Monday, 28 July 2014

रमज़ान में रोटी !

Photo: रमज़ान में रोटी !
रोटी और संसद – धूमिल 
"एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ –
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।"

रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी के बारे में 
जो सवाल संसद से धूमिल ने पूछा था, 
उसका जवाब वक़्त ने दे दिया. 
उसका नाम है – शिव-सेना का अन्ध-हिन्दूवादी नेता ' !!

(17 जुलाई को दिल्ली के नवमहाराष्ट्र सदन में हुई घटना असामाजिक, असभ्य और ग़ैरक़ानूनी है क्योंकि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि राजन विचारे ने एक सरकारी कर्मचारी के मुंह में जबरन रोटी ठूंसने की कोशिश की, जैसा टीवी चैनलों ने दिखाया. 
यह घटना निंदनीय और घृणित हो जाती है जब उस कर्मचारी का नाम अरशद ज़ुबैर होता है, और चल रहे रमज़ान के महीने में वह रोज़ा रखे हुए होता है.
उसका नाम सरकारी वर्दी पर लिखा होता है लेकिन वहां मौजूद 11 सांसदों में से एक भी उसे पढ़ नहीं पाता, पढ़ना नहीं चाहता.)


रमज़ान में रोटी !
रोटी और संसद – धूमिल
"एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ –
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।"

रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी के बारे में
जो सवाल संसद से धूमिल ने पूछा था,
उसका जवाब वक़्त ने दे दिया.
उसका नाम है – शिव-सेना का अन्ध-हिन्दूवादी नेता ' !!

(17 जुलाई को दिल्ली के नवमहाराष्ट्र सदन में हुई घटना असामाजिक, असभ्य और ग़ैरक़ानूनी है क्योंकि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि राजन विचारे ने एक सरकारी कर्मचारी के मुंह में जबरन रोटी ठूंसने की कोशिश की, जैसा टीवी चैनलों ने दिखाया.
यह घटना निंदनीय और घृणित हो जाती है जब उस कर्मचारी का नाम अरशद ज़ुबैर होता है, और चल रहे रमज़ान के महीने में वह रोज़ा रखे हुए होता है.
उसका नाम सरकारी वर्दी पर लिखा होता है लेकिन वहां मौजूद 11 सांसदों में से एक भी उसे पढ़ नहीं पाता, पढ़ना नहीं चाहता.)

"ये सच है कि शिवसेना का रवैया मुसलमानों के प्रति कठोर रहा है. ये भी सच है कि प्रवीण तोगड़िया जैसे नेताओं के ज़हरीले बयान नज़रअंदाज़ किए जाते हैं. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि हम भी हर घटना को हिंदू-मुसलमान के नज़रिए से देखने के आदी हो गए हैं. ये नज़रिया शिवसेना के व्यवहार से भी ख़तरनाक है...."http://beyondheadlines.in/2014/07/editorial-2/

रोज़ी (रोज़ा) रोटी, सेना और मीडिया

आ रे नौजवान ! – इप्टा

Photo: आ रे नौजवान !
आ रे नौजवान, तेरी बेड़ियाँ रही हैं टूट;
क्रान्ति का नया कदम बढ़ा तू....
क्रान्ति का नया कदम बढ़ा !

बढ़ रहा है आज तेरा कारवाँ,
सर झुका रहा जमीन को आसमाँ;
राह की सफों को तूने कर लिया है पार,
सामने की मंजिलें रहीं तुझे पुकार....

उठ गुला....म ! उठ गुलाम !
उठ गुलाम ! ज़िन्दगी के बन्धनों को तोड़ दे;
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे !
आ रे नौजवान…

अब सुना न जुल्म की कहानियाँ,
दाँव पर लगा दे नौजवानियाँ;
ख़त्म हो चली हैं ऐश-ओ-हुक्मरानियाँ,
ख़त्म हो चली हैं ये वीरानियाँ....

उठ गुला....म ! उठ गुलाम !
उठ गुलाम ! ज़िन्दगी के बन्धनों को तोड़ दे;
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे !
आ रे नौजवान…

–  इप्टा

आ रे नौजवान !
आ रे नौजवान, तेरी बेड़ियाँ रही हैं टूट;
क्रान्ति का नया कदम बढ़ा तू....
क्रान्ति का नया कदम बढ़ा !

बढ़ रहा है आज तेरा कारवाँ,
सर झुका रहा जमीन को आसमाँ;
राह की सफों को तूने कर लिया है पार,
सामने की मंजिलें रहीं तुझे पुकार....

