की पीठ में छुरा भोंकना ही था. वास्तव में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का सैद्धांतिक विकास बहुत सारी प्रवृत्तियों के साथ संघर्षों के दौरान ही हुआ है. क्रांतिकारी आन्दोलन के ठहराव या क्रांति पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होने के दौर में यह हमेशा होता रहा है कि क्रांतिकारी व्यवहार से कटे बुद्धिजीवी आन्दोलन के ठहराव का सम्यक और गहन विश्लेषण करने की बजाय मार्क्सवाद की उन शिक्षाओं पर ही हमला करने लगते हैं जिनके बगैर क्रांतिकारी आन्दोलन कभी खड़ा ही नहीं हो सकता. उदाहरण के लिये लेनिन के दौर में मेन्शेविक ऐसे ही निठल्ले बुद्धिजीवी थे जो लेनिन के पार्टी संबंधी सिद्धांतों को नकार कर दुअन्नी-चवन्नी छाप मेम्बरशिप वाली मॉस पार्टी की अवधारणा पेश कर रहे थे और यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि लेनिन के नेतृत्त्व में जब बोल्शेविक पार्टी क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर बढ़ रही थी तब इन मेंशेविकों ने सत्ता के एजेंटों की भूमिका निभाई. इसी तरह रूस और चीन में संशोधनवादी सत्ता के अस्तित्त्व में आने और खास तौर पर सोवियत संघ के विघटन के बाद पूरी दुनिया के निठल्ले बुद्धिजीवियों में लेनिन के पार्टी विषयक सैद्धान्तिक अवदानों को नकार देने का फैशन बहुत चलन में है. हास्यास्पद बात तो ये है कि किसी भी तरह के क्रांतिकारी प्रयोग खड़ा करने या किसी भी तरह की सैद्धान्तिक व्याख्या करने में अक्षम टुटपूंजिये भी अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व हीनता को छिपाने के लिये फर्जी सिद्धांतों की आड़ लेने से बाज नहीं आते. क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में बार बार ऐसे मौके आते हैं जब लोग अपनी व्यावहारिक गड़बड़ियों के पीछे के सैद्धांतिक भटकावों की तलाश करने के बजाय सिद्धांत पर ही सवाल खड़े करने लगते हैं और प्रायः यह सामने आता है कि ये प्रवृत्तियाँ आन्दोलन के इतिहास में कई बार दुहराई जा चुकी होती हैं और उस ऐतिहासिक कथन पर सीधे सीधे खरा उतरती हैं जिसके अनुसार इतिहास की घटनाएँ जब दुहराई जाती हैं तो पहले तो वह त्रासदी और उसके बाद कॉमेडी के रूप में ही दुहराई जाती हैं. मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर कीचड़ उछालने की यह प्रवृत्ति ऐसे लोगों को उसी सड़ांध मारते दलदल में पंहुचा देगी जिसे वे अपने खलिहरपन को दूर करने के लिए अपने चारों ओर तैयार करते है और जिससे वे लगातार कीचड़ बटोर बटोर कर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के ऊपर फेंकते रहे हैं
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Anurag Pathak Apna new no de de
Girijesh Tiwari नमस्ते अमित, आपकी पोस्ट पढ़ी, बेहतर होता अगर हम आमने सामने बात करते. बात पोस्ट्स और कमेन्ट्स से कहीं अधिक है और कहीं अधिक महत्वपूर्ण भी हम दोनों के लिये ही.
Dhriti Pragya Singh अमित क्या यह उचित है कि हम बिना विचार विमर्श के अपने निजी विचार थोप दें किसी पर
अपनों का दुख सौ दुखों से भारी होता है बेटा
तुम एक बार बात तो करते
Bittu Singh Rathor bhaiya ji kaha par hai
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कविता कृष्णपल्लवी के लेख पर मेरी टिप्पणी. टैग करने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी.
https://www.facebook.com/notes/kavita-krishnapallavi/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B0-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AC-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9B-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%82/665998956788982
मित्र Om Dwivedi, आपके द्वारा प्रेषित यह लेख पढ़ा. लेख पर मेरी कुछ सहमति और अनेक असहमतियाँ हैं. व्यक्ति को वर्गीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए. परन्तु उसकी उपलब्धियों को भी सम्मान देना चाहिए. जिन साहित्यकारों के नाम इस लेख में आये हैं, वे लब्ध-प्रतिष्ठ कलमकार हैं. पुरस्कार मिलना, उसे देना और लेना सबकुछ केवल गणित ही नहीं होता. कुछ सकारात्मक होने पर ही किसी रचनाकार को सम्मान और पुरस्कार मिलता है.
