Thursday, 11 December 2014

____RAPE CASES & FALSE ALLEGATIONS____

good morning my dear friend, in our society now a days people have become mad to rape a girl and hang her with a rope from a tree. there are so many cases in previous months.

but there are many false allegations also against many young-men and gentlemen. Last evening one of my sons was blamed to mishandle a neighbor girl. the girl is minor. she is a student of class VI and was laughing after accusing him. she changed her statement twice. it was clear to every person listening the story that the allegation was totally baseless and false. her mother lives in this house with her two daughters and a son for their study. She was accusing and abusing continuously. when the boy was called. he explained the whole story. the statement of the mother and daughter of biting the boy changed twice. every boy is disturbed due to this baseless quarrel. the boy is in my touch since last three years. he is a well disciplined young-man. he has helped me a lot during these years and he does not bear involvement of any boy or girl in any kind of gossip while working. he often scolds the boys and girls not to waste their time and work seriously.

One of my friends Late Comrade Khurshid Anwar was blamed of rape by Madhu Kishwar and a caucus helping her. she is a high profile lady running an N.G.O. Khurshid Anwar was tortured badly for many months in every way possible by circulating the video of the girl's statement and writing against him on facebook by the gang behind the allegation. he was cornered so badly that he came to the last decision to commit suicide. He was a rebel pen-person writing continuously against all the wrongs in Islamic terrorism and could not be controlled by any threatening of the fanatic elements.

Eve-teasing, molestation, dowry torture and rape are serious blames and any girl can accuse any boy at any time and then none of us is ready to even listen explanations of the boy or man. everybody stands with the girl. two of my live friends have faced such allegations in last months.

the problem of rape - both real and false - is increasing badly daily. No body knows how to handle it. We are trying to create social awareness among the youth in every way possible in our limitations.
- girijesh

_____सवाल फैसले का : सलाह आपकी : तरीका जनवाद का_____

प्रिय मित्र, अचानक आज फिर एक निर्णय के दोराहे पर खड़ा हूँ. मुझे अपना मकान बदलना पड रहा है. जिस मकान में अभिषेक पण्डित जी सपरिवार किराये पर रहते हैं, उसमें उनके बगल वाले हिस्से में उनके साथ रहने के लिये उस मकान में 9000+बिजली का खर्च करने के पक्ष में निर्णय लिया जा रहा है.

जिस मकान में मैं पिछले तीन वर्षों से हूँ, इसमें कमरे छोटे हैं, जगह थोड़ी कम है, नमी, गन्दगी जैसी कुछ और असुविधाएँ हैं. और इसका किराया भी 4000+ बिजली था. उसका किराया 9000 + बिजली होगा. इस जगह से उसकी दूरी दस मिनट पैदल की है. उसमें इससे अधिक कमरे भी हैं, अधिक जगह भी है और बच्चों की साइकिलें खड़ी करने की भी भरपूर जगह है.

अगर इस फैसले पर कल शाम को मेरे बच्चे पर लगाये गये चरित्र सम्बन्धी झूठे आरोप की अचानक घटी घटना के कारण मुझे आज नहीं भी पहुँचना पड़ता, तो भी मुझे अपने विज्ञान-प्रयोगशाला और पुस्तकालय के लिये कम से कम एक और कमरा आने वाले दिनों में आस-पास भाड़े पर जुटाना ही पड़ता.

अब अचानक यह 5 हज़ार का बोझ हमारी 'Personality Cultivation Project व्यक्तित्व विकास परियोजना की अर्थव्यवस्था पर बढ़ने जा रहा है. इस परियोजना के केन्द्र में मेरी कामना है कि कुल लगभग 150+ (नौ, दस, ग्यारह, बारह और प्रतियोगिता के तीस-तीस के हिसाब से) बच्चे एक साथ निःशुल्क सीख सकें.