उठ गुला....म ! उठ गुलाम !
उठ गुलाम ! ज़िन्दगी के बन्धनों को तोड़ दे;
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे !
आ रे नौजवान…

अब सुना न जुल्म की कहानियाँ,
दाँव पर लगा दे नौजवानियाँ;
ख़त्म हो चली हैं ऐश-ओ-हुक्मरानियाँ,
ख़त्म हो चली हैं ये वीरानियाँ....

उठ गुला....म ! उठ गुलाम !
उठ गुलाम ! ज़िन्दगी के बन्धनों को तोड़ दे;
चल सुबह की रौशनी में डगमगाना छोड़ दे !
आ रे नौजवान…

"हम आज़मगढ़िया नौजवान !" — Kamla Singh 'तरकस'

Photo: "हम आज़मगढ़िया नौजवान !"  —  Kamla Singh 'तरकस'
हम आज़मगढ़िया नौजवान, मुश्किल है अपना वर्तमान;
आतंकवाद की नहीं खान, अपने भी पुरखे थे महान;
ऊसर की मड़ई में मकान, अलबेली अपनी आन-बान;
हम रहते हैं तमसा-तीरे, बढ़ रहे क़दम धीरे-धीरे;
तमसा लहरों की छिड़ी तान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

राहुल शिबली हरिऔध नाम, शैदा कैफ़ी गुरुभक्त श्याम;
साहित्य-जगत में रहा मान, हरिहरपुर का संगीत-गान; 
है यहाँ शहीदानी मस्ती, सौदागर सिंह की यह बस्ती;
मिट्टी की भी पहिचान बनी, है होड़ काल के साथ ठनी;
इतिहास कर रहा है बखान हम आज़मगढ़िया नौजवान !

काली मिट्टी की पात्र-कला, पुश्तैनी है प्रख्यात कला;
बर्तन निज़ामबादी तमाम, है दूर-दूर मशहूर नाम;
बुनकर लोगों की रही भूमि, शायद कबीर की यही भूमि;
सठियाँव निकट का लहरपार, है यहीं मुबारकपुर बाज़ार;
रेशमी साड़ियों की है खान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

शिक्षा में है हो रहा पतन, मिट्टी में मिल खो रहे रतन;
खो गयी कहाँ है आज अकल, सबके सिर पर है चढ़ी नक़ल;
ट्यूशनी पढ़ा पढ़ रहे छात्र, शिक्षा लेने के सभी पात्र;
इसकी उसकी औकात जान, दर्जनों चल पड़ी हैं दुकान; 
सिखलाता कोई नहीं ज्ञान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

हैं यहाँ कई तो अस्पताल, पर ठीक नहीं है हाल-चाल;
हैं कई निजी, कुछ सरकारी, पर जान बचाना है भारी,
निर्धन, बीमार, गँवार शहर, झोलाछापों पर ही निर्भर;
मासूमों को ही है ठगती, मन्दिर-मस्जिद में है बसती; 
ओझा-सोखा की भी दूकान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

बाज़ार यहाँ दूकान यहाँ, रिश्वत का कारोबार यहाँ;
गायब उद्यम औ’ रोज़गार, धन्धे अवैध बढ़ते अपार;
बैंकों का कोई नहीं अर्थ, ग्रामीण गरीबों को है व्यर्थ;
धनिकों को ही देते हैं धन, है सूदखोर का खूब चलन;
विकलांग बना शासन-विधान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

हो रहा पलायन घोर नरक, लुधियाना, दिल्ली, सउदी तक;
पत्नी-बच्चे, माँ-बाप छोड़, रोटी की करने चले होड़;
रोती ममता दिल रहे टीस, शोषण की चक्की रही पीस;
ज़िन्दगी पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ी, यातनापूर्ण ही हर सीढ़ी;
हर पल उत्पीड़न कठिन प्रान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

है गढ़ा जा रहा फिर यह गढ़, होगा जो निश्चय ही बढ़-चढ़;
कुछ कदम चल पड़े आगे बढ़, रचने को कल का आज़मगढ़;
जो जुटा सकेगा पुनः मान, देगा भविष्य ही समाधान;
आँखों में अपनी हैं सपने, यूँ जूझ रहे हैं सब अपने; 
अब तो ज़िद में है लिया ठान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

हम आज़मगढ़िया नौजवान, मुश्किल है अपना वर्तमान;
आतंकवाद की नहीं खान, अपने भी पुरखे थे महान;
ऊसर की मड़ई में मकान, अलबेली अपनी आन-बान;
हम रहते हैं तमसा-तीरे, बढ़ रहे क़दम धीरे-धीरे;
तमसा लहरों की छिड़ी तान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

राहुल शिबली हरिऔध नाम, शैदा कैफ़ी गुरुभक्त श्याम;
साहित्य-जगत में रहा मान, हरिहरपुर का संगीत-गान;
है यहाँ शहीदानी मस्ती, सौदागर सिंह की यह बस्ती;
मिट्टी की भी पहिचान बनी, है होड़ काल के साथ ठनी;
इतिहास कर रहा है बखान हम आज़मगढ़िया नौजवान !