और हर जगह केवल बहिष्कार करने से ही आपकी शुचिता और पवित्रता की रक्षा सम्भव हो जाती है - ऐसा मानना बचकाना और हास्यास्पद है. बहिष्कार करके और शिरकत करके दोनों तरीकों से विरोध किया जाता है और किया जाना चाहिए. और हर जगह केवल विरोध - विरोध के लिए विरोध भी व्यर्थ का प्रलाप बन जाता है.
अगर आपकी कलम में ताक़त है, तो आपको भी जन-सम्मान से लेकर तरह-तरह के पुरस्कार मिलेंगे. अगर नहीं है, तो गर्भिणी का अभिनय करके आप को शिशु की किलकारी मयस्सर नहीं होनी. क्या लेखिका को कोई सम्मान या पुरस्कार मिला है ! क्या इनकी लिखी कोई प्रकाशित पुस्तक भी उपलब्ध है ! क्या सारे नाम यूँ ही बड़े हो जाते हैं ! उनकी साधना का कोई मतलब ही नहीं है ! क्या जो मार्क्सवादी नहीं है वह साहित्यकार केवल जनविरोधी ही है ! क्या इनको भी कभी किसी से सम्मान या पुरस्कार लेने का अवसर मिला !
अगर उदय प्रकाश, नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, आलोकधन्वा, राजेश जोशी, कौशल किशोर, विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पाण्डेय, प्रणयकृष्ण, सुशीला पुरी - सभी के सभी अलाने-फलाने सब तरह से गलत ही हैं, तो सबको गलत ठहराने वाले आत्म-मुग्ध पाण्डित्य के एकोहम के भ्रम के शिकार हैं. दरअसल, आप एक मात्र नहीं हैं, आप अनेक में से केवल एक हैं. अन्यथा जो कुछ आप कहें और करें, वह सबकुछ सही है और जो दूसरे कोई भी कहें या करें, वह सबकुछ सीधे-सीधे खारिज़ कर देने की बीमारी क्या दम्भ के अलावा कुछ और दिखाती है !
प्रो. रणधीर सिंह के एक उद्धरण पर मेरे द्वारा पोस्टर बनाने पर यह फ़तवा देना कि प्रो. रणधीर सिंह गलत हैं, तो हास्यास्पद ही था. जब हम किसी की ओर एक अंगुली उठाते हैं, तो हमको अपनी ओर उठने वाली अपनी ही तीन अंगुलियाँ भी दिखनी चाहिए. अन्यथा कबीर याद आ जाते हैं -
''दोस पराया देखि के, चले हसन्त-हसन्त ;
आपन याद न आवई, जाको आदि- न अन्त. "
मेरी समझ है कि मुझे अपना निर्णय लेने की आज़ादी है, हर एक को अपना निर्णय लेने की आज़ादी है. मगर यह आज़ादी वहीं तक है, जहाँ दूसरे का सम्मान शुरू होता है.
हर दूसरे के लिए अपमान-जनक टिप्पणी करके ख़ुद को क्रान्ति का केन्द्र मानना और कहना लोगों को केवल मुस्कुरा देने तक पहुँचा देता है. और लेखिका का यह भ्रम बार-बार दिखा है. मेरे बारे में तो इनकी और इनके सत्संगियों की यही राय है. और इनकी ही राय में कितनी अर्थवत्ता है - मैं उस तरह और उस स्तर की टिप्पणी को आलोचना नहीं भर्त्सना समझता हूँ. आलोचना का प्रस्थान-बिन्दु सकारात्मक होता है, और भर्त्सना या निन्दा का नकारात्मक.