कृपया ध्यान दें कि यह पोस्ट मैं आप से पैसे की माँग करने की मंशा से नहीं लिख रहा हूँ. जैसा कि पिछले वर्ष त्रात्स्कीवादी राजेश त्यागी ने मेरे ऊपर आरोप लगाया था और अनेक मित्रों ने उनके उस गलत आरोप का खण्डन भी किया था.

इस मुद्दे पर जिन भी मित्रों का नम्बर मेरे पास थे, मैंने उन सबको इस आशय का एस.एम्.एस. किया. और उसके उत्तर के रूप में से मेरे दो बच्चों द्वारा एक-एक हज़ार के सहयोग का आश्वासन भी मुझे मिल चुका है.

यह पोस्ट मैं केवल आपकी सलाह लेने के लिये आप तक भेज रहा हूँ, ताकि यह फैसला भी मेरी ज़िन्दगी के दूसरे फैसलों की तरह ही जनवादी तरीके से लिया जाये. आप मेरे मित्र हैं और इसीलिये इस फैसले में भी आप का मत मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अभी तक के सभी फैसलों में रहता रहा था.

ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (26.9.14. शाम 5.21)

श्रीलंका का 'चे ग्वेरा' - रोहाना विजेवीरा

____पढ़ें और जानें____
कौन था श्रीलंका का 'चे ग्वेरा'? - चार्ल्स हैवीलैंड बीबीसी न्यूज, जाफ़ना, श्रीलंका 15 नवंबर 2014
रोहाना विजेवीरा

लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (लिट्टे) के उभार के दौरान ही श्रीलंका सरकार के ख़िलाफ़ एक और हथियारबंद संघर्ष हुआ था जिसके बारे में बाहरी दुनिया को बहुत कम मालूम है.
श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा ने सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ जनता को गोलबंद कर हथियारबंद संघर्ष छेड़ा था.
विजेवीरा क्यूबाई क्रांति के नायक चे ग्वेरा की तरह ही दिखते थे. एक ग़रीब परिवार में पैदा हुए विजेवीरा सोवियत संघ की यात्रा के दौरान स्टालिन से प्रभावित थे.
ग्रामीण और ग़रीब आबादी को गोलबंद कर उन्होंने श्रीलंकाई सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ दिया था.
दो बार तख़्तापलट की कोशिशों के बाद उन्हें पकड़ लिया गया और चे ग्वेरा की तरह उनकी मौत भी हिरासत में हुई.
इस संघर्ष में क़रीब 70,000 लोगों की जानें गईं.

पच्चीस वर्ष पहले, 13 नवंबर 1989 को इस खूनी संघर्ष को चलाने वाले कट्टर वामपंथी नेता रोहाना विजेवीरा की हिरासत में मौत हो गई थी.
बीबीसी विटनेस प्रोग्राम में बात करते हुए विजेवीरा के वकील और दोस्त प्रिंस गुनासेकरा ने बताया, "मैंने उनकी मृत्यु के बारे में सुना. असल में, हमें इसकी आशंका पहले से थी."
जब उत्तर की तरफ तमिल संघर्ष अपने उफान की ओर था तो देश के दक्षिणी हिस्से में भी हिंसा चरम पर थी. विजेवीरा की जनथा विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) या पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ने उन लोगों को मार डाला जो उनकी विचारधारा को नहीं मानते थे.
विजेवीरा श्रीलंका के सुदूर दक्षिण में एक कम्युनिस्ट ग्रामीण परिवार में 1943 में पैदा हुआ थे.
उनकी मृत्यु के बाद एक समय उनके सहकर्मी रहे विक्टर इवान ने लिखा है, "उनके माता-पिता ग़रीब और सामान्य थे."

चे ग्वेरा से प्रभावित
विजेवीरा ने सोवियत संघ की यात्रा की और स्टालिन से प्रभावित हुए. लेकिन, वो अपने लहराते बालों और लाल सितारे वाली गोल टोपी के साथ क्यूबाई क्रांति के हीरो रहे चे ग्वेरा की तरह दिखना पसंद करते थे. विजेवीरा की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और छह बच्चों को एक पोत में बंद कर दिया गया था, जिनका आज तक पता नहीं चला.