काली मिट्टी की पात्र-कला, पुश्तैनी है प्रख्यात कला;
बर्तन निज़ामबादी तमाम, है दूर-दूर मशहूर नाम;
बुनकर लोगों की रही भूमि, शायद कबीर की यही भूमि;
सठियाँव निकट का लहरपार, है यहीं मुबारकपुर बाज़ार;
रेशमी साड़ियों की है खान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

शिक्षा में है हो रहा पतन, मिट्टी में मिल खो रहे रतन;
खो गयी कहाँ है आज अकल, सबके सिर पर है चढ़ी नक़ल;
ट्यूशनी पढ़ा पढ़ रहे छात्र, शिक्षा लेने के सभी पात्र;
इसकी उसकी औकात जान, दर्जनों चल पड़ी हैं दुकान;
सिखलाता कोई नहीं ज्ञान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

हैं यहाँ कई तो अस्पताल, पर ठीक नहीं है हाल-चाल;
हैं कई निजी, कुछ सरकारी, पर जान बचाना है भारी,
निर्धन, बीमार, गँवार शहर, झोलाछापों पर ही निर्भर;
मासूमों को ही है ठगती, मन्दिर-मस्जिद में है बसती;
ओझा-सोखा की भी दूकान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

बाज़ार यहाँ दूकान यहाँ, रिश्वत का कारोबार यहाँ;
गायब उद्यम औ’ रोज़गार, धन्धे अवैध बढ़ते अपार;
बैंकों का कोई नहीं अर्थ, ग्रामीण गरीबों को है व्यर्थ;
धनिकों को ही देते हैं धन, है सूदखोर का खूब चलन;
विकलांग बना शासन-विधान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

हो रहा पलायन घोर नरक, लुधियाना, दिल्ली, सउदी तक;
पत्नी-बच्चे, माँ-बाप छोड़, रोटी की करने चले होड़;
रोती ममता दिल रहे टीस, शोषण की चक्की रही पीस;
ज़िन्दगी पीढ़ियाँ-दर-पीढ़ी, यातनापूर्ण ही हर सीढ़ी;
हर पल उत्पीड़न कठिन प्रान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

है गढ़ा जा रहा फिर यह गढ़, होगा जो निश्चय ही बढ़-चढ़;
कुछ कदम चल पड़े आगे बढ़, रचने को कल का आज़मगढ़;
जो जुटा सकेगा पुनः मान, देगा भविष्य ही समाधान;
आँखों में अपनी हैं सपने, यूँ जूझ रहे हैं सब अपने;
अब तो ज़िद में है लिया ठान, हम आज़मगढ़िया नौजवान !

Sunday, 20 July 2014

____“बिलबिलाती जा रही है आज मेधा...” – गिरिजेश____


लगे थे चुपचाप कितने वर्ष
जब था साधना में लीन
तन-मन अनवरत मेरा,
तो उगी थी एक मेधा इस तरह
जैसे उगा सूरज, दिशा पूरब
लाल हो कर निखर आयी.

और मेधा बढ़ी, बढ़ती गयी आगे,
तोड़ कर अवरोध पथ के,
ख़ूब मेहनत से पढ़ाई की,
जगी वह रात-दर-हर रात,
खपाये साधना में दिन, गुज़ारे वर्ष,
खुली आँखों बसे थे स्वप्न
केवल सफलता के,
सफल हो कर बनेगी और सक्षम,
और उसके बाद बेहतर कर सकेगी,
सदा सेवा दुखी, पीड़ित मनुजता की.

निकाला रिटेन जब प्रतियोगिता का,
हुए हर्षित सभी परिजन,
दिया सबने बधाई,
उमग आये सभी के मन,
लगा सबको कि अब साकार होंगे,
स्वप्न जो अब तक बसे थे,
सभी आँखों की चमक में.

और आया आख़िरी अवरोध को भी
पार करने का जो मौका,
तब सभी ने दी दुआएँ...
हुआ इण्टरव्यू,
बहुत-से प्रश्न पूछे गये,
दिये उत्तर सही सब के.
मुदित था मन
कर रहा केवल प्रतीक्षा
चयन के परिणाम का अब.