लेखिका को भी आलोचना के बारे में अवश्य ही जानकारी होनी चाहिए. मगर इनकी कलम से केवल उपहास, निन्दा और भर्त्सना ही निकलती है. सबका पर्दाफाश करना ही इन लोगों का एक महत्वपूर्ण क्रन्तिकारी काम है. अपना पर्दा देखने की नज़र है ही नहीं. मैं यह किसी पूर्वाग्रह से नहीं लिख रहा. मैंने इनकी विद्वत्ता और स्तरीय लेखन की प्रशंसा भी की है और उसे शेयर भी किया है. मगर मानवीय सद्गुण के साथ यह एक दुर्गुण है. मेरा अनुरोध है कि इसके बारे में लेखिका और उनके सभी मित्रों को गम्भीरता के साथ विचार करना चाहिए. इनकी मेरे विषय में जो राय है,वह मैं यहीं प्रस्तुत कर देता हूँ.
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और अब अमित पाठक की यह पोस्ट 26.3.15. इसी शृंखला की अगली कड़ी है.
Amit Azamgarh with Awadhesh Yadav and 4 others -
https://www.facebook.com/amit.pathak.106/posts/822545047826833
"पिछले दिनों जो पोस्ट आपने मुझे टैग की थी उस पर मेरा जवाब कमेंट के रूप में जा नहीं पा रहा था. सो उसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
_____A SELF-CRITICAL CONFESSION…_____
My dear friend, I am ashamed of making a worthless burden of my irrelevant whims and fancies a thankless liability for all my dears and nears. Each and every beginning with a big ZERO but a new zeal of all my attempts to serve the humanity and change the world turned out to be only one more bitter failure. All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.
I visualise the timidness of my own personal development as the principal cause of this only life-time achievement of series of failures. Neither I could rectify my own thought-process, nor overcome my own behavioural distortions throughout my life but only tried to preach others with a mouth too loud to tolerate.
I don't know any way out and I don't see any chance. But I wish to…
May I be helped !
Hopefully… your’s girijesh (9.3.15.)
https://www.facebook.com/photo.php…
वैसे इस तरह की आत्मालोचनाओं और आत्मस्वीकृतियों की बात आपके फेसबुक वाल पर कोई नयी चीज़ नहीं है और यह तो आप भी समझते हैं कि यह आपके लिए और दूसरों के लिए भी कोई महत्त्व नहीं रखती. वास्तव में अपनी असफलताओं को इस तरह के सतही विश्लेषण की पीछे छुपाने की कोशिश सच्चाई को और नग्नता से सामने ला पटकती है. अपनी व्यवहारिक गड़बड़ियों के पीछे सैद्धांतिक भटकाव के विश्लेषण से आँखे मूँद लेने की यह आदत समय समय पर इस तरह के अनर्गल प्रलापों के रूप में सामने आती रहती है. “मूंदहुँ आँख कतहूँ कछु नाहीं” की भाववादी प्रवृत्ति से चिपके रहने के बाद इस तरह का रोना-धोना आपको ही शोभा देता है.