एक समय उनके वकील रहे पी राजानायागम कहते हैं, "वह बहुत करिश्माई और प्रभावशाली वक्ता थे और बिना किसी लिखित भाषण के ही तीन चार घंटे बोल सकते थे."
ग्रामीण और ग़रीब लोगों में उनका ख़ासा प्रभाव था.
हालांकि विजेवीरा की जनजातीय पहचान भी इसका एक कारण था. श्रीलंका (तब सीलोन) की आबादी एक मिश्रित जनजातीय आबादी थी और विजेवीरा का आधार बहुसंख्यक सिंघलियों के बीच अधिक था.

सत्ता को दोष
पढ़े-लिखे सिंघली अपनी बेरोज़गारी के लिए सत्ता को दोष देते थे.
वर्ष 1971 में विजेवीरा जेल में बंद थे और वहीं से उन्होंने विद्रोह को संचालित किया, लेकिन यह असफल रहा और जेवीपी के हज़ारों सदस्य मारे गए.
उस समय श्रीलंका में जेवीपी नेता के ख़िलाफ़ एक पोस्टर आम था- "बर्बरों को मारो."

प्रिंस गुनासेकरा - विजेवीरा के दोस्त और उनके वकील गुनासेकरा अब लंदन में रहते हैं.
वर्ष 1982 विजेवीरा ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा. हालांकि वह तीसरे नंबर पर रहे. 1980 के दशक के अंत में जेवीपी पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके बाद विजेवीरा एक बार फिर हिंसक विद्रोह की साजिश रचने लगे.

टॉर्चर
उनकी पार्टी का तर्क था कि लिट्टे के साथ शांति वार्ता चलाना सिंघलियों को बेचने जैसा है.
प्रिंस गुनासेकरा कहते हैं कि यह राष्ट्रपति ही थे जिन्होंने जेवीपी के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों को उकसाया.
जेवीपी में जो थे और जिनका उससे संबंध था उन्हें उठा लिया गया, टॉर्चर किया गया और मार दिया गया.
जेवीपी ने भिक्षुओं, शिक्षाविदों, यूनियन नेताओं, यहां तक कि अभिनेता से नेता बने लोकप्रिय विजया कुमारतुंगा की हत्या की. विजया की पत्नी चंद्रिका कुमारतुंगा बाद में राष्ट्रपति बनीं.
बीबीसी सिंघला के संपादक प्रियाथ लियानागे के अनुसार, "जेवीपी कंगारू कोर्ट लगाते थे तो सरकार के पास हत्या करने वाले गिरोह और उत्पीड़न केंद्र थे. वर्ष 1989 में यहां चारों ओर हिंसा थी."

लापता लोग
गुनासेकरा बताते हैं कि सरकार ने हरे-भरे जंगलों से लेकर बौद्ध विहारों तक पर बदले का कहर ढाया.
उन्होंने कहा कि जेवीपी समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया, उनका सिर क़लम किया गया और उनके सिरों को खंभों पर लटकाया गया.
उनके अनुसार, वर्ष 1989 में रोहाना विजेवीरा को एक चाय बगान में परिवार समेत गिरफ़्तार कर लिया गया और हिरासत में उनकी मौत हो गई.
जेवीपी का विद्रोह इस तरह ख़त्म हो गया, लेकिन सुरक्षा बल महीनों तक समर्थकों को तलाशते रहे. इनमें हज़ारों आज तक लापता हैं.