और जब परिणाम आया,
हुआ अचरज,
अरे कैसे हुआ ऐसा !
क्यों नहीं हो सका उस का ही चयन !
चयन कैसे और क्यों कर हो गया
उन सभी का ही
था कि जिनके पास स्थानीयता का,
या पहुँच की पैरवी का,
या कि पैसे की चमक का,
कुटिल बल –
जिसने ख़रीदा
उन दिमागों को
जिन्होंने घोषणा की.

और बैसाखी लगे कन्धे खड़े थे,
जो कदम चल ही नहीं सकते कभी भी,
उन्हें घोषित कर विजेता,
तन्त्र के उद्घोषकों ने,
कर दिया वध न्याय का ही !

गूँजता है महज़ अब
मथ रहा मन को हमेशा ही
घोषणा का दम्भ-पूरित स्वर,
और मेधा बिलबिलाती जा रही है...

सहन होती नहीं अब यह दुर्व्यवस्था,
क्या बचा है भ्रम तनिक भी
न्याय को लेकर व्यवस्था के विषय में !
कौन-सा लक्षण दिखाई दे रहा है मनुजता का !
एक भी तो नहीं मुझको दिख रहा है.
है लगाना मुझे भी अब ज़ोर
सबके साथ मिल कर
ताकि मटियामेट हो
यह जन-विरोधी दुर्व्यवस्था !

20.7.14. (10.30.a.m.)

Saturday, 12 July 2014

#कल्पनातीत_भविष्य_बनाम_शिक्षा_के_तन्त्र_और_तन्त्र_की_शिक्षा_का_सवाल !


हिमांशु कुमार जी मेरे मित्र हैं.
मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला.
आज मैंने उनसे बात भी की.
मैं समझता हूँ कि हम सब 'शिक्षा के तन्त्र और तन्त्र की शिक्षा' के दोहरे पाटों में पीसे जा रहे हैं.
हमारे बच्चे हमसे दूर होते जाने के लिए बाध्य हैं.
वे मन से इस तन्त्र के चाकर बनते रहेंगे.
हमारे सामने चुनौती है कि हम उसी तरह एक बार फिर जनपक्षधर शिक्षा-संस्थानों को खडा करने का प्रयास करें, जैसा हमारे देश की आज़ादी की जंग के दौरान किया गया था.
'नेशनल कॉलेज, लाहौर' और 'डी.ए.वी. कॉलेज' जैसे.
जिसमे से नये इन्सान गढ़े जा सकें.
जब तक ये संस्थान नहीं खड़े होते हैं, तब तक हमारे बच्चों को सही पढ़ाई का सम्मानपूर्ण हक़ कैसे मिले - यह प्रश्न लगातार दिमाग में कौंधता रहता है और दिल में करकता रहता है.
मेरा अपना '#राहुल_सांकृत्यायन_जन_इण्टर_कॉलेज' का प्रयोग अन्तर्वस्तु में सफल होते हुए भी लाभ-लोभ के चक्कर चलाने वाले व्यवस्था-वादियों के हाथ लग कर अपनी परिवर्तनकारी भूमिका से पतित हो चुका है.
अब '#व्यक्तित्व_विकास_परियोजना' की टोली के युवा क्या और कितना कर सकेंगे - इसका मूल्यांकन भविष्य के गर्भ में है.
और भविष्य कल्पनातीत होता रहा है.

मुझे अपनी वर्तमान सीमाओं पर क्षोभ है.
मेरे प्यारे दोस्तो, मेरी मदद कीजिए !

Himanshu Kumar -
"इस नेता को मत चुनो
क्यों ?
क्योंकि उसने हजारों निर्दोषों को मरवाया था .
तो क्या हुआ वो मुझे नौकरी दिलवाएगा
तुम्हे ये क्रूर नेता नौकरी कैसे दिलवाएगा ?
ये नेता उद्योगपतियों की सारी परेशानियों को दूर कर देगा
नए नए उद्योग खुलेंगे , नई नई नौकरियां निकलेंगी , मुझे भी नौकरी मिल जायेगी .

क्या तुम्हारे लिए नौकरी ही सब कुछ है ?
हाँ मेरे लिए मै ही सब कुछ हूँ .
अगर मेरे पास नौकरी नहीं होगी तो मैं गरीब रह जाऊंगा , आप मुझे बेकार ज़ाहिल और नीच मानेंगे .
मेरे पास नौकरी नहीं होगी तो मै फेसबुक पर आप के साथ बात भी नहीं कर पाऊंगा . मै क्या सोचता हूँ ये किसी को भी पता नहीं चलेगा , मै बेनाम और बेकार बना रहूँगा .मेरी शादी नहीं होगी , मेरा परिवार नहीं होगा .इसलिए मुझे नौकरी चाहिए .