आपके साथ पिछले मुलाकात के बाद मैंने खुद को एक लम्बा विश्राम लेकर सोचने का मौका दिया और इस दौरान कई बातें साफ़ हो गई. “मानवता की सेवा और दुनिया को बदल देने के लिए किये गए पहले प्रयोग (राहुल सांकृत्यायन जन इण्टर कॉलेज)” की असफलता को आपने किस रूप में सूत्रबद्ध किया और उनसे किन निष्कर्षों पर पँहुचे यह मैं नहीं कह सकता लेकिन दो धाराओं के बीच के संघर्ष में पराजित होने की बात कहकर आप इस पूरे प्रयोग की असफलता के विश्लेषण से बचते रहे हैं और अपने चारो ओर के उस भ्रम जाल को टूटने से बचाने की पूरी कोशिश करते रहे हैं जिनके बीच आप जी रहे हैं. वास्तव में आपके उस प्रयोग और आपके वर्तमान प्रयोग “व्यक्तित्त्व विकास परियोजना” की अंतर्वस्तु में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. वास्तव में यह क्रांति का ढोल पीटने वाले वाम और दक्षिणपंथी भटकावों, संशोधनवाद, से भी खतरनाक है. क्रांतिकारी संघर्षों से दूरी बनाते हुए क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व गढ़ने की यह दिशा ने व्यवस्था की सेवा करने वाले बेहतर व्यक्तित्त्व तैयार करने का कम, मुझे उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व होने का भ्रम नहीं है, लोगों के लिए कुछ कर देने का काम और उन्हें इसी व्यवस्था के भीतर झूठी उम्मीद का झुनझुना पकड़ा देने के काम को कोई क्रान्तिकारी काम नहीं कहा जा सकता. कम से कम मार्क्सवाद से तो इसका कोई लेना-देना नहीं है. उलटे यह किसी भी संभावना संपन्न व्यक्ति को मार्क्सवादी राजनीति से कोसों दूर ले जा कर खड़ा कर देती है और प्रायः उन्हें मानसिक अवसाद की तरफ धकेल देती है. व्यक्तित्त्व विकास परियोजना का काम का काम शुरू होने के कुछ ही समय पहले मैं आपसे जुड़ा था. इसकी पहली बैठक का ठीक ठीक समय बता पाने में मैं असमर्थ हूँ. आपके आलावा मेरे और कमोबेश मेरी ही उम्र के कुछ दूसरे नौजवानों के साथ व्यक्तित्त्व विकास परियोजना की शुरुआत हुई. अभी इसे एक संगठन भी नहीं कह सकते थे. हम नौजवानों में से कोई भी किसी विशेष राजनैतिक समझदारी से लैस नहीं था फिर भी हमने आपनी पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ इस काम को आगे बढ़ाया. क्योंकि एक सामान्य मध्यमवर्गीय चेतना के अनुसार यह एक ‘भला काम’ था जो क्रांतिकारी काम के छलावरण में लिपटा हुआ था. लेकिन आपने अपने इस “क्रांतिकारी प्रयोग” में जुटे किसी के भी राजनैतिक स्तरोन्नयन का काम नहीं किया. कुछ एक अध्ययन चक्रों को छोड़ दिया जाए तो उस दौर में हममें से अधिकतर ने अपनी समझदारी को उन्नत करने का प्रयास किताबी ज्ञान के जरिये ही किया. स्पष्ट था कि बिना किसी राजनैतिक चेतना के अलग अलग तरह के तत्वों को बांधे रखना सम्भव नहीं था. परिणामस्वरूप परियोजना के संचालन के लिए बनाई गई केन्द्रीय टीम के अलग अलग सदस्य समय पर अलग अलग समस्याओं से जूझते रहे और आपने अपनी स्थिति को सुरक्षित रखते हुए उनकी कम समझदारी का रोना रोते रहे. “पोलिटिक्स इन कमांड” का जाप करते हुए “मेन(men) इन कमांड” की घृणित कार्यप्रवृत्ति को व्यवहार में अपनाये रहना मुंह में राम बगल में छुरी जैसा ही था. “All my attempts and consequently my failures seem to be a shameless punishment of loving me for all those innocent and humble persons, who due to one or other reason came near at one or other turn of life and loved me selflessly.” अपने प्यार का हवाला देकर लोगों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की लिजलिजी प्रवृत्ति से आपके करीब आने वाले हर आदमी को जूझना पडा है. बी.एससी. की पढाई पूरी होने के बाद से ही मैं व्यक्तित्त्व विकास परियोजना के कामों में कोई प्रत्यक्ष भूमिका न निभाने के बावजूद मैं इससे पूरी तरह से अलगाव की स्थिति में भी नहीं था. मगर पिछली बातचीत ने मुझे अपनी स्थिति का एक बार फिर से समग्र मूल्यांकन करने पर विवश कर दिया.