तस्वीर
हालांकि अब जेवीपी बहुत छोटी पार्टी हो गई है, लेकिन उसकी रैलियों में अभी भी रोहाना विजेवीरा की तस्वीर लगाई जाती है.
आज भी उसके कट्टर समर्थक मौजूद हैं.
एक अनुमान के अनुसार, इस हिंसा में लगभग 70,000 जानें गईं, लेकिन फिर भी लिट्टे की तरह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर कम ही गया.
विजेवीरा की मौत के समय राष्ट्रपति रहे प्रेमदासा और रक्षा मंत्री रंजन विजेरत्ने का बाद में लिट्टे ने हत्या कर दी.
 http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/11/141114_rohana_wijeweera_sri_lankan_stalinist_icon_sr

___ “TRUST NONE, BELIEVE EVERYONE !” ___

प्रिय मित्र,
आज एक बात कहने का साहस कर रहा हूँ. कई दिनों तक कई तरह से सोचने और और ख़ूब अच्छी तरह से विचार करने के बाद आज आपसे कहने की ज़ुर्रत कर पा रहा हूँ. यह जानते हुए भी कि आपको 'अच्छा' नहीं भी लग सकता है — कह रहा हूँ क्योंकि जानबूझ कर न कहना और भी बेईमानी लग रहा है.

हर आदमी अपनी प्राथमिकता और अवस्थिति स्वयं ही निर्धारित करता है और अपने ही चयन के अनुरूप आचरण करता है — चाहे वह छोटा बच्चा हो या तथाकथित परिपक्वता की उम्र तक पहुँचा हुआ हो, चाहे उससे उसे सुख मिले या दुःख, चाहे उसमें उसका हित हो या अहित, चाहे उसके चलते दूसरों का हित हो या अहित.

अगर वह थोड़ा समझदार है, तो भी वह तब तक अपनी अवस्थिति से तनिक भी हटने को तैयार नहीं होता, जब तक उसे अपने किये का परिणाम न मिल जाये. और अगर वह कम समझ रखता है, तब तो परिणाम सामने आने के बाद भी अपनी गति और दिशा नहीं बदल पाता. कई बार वह ख़ुद को बदलना ही नहीं चाहता. कई बार वह चाहता तो है मगर बदल नहीं पाता. उसकी आदतें और तौर-तरीक़े उसकी चाहत पर हर बार भारी पड़ते हैं.

गीता का यह श्लोक हमको अपनी सहायता करने की सलाह देता है. मगर क्या हम इस सलाह को लागू करते हैं. नहीं न !
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ६.५ ॥”
{अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है । (६.५)


Let a man lift himself by his own Self alone, and let him not lower himself; for, this Self alone is the friend of oneself, and this Self is the enemy of oneself. (6.5)}

स्पष्तः यह तथ्य सामने आता है कि ‘स्व’ के विरुद्ध संघर्ष की चर्चा व्यास से माओ तक सभी करते हैं. मगर समस्या तब भी वैसी ही थी, जैसी अभी है. इन्सान अभी भी दूसरों को ही नहीं, ख़ुद अपने आप को भी धोखा देने से बाज़ नहीं आ रहा.

जानते तो हम सभी हैं कि अकेले न तो तृप्ति मिल सकती है और न मुक्ति. छोटे-बड़े हर काम के लिये हमको अपने आस-पास के लोगों की मदद पर निर्भर करना पड़ता है. और लोग हैं कि कथनी-करनी का अन्तर पूरा-पूरा बनाये रखते हैं. लोग जैसा कहते हैं, करते उसके ख़िलाफ़ ही हैं. सब पर यकीन करने वाला मन बार-बार ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करता है. और फिर भी अगली बार ठगे जाने के लिये लोगों पर फिर से एक बार और यकीन करना शुरू करता है.

और फिर यह सूत्र सामने आता है — 
“TRUST NONE, BELIEVE EVERYONE !”
ये दोनों विचार देखने में तो परस्पर विरोधी लगते हैं. मगर वास्तव में ये दोनों ही परस्पर पूरक हैं. चूँकि हर काम में दूसरों से मदद लेनी ही पड़ती है, इसलिये सब पर यकीन भी करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता; और चूँकि लोगों की कृपा से अभी तक हर बार विफल होना पड़ा है, इसलिये एक-एक से सजग भी रहना ही पड़ता है. वस्तुतः ख़ुद अपने-आप पर भी विश्वास करने का साहस नहीं होता क्योंकि यह निश्चित नहीं होता कि अन्तिम फैसलाकून घड़ी में अपना ही शरीर और मन साथ देगा या दगा दे जायेगा.