तुम जानते हो की तुम्हें नौकरी देने वाले उद्योगपति तुम्हारे इस क्रूर नेता के साथ मिल कर गरीबों की ज़मीनें छींनेंगे, गरीबों को मारेंगे तब अपना उद्योग लगायेंगे ?
ये सब रोकना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है ,मुझे अपनी ज़िन्दगी का देखना है , मुझे नौकरी चाहिए बस .

क्या तुम्हे मालूम है तुम्हारे नेता की विचारधारा क्या है .
मुझे उसकी विचारधारा से कुछ लेना देना नहीं है .
क्या विचारधारा कुछ नहीं होती ?
विचारधारा अपने हालात से पैदा होती है , मेरे हालात में यही विचारधारा जन्म लेगी, जो आज मेरी है . .
तुम्हारा नेता तुम्हारे धर्म का नहीं है .
तो क्या हुआ धर्म मुझे नौकरी तो नहीं दे देगा ?
तुम्हारे नेता की जाति भी अलग है .
कोई बात नहीं मुझे जाति की नहीं खुद की चिंता है .

इस तरह देश से पहचान आधारित राजनीति समाप्त हुई और पूंजीवादी बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था ने राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया ."
हम अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा दिला रहे हैं जो उन्हें शिक्षित होने के बाद एक अदद नौकरी के लिए तैयार कर रही है .

हमारे बच्चों को पता है कि उन्हें नौकरी या तो सरकार देगी या पूंजीपति .

इसलिए हमारे बच्चे उस सरकार ही को चुनेंगे जो पूंजीपतियों का साथ दे .

इस शिक्षा प्रणाली में पढ़ कर बच्चे पूंजीपतियों के गुलामों को ही वोट देंगे .

अब आपकी समझ में आया कि ये मनमोहन ,चिदम्बरम या मोदी क्यों इस देश के भाग्य विधाता बन रहे हैं ?

इस बीच एक महीने पहले से छोटी बेटी हरिप्रिया ने स्कूल जाना बंद कर दिया है .

अब वो घर पर ही सब कुछ खुशी से सीख रही है .

सुबह धान लगाने के लिए गाँव में गयी है .

मिट्टी की दीवारों पर चित्र बना रही है .

मैं संतुष्ट हूँ .

क्रान्ति और कैरियर का सवाल : आत्मनिर्णय का अधिकार





















क्रान्ति और कैरियर का सवाल :
आत्मनिर्णय का अधिकार - गिरिजेश
 

प्रिय मित्र, युवा आदर्शवादी होते हैं. युवा भावुक होते हैं. युवा ईमानदार होते हैं. युवा स्वाभिमानी होते हैं. युवा रोमांचकारी कारनामों के प्रति आसानी से आकर्षित हो जाते हैं. युवा विपरीत परिस्थितियों की तनिक भी परवाह नहीं करते. युवा वर्तमान की विसंगति से क्षुब्ध होते हैं. युवा दुनिया को बदलने को आतुर होते हैं. युवाओं के अपने ख़ुद के भी सपने होते ही हैं.

परन्तु इन सब के बावज़ूद किसी भी माध्यम से जनपक्षधर प्रगतिशील वैज्ञानिक विचारधारा के सम्पर्क में आ जाने के बाद युवाओं के लिये अपना कैरियर बनाने के ख़िलाफ़ और होलटाइमर बनाने के पक्ष में दशकों से क्रान्तिकारी कतारों में चुभने वाली तीख़ी टिप्पणियाँ सुनते-करते और इस मुद्दे पर अपना प्रतिवाद दर्ज़ कराते समय हर बार मेरा केवल एक ही तर्क रहा है कि प्रतिबद्धता किसी बन्धन को सहन नहीं करती. न ही नौकरी के बन्धन को और न ही कन्धे से झोला लटकाते ही उपदेशक बन जाने वाले आत्म-मुग्ध क्रान्ति-दूतों के बड़बोलेपन को. 