पिछली मुलाकात के बाद जो सूत्र आपने दिया, वह तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद की पीठ में छुरा भोंकना ही था. वास्तव में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का सैद्धांतिक विकास बहुत सारी प्रवृत्तियों के साथ संघर्षों के दौरान ही हुआ है. क्रांतिकारी आन्दोलन के ठहराव या क्रांति पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होने के दौर में यह हमेशा होता रहा है कि क्रांतिकारी व्यवहार से कटे बुद्धिजीवी आन्दोलन के ठहराव का सम्यक और गहन विश्लेषण करने की बजाय मार्क्सवाद की उन शिक्षाओं पर ही हमला करने लगते हैं जिनके बगैर क्रांतिकारी आन्दोलन कभी खड़ा ही नहीं हो सकता. उदाहरण के लिये लेनिन के दौर में मेन्शेविक ऐसे ही निठल्ले बुद्धिजीवी थे जो लेनिन के पार्टी संबंधी सिद्धांतों को नकार कर दुअन्नी-चवन्नी छाप मेम्बरशिप वाली मॉस पार्टी की अवधारणा पेश कर रहे थे और यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि लेनिन के नेतृत्त्व में जब बोल्शेविक पार्टी क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर बढ़ रही थी तब इन मेंशेविकों ने सत्ता के एजेंटों की भूमिका निभाई. इसी तरह रूस और चीन में संशोधनवादी सत्ता के अस्तित्त्व में आने और खास तौर पर सोवियत संघ के विघटन के बाद पूरी दुनिया के निठल्ले बुद्धिजीवियों में लेनिन के पार्टी विषयक सैद्धान्तिक अवदानों को नकार देने का फैशन बहुत चलन में है. हास्यास्पद बात तो ये है कि किसी भी तरह के क्रांतिकारी प्रयोग खड़ा करने या किसी भी तरह की सैद्धान्तिक व्याख्या करने में अक्षम टुटपूंजिये भी अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्त्व हीनता को छिपाने के लिये फर्जी सिद्धांतों की आड़ लेने से बाज नहीं आते. क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में बार बार ऐसे मौके आते हैं जब लोग अपनी व्यावहारिक गड़बड़ियों के पीछे के सैद्धांतिक भटकावों की तलाश करने के बजाय सिद्धांत पर ही सवाल खड़े करने लगते हैं और प्रायः यह सामने आता है कि ये प्रवृत्तियाँ आन्दोलन के इतिहास में कई बार दुहराई जा चुकी होती हैं और उस ऐतिहासिक कथन पर सीधे सीधे खरा उतरती हैं जिसके अनुसार इतिहास की घटनाएँ जब दुहराई जाती हैं तो पहले तो वह त्रासदी और उसके बाद कॉमेडी के रूप में ही दुहराई जाती हैं. मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर कीचड़ उछालने की यह प्रवृत्ति ऐसे लोगों को उसी सड़ांध मारते दलदल में पंहुचा देगी जिसे वे अपने खलिहरपन को दूर करने के लिए अपने चारों ओर तैयार करते है और जिससे वे लगातार कीचड़ बटोर बटोर कर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के ऊपर फेंकते रहे हैं
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Anurag Pathak Apna new no de de
Girijesh Tiwari नमस्ते अमित, आपकी पोस्ट पढ़ी, बेहतर होता अगर हम आमने सामने बात करते. बात पोस्ट्स और कमेन्ट्स से कहीं अधिक है और कहीं अधिक महत्वपूर्ण भी हम दोनों के लिये ही.
Dhriti Pragya Singh अमित क्या यह उचित है कि हम बिना विचार विमर्श के अपने निजी विचार थोप दें किसी पर
अपनों का दुख सौ दुखों से भारी होता है बेटा
तुम एक बार बात तो करते
Bittu Singh Rathor bhaiya ji kaha par hai
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अमित पाठक की यह पोस्ट मेरे इस चित्र पर की गयी आत्मालोचना पर है.
अमित पाठक की यह पोस्ट मेरे इस चित्र पर की गयी आत्मालोचना पर है.





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