जीवन की यह कैसी विडम्बना है !
ढेर सारे प्यार के साथ — आपका गिरिजेश (17.11.14.)

____ इन्कलाब ज़िन्दाबाद ! ____


प्रिय मित्र, मैं विनम्रता के साथ आपका अभिवादन कर रहा हूँ.
मैं आज एक बार फिर आप के साथ ज़िन्दगी के सच की चर्चा करना चाहता हूँ.
वर्तमान जनविरोधी व्यवस्था को धनतन्त्र कहते हैं.
समूची धरती पर आदमखोर भेड़ियों की हुकूमत है.
धरती का हमारा अपना हिस्सा भी इसका महज़ एक अंग है.

धरती के हर देश में हुकूमत करने वाले इन भेड़ियों के पास तरह-तरह के हथियार हैं.
वे उनमें से हर एक का इस्तेमाल करते चले जा रहे हैं.
उनका मकसद केवल एक है — अपनी हुकूमत को बनाये रखना.
अपनी हुकूमत कायम रखने के लिये वे किसी भी हद तक पतित होते रहे हैं.
मगर उनकी तो गिनती भी मुट्ठी भर से अधिक नहीं है.
झूठ उनका सबसे शातिर हथियार है.
अन्धविश्वास की ताकत उनकी ताकत है.

समूची धरती पर मेहनतकश इन्सानों की तादाद अरबों में है.
हमारे महान पुरखों ने एक से एक शानदार कारनामे किये हैं.
उनकी सारी की सारी कहानियाँ प्रेरक और रोमांचकारी हैं.
जन-सामान्य की ज़िन्दगी की भीषण यन्त्रणा को दूर करना ही हमारा मकसद है.
सच हमारा सबसे धारदार हथियार है.
विज्ञान की ताकत हमारी ताकत है.

समूची धरती पर आज संक्रमण का अभूतपूर्व दौर चल रहा है.
जीवन के समुद्र में ज्वार-भाटा जारी है.
जीवन जैसा कल था, वैसा आज नहीं है.
जीवन जैसा आज है, कल फिर निश्चय ही वैसा नहीं रहेगा.
युवा आज अधिक तेज़ रफ़्तार से सोच रहे हैं, देख रहे हैं, समझ रहे हैं.
युवा तूफ़ानी रफ़्तार से आने वाले दिनों में आगे बढ़ने जा रहे हैं.
युवाओं के तेवर पर ही मुझे भरोसा है.

इतिहास अगली करवट लेने जा रहा है.
इतिहास को रोका नहीं जा सकता.
इतिहास को पीछे नहीं ले जाया जा सकता.
इतिहास आगे ही बढ़ता है.
वे इतिहास की धारा के विरुद्ध हैं.
उनको प्रतिगामी कहते हैं.
हम इतिहास की धारा के साथ हैं.
हम प्रगतिशील कहे जाते हैं.

आज उनका है.
मगर कल हमारा था.
कल धरती पर मेहनतकश का लाल परचम लहराता था.
लाल परचम हमारे महान शहीदों के बलिदान की याद दिलाता है.
हमने जीवन-संग्राम में केवल मोर्चा हारा है, युद्ध नहीं.
99% मेहनतकश जन और 1% जन-शत्रुओं के बीच का वर्ग-संघर्ष कल भी जारी था.
वह वर्ग-संघर्ष वैसे ही आज भी जारी है.

कल फिर हमारा होगा.
कल फिर हमारी धरती पर हमारा लाल परचम लहरायेगा.
आइए, अनोखी आन-बान-शान वाले उस कल को साकार करने का सपना देखें.
आइए, अपने सपने को साकार करने के लिये जो भी कर सकते हैं, कर गुज़रें.
आज मुझे न जाने किसका लिखा यह शानदार शेर बेतहाशा याद आ रहा है.