अपने देश की क्रान्तिकारी धारा में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिनमें क्रान्तिकारी चेतना के प्रसार का वाहक प्रतिबद्ध व्यक्ति अपनी निज़ी ज़िन्दगी जीते हुए भी इतना अधिक योगदान कर ले जाता है, जितना मेरे जैसे अनेक मूर्ख और अव्यावहारिक होलटाइमर मिल कर भी नहीं कर पाते. मेरी समझ है कि आप अपने प्रवचन से उकसा कर किसी को भी 'ज़बरन' भगत सिंह नहीं बना सकते. और अगर कोई युवा आपके तथाकथित क्रान्ति के ग्लैमर के झाँसे में फँस भी गया, तो भी वह अधिक देर तक टिक नहीं पाता. होलटाइमर के जीवन की यन्त्रणा से त्रस्त होकर पीछे हटने का मौका पाते ही वह अपना रास्ता चुन ही लेता है. और उसका ऐसा करना कहीं से भी अनुचित और ग़लत नहीं है. किसी को भी किसी भी तरह से उस पर कटाक्ष करने का कोई हक़ नहीं बनता.

प्रत्येक व्यक्ति का आत्मनिर्णय का अधिकार चिन्तन और निर्णय की जनवादी प्रक्रिया में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखता है. और आत्मनिर्णय का वही अधिकार किसी भी युवा के लिये अपने जीवन के बारे में इस सबसे महत्वपूर्ण निर्णय में अपना पक्ष चुन लेने के समय भी सबसे महत्वपूर्ण होता ही है. जो 'भगत सिंह' बनना चाहेगा, उसे कोई रोक भी नहीं सकता. और जो ईमानदार अफ़सर बन कर अपने भ्रष्ट अधिकारी के अनुचित आदेशों का पालन करने या फिर इससे इन्कार करने पर बार-बार के अपने तबादलों से तंग रहने और तनावग्रस्त करते रहने वाली नौकरी करना चाहेगा या बेईमान अफ़सर बन कर घूसखोरी करना चाहेगा, उसे कोई 'भगत सिंह' भी नहीं बना सकता. 

मेरी समझ है कि हमारा दायित्व केवल हर युवा को जीवन के सत्य का साक्षात्कार करा देने और उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस कर देना भर है. उसके बाद हमारा दायित्व उसके प्रत्येक उचित और जनपक्षधर निर्णय और आचरण के साथ मजबूती से खड़ा रह कर उसका मनोबल बढ़ाना और उसकी हर एक जनविरोधी सोच और करनी-करतूत का पूरी शिद्दत से विरोध करना ही बनता है.
ढेर सारे प्यार के साथ - आपका गिरिजेश (9.7.14.)

Ashok Azami - "अगर अफ़सरी के लिए लड़ रहे छात्रों का समर्थन सही नहीं है तो सत्ता परिवर्तन (यानि सत्ता हासिल करने की लड़ाई) के लिए होने वाले इन्कलाब का समर्थन तो अपराध होना चाहिए.


"बरिस अठारह छत्री जीये, आगे जीये तो धिक्कार..!"



मेरे प्यारे आदम,
तुम्हारा यह प्यार-वार तो सब बहुतै ठीक है.
क्या कहना तुम्हारे अन्दाज़-ए-बयाँ का !
मैं तुमसे पूरी तरह संतुष्ट हूँ !
तुम्हारे कड़ी कसरत से कमाये गये ताकतवर शरीर से,
तुम्हारी धार से, तुम्हारी ऊँचाई से, तुम्हारी लोकप्रियता से,
और सबसे अधिक तुम्हारे स्वनिर्मित बहुआयामीय व्यक्तित्व से !

मगर प्यारे, लगता है एक चूक हो गयी आज तुमसे !
मुझे लगता है तुमको मेरी उमर के बारे में शायद सटीक अन्दाज़ नहीं है....
तुमको भी मुझे यही लगता है कि भरम हो गया है कि 'तुम्हारा गुरुवा' 'बुढऊ' हो गया है....

आओ तुमको आज एक रहस्य बताता हूँ....
देखो, यह रहस्य अपने तक ही महदूद रखना...
किसी और को पता न चलने पाये...
वरना बात चोटा की तरह पसर कर सब तरफ़ फैल जायेगी...
और तब मेरा इतना गुप्त रहस्य पूरी तरह खुले रहस्य में तब्दील हो जायेगा...
बात फैल जाने पर रहस्य को गुप्त रखने का का सारा मज़ा किरकिरा हो जायेगा....

मेरा 'सफ़ेद-सफ़ेद मेकअप' बहुतों को गफ़लत में डाल देता है...
इसे देख कर एक 'सीनियर सिटिज़न' भी सटक गये....
उनको मुझसे सवाल करने के बहाने बात करने की सूझी...
मामला लीडराबाद का था...

अगल-बगल मेरे कुछ मानस-पुत्र भी मौज़ूद थे....
उन सब का तो यही कहना और मानना है -
"गुरुजी, आप कुछ नहीं समझते... आप बच्चे हैं..."

खैर शायद मैं मेन मुद्दे से थोड़ा-बहुत भटक रहा था...
आओ वापस मुद्दे पर चला जाये...
वरना बात 'गुलाब से शुरू होकर गोबर तक' चलती चली जायेगी...

हाँ, तो उस सज्जन को सवाल पूछने की सनक चढी...
वह आगे-पीछे अगल-बगल देखने की ज़रूरत भी समझने से बाज आ चुके थे...
उनको तो पूछना ही था...
सो पूछते भये....

उनका पहला सवाल था -
"गुरुजी, आपकी उमर कितनी है?"
मैंने उत्तर दिया -
"मेरी उमर केवल अट्ठारह साल ही है."
उनको यकीन नहीं हुआ...
बोले - "सच बताइए, मुझको बहकाइए मत..."
मैंने कहा - " हे मित्र, दुनिया जानती है कि मैं झूठ नहीं बोलता...
मैं तो जब भी बोलता हूँ, तो केवल सच ही बोलता हूँ....
और जब बोलने लायक सच नहीं रहता, तो नेताओं की तरह पट से बोल देता हूँ -
"नो कमेन्ट !"
भाई मेरे, मेरी उमर वास्तव में अट्ठारह साल ही है. जिस तरह आज मेरी उमर अट्ठारह साल है, वैसे ही आज से दस साल पहले भी अट्ठारह साल ही थी. उससे भी दस साल पहले वैसे ही अट्ठारह साल ही थी. और उससे भी पहले वैसे ही...

देखिए हमारे पुरखों ने कहा है -
"बरिस अठारह छत्री जीये, आगे जीये तो धिक्कार..!"
इसीलिये मैं मरने तक अट्ठारह साल का ही रहूँगा...
बिना किसी फेर-बदल के...
क्योंकि मेरी ज़बान और पत्थर की लकीर मिट तो सकते हैं. मगर किसी हालत में बदल नहीं सकते...."

तो यह तो रहा उनके पहले सवाल का जवाब !
कुछ संतुष्ट और कुछ अचरज के साथ उन्होंने दूसरा सवाल भी तड़ से दाग दिया...
पूछने लगे - "आपके बच्चे कितने हैं ?"
मैंने कहा - सही बताना तो बहुत मुश्किल है, मगर अंदाज़न यही लगभग हज़ार, दो हज़ार..."

अब उनको केवल अचरज ही होना बाकी था.
तीसरा सवाल कसमसा कर पूछ ही तो बैठे....
बोले - "आप का परिवार ?"
मैंने कहा - "मैंने तो शादी ही नहीं किया...
मेरे ये सभी बेटे-बेटियाँ ही मेरा परिवार हैं..."
इनमें से किसी से भी पूछ लीजिये कि ये मेरा परिवार हैं या नहीं..."
सब के सब एक स्वर से बोलने लगे - "गुरूजी, हम सब ही आपका परिवार हैं..."

तब तक उनको दुनियादारी समझ में आ चुकी थी...
इसलिये चालाकी दिखाते हुए सवाल किया - "अच्छा, आपकी सम्पत्ति ?"
मैंने कहा - मेरी सम्पत्ति मेरी ज़ेब या बैंक में नहीं रहती...
मेरी सम्पत्ति मेरे बच्चे ही हैं...
इनका सब कुछ मेरा ही है...
और इनको देने के लिये मेरे पास मेरी महज़ एक चीज़ ही है...
और वह है मेरा दिमाग !"

अब उनका 'तरकश' खाली हो चुका था...
मैंने उनको दोनों हाथ जोड़ कर नमस्ते किया और मस्ती से आगे चल दिया....

हाँ, तो यह हुई न बात...
और अब जब यह सब बात पूरी हो ही गयी...
तो फिर तो तुमने जो अभी मुझको 'बुढ़ऊ" कहा तो कहा...
अब कभी 'बुढ़ऊ-सुढ़ऊ' कहना मत...
नहीं, तो समझ लो, हाँ...
दोनों कान गरम कर दूँगा...."

ढेर सारे प्यार के साथ - तुम्हारा गिरिजेश
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मेरे प्यारे आदम का आज ही का वह पत्र, जिसका यह जवाब है -

हमरा गुरूवा ( मेरे हिस्से का सच)
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सुनो बुढऊ!
तुम्हे देख कर आज भी मुझे आश्चर्य होता है कि कोई इतना क्षमतावान और सतत संघर्ष के लिए बिना किसी आलम्ब और आश्रय कैसे इतनी ऊर्जा धारण कर सकता है .....