हिसाब कर लो चाहे जैसे, चाहे जितना भी;
मुझे घटा क' तुम गिनती में रह नहीं सकते | — अज्ञात

ढेर सारे प्यार और पूरी उम्मीद के साथ — आपका गिरिजेश (22.11.14)

__भारतीय इतिहास के शिखर-पुरुष चाणक्य हैं मेरे आदर्श__


प्रिय मित्र,
ज़िन्दगी ज़हर है !
मगर है तो !
ज़हर ही नहीं, जंग भी है !
इतना अधीर मत होइए.
भरोसा रखिए ख़ुद पर और दोस्ती पर !
चलिए न, जो भी चाल आपकी कूबत में है.
चलिए और मुझे अपने तरीके से चलने दीजिए.
शायद अभी भी कुछ कर सकूँ.

पूरी दुनिया में पूँजी का राज है.
पूँजी स्वभाव से ही दोमुँही है !
जो भी कहती है, करती है ठीक उलटा.
दोहरी जुबान का मीठा ज़हर !
मधुर मुस्कान के पीछे जानलेवा साज़िश !
मुखौटे के छेदों के पीछे से घूरती निर्मम हत्यारे की शातिर आँखे !
दोहरी फ़ितरत वाले हैं पूँजी के पुजारी !
मुनाफ़ा ही है उनका ख़ुदा !
इसीलिये तो दोगले हैं धनपशु !
पूँजी का घिनौना चरित्र मुखौटों के पीछे छिपाये नहीं छिपता.
पूँजी की पूरी दुनिया ही दोगली होती है.

शातिर से डरना,
शातिर से भागना,
शातिर को शह देना है.
शातिर का शिकार करने का मन बनाना दिलेरी है.
शातिर का शिकार मासूमियत की बेवकूफ़ी के बस का है क्या !
नहीं न !
जूझना ही होगा !

और इन्कलाबी हाथ-पैर में पत्थर बाँध कर समुद्र में नहीं कूदते.
जूझना है,
क्योंकि लक्ष्य पवित्र है.
अगर केवल लक्ष्य पवित्र है,
तो भी चलेगा !
साधन नहीं भी होगा, तो भी चलेगा !
मन कलुषित तो नहीं,
मंशा दोहरे दोगले लोगों से मानवता को मुक्त कराने की तो है,
साथ जो भी दे, जितना भी दे, जब भी दे...
साधन जो भी मिलेगा, जितना मिलेगा, जब भी मिलेगा,
भागूँगा नहीं,
लडूँगा ही उससे !

न्याय की देवी अन्धी है.
न्याय की आस लिये अदालत नहीं जाऊँगा.
हाथ-पैर दिमाग ही से लडूँगा.
शिकार को 'शातिर' कह कर छोडूँगा नहीं.
उसको परास्त करना है,
तो उससे अधिक चालाकी चाहिए.
भारतीय इतिहास के शिखर-पुरुष चाणक्य हैं मेरे आदर्श.

जब भी मौका मिला,
कुछ लोगों की धुलाई भी करता ही रहा हूँ.
आगे भी मौका मिलेगा ही,
आगे भी धुलाई करूँगा ही.
तब तक घात लगा कर धीरे-धीरे ही चल सकता हूँ.

कभी गुहार लगाऊँ,
तो मदद कीजियेगा.
अगर मेरी कोशिश तनिक भी सफल हो सकी,
तो मुझे नहीं,
उसका श्रेय आपको ही मिलेगा.