मैं तुम्हे तब से जानता हूँ जब तुम नौ साल के एक बच्चे को उसकी पहली कहानियों की किताब "चंपक" लाकर दिए थे । जिंदगी भर ठेले पर रूपये लाद कर उन्हें ठोकर मारने वाले तुम, हमेशा मेरे लिए एक अपूर्ण स्वप्न ही रहोगे क्यों कि मैं जानता हूँ कि लाख चाहने के बाद भी मैं एक दूसरा "तुम " नहीं हो सकता।

तुम्हे पता है जब आलमारी के पायदान पर पैर रखकर जूता साफ़ करने वाले आठवीं कक्षा के एक बच्चे को तुमने इतना जोर का झापड़ मारा था की आँखों के सामने नाचती चिंगारियाँ आज भी याद हैं मुझे, वह बच्चा तुम्हे बहुत गरियाया था कि इतनी छोटी बात के लिए तुमने उसे मारा ,आज मैं समझ सकता हूँ कि उसी छोटी बात के तुम्हारे करारे थप्पड़ की वजह से मैं आज गलतियाँ करने से पहले एक बार हिचकिचाता जरूर हूँ और थप्पड़ के लिए आभार तो जताया नहीं जा सकता है .......

दसवीं में तुमने मुझे अपने स्कूल से निकाल दिया, काहे कि मैं एक लड़की के सामने उस समय का फेवरेट गाना " आइ लव यू " (औजार ) गा रहा था ,मुझे लगा की तुम अविवाहित संवेदनहीन एक यांत्रिक मानव हो जिसे बस आदर्शों में जीना ही आता है लेकिन आज मुझे पता है कि तुममे मेरे लिए कुछ ज्यादा ही संवेदना थी जिसे अपनी कठोरता के आवरण में छिपाए रखा था तुमने .....

तुम्हारी गुस्से वाली आँखे देख कर मैं तब भी डर जाता था और सच कहूँ तो आज भी डर जाता हूँ काहे कि भले ही तुम जानते हो कि आज तुमको पटक दूँगा मैं, तुम अपना डंडा उठाकर कभी भी पीट सकते हो मुझे जब तुम्हे लगे की इसकी जरूरत है।

जब हिम्मत कहीं भी टूटती न हो तो कहीं न कहीं सनक का रूप ले लेती है और तुम ऐसे ही सनकी हो ................

हर बार तुम मेरे सामने मुस्कुराते थे जब तुम यह चाहते थे कि मैं पढूँ, दुनिया को जानूँ, तुम जानते थे की तुम्हारी सब कठोरता के बाद भी मैं करूँगा वही जो मैं चाहूंगा तुमने बड़ी कोमलता से चंपक की कहानियों को प्रेमचंद ,राहुल सांकृत्यायन, मैक्सिम गोर्की और समग्र जीवन दर्शन में बदल दिया.............

ई तो यार चाल थी तुम्हारी, तुम्हारी चतुराई........
ई के लिए भी मैं तुमको आभार प्रकट कर के तुम्हरी समझदारी का अपमान थोड़े न करूंगा।

लम्बे समय तक मैं तुम्हे बेकार मान कर तुम्हे भुलाया रहा, तुमसे भागता रहा लेकिन तुमने मेरी प्रतीक्षा की.......
और जब मैं अपने टूटन के सबसे कमज़ोर समय में तुमसे मिला, तुम्हारे चंद शब्दों ने ही मुझे फिर से सिखाया कि क्या करना चाहिए.......
तुमसे बात कर के ही लगा की पराजय तो होती ही नहीं है , होता है तो केवल संघर्ष और लक्ष्य की प्राप्ति ।

बस एक बात टीसती है यार ......
कि तुम्हारी किसी भी रूप में कोई मदद कही किया मैंने.....
आज भी मैं अपने ही मन की कर रहा हूँ और तुम बस देख रहे हो....
लेकिन तुम देखना इस बार मैं खुद को सही साबित करूंगा.....
मैं कहूंगा तुमसे कि "अब बताइये ! आगे क्या करना है??"

मैं तुम्हारी सामर्थ्य बनना चाहता हूँ बुढऊ काहे कि मैं जानता हूँ कि तुम्हारा अड़ियल स्वभाव बुढौती में और खतरनाक होगा और इसको केवल मैं ही झेल सकता हूँ।

बस अभी कुछ समय तक तुम खुद को स्वस्थ रखो, प्रसन्न रखो और खड़े रखो क्योंकि तुम्हारे बेवकूफ़ चेले को आज भी तुम्हारी जरुरत है।

- गंभीर आदम