ढेर सारा प्यार 

– अब तक की तरह ही अभी भी आपका ही गिरिजेश (1.12.14)

___संक्रमण का दौर और एकजुटता का सवाल___

प्रिय मित्र,
आज पूरी दुनिया में अतिमहाबली अमेरिका की चौधराहट वाली लुटेरी व्यवस्था है.
आज हमारे देश में परिधान-मन्त्री मोदी की सत्ता है.
उनका दृष्टिकोण अन्धहिन्दूवादी दृष्टिकोण है.
उनकी विचारधारा साम्प्रदायिकतावादी विचारधारा है.
दिल्लीश्वर की सत्ता मनमाने तरीके से हमारे इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने में लगी है.
साहेब की सरकार पिछली सरकार से भी अधिक तेज़ गति से राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध सन्धियाँ करने और जनविरोधी नीतियाँ बनाने में लगी है.
मोदीवादी स्वर और भी ज़ोर-शोर के साथ जन-सामान्य में दुर्भावना फ़ैलाने की हर मुमकिन साज़िश और बयानबाज़ी कर रहे हैं.
आम इन्सान पहले से ही महँगाई, बेरोज़गारी और भ्रस्टाचार से त्रस्त है.
आम इन्सान की रोज़-ब-रोज़ की ज़िन्दगी को और भी तकलीफ़देह बनाने की मंशा से सत्ता बाज़ार की लुटेरी शक्तियों को और भी बढ़ावा दे रही है.
इस तरह हर क़दम पर मोदीवादियों का हस्तक्षेप अनुचित, अपमानजनक और असह्य है.

आज विश्व-पटल पर सन्नाटा पसरा है.
ऑकुपाई आन्दोलन और अन्ना-आन्दोलन के दौर का जन-ज्वार बीते कल की कहानी बन चुका है.
इतिहास अगले जन-उभार की बेचैनी के साथ प्रतीक्षा कर रहा है.
आज का दौर इतिहास के संक्रमण का दौर है.
संक्रमण के इस दौर की व्यवस्था-जनित विकृतियों का समाधान प्रस्तुत करने का ऐतिहासिक दायित्व हमारे सामने है.
विचारधारात्मक विच्युतियों ने हमारे देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन की अपूरणीय क्षति की है.
इन विचलनों से मुक्त होकर क्रान्तिकारी परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार करने की चुनौती हमारी आँखों में घूर रही है.

मेरे सामने तीन प्रश्न हैं.
ये प्रश्न मुझे लगातार मथते रहते हैं.
पहला प्रश्न है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के सर्वाधिक विकसित चिन्तन को परम्परावादी चिन्तन, आचरण और अनुकरण के मकड़जाल में उलझ कर परेशान हो रहे भोले-भाले मासूम जन-सामान्य तक कैसे पहुँचाया जाये !
दूसरा प्रश्न है कि सभी प्रतिबद्ध और ईमानदार जनपक्षधर शक्तियों और व्यक्तियों को एकजुट करने के लिये वर्तमान परिस्थिति में क्या और कैसे किया जाये !
तीसरा प्रश्न है कि ऐसे लोगों का क्या किया जाये, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ख़ूब अच्छी तरह जान-समझ चुके हैं. मगर अपनी व्यक्तिगत व्यवस्था को हर तरह से चाक-चौबन्द करने में ही रात-दिन लगे रहते हैं. ऐसे लोग अपना किसी तरह का नुकसान किये बिना क्रान्ति के नाम पर केवल ज़बानी जमाखर्च करते रहना चाहते हैं. इनके दोहरेपन से होने वाले नुकसान से अपने आन्दोलन को कैसे बचाया जाये !

मुझे लगता है कि अगर हम इन तीन प्रश्नों के सन्तोषजनक समाधान प्रस्तुत कर सके, तो आज की वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगे.
यदि हम सहमत हैं, तो एकजुटता के लिये एक बार और पहल लेनी होगी.
यदि हम सहमत हैं, तो एक साथ मिल-बैठ कर विचार-विमर्श करना होगा.
यदि हम सहमत हैं, तो एक साथ खड़े होकर प्रतिवाद के स्वर को और सशक्त बनाना होगा.
आपके विचारों का स्वागत है.
आपसे पहल की उम्मीद है.
ढेर सारे प्यार एक साथ –– आपका गिरिजेश (4.12.14)